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Hindi novel - Madhurani - Chapter-47 = मुलाकात

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     ..................गणेश बाबू जब अपने खयालोंसे होश मे आए ....
 उन्होने इर्द गिर्द देखा , हॉल लगभग खाली हो गया था. यानी कई लोग सरकार से मिल कर लौट चुके थे . गणेश बाबू का बेटा वीनू भी कहीं दिखाई न पड़ा. गणेश बाबू ने हॉल से बाहर आ कर देखा वीनू वहाँ भी न था

शायद उकता कर घर  चला गया होगा..

 आजकल लड़कों में कोई सब्र नहीं ..

नौकरी पाने के लिए न जाने कैसे- कैसे  पापड़ बेलने पड़ते हैं , द्वारे द्वारे घूमना पड़ता है तब कहीं जा कर नौकरी मिलती है...

उन्होने  सोचा इतने में किसी ने पुकारा

"गणेश बाबू गावंडे"

गणेश बाबू का चेहरा खुशी से चमक उठा. खुशी में अपने सामान की थैली लेने के लिए गणेश बाबू अपनी कुर्सी की ओर जाने लगे.

 "गणेश बाबू गावंडे.. कौन हैं?" उनका नाम दोबारा पुकारा गया.

"मैं.. मैं.... गणेश बाबू गावंडे .." गणेश बाबू ने अपनी थैली संभालते हुए जल्दबाज़ी में दरवाज़े की ओर आते  हुए कहा.

" अरे तो जवाब देने का क्या लेंगे जनाब..यहाँ आपका शुभ नाम चिल्ला चिल्ला कर मेरा हलक सूखा जा रहा है.." वह आदमी गणेश बाबू पर बरस  उठा .

गणेश बाबू उसकी ओर देख कर एक खिसियानी हँसी हँसे.

" जाने कैसे कैसे नमूने  मुँह उठा कर चले आते हैं यहाँ ... अब इन्ही को देखिए .. मुँह में दही जमा हुआ है इनके  .. जवाब देना ज़रूरी नही समझते .. इन्हें लगता है मानों इन्हे सब पहचानते हैं ... खुद को न जाने क्या फिल्मी हीरो  समझते हैं.." वह आदमी भुनभुनाते हुए दूसरे आदमी से कहने लगा.

 गणेश  बाबू ने डरते डरते अंदर जाने के लिए  दरवाज़ा धकेला.  उन्होने भीतर  झाँक कर देखा . सामने ही एक मुलायम सोफे पर बैठी  मधुरानी उन्हें दिखाई दी.  जिसे लोग अदब से सरकार कहते थे वह मधुरानी ही  थी . गाँव की एक मामूली दुकानदार से ... ग्राम पंचायत का चुनाव जीत कर सरपंच बनी ... फिर पंचायत समिति का चुनाव जीतते हुए ....आख़िरकार वह विधायक के पद तक आ पंहुची थी. उसके बगल में ही पाटिल बैठे थे .

उसकी इस उड़ान में यक़ीनन इन पाटिल साहब का ही हाथ होगा ... गणेश बाबू ने सोचा .

गणेश बाबु दरवाजे पर खड़े थे. लेकिन मधुरानी का ध्यान दरवाज़े की ओर न था. वह पाटिल जी से किसी मसले पर बातें कर रही थी . गणेश बाबू ने दरवाज़े को ज़रा और खोला और भीतर आ गये. लेकिन वह अंदर आए इसका ख्याल भी किसी को न था . वह दोनो अभी भी अपनी चर्चा में मग्न थे. गणेश बाबू पास ही एक कुर्सी के सामने जा कर उहापोह की स्थिति में खड़े रहे.

खुद से कैसे बैठूं किसी ने बैठने के लिए कहना चाहिए...

यूँ भी अबतक जो बेइज़्ज़ती हुई है वह कोई कम थोड़े ही  है ?...

अंदर चिट्ठी भिजवाने के बावजूद भी मधुरानी ने इतनी देर इंतेजार करवाया...

गणेश बाबू ने सोचा.

मधुरानी ने हालत के मुताबिक खुद को ढाला था , इसका सबसे बड़ा सुबूत यानी उसकी भाषा जो शहर में रह कर साफ़ हो गयी थी. वहीं उनकी अपनी भाषा सुदूर गाँवों में काम कर गँवई हो गयी थी . उनका रहन सहन भी बदल गया था पॅंट शर्ट पहनना छोड़ अब वह शर्ट और पायजामा पहनने लगे थे.

इंसान को हमेशा तरक्की की राह चलना चाहिए .. जैसे मधुरानी चली ...मेरी तरह उल्टी दिशा में नहीं... उन्होने सोचा

उसके हाव भाव में यूँ तो कोई ख़ास फ़र्क नज़र नहीं आया. यूँ भी उसकी अदाएँ किसी रानी से कम न थी.
धीरे - धीरे पाटिल साहब और मधुरानी की चर्चा गर्म होते- होते फिर बहस में बदल गयी. मधुरानी अपनी बात ज़ोर दे कर मनवाना चाहती थी. लेकिन पाटिल जी थे की समझने को तैयार ही न थे , बहस गर्म होती जा रही थी. गणेश बाबू को महसूस हुआ की कहीं वे  ग़लत समय पर तो न आ गये ? शायद थोड़ी देर और राह देख सकते थे. गणेश बाबू बाहर जाने को जैसे ही मुड़े तभी मधुरानी का ध्यान उनकी ओर गया.

"आइए गणेश बाबू विराजिये" मधुरानी ने थोड़ी देर अपनी चर्चासे बहार आते हुए कहा.

गणेश बाबू को  मानो उसके साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आने लगे  - उसकी वही चंचल शोख आँखें , वही शरारती मुस्कुराहट. उन्होने उसकी ओर देखा. यही चीज़ें आज भी कायम थी केवल समय के साथ चेहरे पर थोड़ी गंभीरता आ गयी थी. उसने  एक पल भी एहसास होने न दिया की कुछ देर पहले वह ताव ताव में बहस कर रही थी, यूँ तो अपने चेहरे के हाव भाव एक पल में बदलने  की उसे महारत हासिल थी और गणेश बाबू इस बात से खूब वाकिफ़ थे.

गणेश बाबू सकुचाते हुए मधुरानी के सामने सोफे पर बैठ गये.

"बड़े दिनों बाद मिलना हुआ.." मधुरानी ने उलाहना देते हुए कहा.

गणेश बाबू हौले से मुस्कुराए.

"कहिए कैसे आना हुआ..?" मधुरानी ने पूछा

पाटिल जी ने पहचान दिखाना भी ज़रूरी न समझा. पाटिल जी  गुस्से में तड़ से उठ बैठे और पैर पटकते हुए वहाँ से चले गये. मधुरानी  चोर निगाहों से उनको जाते हुए देख रही थी.

" मधुरानी... मॅडम"  सिर्फ़ मधुरानी कहना उचित न होगा ऐसा जानकार गणेश बाबू ने उनके नाम के आगे मॅडम जोड़ा. 'मॅडम' कहते हुए गणेश बाबू थोडा  रुके .

मधुरानी ने कोई ऐतराज़ न जताया "हाँ… हाँ  .. कहिए रुक क्यों गये?"

"मॅडम वह मेरे तबादले के बारे में कुछ कहना था.."

"याने तबादला कराना है या रुकवाना है..?"

"रुकवाना है.."

"ठीक है ... ठीक है...एक काग़ज़ पर आप अपना पद , वरिष्ठ का नाम और इलाक़ा इत्यादि बातें ज़रा विस्तार में लिखिए...बाकी हम देखते हैं.."

गणेश बाबू  ने तुरंत अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला और मधुरानी के सामने रखते हुए बोला  " यह रही अर्ज़ी मैने इसमे सब कुछ लिखा है"

"नहीं मेरे पास नहीं .. बाहर दरवाज़े के करीब हमारे सेक्रेटरी साहब बैठे हैं उन्हीं को दीजिए.."

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद मॅडम.."

"अरे गणेश बाबू आप तो हमें शर्मिंदा कर रहे हैं" मधुरानी ने कहा.

"लेकिन काम तो हो जाएगा न  मॅडम.."

"होगा होगा यक़ीनन होगा...फ़िक्र न करें.." मधुरानी ने जवाब दिया.

मधुरानी का इशारा समझ कर गणेशबाबू  वहाँ से चलने को हुए.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi literature - Madhurani - Chapter 46 - बेचैनी

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     पिछली दो रातों से गणेश की  आँख न लग पाई थी सोमवार रात भी उसने उसी बेचैनी में काटी .

अच्छा हुआ जो समय रहते मुझे माधुरानी का सच पता चल गया...

लेकिन मैं अब भी न जाने क्यों बैचें हूँ? …  गणेश परेशन हो उठा .

सुबह उठ कर गणेश नहाया धोया , दाढ़ी बनाई . बैग में से धुले हुए इस्त्री किए हुए कपड़े निकाल कर पहने और बैग बंद करी. सारजा बाई को उसने कल ही इत्तला कर दी थी . बैग  ले कर वह घर से बाहर निकला और दरवाज़ा बंद कर ताला लगाया . ताला लगाते समय उसने यह सोच लिया की वह दुकान की ओर न देख कर सीधे बस स्टाप जाएगा.

ताला चढ़ा कर वह मुड़ा और बोझिल कदमों से चलने लगा लेकिन उसके कदम बरबस ही उसे माधुरानी की दुकान की ओर ले जाने लगे .

"कैसे हो गणेश बाबू.. दो रोज हो गये आपको देखे बगैर" मधुरानी उसे दुकान की ओर आते देख बोल उठी " कुछ जी ठीक ना था का?"

" हाँ ज़रा तबीयत ठीक न थी..."

"और ए बॅग उठाए तालुका जा रहे हो का?"

गणेश को अब  अहसास हुआ की इसने मज़ाक में ही सही उसकी बीवी के बारे में अब तक  कभी कोई पूछताछ न की थी.

" हाँ वहीं जा रहा था"

" ए अच्छा हुआ .... हमरी दुकान का भी काफ़ी समान ख़त्म हुई गवा है और आप तालुका जा रहे हो"

 गणेश मौन खड़ा रहा.

" ए लीस्ट  लीजियो  हमने  विलास से बनवाई रही ..."

उसने लिस्ट उसे थमाते हुए कहा , उसने लिस्ट अपनी जेब में रखी और चलने के लिए मुडा.

" ओ गणेश बाबू रुकिये तो ज़रा समान कैसे लावेंगे ?  ए  बड़ी थैली रखिए "

गणेश ने वह थैली लेने के लिए हाथ बढ़ाया . हाथों में थैली लेते हुए  मधुरानी के  नर्म मुलायम हाथों का स्पर्श पा कर वह रोमांचित हो उठा.

यही वो नर्म अहसास ... यही वह  नाज़ुक सी छुअन....

उसकी सारी उदासी मानों गायब से हो गयी थी एक नया जोश उसकी रगों में दौड़ रहा था.  उसने दूसरा हाथ थैली पकड़ने के लिए आगे बढ़ाया और मौका पा कर उसे छू लिया , उसने मधुरानी की आँखों में आँखें डाल कर देखा:

वही शोख नज़र...

वही मीठी मुस्कान ...

उसकी  सारी उदासी दूर हो गयी.  वह बड़े जोश में थैली उठाए बस स्टाप की ओर बढ़ा . गली में मुड़ते वक्त उसने मधुरानी की ओर देखा. वह अब भी उसकी ओर देख कर मुस्कुरा रही थी. वो गली में मूड गया और तेज कदमों से बस स्टाप को ओर चल पड़ा. उसे अब पूरी तरह  अहसास हो गया था की वह भी अब   मधुरानी की कार्यकर्ता मक्खियों के झुण्ड में  में शामिल हो गया था.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 45 रुसवाई

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     रात  भर  मधुरानी के बारे में सोच सोच कर वह बैचैन रहा. उसे ऐसा लग रहा था मानों अभी के अभी वह उठ कर जाए और उसका गला घोंट कर उसे जान से  मार डाले और उसका कच्चा चिट्ठा गाँव वालों के सामने खोल दे . उसने सोचा -

कितने लोग ऐसे होंगे जिन्हें मधुरानी ने यूँ बेवकूफ़  बना कर अपने जाल में फँसाया होगा ?…

 लोगों की छोड़ो क्या  मुझमे  यह कहने की हिम्मत  है  कि मधुरानी ने मेरे जज्बादों के साथ खेल खेला ?…

 और  यूँ भी  कह कर  क्या हासिल होगा ?....

 उल्टे जग हंसाई होगी सो अलग ...

शायद  चुप रहना ही बेहतर है ..

क्या इसके अलावा मेरे पास कोई चारा नहीं?....

 क्या मुझे उसके पास जा कर उसे समझाना चाहिए कि लोगों के जज्बादों के साथ यूँ खेल खेलना बंद करो ?…

क्या वह मेरी बात वाकई सुनेगी ?....

मुझे नहीं लगता कि वह बदजात  औरत कुछ समझेगी .....

जो औरत अपने पति के हत्यारे से हाथ मिला सकती है वह किसी भी हद तक  गिर सकती है ..

उसे समझने में मुझसे बड़ी भूल हो गयी.....

रह रह कर गणेश के मन में यह ख्याल आते . अब उसका सिर दर्द से मानों फट रहा था लेकिन ख्याल तो फिर ख्याल थे जो आते थे, फिर जाने का नाम न लेते थे. वह बैचेनी में मानों पागल हो उठा. .दो दिन हो गये गणेश का कहीं मन नहीं लग रहा था. दो दिन से  उसने खुद को कमरे में क़ैद कर रखा था . दो दिन से न उसने  नहाया था , न दाढ़ी बनाई थी , वह पूरी तरह निराश हो गया था. उसका भ्रम जो  टूट गया था, अब उसे  समझ आया की इश्क़ में पागल होना क्या होता है. उसने कापी पेन लिया, क्योकि  उसके दिमाग़ में शायरी पनप रही थी. उसने दो लाइन लिखीं और अपने दिल के ज़ज्बात  काग़ज़ पर उतार दिए:

 वाह .. क्या शायरी है मानों किसी फिल्मी गाने के बोल हों..

हाँ यह तो किसी पुरानी फिल्म का गीत है..

 वह दुबारा कुछ लिखने लगा. दो तीन लाइन लिख कर उसने  काग़ज़ फाड़ कर फेंक दिया. उसकी शायरी के बोल किसी फिल्म के गीत से मेल खा रहे थे.

