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Friday, November 11, 2011

Upanyas Madhurani - Chapter 30 जफ्र आफ़र मैफ़र तुंफ्र राफ्र देफ्र

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गणेश जब मधुरानी की दुकान के सामने से गुजरा तो वहाँ ख़ासी भीड़ थी . कल बैठक में हुई बमचक के बाद से वह काफ़ी बेचैन था लिहाज़ा मधुरानी से बात कर अपनी बेचैनी से छुटकारा पाना चाहता था मगर लोगों की भीड़ देख कर उससे मिल पाना मुमकिन नहीं था. गणेश ने भीड़ में गर्दन उठा कर मधुरानी की ओर देखा , उनकी नज़रें मिलते ही वह अर्थपूर्ण ढंग से मुस्कुराई.

मानों उसकी आँखें उससे कह रही हों "मेरी मजबूरी को समझो...इन लोगों के होते हुएमन तुमसे कैसे मिल सकती हूँ"

गणेश बेचैनी से उसकी दुकान की तीन चार चक्कर लगा आया फिर हार कर एक जगह खड़े हो कर सोचने लगा

"यहाँ चहल कदमी करने से कुछ हासिल नहीं होगा , उल्टा अगर किसी को शक हो गया तो बेकार की मुसीबत गले पड़ जाएगी " उसने भीड़ में गर्दन उठा कर मधुरानी की ओर देखा और हाथ से "बाद में आने" का इशारा किया . उसकी भी
अपनी आँखों से मूक सहमति पा कर उसने वहाँ से कदम बढ़ाए .

अचानक उसे अजीब सी आवाज़ सुनाई दी " जफ्र आफ़र मैफ़र तुंफ्र राफ्र देफ्र" वह ठिठक कर वहीं बीच रास्ते ठहर गया

"यह तो शायद मधुरानी का ख़ुफ़िया संदेसा है , क्या कह रही थी वह पिछली बार" उसने अपनी याददाश्त पर ज़ोर डाल कर याद करने की कोशिश की "अरे हाँ वह फालतू की " फ्र , फ्री" हटाने की बात कर रही थी , क्या मतलब हो सकता है इसका ??? ज से जल्दी ?? आ से आना ?? म से मैं , तु तुम , रा से राह दे से देखना ???"


उसके दिमाग़ में यह बात कौंधी "जल्दी आना , मैं तुम्हारी राह देखूँगी" "अरे वह शायद मुझ ही से बातें कर रही थी , मगर किसी को शक न हो इसलिए अपनी ख़ुफ़िया ज़बान में बोली" उसने दूर मुड़ कर देखा , मधुरानी उसी को देखती हुई शरारत से मुस्कुरा रही थी , हाय वह उसकी मदहोश करने वाली शराबी आँखें , और दिल पर छुरियाँ चलाने वाली नशीली नज़र , मानों वह अपने आशिक को करीब बुला रहीं हों , गणेश भी उसकी ओर देख मुस्कुराया और अपने कमरे की तरफ बढ़ा

रास्ते में उसे वही गूंगी लड़की लोटा ले कर खेतों की तरफ जाती दिखाई दी , उसने आस पास देखा उस गूंगे लड़के का कहीं अता पता न था . लेकिन यह उसकी नज़रों से न बच सका क़ि आस पास के लोग भूखी नज़रों से गूंगी के जिस्म को ताके जा रहे थे . उड़ते उड़ते उस तक यह बात पंहुची थी कि उस गूंगे लड़के को उसके घरवालों ने एक कमरे में क़ैद कर रखा था और सुबह शाम पहरे पर एक क़ारींदा बैठा रखा था. शायद इसलिए वह गूंगी लड़की भी उदास सी लग रही थी , भारी कदमों से वह अपने कमरे में लौट आया.

वहाँ से लौट कर वह बिस्तर पर लेटा और उसकी आँख लग गयी . अचानक उसकी नींद टूट गयी - दरवाज़ा पर खटखट हुई , वह चौंक कर उठ खड़ा हुआ "भला इस समय कौन आया होगा ?" उसने आगे बढ़ कर खिड़की से झाँक कर पता करना चाहा , बाहर अंधेरा छा गया था , उसने मधुरानी के दुकान की तरफ देखा , दुकान में अब कोई ग्राहक न था , मधुरानी भी दुकान में न थी .

"शायद यह मधुरानी ही होगी"

वह जल्दी से दरवाज़े के करीब आया और होंठों पर मुस्कान लिए उसने दरवाज़ा खोला . लेकिन यह क्या ? दरवाज़े पर मधुरानी न थी , यह सारजाबाई थी जो खाना ले कर आई थी . चुपचाप उन्होने अंदर आ कर भोजन की थाली रख दी और सुबह की जूठी थाली ले कर चली गयी . अंदर आ कर उसने सोचा "दुकान खुली छोड़ कर मधुरानी न जाने कहाँ गयी होगी" .

गणेश बाहर आया और उसकी नज़रें मधुरानी को इधर उधर खोजने लगीं , उस दिखाई दिया अंधेरी गली के कोने में खड़ी मधुरानी किसी औरत से धीमे धीमे बातें कर रही थी. उस दूसरी औरत ने हाथों में लोटा पकड़ रखा था . अचानक उस औरत की नज़र गणेश की तरफ गयी और ज़रा तेज आवाज़ में अपनी बात ख़त्म करते हुए बोली "अबकी बार मोडे को बड़े डाक्टर को दिखाएँगे ऐसे मेरा मर्द बोला " और जाते जाते बोली " बाद मा बताऊंगी"

उस को जाता देख मधुरानी भी अपनी दुकान की ओर चल पड़ी और रास्ते में गणेश को देख पूछा " तब के वखत आए रहे ?" , गणेश ने बाहर से कमरे का दरवाज़ा बंद किया और वह भी उसके पीछे पीछे चल पड़ा.

क्रमशः

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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