उपन्यास - अद्-भूत
The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA.
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Thursday, March 27, 2008

Ch-62 : लता (शून्य-उपन्यास) Hindi

बंगलेके बाई तरफ एक जगह एक फुलोंसे लदी हूई लता थी. फुलोकी खुशबुभी मन मोह लेनेवाली थी. वह लता बंगलेके दिवारका, खिडकीका और पाईपका सहारा लेते हूए उपर टेरेसतक पहूंच गई थी. उसने टॉर्चकी रोशनी डालते हूये उस लता को निचेसे उपरतक गौरसे देखा. वह फुलोंसे पुरीतरह लदी हूई थी. फिर उसने उसकी तरफ उपरसे निचे तक गौरसे देखा. लताके तले बहुत सारा कचरा पडा हूवा था. निचे पॉलीथीन बॅग्ज, कागजके मसले हूए टूकडे, इस तरह का बहुत सारा कचरा पडा हूवा था. जॉन घूटनोपर बैठकर उस कचरेमे कुछ मिलता है क्या यह देखने लगा. उसने अपने जेबसे एक बडीसी पॉलीथीन बॅग निकाली और उसमें वह वहा के कचरेसे जो भी महत्वपुर्ण लगा या महत्वपुर्ण होनेकी संभावना थी ऐसा कचरा उस बॅगमे ठूसने लगा. उस कचरेमें ढूंढनेके बाद उसने उस लता को पकडकर जोर जोरसे हिलाया. उसके शरीरपर फुलोंकी बरसात होने लगी. और कुछ गिरनेका 'धप.. धप' ऐसा आवाज आने लगा. उसने टॉर्च के रोशनीमें गौरसे देखा तो उस लताके टहनीयोंमे अटका हूवा और कुछ कचरा निचे गिर गया था. उसमेंकाभी कुछ छाटकर उसने अपने बॅगमें ठूंस दिया. उसे एक पॉलीथीनकी बॅग मिल गई. उसका मुंह गांठ मारकर बंधा हूवा था. उसने वह पॉलीथीन बॅग हिलाकर देखी. अंदरसे कुछ बजनेका आवाज आ रहा था. जो भी होगा बादमें देखेंगे...

ऐसा सोचकर उसने वह बॅगभी अपने बॅगमें डाल दी.

चलो अब बहुत हो गया...

अब मुझे चलना चाहिए...

जॉनने बॅग उठाई और कंपाऊंडकी तरफ वापस जानेके लिए निकल पडा.

जॉनको घर आते आते सुबहके चार बज चूके थे. वह पुरी तरहसे थक चूका था. पॉलीथीन बॅग निचे रखकर दुसरे जखमी हाथको संभालते हूऐ उसने क्वार्टरका दरवाजा खोला. उसे याद आगया की एकबार ऐसेही जब उसका अॅक्सीडेंट हुवा था तब अँजेनीने उसे संभालते हूए घर लाया था. और क्वार्टरका ताला उसनेही खोला था. उसकी याद आतेही उसका मन फिरसे खट्टू होगया.

दरवाजा खोलते खोलते उसे याद आया -

अरे व्हिस्कीकी बॉटल लाना तो मै भूलही गया....

मै बाहर निकलने का एक उद्देश व्हिस्कीकी बॉटल्स लाना यह था और वही मै भूल गया ...

दरवाजा खोलकर निचे रखे पॉलीथीनकी थैलीकी तरफ देखकर उसने सोचा -

चलो तो अपना दर्द भूलनेके लिए अपने पास और एक काम है...

इस कचरेमें कुछ महत्वपुर्ण मिलता है क्या यह ढूंढना...

पॉलीथीनकी थैली उठाकर वह घरके अंदर चला गया. अंदरसे दरवाजा बंद कर लिया और सोफेपर बैठकर वह उस थैलीसे एक एक मसला हूवा कागज बाहर निकालकर उसे ठिक कर उसमें कुछ मिलता है क्या यह देखने लगा. सब कागजके टूकडे टटोलकर खतम होगए लेकिन कुछ खास नही मिल रहा था. फिर वह वहांसे उठाकर लाई पॉलीथीन बॅग्ज खोलकर देखने लगा. कुछ बॅग्जमें बचे हूए, सडे हूए मुंगफलीके दाने थे. तो कुछ बॅग्जकी बहुतही गंदी बदबू आ रही थी. आखिर उसे एक गांठ मारी हूई पॉलीथीनकी थैली मिल गई. उसने उस थैलीकी गांठ बडी सावधानीसे खोली. अंदरसे बदबू आयेगी इस अनुमानसे मुंह बाजू हटाया. लेकिन अंदरसे कोई बदबू नही आयी. उसने थैलीमें झांककर देखा. अंदर कुछ कांचके टूकडे थे.