सोचा था  जी लेंगे तेरे प्यार के सहारे
लेकिन अब हम प्यार में हारे
तो जी लेंगे नफ़रत के ही सहारे
मरेंगे नहीं जी लेंगे.
छोड़ेंगे सब लेकिन  जीना न छोड़ेंगे

वह बड़ा जज्बाती   हो कर कुछ लिखने की कोशिश कर रहा था. लेकिन लफ़्ज़ों के बजाए उसने  अपने ज़ज्बात  काग़ज़ पर उतार दिए थे  . उसके दिलो दिमाग़ पर छाया बोझ कुछ हल्का हुआ . उसे इस बात की खुशी हुई की वह शायरी भी कर सकता है....  शायद इंसान यूँ ही दर्द में खुशी ढूँढना पसंद करता है.

     दो दिन शनिवार और इतवार थे. शायद इसलिए किसी को गणेश का ख्याल न रहा . लोगों को लगा कि दो दिन वह अपने घर गया होगा. लेकिन आज सोमवार को भी जब गणेश आफ़िस  न आया तो सरपंच जी खुद उसका हाल जानने उसके घर पधारे.

"क्यों गणेश बाबू .... जी ठीक ना है का ? आज ऑफिस में दिखे नहीं "

" हाँ ज़रा लेटा हुआ था .. कुछ तबीयत ठीक नही है"

"का  ज्वर चढ़ आया है ?" कहते हुए सरपंच जी ने उस पर हाथ रखा और कहा.

"ज्वर तो न है..... कई दिन होई गये हैं अपनों को साथ न पा कर शायद आप उदास हैं" सरपंच जी मुस्कुराते बोले

" हुम्म...." गणेश ने कहा.

"यह सरपंच जी ने अच्छा सुझाव दिया घर जाने का ...

थोड़ी आबो हवा बदलेगी..

यूँ कितने दिन अकेले रहूँगा मैं?....

गणेश ने सोचा. फिर उस दिन कई लोग उससे आ कर मिले. लेकिन मधुरानी न आई. गणेश को अब भी उम्मीद थी की मधुरानी उससे मिलने ज़रूर आएगी. उसे याद आई.…  वह शरारती नज़र , .... उसके हाथों की वह नर्म नर्म छुअन.

नहीं अब यह सब नहीं होगा.... उसने अपने मन में आए ख्याल को झटक दिया.

गणेश ने फ़ैसला कर लिया की वह अब मधुरानी से कोई रिश्ता नहीं रखेगा. वह उठा और अपने घर जाने के लिए बॅग  भरने लगा. लेकिन उसे  अहसास हुआ की घर जाने की बात को लेकर वह उतना  उत्साहित न था.  वह समझ न पा रहा था की ऐसा क्यों था. आख़िर इतने दिनों बाद वह बीवी से मिलने  जा रहा था फिर भी उससे मिलने को लेकर वह उत्साहित न था.  शायद इस मधुरानी के चक्कर में वह इतना उलझ चुका था की उसे बीवी बच्चों का ख्याल न रहा .

लेकिन अब ऐसा कभी नहीं होगा अब इस मधुरानी का किस्सा ख़त्म .... बिल्कुल ही ख़त्म.... गणेश ने मन ही मन  दोहराया.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 44 गोदाम में

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     मधुरानी के गोदाम की तरफ जाते हुए उसने बैलगाड़ी की ओर एक नज़र देखा . बैल पास ही एक खूँटे  से बँधे  बैठ कर  थके - हारे चारा  चर  रहे थे. गणेश को बैलगाड़ी में कुछ अनाज फैला हुआ दिखाई दिया. उसने पास जा कर देखा तो  बैल गाड़ी खाली थी .

शायद बोरियाँ अभी अभी ही गोदाम  में रखी गयीं थी.... शायद बोरियाँ रखवाते समय  हुई आवाज़ की वजह से ही  मेरी नींद टूटी ....

गणेश गोदाम के दरवाज़े की ओर बढ़ चला. दरवाज़े के पास जाते ही वह  ठिठका  भीतर संभाजी और मधुरानी बातें कर  रहे थे . बाहर अंधेरे के कारण उनको दरवाज़े पर खड़ा गणेश दिखाई न दिया . गणेश ने और करीब जा कर उनकी बातें  सुनने की कोशिश की. उसने देखा मधुरानी ने संभाजी के दोनो हाथ हाथों में लिए थे और बोली,

"संभा जी एक आप ही हैं  जो खुशी खुशी हमारे वास्ते इतना काम करे हैं ...वरना हम  पर तो अपनी खेती गिरवीं रखने और भूखे प्यासे जीने की  नौबत आ जाती"

यहाँ गणेश के मानों  पाँवो तले ज़मीन खिसक गयी थी , उसका दिमाग़ मानों फट रहा था. ऐसा लग रहा था मानों कोई अपनी  बंदूक से तमाम गोलियाँ उसके सिर में बेरहमी दागे जा रहा था . मौके का  लाभ  उठा कर संभाजी ने उसको बाँहों  में भरने की कोशिश की . 

"अरे हमने ताला जाने कहाँ रख दिया रहा ?" कहते हुए बड़ी सफाई से उसने खुद को उसकी बाँहों की पकड़ से छुड़ाया .

"कहीं ईहाँ बोरियों के बीच तो ताला चाभी दब न गयी?"

उसने कहा और कमरे में इधर - उधर घूम कर ताला  ढूँढने लगी , इतने में उसके पैरों के पास से एक चूहा भागा उसने झपट कर उस चूहे को बड़ी बेदर्दी से  अपने पाँवों  तले  कुचल कर मार डाला.

कैसी पत्थर दिल औरत है यह... गणेश ने यह देख कर सोचा  … न  कोई जजबात न कोई रहम …

उसे ऐसे लगा मानों वह खुद वही बदनसीब  चूहा हो.  गणेश सोच रहा था:

मैं भी कैसा बेवकूफ़ हूँ जो इसके प्रेमजाल में फँस गया... अगर मैं खुद  आ कर यह सब न देखता तो इसको चूहा मारते देख इसकी बहादुरी का कायल हो  जाता.…

"अरे हम बड़े भुलक्कड़ हो गये हैं , ताला चाभी तो ई हाँ रखी रही" ऐसा कहते हुए उसने एक खाने से  ताला चाभी
उठाते हुए कहा " संभाजी  ...का टेम हुआ रहा?" उसने संभाजी से समय पूछा.

"ग्यारह...बारह बजे होएंगे" संभाजी ने  जवाब दिया.

" बड़ी देर होई गयी रही" कहते हुए वह दरवाज़े के करीब  आने लगी.

उसको करीब आता देख गणेश वहाँ से फ़ौरन हट कर आड़ में खड़ा हो गया.  वह सोचने लगा:

तो इस औरत का  चाल-चलन ठीक नहीं है...  यह तो हर किसी पर डोरे डालती है , यूँ तो कई पंछी इसने अपने जाल में फँसाए होंगे...

गणेश लंबे लंबे डग भरता हुआ अपने  कमरे की तरफ  गया , दरवाज़े पर  चढ़ि  सांकल खोल कर वह भीतर गया और अंधेरे में खिड़की के सामने खड़े हो बाहर  झाँकने लगा . मधुरानी ताला  ले कर गोदाम के बाहर दरवाज़े के पास खड़ी हुई थी , धीरे धीरे संभाजी उसके  पीछे पीछे चलता हुआ गोदाम से बाहर आया, .मधुरानी ने उसको ताला पकड़ाया और  ताला  पकड़ाते वक्त उसने जान  बूझ कर अपने हाथों से उसके हाथों को छुआ.  शायद उसने उसकी हथेलियाँ  भी दबाई हों. गणेश की आँखों पर पड़ा    मधुरानी के प्यार का पर्दा  परत दर परत  दूर हो  रहा था. कभी उसे खुद पर गुस्सा आता तो कभी मधुरानी पर.  फिर संभाजी ने गोदाम के दरवाज़े पर ताला लगाया और चाभी मधुरानी को  पकडाई . चाभी देते समय उसने  भी जान बूझ कर उसके हाथों को छुआ . मधुरानी चाभी लेकर अपने घर की ओर गयी और दरवाज़े पर खड़ी हो कर  मुडी और उसने  संभाजी की ओर देख एक मीठी मुस्कान दी. फिर घर के भीतर गयी और संभाजी की ओर देखते हुए धीरे धीरे किवाड़ बंद किए . इधर  संभाजी खोए खोए से उन बंद किवाडो की तरफ ताक रहा था. गणेश के दिमाग़ की नसें मानों फट सी रहीं थी. उसे मधुरानी के साथ बिताया एक एक लम्हा याद आ रहा था..

उसकी वह चंचल शोख अदाएं …

उसकी वह घायल कर देने वाली  नशीली नज़र  …

उसकी नाज़ुक मदहोश करने वाली  मीठी छुअन …

याने की मधुरानी ने उसे भी अपने जाल में फाँस रखा था... संभाजी को फँसा कर वह उससे अपनी खेती - बाड़ी के काम  करवाती थी..लेकिन मुझे फँसा कर उसे  आख़िर क्या हासिल हुआ? …

फिर उसे अहसास हुआ कि  मधुरानी की दुकान का सारा  हिसाब-किताब वही किया करता और तालुके से दुकान के लिए माल भी वही लाया  करता . वह यह काम इतने अपनेपन से करता कि  उसे इसका कभी अहसास ही न हुआ कि मधुरानी उससे अपना काम निकलवा रही है. हालाँकि  उसने अपनी खुशी  से यह ज़िम्मेदारी ली थी. क्योंकि  इसके पीछे उसका  छुपा मकसद यह था की  उसे  मधुरानी के आस पास रहने का मौका मिले  . मधुरानी ने खुद हो कर उसे कभी कोई काम करने के लिए नहीं  कहा था …  लेकिन हाँ उसने  वैसा माहौल बनाया था.

कैसी धूर्त और चालाक औरत है यह...
 
कोई भी चीज़ मधुरानी की शख्सियत को बयान नहीं कर सकती थी …  अब कहीं जा कर  वह मधुरानी के चरित्र को समझ पा रहा था

वह एक रानी थी , जैसे मधु मक्खियों में  रानी मक्खी होती है वैसी  …  

और मैं उसके झुंड की एक मामूली सी  कार्यकर्ता मक्खी, मैं बेवकूफ़ था जो उसके आस पास मंडराने के लिए उसके छोटे मोटे  काम किया करता था …   उसने सोचा

लेकिन मधु मक्खियों के इस झुंड में नर मक्खी कौन है? … उसे यह सवाल अब सताने लगा …

... पाटिल साहब , सरपंच जी ? संभाजी ?? या उसकी दुकान में काम करने वाला वह लड़का? या फिर कोई और???.. कोई भी  …

हो सकता है . अब तक मैं इस ग़लतफहमी में जी रहा था  की वह सिर्फ़ मेरी है ...

उसकी इन हरकतों ने मेरे दिल को तोड़ दिया और टूटे  शीशे  के टुकड़ों की तरह मेरा दिल हज़ार टुकड़ों में टूट कर बिखर गया...

मैं बेवकूफ़ था जो उसकी चिकनी चुपड़ी बातों  में आ गया …

गणेश से यह बर्दाश्त नहीं हो रहा था की उसे मधुरानी ने बेवकूफ़ बनाया 


क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel Madhurani - CH-43 - वह कहाँ गयी

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     गणेश सुबह जब मधुरानी की दुकान पर आया तो उसे मधुरानी कहीं दिखाई न दी . गल्ले पर पड़ोस का लड़का विलास बैठा दिखाई दिया . मधुरानी अपने दुकान का हिसाब-किताब  उसी से कराती. गणेश ने सोचा उसी से पूछ लिया जाए की आख़िर माधुरानी कहाँ गयी. लेकिन वह चाह कर भी कुछ  पूछ न सका.

पता नहीं वह क्या सोचे .. इतनी सुबह सुबह उससे पूछना ठीक न रहेगा .. वह शायद यहीं आस पास होगी आ जाएगी …

उसने सोचा और वहाँ से निकल गया. दोपहर में दुकान बंद होने से पहले वह वहाँ दोबारा गया. तो उसने देखा मधुरानी दुकान पर अब भी मौजूद न थी. और वहाँ विलास ही बैठा हुआ था . गणेश ने उसको कभी इतनी देर दुकान में यूँ बैठे न देखा था .. यूँ तो गणेश  दुकान को अपने कमरे की खिड़की से भी देख सकता था लेकिन बिना वहाँ जाए उसको चैन कहाँ?

वह कहीं गाँव तो नहीं चली गयी?  लेकिन यूँ इस तरह बिना बताए ? …

गणेश ने दोबारा सोचा की वह विलास से उसके बारे में पूछे. लेकिन उसने अपनी इच्छा को दबा दिया . बाद में जब वह शाम को लौटा तो वहाँ मधुरानी को न देख उससे रहा न गया-

" क्यों भाई आज तुम दुकान पर कैसे बैठे हो?" उसने विलास से पूछा ,

लेकिन वह सीधे थोड़े ही न बताने वाला था

 "का काम है बाबूजी?"

" नहीं भाई यूँ ही पूछ लिया " चेहरे पर कोई शिकन न लाते हुए उसने कहा लेकिन वह भी बड़ा चालाक
था.

" सुबह से देखूं हूँ साहब जी ...आप दुकान के चक्कर लगवे जा रहे है" उसने गणेश की ओर घूरते हुए पूछा.

 अब गणेश ने सीधे सीधे पूछ ही लिया " हां भाई थोड़ा काम ही था .... कहाँ गयी वह?"

 हार कर उसे भी सीधा जवाब देना ही पड़ा " वह खेत गयी है"

"खेत में ...? खेत में क्या फसल काटने गयी है?" गणेश ने जान बूझ कर मजाकिया लहज़े में कहा और हंस पड़ा.

" ना ना साहबज़ी उसकी फसल का गाहना है आज के रोज... उसी  काम के लिए गयी रही है वह "

" गाहना? ... पर वह सब काम तो संभाजी देखते हैं.."

" अब हमको ई बात की खबर कैसे होई ? हम अपना काम देखे या ई फालतू चीज़ें देखे?" लड़के ने  तड से कह दिया और दुकान पर आए ग्राहक से बात करने लगा .

गणेश ने उसके और मुँह लगना ठीक न समझा और सोचने लगा  …  अब ये फसल गाहने क्यों गयी होगी ? अब तक उसे आ जाना चाहिए …

चाहे जो हो उस की वजह से तो इस उबाऊ गाँव की  नीरस नौकरी में टिका हुआ हूँ वरना कभी का चला जाता...

