ऑफिसमें अबतक कोई नही आया था. जॉन सुबह सुबह अकेला आकर टेबलके सामने अपने कुर्सीपर बैठ गया. वह शायद थकावट महसुस कर रहा था. उसने एक फाईल निकाली और उसमेंके पन्ने पलटने लगा. उसका उस फाईलमें जराभी खयाल नही था. तो भी वह एकाग्र होनेका प्रयास करते हूए फाईलके पन्ने पलटने लगा. थोडी देरमें एक एक करते हूए ऑफिसका दुसरा स्टाफ आने लगा.
अब ऑफीसमें अच्छी खासी चहलपहल और खुसुर फुसुर सुननेमे आ रही थी. तभी जॉनके पास एक मेसेंजर आकर हल्के आवाजमें बोला.
" सर, बॉस आ गए है .."
" बॉस ?..."
" सर ... शहर पोलीस शाखाप्रमुख"
" क्या? इतनी सुबह सुबह ?" जॉन अपने कुर्सीपरसे उठते हूए बोला.
शहर पोलीस शाखाप्रमुख आया मतलब कुछ तो जरुर सिरीयस होगा....
सोचते हूए जॉन उन्हे रिसीव्ह करनेके लिए बाहर गया. शहर पोलीस शाखाप्रमुख जॉनको रस्तेमेंही मिले.
" गुड मॉर्निंग सर" जॉनने अभिवादन किया.
" जॉन आय निड टू टॉक टू यू. इट्स व्हेरी इम्पॉर्टंट" शहर पोलीस शाखाप्रमुख ना रुकते हूए सिरीयस मूडमें बोले.
जॉन वैसाही मुडकर उनके पिछे पिछे आने लगा. दोनो आकर जॉनके केबीनमें बैठ गए.
" क्या खुनी का कुछ अता पता लगा की नही ?"
बैठे बराबर शहर पोलीस शाखाप्रमुखने जॉनको सवाल किया.
" नही सर, अबतक और कुछभी खास जानकारी नही मिली. और वो तो वो उपरसे ...आपको पता है ही... अपनाही कोई आदमी खुनीको मिला हूवा है" जॉनने कहा.
" और कितने खून होनेकी राह देखनी पडेगी हमें?"
शहर पोलीस शाखाप्रमुखने तिरछे अंदाजमें सवाल पुछा.
" सर, मुझे लगता है की मै आपको अबतक किए इनव्हेस्टीगेशनके बारेंमे संक्षिप्तमें बताता हू... ताकी आपको हम कर रहे इनव्हेस्टीगेशनके बारेमें पता चले. "
जॉनने एक दीर्घ सांस ली और वह उसके बॉसको उन्होने इस केसपर अबतक किये काम के बारेंमे जानकारी देने लगा.
" जैसे मैने आपको पहले बताया था... पहले खुनके वक्त हमें एक 'झीरो' ऐसा लिखा टी शर्ट पहना हूवा आदमी लिफ्टमें चढते हूए मिला था.... वैसाही टी शर्ट पहना और एक आदमी मुझे जहा अँजेनीको अॅडमीट किया था उस हॉस्पिटलमें मिला था....दोनोभी हमारे शिकंजेसे जरासे अंतरसे छूट गए थे... इसलिए हमनें दोनोंके स्केचेस निकालकर पुरी मिडीयाकेद्वारा लोगोमें जारी किये.... उन दोनोंको हमने पकडा भी लेकिन आखिरमें ऐसा पता चला की उन दोनोंका इन खुनसे कोई वास्ता नही था. .... इन फॅक्ट वैसे 'झीरो' निकाले हूए टी शर्ट पहनना आजकल फॅशन बनती जा रही है.... लेकिन यह खुनीभी दिवारपर खुनसे झीरो निकालता है इसलिए हमने यह खुन और वे दो टीशर्टवाले ये दोनो घटनाए एकदुसरेसे जोडी थी... इसलिए शुरुसेही हमने खुनीको पकडनेके हिसाबसे पक्की की दिशा पूरी तरहसे गलत साबीत हूई .... उसमें वक्त सो गया, हमारी मेहनत भी गई.... और आखीरमें हाथमें कुछ भी नही आया.... लेकिन अब हम नए जोशके साथ तैयार हूए है...... और पुरी तरह अपनी जान की भी पर्वा ना करते हूए जी जान लगाकर हम इस काममे लग गए है......" जॉन ने पुरी जानकारी सक्षिप्तमें दी.
उसका इशारा हालहीमें उसपर हूए जानलेवा हमलेकी तरफ था.
" काममें लगे हो... फिर खुनी क्यो नही मिल रहा है.? तुम्हे लग रहा होगा की इतनी सुबह आकर तुम लोगोको तकलिफ देनेके बजाय मै चूपचाप अपने ऑफिसमे जाकर शांतीसे अपने कुर्सीपर बैठकर आराम क्यो नही करता? मेरे कुर्सीको कितने किल है इसका तुम्हे अंदाजा नही होगा. उपरसे हमेशा दबाव लगा रहता है. पुरे शहरमें दहशत फैली हूई है... रातको आठ बजनेसे पहले सब रास्ते सुनसान हो जाते है. हर आदमीको लगता है की अब अगला नंबर उनका ही है. इतने दिन लोग चूप थे. अब वे मेयर को जाकर सफाई मांग रहे है और वह मेयर मेरे सरपे चढकर मुझे सफाई मांग रहा है. और इतनाही काफी नही था की यह प्रेसवाले पुलिसके बारेमें उलटा सिधा छापकर अपनी बदनामी कर रहे है. सच कहो तो लोगोका पुलिसपरसे विश्वास उडनेकी नौबत आई है. अब बहुत हो चूका अब सरके उपरसे पानी जा रहा है. मसला अब मिनीस्ट्री तक पहूंच गया है. ऐसी स्थीतीमें मै कैसे शांत रह सकता हूं. तुम लोगोंको जादासे जादा मै 4 दिनकी मौहलत देता हूं. उधर कुछभी करो और चार दिनमें उस खुनीको मेरे सामने पेश करो... लाईव्ह ऑर डेड"
"सर हम रातदीन कडी मेहनत कर रहे है"
" मुझे मेहनत नही, रिझल्ट चाहिए" शहर पोलीस शाखाप्रमुख कुर्सीसे एकदमसे खडे होते हूए बोले.
जॉनभी उसके कुर्सीसे उठ गया. शहर पोलीस शाखाप्रमुख अब जाने लगे थे. जाते जाते वे दरवाजेमे रुके, पलटे और बोले,
"... और अगर तुम्हारेसे यह केस सॉल्व नही होता है तो इस्तीफा दो. मै दुसरा कुछ बंदोबस्त करुंगा"
शहर पोलीस शाखाप्रमुख टाकटाक जुतोंका आवाज करते हूए वहांसे चले गए. जॉन दरवाजेतक गया और उन्हे जाते हूए देखता रह गया.
..contd..
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उपन्यास - अद्-भूत (संपूर्ण) The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA. आप यह उपन्यास अपने दोस्तोंको ईमेलभी कर सकते है. |
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Tuesday, January 22, 2008
Ch-21: जॉनके बॉसकी व्हीजीट.. ... (शून्य-उपन्यास)
Posted by
Sunil Doiphode
at
10:09 AM
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Labels: bharat sahitya, bharatiya, bhasha India, Book display, hindi dramas, Indian literature, literary, novel, novel on internet, sahitya awards, sahitya sangraha, the hindu, tukaram, upcoming blogs
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