टूटे ग्लासके होंगे....

वह सोफेसे उठकर निचे मॅटपर घुटने टेंककर बैठ गया. उसने वे टूकडे बडी सावधानीसे थैलीसे बाहर मॅटपर उंडेल दिए. दो-तीन टूकडोंपर उसे खुनके दाग दिखाई दिए.

अरे वा यह तो कातिलका या उसके साथीका खुन दिख रहा है...

उसने खुनके दागवाला एक टूकडा हलकेसे अपने हाथमें लिया.

अब मुझे इस धागेसेही कातिलतक पहूचना है...

लेकिन क्या इस खुनसे मै कातिलके बारेमें कुछ जानकारी पा सकता हू ?

वह सारी संभावनाए टटोलकर देखने लगा. और फिर अचानक उसकी आंखे खुशीसे चमकने लगी. उस कांचके टूकडेपर उसे खुनसे सने हाथके और उंगलियोंके निशान दिखाई देने लगे.

" यस्स" वह खुशीसे चिल्लाया.

दुसरे खुनके दाग लगे टूकडेभी उसने सावधानीसे उठाकर गौरसे देख लिए. उसपरभी उंगलियोंके निशान दिख रहे थे. वैसेही वे कांचके टूकडे हाथमें लेकर वह फोनके पास चला गया. वे टूकडे बगलमें एक टेबलपर रखकर उसने एक नंबर डायल किया.

" सॅम... मै तुम्हारे उधर आ रहा हू... अभी ... एक बहुतही महत्वपुर्ण धागा मेरे हाथ लगा है..." वह अपनी खुशी छिपा नही पाकर उत्साहभरे स्वरमें फोनपर बोल रहा था.

क्रमश:...

Wednesday, March 19, 2008

Ch-59A : आर्यभट्ट (शून्य-उपन्यास) Hindi

कमांड2 निश्चिंत होकर कुर्सीपर रिलॅक्स होकर बैठा था. उसके सामने टीव्ही शुरु था. लेकिन उसका टीव्हीके तरफ ध्यान कहा था.? वह तो अपनेही धुनमें था. अबतक बॉसने बताए हूए सब काम उसने इमाने इतबारे पुरे किए थे. और उसकी वजहसे बॉसभी उसपर खुश लग रहा था. सबसे महत्वपुर्ण बात यह थी की कमांड1के कत्लका शक बॉसको उसपर नही आया था. वह बिचबिचमें टिव्हीके चॅनल्स बदलकर खबरें देख रहा था. आगजनी, दंगा फसाद, लाठीमार, यह सब खबरें देखते हूए उसे बडा मजा आ रहा था. उसके चेहरेपर एक शैतानी मुस्कुराहट फैली हूई थी. वह अपनी मस्ती दिमागसे झटककर कुर्सीपर सिधा होकर बैठ गया..

मुझे ऐसे सुस्ताकर नही चलेगा...

मुझे अब आगेकी कार्यवाहीके पिछे लगना चाहिए...

वह कुर्सीसे उठ खडा हो गया. उसने वही दोचार चक्कर लगाए और फिर कुछ ठोस निर्णय लेकर वह कमरेमें कोनेमें रखे आलमारीके पास चला गया. आलमारी खोलकर उसने आलमारीका सबसे निचेवाला ड्रॉवर खोला. ड्रॉवर का बक्सा पुरी तरह बाहर निकालकर अपने पैरके पास निचे रख दिया. ड्रॉवर निकालनेके बाद जो खाली जगह बनी थी वहांसे उसने और एक छूपा कप्पा खोला. उस कप्पेसे कुछ ढूंढकर उसने वह चिज अपने पॅन्टके दाए जेब मे रख दी. फिर उसने वह छुपा कप्पा ठिक तरहसे बंद किया, पैरके पास रखा ड्रॉवर उठाकर उसने उसके पहले जगह पर ठिक तरहसे रख दिया और आलमारी बंद कर वह कॉम्प्यूटरके पास जाकर खडा हो गया. कॉम्प्यूटर शुरु किया और कॉम्प्यूटर बूट होनेकी राह देखते हूए कमरेमे फिरसे चहलकदमी करने लगा.

अगली कार्यवाही करनेके पहले मुझे अब ठिक तरहसे तैयारी कर लेनी चाहिए...

अपना लक्ष अभीभी अधूरा है...

जिस लक्षके लिए मैने कमांड1का कत्ल करनेकी रिस्क ली, वह अभीभी पहूचसे बहुत दूर है...

उसने अपने दाए पॅन्टके जेबसे अभी अभी आलमारीसे रखा हूवा पेन ड्राइव्ह निकाला. पेनड्राईव्हकी तरफ देखते हूए वह सोचने लगा.