     देर रात  उसके बारे में सोचते हुए जाने कब वह गहरी नींद में डूब गया उसे मालूम ही न चला . अचानक वह बिस्तर पर उठ बैठा , मधुरानी का ख्याल उसके मन में आया:

 क्या वह लौटी होगी ? चल कर देखता हूँ …

गणेश  बिस्तर से उठ कर खिड़की के पास आया, वहाँ से झाँकते  हुए उसने देखा माधुरानी के घर के  बगल  में एक कमरे के सामने सड़क पर  बैलगाड़ी खड़ी थी . माधुरानी उस बगल के कमरे का उपयोग बतौर गोदाम करती थी , शायद उसके खेत से माल आ गया था और वह बोरियाँ  गोदाम में रखवा रही थी.

यूँ भी अब नींद  आने से रही .. चल कर मधुरानी से बतिया लेता हूँ... तब ही चैन आएगा …  यह सोच कर वह उठा और बदन पर शर्ट पॅंट पहन लिया.  गर्मी  के दिन थे  लिहाज़ा  गणेश बनियान और कच्छा पहन कर सोता था . तैयार हो कर वह कमरे से  बाहर आया और दरवाज़े पर सांकल चढ़ा कर वह माधुरानी के गोदाम की ओर चल पड़ा.


क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 42 चलते - चलते

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     यूँ ही नाले के किनारे चलते - चलते गणेश बहुत दूर निकल आया था . उसने यों ही पीछे मुड़ कर देखा किनारे से मधुरानी और अन्य महिलाएँ ओझल हो चुकीं थी . मोड़ पर किनारे बड़े बड़े वृक्ष थे . गणेश ने एक जगह लोटे से पानी उडेल दिया.

मैं भी कितना बेवकूफ  हूँ बिना  वजह यह बोझ ले कर चल रहा था …

उसने सोचा , नाले के कल कल बहते पानी के संगीत का आनंद  लेते हुए, लहलहाते खेतों को देखते हुए गणेश अपनी राह आगे बढ़ा जा रहा था.

बस अब बहुत हुआ .. चलते चलते काफ़ी आगे निकल आया .. अब वापिस चलना चाहिए ... यूँ भी काफ़ी समय बीत गया सो वैसे भी किसी को शक नहीं होगा  …

 गणेश लौटनेकी सोच ही रहा था कि उसे थोड़ी दूर नाले के बहते उथले पानी में दो लोग कुछ करते हुए दिखाई दिए.

क्या कर रहे हैं यह लोग ? चल कर देखता हूँ .. यूँ भी आज लौट कर आफ़िस में करने लायक कुछ खास काम नही है …

वह लौटने का विचार छोड़ कर उन लोगों की दिशा में आगे बढ़ने लगा . थोड़ा करीब जा कर उसने उन लोगों में से एक को पहचान लिया -

यह तो महदू है...रोज क्रिकेट खेलने आम के बगीचे में आता है , इस दूसरे लड़के की शक्ल भी जानी पहचानी लग रही है... मधुरानी की दुकान के आस पास यह घूमता रहता है …

नीचे झुक कर वह लड़के रेत में कुछ कर रहे थे.

आख़िर क्या कर रहे हैं यह लड़के? …

गणेश की जिज्ञासा जाग उठी , गणेश उनके करीब जाने लगा  . गणेश को पास आते देख महदु ने पूछा,

" बाबू जी रास्ता भूल गये रहे का?"

फिर गणेश के हाथ में लोटा देख कर वह बोला

" शौच के लिए ..? हैं? इतना दूर ?"

गणेश ने उसके सवाल को नज़रअंदाज़ कर उनके साथ नीचे बालू में बैठते हुए पूछा,

" तुम दोनो लड़के क्या कर रहे हो?"

"मछली पकड़े हैं साहब जी और का करेंगे?" उसने जवाब दिया .

"मछलियाँ? वह कैसे?"

गणेश ने देखा बालू में पानी के बहाव को एक तरफ मोड़ा गया था.

" ई देखो साहब जी ... ईहाँ हमने ई गड्ढे मा पानी का बहाव मोड़ा रहा .. ए नाली के ज़रिए गड्ढे में पानी आवत है.... उ पानी जब ई गड्ढे मा बह कर आवे है तो उ बहाव के संग मछली भी ई गड्ढे में आवे है ... जब कोई बड़ा मछली का झुंड आवे रहा तो हम ए नाली का मुहाना बंद कर देवे हैं और ई गड्ढे में मछली फँस जात है"

गणेश ने देखा वाकई उस नाली के बहाव के साथ साथ कई मछलियाँ बह कर गड्ढे में आ गयीं थी और वहीं फँस गयीं थी.

"समझा" गणेश बोला "लेकिन तुम इन मछलियों को पकडोगे कैसे ?"

" बाबू जी उ  नाली का मुँह जब  बंद किए रहे तो ई गड्ढे का पानी ,  ई बालू सोख लेगी और बिन पानी के मछलियाँ तड़प तड़प कर मार जावेगी"

 " क्या बात है... बढ़िया तरकीब निकाली है" गणेश  चहक कर बोला .

गणेश वहीं एक चट्टान पर बैठ कर उनको मछलियाँ पकड़ते हुए देखने लगा. कुछ देर बाद उसकी नज़र दूसरे किनारे पर खड़े दो लोगों पर गयी जो पानी में उतार कुछ निकाल रहे थे .

"वह लोग क्या कर रहे हैं? " गणेश ने पूछा

" उ लोग बाबू जी ? उ लोग पटुआ निकाले रहे" महदू ने  बहाव रोकते हुए कहा.

 फिर  गणेश के साथ आ कर खड़ा हो गया , उधर दूसरा लड़का  वहीं गड्ढे के पास खड़ा हो गया.

"पटुआ??" गणेश ने पूछा "पटुआ ऐसे निकालते हैं?"

"फिर.. आपको का लगा?" महदू ने पूछा.

 गणेश चलकर उन लोगों के करीब पहुँचा उसने देखा वह लोग नाले के एक जगह शांत पानी से कुछ टहनियाँ  निकाल रहे थे.

"कौन सी टहनियाँ है यह और यह इन्होने पानी में क्यों डुबो कर रखी है?"

 "साहब जी ई पटुए की टहनियाँ है आपके यहाँ इसको  सायद पटसन बोले होंगे"

 उन्होने देखा वह लोग पानी में भीगी  टहनियों को निकाल कर उस की  छालों को अलग कर रहे थे . उन्हीं छालों से पटुआ बनता था.

"इन टहनियों की छालें तो बड़ी आसानी से वह लोग निकाल रहे हैं"

" उ लोग ई टहनियों को हफ़्ता भर पानी में डुबाए रहे "

" अच्छा  तो यह लोग इन टहनियों को मुलायम करने के लिए पानी में रखते हैं"

"पटुआ निकालने का ए ही तरीका है बाबू जी" महदू ने जवाब दिया .

 उन्होने देखा उन छालों को पानी से साफ करने  के बाद कुछ  रेशे निकाले गये थे. उनको उन्होने वहीं धूप में सूखने डाला था. गणेश बड़े गौर से उनको पटुआ निकालते हुए देख रहा था. उसे याद आया बचपन में उसने स्कूली किताब  में  पढ़ा था कि बंगाल और बिहार में पटुए की खेती अधिक होती है , लेकिन उसे मालूम न था कि पटुए की खेती इस प्रकार होती है . गणेश अपने विचारों में इतना खो गया था कि उसे अहसास ही न हुआ कि वह किसलिए आया है , फिर अचानक उसे होश आया:

अरे बाप रे.. बड़ी देर हो गयी मुझे ...पता ही नहीं चला वक्त  कैसे गुजर गया ...शायद मधुरानी अब तक वहीं हो  …

वह लंबे लंबे डग भरता वापस चल पड़ा . चलते चलते  वह उस जगह के करीब आ पंहुचा जहाँ मधुरानी को उसने  कपड़े धोते  देखा था किंतु मधुरानी अब वहाँ न थी.

धत्त तेरे की ... शायद मुझे आने में ज़रा  ज़्यादा ही देर हो गयी माधुरानी तो कब की लौट गयी …

उसने सोचा  …  खैर...अभी नहीं तो थोड़े समय बाद दुकान पर  आएगी

.. लेकिन इस रूप में नहीं …

 वह चलते हुए उस चट्टान के पास आया जहाँ मधुरानी  कपड़े धो रही थी. उसने देखा उस चट्टान के आस पास बालू में मधुरानी के पदचिन्ह उभर आए थे उसने गौर किया बालू में किसी ने कोई चित्र बना रखा था.

शायद यह चित्र मधुरानी ने ही बनाया होगा …

 उसने देखा चित्र में एक स्त्री गालों पर हाथ रख दूर किसी की बाट जोह रही थी .  उसने मन ही मन कहा …

ओह ... तो मधुरानी यहाँ मेरी राह देख रही थी …

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel Madhurani - Chapter_41 धुलाई

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     गणेश चलते हुए पुल पर पहुँचा .. पुल की दाईं जगह काफ़ी चट्टानी थी और बीच में शायद गहरी खाई थी, इसलिए दाईं तरफ कपड़े धोतीं हुई महिलाएँ दिखाईं नहीं दे रहीं थी .  दाईं ओर ही लड़कों का जत्था पानी में खेल रहा था . लड़के उँची चट्टान पर चढ़  कर पानी में छलाँग लगा रहे थे. लड़के अपने खेल में सुध बुध खो बैठे थे. पुल के बाईं तरफ नाला ज़रा उथला और  सपाट था , उसी जगह  कपड़े धोतीं हुईं महिलाओं का झुंड दिखाई पड़ा . उस उथले पानी में चट्टानों पर  औरतें पटक पटक कर कपड़े धो रहीं थी . फट फटाक की आवाज़ पूरे वातावरण में गूँज रही थी , पास ही उन औरतों के बच्चे पानी में खेल रहे थे . कभी कोई बच्चा पानी में पत्थर फेंकता तो छपाक की  आवाज़ से पास खड़े बाकी बच्चों का मनोरंजन होता और वो ताली  बजा कर खिलखिला कर हंसते .

     गणेश पुल से बाईं तरफ नीचे आ कर  कर नाले के पानी में उतरा . उन औरतों के बीच उसकी नज़रें मधुरानी को खोज रहीं थी . उसे पीली साडी पहनी हुई मधुरानी दूसरे किनारे पर कपड़े धोती हुई दिखाई दी. उथले नाले में रास्ते  बनाते हुई किसी प्रकार दोनों हाथों से अपनी पतलून और लोटा समहालते हुए वह दूसरे किनारे की ओर आगे बढ़ रहा था . पानी ज़रा गहरा होता जा रहा था, इसलिए बीच में एक जगह वह रुका , लोटा वहीं उसने एक सपाट पत्थर पर रखा और अपनी पतलून को उपर खोंस लिया ताकि वह पानी में भीगने से बची रहे . इसके बाद उसने सावधानी से पानी में कदम रखा . एक जगह नाले में यों ही गुज़रते हुए उसे छोटी छोटी मछलियों का झुंड नज़र आया जो उसके पानी में पैर रखते ही इधर उधर बिखर गया . पानी अब घुटनों तक पंहुच चुका था और उसकी लाख कोशिश के बावजूद उसकी पतलून के किनारे गीले हो गये थे . आख़िरकार वह दूसरे किनारे पर पंहुच ही गया . वहाँ पंहूचते ही उसने लोटा एक चट्टान पर रखा और अपनी खोंसी हुई पतलून ढीली छोड़ दी . उसने  किनारे पर नज़रें घुमाई , पास ही  मधुरानी कपड़े धोने में मग्न थी . गणेश लोटा ले कर उसकी ओर बढ़ने लगा .  उसने  वापस मधुरानी को देखा वह सुध बुध खो कर कपड़े  धो रही थी. कपड़े धोते समय साड़ी न भीगे इसलिए उसने अपनी साड़ी घुटनों के उपर खोंस रखी थी जिससे उसकी गोरी गोरी टाँगों के दर्शन गणेश को हो रहे थे . गणेश को उसकी मांसल गोरी  टाँगें  लुभा रहीं थी . कपड़े घुमा कर चट्टान पर पटकते हुए उसके उरोजो की हलचल मानों गणेश को दीवाना बना रहीं थी वह उसको ताके जा रहा था . वह उसके एकदम करीब  पंहुच गया था . उसकी पद्चाप सुनकर उसने पलट कर देखा , गणेश को देख कर वह लजा कर हंस पड़ी फिर   सम्हल कर अपनी खोंसि हुई साड़ी को नीचे किया, फिर पल्लू संभाल कर बगल में रखी बाल्टी से कपड़े निकल कर उन्हें निचोड़ने लगी. बीच बीच में वह चोर आँखों से गणेश की ओर देख रही थी. गला साफ करते गणेश ने उससे कहा

 " अच्छा तो रोजाना कपड़े  धोने तुम इस तरफ आती हो"

" का करे बाबूजी इधर गाँव में आपके सहर के जैसे नल ना है , इसलिए हमका ई हाँ नाले में कपड़े धोने आना पड़ता है" उसने जवाब दिया ,

गणेश अब भी उसे निहार रहा था , अचानक उसे अहसास हुआ यहाँ और भी लोग हैं और वह उसकी ओर देख रहे हैं  , वह किसी को बातें बनाने का मौका देना नहीं चाहता था, इसलिए लोटा उठा कर वह आगे बढ़ा. पीछे मुड़ कर उसने देखा , मधुरानी ने कपड़े वहीं सूखने के चट्टान पर बिछाए थे, फिर भी वह अपनी चोर निगाहों से उसी को देखे जा रही थी. गणेश ने सोचा:

 किस्मत भी न जाने क्या गुल खिलाती है , मधुरानी जैसी बला की खूबसूरत और हिम्मती औरत यहाँ इस पिछड़े  गाँव में पैदा होती है , अगर कहीं यह शहर में होती तो  शायद फर्श से अर्श पर जा बैठती....

 चलते चलते वह दूर आ गया था उसने वापस मुड़ कर देखा , मधुरानी ने अपनी साडी वापस घुटनों के उपर खोंस ली थी और वह चट्टानों पर पटक कर कपड़े धो रही थी , अब माधुरानी उतनी साफ नज़र नहीं आ रही थी , वह भी उसकी नज़रों से दूर आ चुका था.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 40 दाग़ अच्छे हैं..

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     रोज़ाना की तरह इस रोज़ भी गणेश शिवालय गया लेकिन आज मंदिर सुनसान देख उसे हैरत हुई. हमेशा की तरह आज वहाँ जुआरियों की टोली नज़र न आई.

शायद आज गाँव में पुलिस आई होगी....

उसने सोचा . गाँव में जब भी पुलिस का आना होता तो जुआरी कहीं छुप  जाते थे.  भूले भटके यदि कोई पुलिस के हाथ लगता तो या तो उसको थाने ले जाते या घूस ले कर छोड़ते.  नागपंचमी के दिन तो मानों पुलिसवालों के हाथों में सोने की बटेर लग जाती. इस दिन गाँववाले जुआ खेलते ही खेलते थे, लिहाज़ा पुलिस वालों की भी ख़ासी कमाई होती थी. गणेश को हमेशा अचरज होता था क़ि गाँव में इतनी ग़रीबी होने के बावजूद जुए में लगाने के लिए इन लोगों के पास पैसा आख़िर आता कहाँ से है. उसने सुन रखा था कि गाँव में मटके के अड्डे भी चला करते. हालाँकि गणेश इन जगहों पर कभी न जाता था.

आज मंदिर भी सूना था . दोपहर में मधुरानी की दुकान भी बंद रहा करती,  क्योंकि मधुरानी उस वक्त घर के बाकी काम काज किया करती।

 फिर कहाँ वक्त काटा जाए.....

इस सोच में गणेश डूबा था उसे याद आया, एक बार मधुरानी ने उसे बताया था , दुपहरी के वक्त गाँव की महिलाएँ  नाले पर कपड़े धोने जाया  करतीं . यों भी नाला शिवालय के इतने पास था कि बरसात के दिनों में बाढ़  आने पर पानी शिवालय तक पहुच जया करता .

 नाले पर ही चला चलता हूँ ,....

लेकिन वहाँ तो औरते ही औरते होंगी ..

अगर कहीं उनको शक हो गया कि मैं मधुरानी से मिलने आया हूँ तो बेकार ही बात पूरे गाँव में फैला देंगी...

कुछ रास्ता निकलना चाहिए जिससे साँप भी मर जाए और लाठी भी ना टूटे....

 उसने सोचा.

वहा ... शौच का बहाना कर वहाँ जाता हूँ किसी को कोई शक न होगा....

 वह वापस आफ़िस आया, जो वहाँ से नज़दीक ही था. वहाँ पांडु चपरासी को उसने लोटा भर कर लाने को कहा. पांडु ने भरा लोटा उसके हाथ में पकड़ाते हुए कहा.

" बाबू जी शौच के लिए नाले पर जात हों  उ हाँ लोटा की का ज़रूरत ?"

गणेश ने सोचा

अब इसका क्या जवाब दूं....

चुपचाप वह नाले की दिशा में तेज कदमों से चल पड़ा . पुल की ओर जाते हुए उसके रास्ते कीचड़ से सनी हुई एक भैंस आड़े आ गयी , उससे सुरक्षित अंतर रख कर वह वहाँ से गुज़रने लगा . उसे वह पुरानी  मजेदार घटना याद आ गयी . एक बार  सुबह उठने में उसे ज़रा देरी हो गयी थी  . जल्दी जल्दी नहा धो कर  कड़क इस्त्री किए हुए साफ सुथरे कपड़े पहनकर आफ़िस जाने के लिए निकला था.  यों भी उसे आफ़िस जाने के लिए देरी हो रही थी, लिहाज़ा वह तेज कदमों से अपने रास्ते चला जा रहा था , रास्ते में  कीचड़ सनी भैंसो का झुंड उसके आड़े आया , चरवाहे उन्हें गाँव के बाहर चराने ले जा रहे थे , लेकिन भैंसो की संख्या इतनी अधिक थी कि उन्होने पूरा रास्ता अड़ा रखा था . गणेश उस झुंड के बीच किसी प्रकार रास्ता निकालते हुए आगे बढ़ रहा था कि एक पास से गुजरती हुई भैंस ने मक्खियाँ उड़ाने के लिए अपनी कीचड़ से सनी पूंछ हिलाई,  जो सटाक से  पूरे हिन्दुस्तान का नक्शा उसकी शर्ट पर छप गया .  उस कीचड़ के धब्बे को अपनी शर्ट पर देख वह मानों आग बबूला हो उठा . गुस्से से कभी वह अपनी शर्ट को देखता तो कभी उस भैंस को . चरवाहे  और दूसरे राहगीर उसकी हालत देख  हंस हंस कर लोटपोट हुए जा रहे थे . गणेश यूँ ही वापस अपने कमरे की ओर चलता बना , नयी शर्ट पहनने के लिए.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 39 अब कोई गिला-शिकवा नहीं

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     भारी कदमों से  गणेश अपने कमरे की ओर  चलने लगा . रास्ते में उसने देखा मधुरानी भीखू के घर से लौट कर अभी अभी अंदर गयी है , वह भी उसके पीछे पीछे जाने लगा .

यही मौका है उससे माफी माँगने का....

उसने सोचा और उसके घर का दरवाज़ा खटखटाया . उसने चारों ओर देखा लोग बाग भीखू के घर के सामने जमे थे  .इतने में मधुरानी की मीठी आवाज़ अंदर से सुनाई दी.

" कौन है"

"मैं हूँ" गणेश ने जवाब दिया

" मैं कौन.?.. कछु नाम वाम न दिया रहा तोरे अम्मा बापू ने ?"   मधुरानी दरवाज़े के करीब आती हुई बोली.

यह क्या मेरी आवाज़ तो यह पहचानती है...

गणेश सन्न रह गया . इतने में किवाड़ खोलती हुई मधुरानी दरवाज़ें पर खड़े गणेश को देखा और बोली " अरे आप आए रहे बाबूजी आइए आइए ... आज कई दिन बाद इधर का रास्ता भूल गए रहे"

मधुरानी गणेश को यूँ दरवाज़े पर खड़ा  देख कर हड़बड़ा उठी थी या शायद वह गणेश को  ऐसा महसूस करवा रही थी ? गणेश भी सकपका कर एक दो मिनट  यह सोच कर चौखट पर खड़ा रहा कि अंदर जाए अथवा नहीं .

"का हुआ बाबू जी?" मधुरानी ने जानना चाहा .

" न... नहीं... एक बात कहनी थी त.. त.. तुमसे ... म ... मेरा मतलब  आ.. आपसे " गणेश हकलाते हुए किसी तरह बोला उसे समज नहीं आ रहा था कि उसे कैसे संबोधित करे.

" बोलो बाबू जी का बात होई?" मधुरानीने उसकी आँखों में आँखें डाल कर पूछा.

 "उ..उस.. द..दिन"

 मधुरानी अब भी उसकी ओर ताक रही थी .

" उस दिन मैने आपका हाथ पकड़ा था.. उसकी माफी चाहता हूँ " गणेश थूक गटक कर एक सांस में बोल पड़ा .

मधुरानी जो इतने वक्त उसकी ओर टकटकी लगाए थी यह सुन कर उसने शर्म से अपनी गर्दन झुकाई  "ई बात में माफी काहे माँगें हो बाबूजी , ई कौनो बात हुई? " मधुरानी ने धारधर आवाज़ में पूछा फिर मीठी आवाज़ में कहा  "हमरा मतलब रहा ... कौनो बात नाही" .

पहली बार में गणेश को उसकी आवाज़  गुस्साई जान पड़ी और दूसरी बार   में विनम्रता .

"भीतर आओ बाबू जी...बैठो ... आपको चाय पिल्वाती हूँ" मधुरानी ने कहा.

 "हैं?? न.. नहीं म.. मेरा मतलब फ.. फिर कभी" गणेश हड़बड़ा कर बोला और मुड़ कर तेज कदमों से चलने लगा  , उसने पीछे मुड़ कर दरवाज़े पर खड़ी  मधुरानी की ओर देखा.  वह  लजा कर मुस्कुराई फिर भीतर भाग गयी . गणेश वापिस सोच में डूब गया .

अब इसका क्या मतलब लगाऊं ?....

शायद पिछली बार मैने उसका हाथ पकड़ने में  ज़रा ज़्यादा ही  जल्दबाज़ी की.. 

शायद इस सब के लिए  थोड़ा रुकना  बेहतर होता....

उसके दिल की धड़कन तेज हो रही थी.

" मैं तो यह सोच कर आया था कि आज किस्सा ही ख़त्म कर दूँगा ,  लेकिन शायद इसके कोई आसार नज़र नहीं आते " गणेश के होंठों पर मुस्कान  बिखर गयी और प्रफुल्लित मन से उसने अपने कमरे की ओर कदम बढ़ाए.

गणेश और मधुरानी का मिलना जुलना दोबारा शुरू हो गया था , गणेश का उसकी दुकान पर जाना बराबर बना रहा . उसकी दुकान पर जाने का वह कोई मौका न छोड़ता था .  वहाँ समान खरीद कर पैसे देते वक्त जब उसका हाथ मधुरानी के हाथों से छूता तो मानों उसके पूरे बदन में करेंट  दौड़ जाता .. उसके हाथों की छुअन में मानों कोई जादू सा था , पल भर में सारी थकान दूर हो जाती, और   फिर वह नये जोश में अपने काम में लग जाता . उसे याद आया उसने यह शायद किसी किताब में पढ़ा था.

"माशूका आशिक की बाहों में आने से पहले हज़ार  नखरा करती है .... लेकिन आख़िरकार जब  आती है तो इश्क की गर्मी में वह पिघल जाती है"


क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Upanyas Madhurani : Chapter38 भीखू की मौत

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     वह  शोर की दिशा में चलता हुआ आगे बढ़ा उसने देखा आगे किसी के घर के बाहर लोगों की भीड़ लगी है . उसने वहीं से आते एक गाँववाले को रोक कर पूछा "भाई साहब .. बात क्या है"

" का मालूम बबुआ ..  सायद उ भीखू का तबीयत कुछ ठीक ना है"

गणेश भीड़ के बीच से रास्ता बनाते हुए आगे पंहुचा और देखा बाहर चबूतरे पर बैठा भीखू  जोरों जोरों से पागलों की भाँति चिल्ला रहा था . उसकी दोनो  बाहें उसके लंबे तगड़े भाइयों ने  पकड़ी  हुईं थी लेकिन वह उनसे भी संभाला नहीं जा रहा था .

गणेश ने वहीं खड़े एक गाँव वाले से पूछा "क्या हुआ इसे"

"मका का मालूम बाबू...आज सुबह से ई ससुरा पागलों की तरह सोर मचाया रहा ... पानी देखते ही चीखने लगता है" गाँव वाले ने जवाब दिया.

"का कहा  पानी देख कर चिल्लाए है ...? हाँ फिर तो किसी पागल कुकुर ने इसको काटा रहा "  दूसरा बंदा बोला.

तभी वहाँ डॉक्टर साहब का आना हुआ  डाक्टर साहब का बॅग हाथ में ले कर  चलता हुआ बंदा कहने लगा " परे हटो सब लोग .. डाक्टर साहब आए हैं"
डाक्टर साहब ने वहाँ आकर भीखू के भाइयों और घरवालों से पूछ ताछ की . भीखू की लुगाई और पाँच साल की बच्ची बहुत डर गये थे . उन्होने भीखू को इस हालत में पहले कभी न देखा था . भीखू की औरत साड़ी के पल्लू से उसका मुँह पोछ रही थी और बेटी  बाबू जी के नाम की रट लगाए बिलख रही थी.

तभी सरपंच जी वहाँ  आए और तमाशबीन लोगों की भीड़ उनके एक शब्द सुनकर छट गयी .. इतनी देर से वह लोग भीड़ हटाने की कोशिश कर रहे थे, न कर पाए और सरपंच जी की सुनकर सब वहाँ से जाने लगे. सरपंच जी की  गाँव में बहुत इज़्ज़त थी.

अब वहाँ पाटिल साहब भी आए उसकी हालत देख कर उन्होने उसे अस्पताल में भर्ती कराने की बात कही . डॉक्टर ने सरपंच  पाटिल ओर भीखू के घरवालों को एक तरफ बुलाया .

"इसको पागल कुत्ते  ने काटा है" डॉक्टर ने गंभीर आवाज़ में कहा.

सरपंच ने भीखू के भाई से पूछा "कब काटा इसको पागल कुकुर ने "

"किसका कुत्ता था" पाटिल जी ने कड़क कर पूछा मानों वह कुत्ते के मालिक को सूली पर चढ़ा देंगे .

 "न..ना.. काटा नही बाबूजी एक दिन चार पाँच कुकुर आपस में यूँ ही लड़ रहे थे और भैया इहा खाट बिछाए सोए रहे ...ओ कुकुर इसका उपर से कूद कर जाए रहे तभी किसी कुकुर ने काटा होगा " उसके भाई ने कहा.

"फिर अब का करें?"

" तब ही इंजेक्सन लिए रहते तो आज ए मुँह देखना ना पड़ता"  एक बुज़ुर्ग गाँव वाला बोला .

" हम कहे रहे इसको पर ई भैया राज़ी न हुआ " भाई ने जवाब दिया. सब लोग बगले झाँकने लगे.

" अरे तो अब लगाए द्यो इंजेक्सन ई को , का हर्ज है इसमें ? "  किसी ने कहा .

 कुछ पल यूँ ही चुप्पी में बीत गये .

डॉक्टर साहब मुट्ठी भींच कर बोले "कोई फायदा नहीं"

"का कह रहे हो डाक्टर साहब? ... हम ..हम भैया को बड़े हस्पताल ले जावेंगे  सहर में" उसका भाई घबरा कर बोला .

डॉक्टर ने उसको दिलासा देने के लिए कंधे पर हाथ रखते हुए   दोहराया " कोई फायदा नहीं .. अब इस सब का वक्त बीत चुका है"  

" अरे डॉक्टर साहब आप भी कमाल करत हो ? अरे सहर में जाने को कितना ऐसा कितना वखत लगे है ?" पाटिल साहब बीच में ही बोले " अरे ओ किसना ज़रा जा तो हमरी जीप ले आ"

" इससे कुछ हासिल नहीं होगा" निराश डॉक्टर साहब बोले.

सरपंच जी डॉक्टर साहब की बात समझ गये और भीखू के भाई को ढाढ़स बाँधते हुए बोले "अब तू ही घर का बड़ा है... हिम्मत दिखा "

भीखू का भाई रुआंसा हो गया वह दौड़ते हुए घर में घुस गया . गणेश को भीखू के बीवी बच्चों  को देख कर बड़ा खराब लग रहा था . इधर डॉक्टर साहब ने अपना ब्रीफ़केस एक तरफ रख दिया था और वे भीखू की नब्ज़ टटोल रहे थे ,  सरपंच जी ने मौके की नज़ाकत को देखते हुए एक औरत को भीखू की बीवी और बच्ची को वहाँ से ले जाने का हुक्म सुनाया .

इतने  में ही भीखू का भाई आया और डॉक्टर से पूछा  "कितना वखत है? "

डॉक्टर ने जवाब दिया "ज़्यादा नहीं बस कुछ देर का मेहमान हैं"

यह सुन कर उसका भाई एक तरफ दौड़ने लगा.

पीछे से सरपंच जी आवाज़ लगाते रहे " अरे कहाँ जाईत हो?"

 "जल्दी ..आता हूँ" दौड़ते हुए उसने कहा और नज़रों से ओझल हो गया .

इतने में कई गाँव वाले भीखू से आख़िरी बार मिलने जमा हो गये. बड़ी मुश्किल से सरपंच जी ने उनको समझा बुझा कर वापस भेजा . भीखू की अम्मा मुँह में पल्लू  ठूंस कर रो रही थी, किसी तरह उसने अपनी पोती को वहाँ से हटाया ... लेकिन भीखू की बीवी किसी कीमत पर वहाँ से जाने को तैयार न थी, वह दहाड़ें मार मार कर रो रही थी. शायद उसे भी यह अहसास हो गया था कि उसकी माँग उजड़ने वाली है.

गणेश मुड़ कर वहाँ खड़े लोगों से बातें कर रहा था . कुछ पल बीते तभी सीना फाड़ देने वाली चीख सुनाई दी . घर की औरतों ने दहाड़ें मार कर रोना शुरू किया . भीखू की अम्मा ने भीखू की बीवी का सिंदूर पोंछ दिया . गणेश ने भीखू की ओर देखा उसका शरीर उसकी बीवी की गोद में था, और उसकी गर्दन एक तरफ लुढ़क गयी थी . भीखू के प्राण पखेरू उड़ चुके थे.

अब सब लोग एक दूसरे को  धकियाते  रोते चिल्लाते अंदर घुस गये . अन्य गाँव वाले अपने प्यारे भीखू का अंतिम दर्शन कर सकें यह सोच कर डॉक्टर साहब , सरपंच जी , पाटिल साहब और गणेश  वहाँ से जाने लगे. इतने में उन्हें  भीखू का भाई जल्दी जल्दी  अंदर आता हुवा दिखाई दिया.   अपने साथ वह एक  ओझा को  ले आया  था. शायद उसने अपने भाई को बचानेकी एक  आखरी उम्मीद उस ओझा में ढुँढनेकी कोशिश की थी.


क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Upanyas - Madurani - Chapter 37 - वाकई, किसी स्त्री को जानना बड़ा मुश्किल काम है ...

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 उस वाकये को हुए तकरीबन हफ़्ता भर हो गया . गणेश अब मधुरानी को जहाँ तक हो सका टालने लग गया था कभी भूले से उनका सामना हो जाता तो गणेश में नज़रें उठा कर उसे देखने की हिम्मत भी न थी. एक बार सामना होने पर उसने उसको देखा तो उसे अहसास हुआ मानों वह गुस्से में लाल पीली हो उसे घूर रही है .


गणेश बेचैन हो उठा

कहीं वह मुझसे  उस दिन वाली बात को ले कर नाराज़ तो नहीं ?

 या फिर इसलिए नाराज़ है कि मैं उसको टालता हूँ ? ...

कुछ पता नहीं चलता....

ग़लती मेरी  ही थी मैं भावनावश हो कर उससे यह सब कर बैठा...

लेकिन वह भी तो इशारे पर इशारे दिए जा रही थी...

जो भी हो मुझे उससे माफी माँगनी चाहिए ...

परंतु कैसे ?

कहीं उसे कोई ग़लतफहमी न हो जाए और कहीं मेरी  लोगों के सामने  बेइज़्ज़ती न कर दे....

उससे माफी शायद अकेले में ही माँगना  उचित होगा "

आज सुबह गणेश की देर से आँखें खुलीं उसने घड़ी में देखा

यह क्या .... सुबह के दस बज रहे हैं

 उसे कुछ शोर सुनाई दिया

कहीं यह गूँगा - गूँगी वाला कांड तो नही हो गया

 तुरंत वह कपड़े बदल कर बाहर जाने को तैयार हुआ उसे लगा कि वह थोड़ा रुक कर मुँह हाथ धो कर कुल्ला कर बाहर जाए लेकिन बाहर का शोर बढ़ता ही जा रहा था

" वापस आ कर ही मुँह हाथ धोता हूँ"

सोच कर वह  निकला

 " बात कुछ ज़्यादा ही गंभीर है"

वह ताला लगाए बगैर ही बाहर चला आया.


क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande



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Hindi Upanyas - Madurani - Chapter 36 - बंद दरवाज़ा

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      उसके दिल की  धड़कने अब तेज हो चुकीं थी उसने हौले से दरवाज़े की सांकल से दरवाज़ा खटखटाया . अंदर से कोई आवाज़ न आई ..उसे तोड़ा अचंभा हुआ उसने दोबारा दरवाज़ा खटखटाया...

"कौन आया रहा ?" अंदर से मधुर आवाज़ आई  .

गणेश के हलक से आवाज़ न आई. बोलने की उसने लाख  कोशिश की लेकिन चाह कर भी  आवाज़ न निकल सकी.

अभी से यह हाल है तो बाद में न जाने क्या होगा ?....  गणेश ने सोचा

.... ऐसे ही वापस चला चलता हूँ ...

नहीं यूँ इस तरह पीठ दिखा कर भागना उचित न होगा.. थोडा धीरज से काम लेना होगा...  भागना मर्दानगी की निशानी नही... औरत चाहे जितनी भी  बिंदास हो साहस तो मर्द को ही करना चाहिए ....

 " कौन है" अंदर से दोबारा आवाज़ आई . इस बार आवाज़ में ज़रा परेशानी झलक रही थी.

"म..म..म..मैं ग.. गग.. गणेश" गणेश  ने हकलाते हुए किसी तरह जवाब दिया. वह अब हल्का महसूस कर रहा था.  उसे खुद पर ही फख्र महसूस हो रहा था.

 इसी तरह हिम्मत करनी होगी ...

" गनेस बाबू... अरे आप उधर बाहेर  काहे खड़े हो बाबू जी अंदर आइए . हम  इहा कपड़े बदलत  रहे "  अंदर से आवाज़ आई.

गणेश की आँखों के सामने मधुरानी कपड़े बदलती  हुई  तस्वीर  आ गई.

आज तक मैं  सिर्फ़ उसके खूबसूरत जिस्म को निहारना चाहता था.....   शायद अनायास ही वह मौका आज हाथ लगा है …

वह जोरों से सांस लेने लगा  और उसके मन में विचार आ रहे थे.

वह कपड़े बदल रही है भला यह  बतलाने की क्या ज़रूरत थी ?.. या शायद वह यही चाहती थी कि मैं यह बात जान लूँ  ... क्या वह  मुझे करीब आने का  इशारा कर रही है ? .. हाँ , बिल्कुल .. इतने दिन से वह झे इसी का तो इशारा दे रही है ... अब इससे अधिक खुलकर वह भला क्या बताएगी? ....

गणेश हौले से अंदर आया और जाते वक्त उसने दरवाज़े पर काँपते हाथों से सांकल चढ़ाई . सांकल चढ़ा कर वह काँपते कदमों से अंदर आया . एक लंबी सांस ले कर मानों उसने हिम्मत जुटाई .

"उ हाँ चबूतरे पर बिछी  खाट पर बैठ जाइए  बाबू जी" अंदर से दोबारा आवाज़ आई.

उसने सोचा.

वह केवल चबूतरे पर बैठने के लिए कह सकती थी .. भला उसने खाट  पर ही बैठने को क्यों कहा ? आख़िर क्या चाहती है यह .. शायद वह कोई गुप्त संदेश देना चाहती हो ... या वह मुझे अपने करीब बुला रही है ? ... हाँ ज़रूर .. मुझे यूँ ही उसके पास जाना चाहिए .. ऐसा मौका दोबारा हाथ नहीं आएगा ....

  उसके दिमाग़ में नग्न मधुरानी की तस्वीर झलकी.

अब तो जाना ही पड़ेगा....

 वह चबूतरे की खाट तक चल कर आया.  उसने  मधुरानी के कमरे में जाने की लाख कोशिश कि लेकिन उसके मानों पाँव ही उठ नही रहे थे.  पूरा जिस्म पसीने से  तर था .

 अगर मधुरानी मुझे यूँ इस हाल में देख लेगी तो न जाने क्या सोचेगी....

 उसने मन ही मन कहा और वहीं धम्म से  खाट पर बैठ गया . बैठ कर उसके थोड़ी जान में जान आई , जेब से रुमाल निकाल कर वह  चेहरे पर आए पसीने को पोंछने लगा .

"म.. मधुरानी म..मैं प..प्यासा हूँ ... थोड़ा पानी मिलेगा? दर असल आ..आज नौकर  प..प..पानी भ.. भरना भू.. भूल गया" उसके मुँह से यह लफ्ज़ कब निकले खुद उसे अहसास नहीं हुआ.

 उसने सोचा चलो अच्छा ही हुआ यूँ ही चुप रहने में क्या लाभ?....

 इतने में मधुरानी ने जवाब दिया " पानी चाहे हो ... लाती हूँ पर उ पानी के लिए इत्ति तकल्लुफ काहे करे हो बाबूजी ? ई हाँ आने जाने में आप पर कोई पाबंदी तो न है.. बाबूजी"  मधुरानी की यह बातें उसके सिर में  हथौड़े की तरह बजने लगीं

 मतलब यह भी एक इशारा है... और वह भी खुल्लम खुल्ला ..अब तो कुछ करना ही पड़ेगा …

वह तड से उठ कर खड़ा हो गया और खिसीयानी हँसी हंसते हुए बोला "न.. नही मेरा व..वह मत...मतलब नहीं था"

उसने धीरे धीरे मधुरानी के कमरे की तरफ कदम बढ़ाए. इसी दौरान  खुद मधुरानी ही कमरे के बाहर आई.

 "देती हूँ बाबूजी ई ज़रा बाल संवार लूँ "

गणेश फट से पीछे हो गया.

धत्त तेरे की...फिर चूक हो गयी.. इन बातों में टाइमिंग का ख़याल रखना पड़ता है.…  उसने मन ही मन कहा.

 जाने कितनी बार यूँ  ही ग़लती होगी .....कहीं उसने मेरी यह हालत देख ली तो कहेगी कैसे लल्लू से पाला पड़ा है.…

उसने नज़र भर मधुरानी को देखा . हरी साड़ी में लिपटी हुई  वह और भी खूबसूरत नज़र आ रही थी.  उसने माधुरानी की आँखों में देखा . उसे उसकी आँखें शरारत से भरी नज़र आई, मानों वह उसे इशारा कर पास बुला रहीं हो . उसके हौसलें अब और बढ़ गये थे. कुछ पल पहले वह खुद को कोस रहा था.

गणेश जहाँ बैठा था वहाँ उसके पीछे ही दीवार में एक खांचा बना हुआ था . मधुरानी अपने  खुले बालों को उंगलियों से सांवरते हुए, और  दाँतों में  बालों की क्लिप दबाए ,  उसके करीब आई और खाँचे से कोई चीज़ लेने के लिए झुकी ... अचानक ही उसके पैर गणेश के पैरों से छू गये और उसके खुले बाल उसके गालों से थोड़ा छू गये.  गणेश के मानों पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गयी, उसका जी किया कि वही  उसकी कमर को पकड़ कर अपनी बाँहों में भींच ले. उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए  भी ,  लेकिन इतने में  वह वापस पीछे सरक गयी , उसे दीवार में बने खाने से जो चीज़ चाहिए थी वह मिल गयी थी ..गणेश अपनी नाकामी पर दोबारा मायूस हो गया . गणेश ने अंदर जाती मधुरानी को देखा.  बड़े गले के ब्लाऊज में उसकी सुराहीदार गोरी गर्दन और  बाहें  देख कर वह मचल उठा . अंदर जाते समय अचानक ही वह रुकी और गणेश की ओर नज़रें उठा कर देखा. गणेश उसे निहारते हुए पकड़ा गया था .वह अंदर चली गयी. गणेश खाट से उठ बैठा.

अब तो अंदर जाना ही पड़ेगा .. इससे अच्छा मौका अब हाथ न आएगा...

 उसने उस कमरे की तरफ कदम बढ़ाए. उसकी साँसे  तेज चलने लगी थी . अब उसमें आत्मविश्वास झलक रहा था . वह उस कमरे के दरवाज़े की चौखट पर खड़ा हो गया और उसने  मधुरानी को आईने में अपने बाल संवारते हुए देखा. वह उसकी ओर पीठ कर खड़ी थी .   वह अपने बाल बनाने में मग्न थी उसने सोचा.

वह शायद यूँ ही बेख़बर रहने का नाटक कर रही है....

 उसने उसकी तरफ कदम बढ़ाए. उसकी धड़कने तेज हो गयीं, कनपटी भी गर्म हो गयी. वह दबे पाँव उसके पीछे पंहुचा ओर एक झटके से उसने  उसका हाथ पकड़ लिया।  उसके मन में लड्डू फुट रहे थे, आख़िर वह जो करना चाह रहा था वह हो ही गया. अब उसे मधुरानी क्या करती है यह देखना था .

 मधुरानी अपना हाथ  छुड़ाते हुए दस कदम पीछे हट गयी.   उसे ऐसी उम्मीद न थी . वह मधुरानी की आँखों में झाँक कर उसके मन की बात जानना चाहता था लेकिन नाकामी हाथ लगी .

कहीं वह नाराज़ तो नहीं हो गयी?.... उसने सोचा.

 उसने हिम्मत जुटा कर दुबारा उसका हाथ पकड़ने की चेष्टा की.

  "बा..बाबूजी .. क्या  हुई गवा है आपको?" मधुरानी  कमरे के बाहर तेज कदमों से चलते हुए निकल गयी.

एक पल तो उसे समझ ही नही आया कि हुआ क्या? लेकिन उसे अहसास हो गया.

मतलब... उसने मुझे ठुकरा दिया....

 उसका सारा शरीर ढीला पड़ गया था . जाते जाते मधुरानी ने  मुड़ कर उस पर एक नज़र डाली उसमें उसकी जलती निगाहों का सामना कर सकने का साहस न था. आख़िर औरत के मन की बात तो  स्वयं शिव जी भी  न  समझ सके. वह मायूस हो उठा और उसका मन खुद के प्रति गुस्से से भर गया . कमरे से निकलते हुए उसने दरवाज़ा ज़ोर से खोला और तेज कदमों से चलते हुए बाहर आ गया. उसने पीछे मुड़ कर मधुरानी को देखना तक मुनासिब न समझा .

वह बाहर खुले में आ गया . गर्मी और उमस के दिन होने के बावजूद उसके  शरीर को छू कर एक ठंडी हवा का झोंका निकल गया . उसको थोड़ा  चैन आया.

चलो अच्छा ही हुआ कम से कम फ़ैसला तो हो गया, नहीं तो जाने कितने दिन में इस बात को लेकर बेचैन रहता...

चलते चलते वह अपने कमरे के बाहर ठिठक कर रुक गया.

अब कहाँ जाऊं .. कमरे में वही अकेलापन .. शादी की भीड़ भाड़  में जाने को उसका जी न किया. फिर न जाने कितनी देर, इन सबसे दूर वह न जाने कितनी देर वह सिर्फ चलता रहा . पूरा गाँव गुँगे की शादी में शामिल होने गया था इसलिए रास्तों पर कोई चहल पहल न थी. फिर अचानक ही एक घर के सामने किसी आवाज़ को सुन कर वह ठिठक गया. अंदर से कोई चीख रहा था . उसे अहसास हुआ यह गूंगी का घर था . घर पर बाहर से ताला लगा था .

इस घर के लोग जाने कहाँ चले गये .. गुँगे की शादी में तो यक़ीनन नहीं गये होंगे फिर कहाँ गये  हैं .. शायद खेतों में गये होंगें ....  

घर के अंदर से किसी के रोने चिल्लाने की आवाज़ अब भी आ रही थी. ऐसी आवाज़ सुन कर पत्थर दिल आदमी भी पसीज जाए . उस गूंगी का दिल टूट गया था और वह कलेजा फाड़ कर रो रही थी. उसका दिल भी इसी तरह रो रहा था फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उसकी आवाज़ किसी को सुनाई नहीं दे रही थी .


क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 35 - गुँगे का ब्याह

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     आज सुबह से गाँव में चहु  ओर चहल-पहल थी . आज गुँगे का ब्याह जो था . गुँगे के बापू और मामा ने  जी जान लगा कर  उसके लिए कोई दूसरी लड़की ढूँढ ली थी . लड़की पड़ोस के ही गाँव की एक ग़रीब घर से थी . लड़की के बाप ने  शायद  गुँगे  की जायदाद देख कर उसकी कमी को नज़रअंदाज़ कर यह सोच हामी भर दी थी कि ऐसे भरे - पूरे खाते-पीते घर में उसकी बेटी सुख चैन से रहेगी. लड़की के माँ-बाप इतने ग़रीब थे  कि ब्याह का खर्च भी नहीं उठा सकते थे, लिहाज़ा ब्याह कि पूरी तैयारी और खर्चा गुँगे के घरवाले ही करेंगे ऐसा तय हुवा था.  ब्याह भी शायद इसलिए गुँगे के गाँव में करना तय हुआ .  लड़की तय होने से पूर्व  गुँगे को घर में ही एक कमरे में क़ैद किया गया था, और एक कारींदा उस पर पहरे पर लगाया गया  था. दूसरी ओर गूंगीके पिता ने भी उसे यूँ ही एक कमरे में बंद कर रखा था.

ब्याह का मुहूरत सुबह ११ बजे का था  , आज तड़के से ही मेहमानों का मजमा सा लगा था  , गाँव के कच्चे पक्के रास्तों से मेहमानों से भरी बैलगाड़ियाँ  आ-जा रहीं थी. उनके ठहरने और रुकने का इंतेजाम  गाँव की  पाठशाला में हो रखा था .

गाँववाले इस शादी को ले कर यूँ खुश थे मानों उनके अपने ही घर के किसी सदस्य का ब्याह हो  , सब नये कपड़े पहनकर और सजधज कर तैयार हो रहे थे.

गाँव में जब भी कोई शादी-ब्याह होता तो लाउड स्पीकर पर गाने बजाने का काम भीखू  को दिया जाता ,  हलवाई का काम और खाने-पीने का इंतेजाम  किसन  के पास होता. उनके अपने अपने सहायक होते थे.  पाटिल और सरपंच जी  जैसे अनुभवी लोगों से ऐसे मौकों पर सलाह - मशविरा किया जाता.  गाँव के नाई के पास बारातियों - घरातीयों  और ब्याह में सम्मिलित होने आए मेहमानों की दाढ़ी बनाने , बाल काटने  तेल मालिश की ज़िम्मेवारी होती, इसके अतिरिक्त वह ब्याह का निमंत्रण देने का और विवाह मंडप में आए लोगों को टीका लगाने का काम करता , इन सब कामों के बदले नाई को साल भर का अनाज और पूरे परिवार को दो जोड़ी नये कपड़े मिला करते . शादी ब्याह की तैयारी में हफ़्ता दस दिन नाई का परिवार  फिर शादी वाले घर के  सदस्यों की भाँति ही पूरे मनोयोग से करता.

 सुबह के दस बज रहे थे ,  गुँगे के यहाँ  चहल पहल अपने चरम पर पंहुच चुकी थी . लाउड स्पीकर पर भीखू ने गाने बजाने चालू कर दिए थे , लिहाज़ा  पूरा वातावरण  फिल्मी गानों के शोर से भर गया था. उधर बॅंड बाजे वाले भी चालू हो गये थे , चारों और चिल्लपो मची हुई थी.

गणेश के यहाँ गाँव का नाई सुबह ही आ कर उसको निमंत्रित कर चुका था. गणेश भी ब्याह में जाने के लिए अपने कपड़े इस्त्री कर रहा था. वह नये कपड़े पहन कर और तैयार हो कर   बाहर आया और कमरे में ताला डालते हुए उसकी नज़र मधुरानी के घर की ओर गयी .  आज दुकान बंद थी  फिर उसने उसके घर की ओर नज़रें घुमाई कि तभी उसे मधुरानी के ससुर और दुकान के नौकर को नये कपड़े पहन  कर घर से बाहर निकलते  देखा. आज गाँवमें शादी थी लिहाज़ा उसने सोचा शायद यह लोग भी शादी में शामिल होने जा रहे हैं .  उनके दूर जाने तक वह वहीं खड़ा रहा , मधुरानी के घर का  दरवाज़ा अभी  भी खुला हुआ ही था जिसका सीधा मतलब था की मधुरानी घर में मौजूद थी.

गणेश सोचने लगा  ,

गाँव के लोग बाग शादी में जा रहे हैं .. और मधुरानी घर पर अकेली है ... यह अच्छा मौका है .. उससे मिलने का ... वह भी मुझसे मिलने को लालायित रहती है .. और इसका इशारा वह कई बार दे चुकी है ... आज इज़हार करने का  इससे अच्छा मौका शायद फिर कभी न मिले....

गणेश के कदम मधुरानी के घर की तरफ बढ़ चले . जाते जाते उसे उस रात की याद हो आई जब मधुरानी अपने नर्म-मुलायम हाथों से उसे सहला रही थी  , उसकी मदहोश करने वाली नज़रें, उसकी शरारती मुस्कान उसे आँखों के सामने दिखाई देने लगी . उसने सोचा,

मैं उसके यहाँ जा तो रहा हूँ .. लेकिन कही मेरी फ़ज़ीहत तो न होगी ? क्या मैं उससे अपने मनकी बात कह पाऊँगा ? …

  चलते चलते वह ठिठक गया  उसने सोचा,

कहीं कोई मुझे देख तो नही रहा ?…

 उसने आस पास देख कर तसल्ली कर ली फिर सोचा ,

 लेकिन उसके यहाँ जाने का क्या बहाना करूँ...?  यूँ बेवजह जाना ठीक न दिखेगा...

 चलते चलते उसे याद आया कि नौकर आज उसके लिए पानी भरना भूल गया  है.... हाँ .. यही ठीक रहेगा .. यूँ भी गर्मी के दिन हैं .. मैं कहूँगा कि गला सूख रहा है ... और पानी पीने के बहाने उसके घर चला जाऊँगा....

 वह अब उसके घर के दरवाज़े पर पहुँच चुका था . उसने एक बार फिर चारों और नज़रें दौड़ाई कि कोई उसे देख न  रहा हो .... चारों और शादी ब्याह के नाच गाने का शोर गुल मचा हुआ था .


क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel Madhurani - Chapter 34 - झुरझुरी

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यूँ ही एक दिन गणेश गणेश  उन लड़कों के साथ  क्रिकेट  खेल रहा था . उस दिन मधुरानी  भी उनका खेल देखने बगीचे में आम के पेड़ की नीचे बैठी थी . गणेश का पूरा ध्यान पेड़ के नीचे बैठी हुई  मधुरानी पर था.  वह अब स्ट्राइक पर था,  उधर दूसरे छोर से महादू  ने  दौड़ते  हुए एक तेज गेंद डाली , गणेश गेंद भाँपने में ज़रा चूक गया और बचने की कोशिश में उसे अहसास ही नहीं हुआ कि कब  गेंद उसके सिर से रगड़ कर चली गयी . गणेश बाल-बाल बच गया, ज़रा एक दो इंच गेंद इधर उधर होती तो सीधा सिर पर चोट लगती . गणेश बदहवास सा नीचे गिर पड़ा,  यह देख लड़कों ने शोर मचा दिया , सब  दौड़े-दौड़े उसके पास आए . दूसरे छोर से मधुरानी भी बदहवास सी दौड़ती आई और झुक कर जब उसके माथे को छुआ तो हथेलियाँ खून से सन गयीं .

" हाय राम ! कोई झटपट जा कर  डाक्टर बुलवाए द्यो ... जाओ कलमुहो  ... खड़े खड़े मुँह का देखत हो"  मधुरानी  घायल गणेश की देखभाल में जुट गयी और आस-पास के लड़कों को निर्देश देने लगी .

उधर गणेश अपने दोनो हाथों से सिर को पकड़े , दर्द से कराह रहा था .

मधुरानी डर सी गयी " गनेस बाबू .. बाबू जी.. बहुत दर्द हो रहा है का ?" उसने तसल्ली करना चाही कि
 कहीं वह दर्द से बेहोश न हो गया हो.

 गणेश ने बड़ी मुश्किल से मिचमिचाते हुए अपनी आँखें खोलीं ...... उसकी आखों के सामने हल्के हल्के अंधेरा सा छा रहा था.... बेचारे को दर्द के मारे कुछ सूझ नहीं रहा था.

" ओ लड़के ... कहीं से पानी लिवा लाओ जा भाग  ससुरे"  मधुरानी ने एक लड़के को पानी लाने भेजा.

" बाबू जी अब जी कैसा है ? " पास खड़े लड़के ने गणेश से पूछा .

" परे.हट मरे ... तेरा सत्यानाश जाए  बाबू जी को कहे सता रहा है ????"  मधुरानी उस पर  चिल्लाई...

"ना.. ना हम तो बस हाल-चाल जानना चाहता हूँ" लड़का सकपकाया .

" ई लो  दीदी जी ई पानी लो , ज़रा बाबूजी को पानी पिलाए द्यो"

इतने में दूसरा लड़का भागा भागा पानी ले आया.मधुरानी ने गणेश को थोडा पानी पिलाया

 " ज़रा बाबूजी का चेहरा में पानी छिड़क द्यो .....जान में जान आवेगी" किसी ने सलाह दी.

सब लोग गणेश को ज़ख्मी देखकर बड़े चिंतित थे. कोई उसका सिर सहला रहा था , कोई उसके हाथ पैर दबा रहा था .  तभी  बबन  डॉक्टर साहब को ले आया .  डॉक्टर की ब्रीफ़केस हाथ में पकड़े बबन ने भीड़ में रास्ता निकाला.

" हटो परे डाक्टर साहब आवे हैं"

 भीड़ छट गयी . एक लड़के ने  मधुरानी  को गणेश की फ़िक्र में घबराते देख ताना मारा

" ए री अब का तू ही उसे इंजेक्सन देवेगी ? हट परे उ देख डाक्टर साहेब आई गवा है"

तभी डॉक्टर साहब करीब पंहुचे  "  हुम्म.... कहाँ लगी है ? ज़रा चोट दिखाइए"

"माथे मे गेंद लगी रही" किसी ने भीड़ में जवाब दिया.

"उ तो रामजी की किरपा रही डाक्टर साहब जो गनेस  बाबू को अधिक चोट न आई , जो गेंद  ज़रा इधर उधर होती तो भैया खुपडिया की खैर ना थी"  दूसरे ने कहा .

 मधुरानी ने उसकी ओर गुस्से से देखा , वह बंदा यह देख अधिक कुछ न बोला और चुप हो गया .

" क्या आपको चक्कर आ रहे हैं गणेश बाबू ? मितलि आ रही है ?" डॉक्टर ने गणेश से जानना चाहा किंतु गणेश ने  'ना' में सिर हिलाया.

डॉक्टर ने स्तेथॉस्कोप कानों  में लगाया और दूसरा सिरा उसके सिने पर रखा .

"चोट उ के सिर में लगा है  और  ई बुडबक उसका सीना जाँच  रहा है" एक ने ताना कसा.

" कही और तो चोट नहीं लगी गणेश बाबू ? कहाँ दर्द हो रहा है ? " डाक्टर ने गणेश से सवाल किया.  गणेश ने ना में दोबारा सिर हिलाया .

डॉक्टर साहब गणेश की नब्ज़ टटोलने लगे  , मधुरानी बड़े परेशान थी. 

"चिंता की कोई बात नहीं , मैं कुछ दवाइयाँ लिख देता हूँ उन्हें दो वक्त  लीजिएगा ,  आपकी तबीयत ठीक रहेगी"  डॉक्टर स्टेथेस्कोप अपने ब्रीफ़केस में रखते हुए बोले.

 इसके बाद उन्होने दवाइयों की शीशी निकालीं  , हर शीशी से तीन तीन गोलियाँ निकालीं उन्हें आधा तोड़ कर कागज की पुडीया बनाईं  और  वह पुडीया मधुरानी  को थमातेहुए बोले  "यह दवाई इन्हें सुबह  शाम  खिलाइए , भूलिएगा नहीं"

 फिर गणेश की ओर मुड़ कर बोले "अच्छा गणेश बाबू अब आज्ञा दीजिए और अपना ख्याल रखिए"  डाक्टर वहाँ से चले गये.

रात हो गयी थी गणेश अपने कमरे में बिस्तर पर लेटा था , बुखार से उसका बदन तप रहा था शाम से ही  उससे मिलने कई लोग आए थे . पड़ोस की सारजाबई उसके लिए खिचड़ी बना  लाई थी , उन्होने चम्मच से उसे खिलाई थी . वह थोड़ी देर उसके पास बैठकर जा चुकी थी. आधी रात  होने को थी , कमरे में अब उसके साथ केवल मधु रानी थी, वह गणेश को सहला रही थी . गणेश को उसकी नर्म मुलायम छुअन भा रही थी . उसका मन किया कि वह भी  मधुरानी को अपनी बाहों में भरकर खूब प्यार लुटाए , लेकिन वह चोट से बदहाल और बेदम पड़ा कराह रहा था.  डॉक्टर ने जख्म पर पट्टी बाँधी थी.

" आह... तुम अब जाओ मधुरानी.. आह" गणेश कराहते हुए किसी प्रकार बोला।

 "ना .. ना बाबूजी तोहे ई हाल में छोड़ कर हम कहीं ना जा सकत है" मधुरानी ने मना करते हुए कहा . मधुरानी ने अपनी हथेलियों से उसके गालों को सहलाया , उसके बदन में झुरझुरी सी दौड़ गयी और उसके  रोंगटे खड़े हो गये. उसने उसका हाथ अपने हाथों में लिया और उसे अपने सीने से लगा लिया .

 मधुरानी अपना हाथ छुडाते हुए बोली " आप आराम करो बाबूजी " फिर उसे पैरों के पास पड़ी चादर ओढाते हुए बोली "आप सो जाओ बाबू जी हम यहीं है"

गणेश उधर दर्द से कराहते हुए अपनी फूटी किस्मत को कोस रहा था ,

धत्त तेरे की , इतना अच्छा मौका हाथ लगा और मैं इस हाल में ? ....

सच है किस्मत हो... तो क्या करेगा पांडु....

क्रमशः ..

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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 33 - गाँव का क्रिकेट

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गणेश की अब गाँववालों से अच्छी ख़ासी जान-पहचान हो गयी थी  और वह उनसे  काफ़ी घुल -मिल गया था . गाँव के नौजवानों के मिलने जुलने का स्थान टेलर की दुकान हुआ करता था . मारुति टेलर की दुकान पर शाम को उसके कई हमउम्र लोगों का जमावड़ा सा लगता था , गाँव की खबरों का ताज़ा हाल वहाँ शाम में मिल जाया करता था . वहीं के कुछ लड़के  शाम ५ से ७ के दरमियाँ आम के बगीचे में क्रिकेट खेला करते , शाम को खेल कर लौटने के बाद उनके मिलने, हँसी मज़ाक करने का अड्डा मारुति टेलर की दुकान पर हुआ करता था . बाद में गेंद बल्ला  और स्टप्स इत्यादि चीज़ें उसी टेलर की दुकान में रखीं जातीं.  सो सब लड़के खेलने से पहले और खेलने के बाद वहीं मिलते थे. गणेश को यह देख कर बड़ा अचरज हुआ के इतने पिछड़े गाँव के लड़कों को क्रिकेट खेलने का शौक है , उसने जब जानने की कोशिश की तो यह बात सामने आई कि गाँव के लड़के रेडियो पर क्रिकेट कमेंट्री सुना करते थे , गावसकर , वेंगसरकर , अमरनाथ  जैसे खिलाड़ियों से वे  वाकिफ़ थे . फिर क्या था  बढ़ई के छोरे ने बल्ला ,  स्टंप  बनाने की ज़िम्मेदारी ली  और चमार के लौंडे ने गेंद बनाने की  , तो  यूँ कर गाँव के लड़के  क्रिकेट खेलने में रम जाते.

गणेश भी शाम को वहाँ उन लड़कों के साथ खेलने जाया करता . कुछ कुछ लड़कों का खेल देख कर वह हैरान हो जाता . महदा नाम का एक लड़का जब बॉलिंग करता था तो अच्छे अच्छों के छक्के छूट जाते  ,उसकी उछाल खाती तेज गेंदों से डर कर  बल्लेबाज़  एक तरफ हट जाते . कई लोग उसकी उछाल खाती गेंदों से ज़ख़्मी हुए थे .  फिर मारुति टेलर ने ऐसी दुर्घटनाओं से बचने  के लिए पॅड्स बनाए . एक दूसरा लड़का  लोहा सिंह  बिना ग्लव्स के कीपिंग करने में माहिर था , गेंद चाहे कितनी ही  तेज या उछाल भरी क्यों न हों उससे छूटती न थी . एक बार हैरत में गणेश ने  उसके हाथ देखे थे,  तो उसने पाया था की वह लड़का मेहनत मज़दूरी किया करता था इसलिए हथेलियों की चमडी सख़्त हो गयी थी, यह उसके नॅचुरल ग्लव्स बन गये थे . जिस लड़के को सारे गाँव के लोग पगला कहते थे वह तो हरफ़नमौला था  , जब उसको गेंद डालने के लिए कहा जाता तो अर्जुन के निशाने की तरह उसका निशाना केवल  तीन स्टॅंप्स हुआ करते  और जब वह बल्लेबाजी  करता तो उसे सिर्फ़  गेंद ही दिखाई देती , वह खूब लंबी हिट लगाता .  फीलडिंग  में तो वह माहिर था ही. मोटर मेकेनिक और बबन एलेक्ट्रीशियन  तो  चालाक खिलाड़ी थे , हरदम नये  स्ट्रोक्स खेलते और नयी   गेंदे  फेंकते थे  , कहल की तकनीक के मामले में उनका कोई सानी न था . आफ़िस का पांडु क्रिकेट का समान मैदान में लाया करता इसके बदले में उसे एक दो ओवर बॅटिंग करने दी जाती लेकिन समान वापस रखने की जब बारी आती तो वह अक्सर नदारद होता.
मारुति टेलर कभी कभार एक-दो गेंद खेल कर वापस अपनी दुकान पर जाया करता , उसे उसके काम से ही फ़ुर्सत न होती .  जब यह साहब बॅटिंग करने आते थे तो उनका ध्यान गेंद के बजाए धोती संभालने में जादा  होता था .

"वाइड बॉल" को वे  लड़के " वाईट बॉल " कहते थे  और आउट की अपील " आउट है"  कह कर करते थे  , ऐसे ही मज़ाक मज़ाक में कई बातें होतीं थी जिनको देख सुन कर गणेश को बड़ी  हँसी आती थी . छ:- छ:  लड़के दोनो टीमों में होते थे इसलिए कामन फीलडिंग  होती थी , और ऐसे में  अंपायर बॉलिंग करने वाली टीम के किसी खिलाड़ी को बनाया जाता  ,  बोलर जब गेंद डालता था और वह गेंद जब बल्लेबाज के पॅड्स से टकराती थी तो सबसे पहली अपील अंपायर बना लड़का ही करता था , वह यह भूल जाता की वह अंपायरिंग कर रहा है ऐसे में सब लोग हंस हंस कर लोट पोट हो जाते .

शाम में लोटा ले कर खेतों में शौच के लिए जाने वाले लोग भी आम के बगीचे में थोड़ी देर रुक कर क्रिकेट का मज़ा लेते और भूल जाते कि वह क्या करने निकले थे .

जब से गणेश ने इन लड़कों के बीच खेलना चालू किया था तब से मधुरानी भी कई बार शाम में  आया करती और गणेश की हौसला अफज़ाई किया करती . कभी कभी तो पाटिल साहब और सरपंच जैसे रसूख्दार लोग भी वहाँ आया करते . पाटिल जी तो सीधे मैदान में घुस जाया करते और बल्ला छीन कर खुद बल्लेबाजी करने लगते

" ए लड़के ज़रा बता तो कौन लौंडा अच्छी गेंद डाले  है ? "

"पाटिल जी  ओ महदू अच्छी तेज गेंद डाले है "

 " ओ मेरा मतलब वो ना था लड़के ,  उसका नाम बता जिसकी गेंद  पीटी जा सके है"

फिर बबन बहुत ही धीमी धीमी गेंद पाटिल जी को डाला करता , पाटिल जो वह बल्ला  घुमाते    की गेंद सीधे मैदान के बाहर हो जाती.

एक दो ओवर खेल कर पाटिल जी बल्ला फेंक देते और कहते ," हद है साला , क्या मरी मरी गेंद डालते हो अरे लड़कों इस विलायती खेल से तो अपना गिल्ली डंडा  बेहतर है"

लड़के मुँह छिपा कर हंसा करते.  यह देख पाटिल जी बड़बड़ाया करते "बर्बाद है आजकल के लड़के .. हमारे वक्त हम लोग तो कबड्डी , गिल्ली डंडा , खो खो  खेलते फिर रात को छुपान छुपैया  खेलते थे"

लड़के अपना खेल जारी रखते.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 32 - चोरनी

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आज बृहस्पतिवार था , बृहस्पतिवार को गाँव में  साप्ताहिक हाट - बाजार  लगा करती थी . सुबह सवेरे ही गणेश आफ़िस जा कर आया , आज कुछ  खास काम  भी नहीं  था,  लिहाज़ा उकता कर वह बाजार की तरफ चल दिया .  सब्ज़ी तरकारी वालों की दुकानों के सामने घूमते हुए वह कपड़े वालों की कतार में चला आया.  कपड़े वालों की दुकानों में छोटे बच्चों से ले कर बड़े बूढ़े और महिलाओं के धोती साड़ियाँ कुर्ते करीने से सजाए गये थे .  उन्हीं के बीच उसे बंजारा लोगों की वह खास पोशाक भी नज़र आई , एक तरफ चोगा और टोपी लटके हुए थे , उस अजीब सी रंग बिरंगी पोशाक को देख कर उसे बड़ा मज़ा आ रहा था . दुपहर का वक्त हो चला था , बाजार में आस पास के गाँवों से आने वाले ग्राहकों की भीड़ धीरे धीरे बढ़ने लगी थी , दुकानों के बीचों बीच रास्ते पर भीड़ इतनी बढ़ गयी थी की पाँव रखने की जगह न थी,  फिर भी उन सबके बीच किसी प्रकार गणेश अपने रास्ते चल रहा था , अब वह पूरी तरह उकता चुका था . उसने सोचा एक बार गाँव की तरफ घूम आए ...
 उसके पाँव बरबस ही मधुरानी की दुकान की तरफ बढ़ चले , बाजार की भीड़ भाड़ से बचते बचाते  वह  पानी की टंकी की ओर बढ़ चला जहाँ बड के पेड़ की अच्छी ख़ासी ठंडी छाँव थी. एकपल उसने इस पेड़ तले सुसताने की सोची लेकिन दूसरे ही पल उसने वह विचार त्याग दिया  और उसने मधु रानी की दुकान की ओर अपने कदम  बढ़ाए .

दूर से ही उसकी दुकान के इर्द गिर्द लोगों का जमावड़ा देख उसे हैरत हुई.  वह मन मसोस कर रह गया, अब इस भीड़ के रहते उससे बातचीत मुमकिन न थी.  उसने दो चार मिनट वहीं चहलकदमी कर गुज़ारे,   वह सोच रहा था कि वापिस बाजार जाया जाए  या थोड़ी देर कमरे में सुस्ताया जाए. लेकिन उसे मधु रानी से मिलने की प्रबल  इच्छा हुई, लिहाज़ा उन लोगों की भीड़ में रास्ता निकालते हुए वह गल्ले के करीब  जा पंहुचा .

" ओ  शामू  ज़रा देख तो उ औरत  धोती में गुड का डला  छिपायात रही , जा जा जल्दी जा उ भिखमंगी चोरनी को पकड़ ला "  मधु रानी की तेज नज़रों से वह चोरनी बच न पाई थी.

" ई करम जले गाँव वाले चोरी चकारि से बाज न आवे है" वह गुस्से से  गाँववालों को कोसते हुए बड़बड़ा रही थी.

 " अरे जल्दी जा  नास्पीटे  , तोरा  सत्यानाश जाए कलमुंहे  जा जल्दी जा  उसको पकड़"  वह चीखी.

 उस नौकर ने इधर उधर नज़रे दौड़ाई और वह चोरनी उसकी नज़रों से न बच पाई , नौकर को अपनी तरफ आता देख  वह भीड़ से निकल दूसरी ओर भागने लगी .  गणेश मधुरानी के करीब खड़ा हो तमाशा देख रहा था . उधर मधुरानी थी जो सुध बुध खो बैठी थी, उसका सारा ध्यान उस चोरनी पर लगा था

" अरे जल्दी जा कलमुंहें  पकड़ उ कर्मजली को देख देख  कैसन  भाग रही है उ कुतिया"  मधुरानी उत्तेजित हो कर चिल्लाए जा रही थी .

" ए री ज़रा ई  बोतल में तेल तो  डाल " उस भीड़ में किसी ने बोतल उठा कर उसका ध्यान अपनी ओर खींचा.

 " ए री मधुरानी ज़रा नोन की थैली निकाल तो "  एक औरत उससे बोली.

 गणेश ने १० रु. का नोट निकाल कर कहा "मुझे एक गोल्ड फ्लेक "

 "अरे  तनिक ठहरो , इधर ई चोर लोग पूरा दुकान पे हाथ साफ करत रहे और आप लोगन को थोडा वक्त रुकने की फ़ुर्सत नाही"  मधुरानी गणेश पर झुंझला कर  जैसे फट पड़ी .

 उसको जब अहसास हुआ कि वह गणेश है तो आवाज़ में नर्मी लाते हुए बोली " बाबूजी ए आप हैं हम समझे कोई और आवे है"  

" न.. न.. कोई बात नहीं पहले तुम अपना काम देख लो , कोई जल्दी नहीं है " गणेश ने जवाब दिया.

 " अरे  बाबू तोके जल्दी ना है पर हमको तो है ना " एक औरत भीड़ में बोल उठी .

उस औरत की ओर गुस्से से देखती हुई मधुरानी तेज आवाज़ में बोल उठी " ए री बड़ी जल्दी है ना तुझे  ? जा किसी और दुकान पर चली जा , हमर दुकान का नौकर उ चोरनी के पीछे  गया है , हम जो  गल्ले से उठ कर तुझे जो समान दिए  रहे तो उ चोर लोग पूरा दुकान पर हाथ साफ कर लिए"

वह औरत चुप हो गयी . मधुरानी की बात अपनी जगह सही थी.

 " बाबू जी  तनिक ठहरिए  उ शाम  के आते ही आपको सिगरेट दिए  रहे "  मधुरानी गणेश की ओर मुखातिब हुई.

 इतने में शाम उस चोरनी को पकड़ कर मधुरानी के सामने ले आया.

"हरामजादे" वह औरत  शाम से अपना हाथ छुड़ाते  हुए बोली "हमरा हाथ जोड़ बेसरम , कीड़े पड़े तोहार हाथ में , तेरा सत्यानास जाए"

"मैं न छोड़ूं  तोहार  हाथ , म्हारी दीदी ने तुमको गुड चुराते देखा होवे है"  लड़का बोला.

 "ए कलमुंही , हम ई गुड के पैसे  दिए हैं" चोरनी उल्टा मधुरानी  पर बरसी .

"पैसे दिए रहे तूने ? हैं ? बड़ी आई पैसे देने वाली कुतिया  "  अपनी  साडी कमर में खोंस कर मधुरानी आगे बढ़ी .

 " ए शामू ज़रा ग्राहकों को देख तो , हम अभी इसको ठीक किए देते हैं"

" जी दीदी जी" कह कर शामू ग्राहकों को समान  तौलने लगा .

इतने में चोरनी कह उठी "हराम की जनी ग़ाली मत दे कहे देती हूँ"

 "चटाक!!!" मधुरानी एक झन्नाटेदार तमाचा उस चोरनी के  मुँह पर रसीद  दिया "गुड चोरनी , रंडी! " मधुरानी उसके बालों का झोंटा पकड़ कर उसे तमाचे पर तमाचे मारे जा रही थी "पैसे दिए तूने कमिनि ? हाँ?  हमर से ज़बान लड़ाती है ? हैं?   कितने का गुड तूने मोल लिया, बता कमिनि ... बोल हरामजादि हम तोहार चमडी निकाल लूँगी "  इतना कह कर उसने और एक तमाचा उसको जड़ा .

"आ " मार से वह औरत कराह उठी फिर आवाज़ में नर्मी लाते हुए बोली "ए री मार मत"

 "अच्छा ? तो बताए दे कितने का गुड खरीदा तूने ? "  इतना कह कर उसके झोंटे को उसने ज़ोरदर झटका दिया .

वह औरत अपने बॉल छुड़ाते हुए नीचे गिर पड़ी फिर सम्हल कर उठती हुई बोली " बताती हूँ"  "चार आने का आधा किलो"

 " चार आने  का आधा किलो? हैं?" उसकी बात को दोहराते हुए मधु रानी बोली " चार आने का आधा किलो गुड कब से मिलत रहा ? हैं? कलमुंही  झूठ बोलती है , कीड़े पड़ें तेरे मुँह में रंडी , हराम जादि चोरनी " उसे गलियाते हुए उसने उसके मुँह पर एक घूँसा जड़ दिया , फिर उसकी साडी से गुड की दल्ली निकल कर शामू को बोली " ओ सामू बेटा ज़रा ई गुड की दल्ली को तोलना तो और बता ई रंडी को कितना होवे है? "

 उससे गुड की दल्ली ले कर तौलने के बाद कहा " डेढ़ किलो बनता है दीदी जी"

" ए देखो गाँववालों ई औरत कहे है इसने हमार से आधा किलो गुड लिया रहा चार आने में , और फिर तौलने पर इसका वजन डेढ़ किलो कैसे हुआ रहा ?  और ई रंडी हमसे कहत रही इसने गुड हमसे मोल लिया है , क्योंरी कुतिया ? " इतना कह कर उसने नीचे बैठी  औरत की कमर में एक जोरदार लात जमाई . वह औरत ज़मीन पर  धराशायी हो गयी

" ठहर  रंडी  की जनि छीनाल औरत , तुझे छठी का दूध याद न दिलाया रहा तो हमरा नाम भी मधुरानी नहीं , कहे देती हूँ  , ए रे सामू ज़रा रस्सी तो ला रे इसको बाँध कर थाने लिए चलते हैं" मधु रानी कड़क कर बोल उठी.

वह औरत दर्द से कराहते हुए अपने कान पकड़ कर  गिडगिडाई  " ना दीदी , रहम करो  हमार छोटे छोटे बच्चे हैं , हमका पुलिस में ना दो" वह मधुरानी के पाँवों को छू कर बोली .

 " नौटंकी ना कर , धन्दे का  टाइम खराब करती  है रंडी , चल उठ  और दफ़ा हो यहाँ से और कहे देते हैं आइन्दा इहा अपनी मनहूस सकल न दिखाना वरना ओ हाल करूँगी तेरा तोरे बच्चे भी तुझे न पहचानेंगे चल भाग बुरचोदि रंडी हरामजादि " पलट कर गल्ले पर वापिस जाते हुए मधुरानी गुस्से से बड़बड़ा रही थी.

गणेश सांस रोक कर यह हाई वोल्टेज  ड्रामा देखे जा रहा था  उसके मुँह से एक लफ्ज़ नहीं निकल रहा था , दूसरी दफे वह मधुरानी का यह रूप देख रहा था. लेकिन जो भी हो ऐसे मुश्किल हालात से दो चार हाथ  करना इसे खूब आता है , कोई और होती तो घबरा जाती.  उसे याद आया एक बार वह अपनी पत्नी को पीछे  स्कूटर पर बिठा कर कहीं जा रहा था एक गुंडा दिन दहाड़े उसकी बीवी के हाथों से पर्स  छीन कर भाग खड़ा हुआ , यह देख कर उसकी बीवी को वो सदमा लगा की उसको समझ ही नहीं आया कि आख़िर क्या हुआ , वह मानों काठ की हो गयी , कितनी देर बाद वह होश में आई तब तक गुंडा दूर भाग चुका था.  उसकी जगह यह मधु रानी होती तो गाड़ी से कूद कर  उस गुंडे का पीछा करती और न सिर्फ़ अपना पर्स उससे लेती बल्कि  उसकी  गर्दन पकड़ कर २-४ लातें उसको लगाए बिना वापस न आती.

आज उसके दिल में मधुरानी के प्रति इज़्ज़त कई गुना बढ़ गयी थी. उसने सोचा,

भारतीय नारी को इसी तरह हिम्मती बनना पड़ेगा , अगर इसी तरह महिलाएँ खुद को मजबूत बनाएँ और हिम्मत से काम लें तो कोई भी इन महिलाओं का शोषण न कर पाएगा , वाकई  औरत अबला नहीं होती....

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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Madhurani/Honey - Chapter 31 वह बदमिज़ाज लोग

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"हे भगवान , कैसे  बदमिज़ाज लोग हैं यह , बेकार बखेड़ा खड़ा कर दिया इन  गाँववालों ने "  गणेश मधुरानी से बतियाते हुए बोला  " अच्छी ख़ासी चर्चा चल रही थी सब गुड गोबर कर दिया "

" सादी ब्याह के मामलों में ऐसा ही होवे है बाबू तुम न जानत रहे , कौन मुआ  किस बात को ले  कब आड़े आ जाए कौनो खबर न  रहे " मधु रानी जवाब देते हुए बोली.

कुछ सोच कर गणेश बोला " कुछ भी हो , मुझे तो इसमें उस पाटिल का ही हाथ नज़र आता है "

"उ  कैसे ? " मधुरानी ने पूछा.

" तुम भूल गई ? सरपंच जी ने उनको चर्चा करने पर राज़ी किया था , मुझे लगता है  पाटिल जी को यह नागवार गुजरा "

" ना ना बाबूजी ... पाटिल भला आदमी है  उ बात होती तो  उसने अपनी हवेली में उनको बुलावा   न भेजा होता "  मधुरानी की बात सुन गणेश एक पल सोच में पड़ गया .

इसे पाटिल जी से इतनी हमदर्दी क्यों ? .....
आख़िर  इसी पाटिल की जीप तले आकर इसके मर्द ने अपनी जान गँवाई थी .और फिर भी यह उसी की तरफ़दारी करती है , क्या वजह हो सकती है? अब यूँ तो पाटिल के बुलाने पर भी इसको वहाँ जाना नहीं चाहिए था.... हुम्म! इसी से पूछता हूँ ... लेकिन क्या यह  वाकई मायने रखता है? .....

फिर वह मधुरानी को जवाब देते हुए बोला " अरे इसी बला को तो राजनीति कहते हैं "

तुनक कर वह बोल उठी " ई राजनीति हमें न मालूम है बाबू ....हम तो बस इतना जानत रहे कि उ पाटिल बाबू मक्कार ना है , दिल का सरीफ़ होवे है , हम कहे देते है .... हमको आदमी की परख करना आवे है , आपको न परखा हमने   ? "  शरारत से उसकी आँखो में आँखें डालते हुए  वह बोली.

"तुम औरतों तो पैदाइशी भोली भली होती हो , खैर मैने पाटिल जी को डाक्टर साहब को इशारा करते हुए देखा है"
गणेश उसकी नज़रें टाल कर बोला.

"जाने दो न बाबू जी उ मुए पाटिल को , काहे उसकी बातें करत हो" वह उठकर उसकी ओर खिसक कर बैठ गई .

"जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ ... अब उस बेचारी गूंगी लड़की का क्या होगा ? अपनी नासमझी और ज़िद  के चलते उसके अरमानों का बेदर्दी से कत्ल किया इन लोगों ने . उस लड़की के साथ बहुत ग़लत हुआ कम से कम यह देखकर तुम्हें कुछ तो विरोध करना चाहिए था , लेकिन तुम भी चुप रह गयीं , तुमसे मुझे यह उम्मीद न थी " गणेश झुंझला कर बोला.

उसने मधु रानी की तरफ देखा , यह बात सुनकर उसके चेहरे की रंगत एक पल में बदल गयी . गणेश को महसूस हुआ कि बेकार ही उसने उससे गुस्से में इतनी कड़ी बात कर दी .

"साहब जी"  वह  संजीदा आवाज़ में दूर कहीं देखते हुए बोली " ई दुनिया में कई  सही गलत  बातें  होत हैं ...ई सब किस्मत का खेल है जो भाग में लिखा है... सो होवे है उ भाग के आगे हमारा तुम्हारा कोई बस न चले है" फिर वह रुककर बोली "आप भी तो उहाँ बोले थे , कौनो फायदा हुआ उ लोगों के सामने मुँह खोल कर ? उल्टा पूरा गाँव के सामने  बेइज़्ज़ती हो गयी"

यह सुन कर गणेश सकपका गया.

 मधु रानी संभल कर बोली " उ लोगन के सामने मैं भी बोली रही तो मुझे भी डपट देते कि औरतों - लुगाइयो को बीच में बोलना न चाहिए "  वह अपनी रौ में बोली चली जा रही थी .

गणेश बीच में बोल उठा " न न मेरा वह मतलब न था " गणेश उसके सामने सफाई देते हुए बोला .

लेकिन उसकी बात को बीच में काटते हुए मधुरानी बोल पड़ी "आप सोचत रहे कि उनका ब्याह हो जाता तो अच्छा रहता  , आप लोगन के लगने से कौनो फ़र्क पड़े है ? मुझे भी लागे है कि आपके संग मेरा  ब्याह हो जावे तो कितना अच्छा हो "

गणेश का मुँह खुला का खुला रह गया वह ऐसे चौंक उठा मानों उसे बिजली का झटका लगा हो.  वह फटी फटी आँखों से मधु रानी को अपलक देखता ही रह गया .

बात को आगे बढ़ाते  हुए उसने कहा "लेकिन मेरा ऐसन सोचने से का होवे है बाबू जी ? .... ई तो किस्मत की बात होवे है"

हे भगवान  ! यह मुझ पर डोरे  डाल  रही है ? क्या यह मेरे गले पड़ने की सोच रही है?.....  गणेश सोच में पड़  गया  ....  बडी चालू चीज़ है यह , मुझे  फाँसने  की कोशिश कर रही है.…   गणेश के पसीने  छूट गये .

"बाबूजी"  मधुरानी की आवाज़ से उसकी तंद्रा टूटी.

 " अ.... हाँ ???"  रुमाल से अपनी गर्दन और और चेहरे पर पसीने की बूँदें  पोछते हुए उसने मधुरानी से कहा "कुछ ? कहा मुझसे?"

उसकी सकपकाहट देख कर मधुरानी की हँसी छूट गयी "बाबू जी"  वह मुस्कुराते हुए बोली  "तोहार तो पसीने छूटे है"  मुस्कुराना जारी रखते हुए  उसने आगे कहा " घबडाओं ना बाबूजी , हमार कोई ऐसा वैसा इरादा ना है , एक औरत का घर बार  उजाड़ कर हम अपना घर ना बसाना चाहे . आपने का सोचा ??  "

"न..न.. नहीं" खिसियानी  हँसी हंसते हुए गणेश बोला , अब भी रुमाल से उसका पसीना पोंछना जारी था.

गणेश की इस हालत के मज़े लेती हुई मधुरानी  ठहाका मार कर हँसने लगी " आईने में खुद की सकल  देखों बाबूजी , का चेहरा होई गवा है "

आख़िर क्या चाहती है यह औरत ? ....इस पिछड़े हुए गाँव में रहने के बावजूद कितने आज़ाद ख्यालात क़ी  है यह .... गणेश मन ही मन विचार करने लगा

"बाबू जी" मधुरानी आगे बोली " आप एही सोचत रहोगे कि कैसी कलमुंही औरत होवे है , इसके ख़सम को उ पाटिल ने अपनी  गाड़ी से कुचला , ई की माँग उजाड़ दि फिर भी उ पाटिल की तरफ़दारी करती है"

हद हो गयी यह तो....  गणेश चौंक गया ....इसे कैसे पता मैं क्या सोच रहा हूँ ?.... कहीं यह कोई टोना टोटका तो नहीं करती?.... शायद नहीं , हो- न- हो यह  मेरे मन की बात ताड़ गयी , या शायद यह महज एक इत्तेफ़ाक हो....

"मेरा ख़सम बेवड़ा था ,  दिन-रात सराब के नसे में धुत्त रहता था उ ही हालत में उ ससुरा उ पाटिल जी की गाड़ी के नीचे आया रहा , ई बात में उ पाटिल जी का क्या कसूर ? और ई बात को लेकर हम काहे पाटिल जी से दुस्मनि मोल ले? अब ई तो एही हुआ के पानी में रहकर मगरमच्छ से पंगा लेना"  मधुरानी ने कहा .

गणेश टकटकी लगाए उसकी ओर देख रहा था ....इसकी सोच सही है... अगर इसने पाटिल साहब से पंगा लिया होता तो वह इसका इस गाँव में जीना हराम कर देता....  गणेश वापिस सोच में डूब गया .

"बाबूजी" अबकी बार उसकी बाँहों को पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से उसे हिलाते हुए मधुरानी बोल उठी "आपको ई बीच बीच में खोने की न जाने कैसी अजीब बीमारी होवे है"

उसके नर्म , मुलायम हाथों  की छुअन से उसके  सारे  बदन में रोंगटे  खड़े हो गये वह फिर अपनी सोच में डूब गया.
अब इसकी बातें  कुछ कुछ समझ में आने लगी है , शायद  यह भी मेरे जसबातों को समझती है....

वह उसकी खूबसूरती को अपनी आँखों से निहार रहा था  , उसे  ताक  रहा था   मानों  उसके चेहरे का नूर  अपनी आँखों से पी जाना चाहता हो.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
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