मुझे अब एकबार बॉसके बारेमे जो मटेरीयल कमांड1के कॉम्प्यूटरपर मिला था उसको एकबार ठिक तरहसे फिरसे पढ लेना चाहिए..

अचानक कमांड2 चहलकदमी करते हूए रुक गया. उसने कॉम्प्यूटरके मॉनिटरकी तरफ देखा. कॉम्प्यूटर बूट हो गया था. कॉम्प्यूटरके पास जाकर प्रथम उसने पेन ड्राईव्ह कॉम्प्यूटरको लगाया. कुर्सी खिंचकर कॉम्प्यूटरके सामने बैठते हूए वह किसी जादूगरकी तरह कॉम्प्यूटरको कीबोर्ड और माऊसके द्वारा अलग अलग कमांड देने लगा. उसने पहले एक बार कमांड1के मेलबॉक्ससे जो महत्वपुर्ण फाईल अपने पेन ड्राईव्हके उपर कॉपी कर रखी थी, खोली. वह एक रिसर्च पेपर था. पेपरका टायटल था.

"आर्यभट्ट्का साहित्य".

उसका अंदाजा था की इस पेपरमें दिए जानकारीके आधारपर उसे भविष्यमें ऐसी कुछ बाते मिलने वाली थी की जिसकी वजहसे उसका फायदा ही फायदा होने वाला था. कमांड1के होठोंपर एक मुस्कुराहट तैरने लगी. शायद उसे भविष्यमें जो फायदा होने वाला था उसके कल्पना मात्रसे वह गदगद हो गया था. वह पेपरमें दिए महत्वपुर्ण मुद्दे पढने लगा...

क्रमश:...

Monday, March 17, 2008

Ch-57: जैसे को तैसा (शून्य-उपन्यास) Hindi

रातका समय था. डॅनने अपने घरका दरवाजा धकेलकर थोडासा खोला और बाहर झांककर देखा. चारो तरफ अंधेरा था. वह धीरेसे घरसे बाहर निकल गया. बाहर आनेके बाद उसने चारो तरफ अपनी नजरे घुमाकर उसे कोई देखतो नही रहा इसकी तसल्ली की. कोई देख नही रहा है इस बातकी तसल्ली होतेही वह कंपाऊंडके बाहर आ गया. फिरसे रस्तेपर उसने चारो ओर अपनी नजरे दौडाई. रास्ता एकदम खाली खाली था. अब वह दाई तरफ मुडकर चलने लगा - अंधेरेमे तेजीसे कदम बढाते हूए. उसके चलनेके गतीके साथही उसके सोचनेभी गती पकड ली. पिछले बार कातिलने हमें भरपूर बक्षिसी देकर खुश कर दिया था. इस बारभी जॉन, सॅम और बॉसको अगला खुन किसका होगा इसकी जानकारी मिलने की बात उसने कातिल को फौरन बताई थी. कातिल उसपर बहूत खुश हो गया था. फिदाही हूवा था.

कातिलने उसे एक जगह बताकर वहा वह सोच भी नही सकता उतना पैसा रखनेका वादा किया था. अब वह वहांही पैसे लेनेके लिए जा रहा था. पैसेका खयाल आतेही उसके दिलमें गुदगुदी होने लगी. पिछले बार मिले पैसेसे दस गुना पैसे उसको अपने आखोंके सामने दिखने लगे. खुशीसे वह झुम उठा. उसके चलनेकी गती धीमी होगई और चालमें एक मस्ती झलकने लगी थी.

होगया अब यह आखरी...

इसके बाद ऐसी बेईमानी नही करुंगा...

इतना पैसा मिलनेके बाद मुझे ऐसी बेइमानी करनेकी फिरसे नौबतही नही आयेगी...

पैसा मिलनेके बाद नौकरी एकदम नही छोडूंगा.. नहीतो किसीको शक हो सकता है...

नौकरीमें कुछ देरतक टाईमपास करेंगे और फिर सही वक्त आतेही नौकरी छोडकर कुछ बिझीनेस करेंगे....

नहीतो पहले बिझीनेस डालूंगा और वह अच्छा खासा चलनेके बाद नौकरी छोड दूंगा....

डॅन सोच रहा था. अचानक असे अहसास हूवा की जिस जगह कातिलने पैसे रखनेका कबुला था वह जगह नजदीक आ चूकी है. वह एक पल रुका. फिरसे एकबार चारो ओर देखकर जिस जगह पर पैसे रखे थे उधर निकल गया. उसके चेहरेपर एक मुस्कुराहट झलक रही थी. स्थान एकदम निर्जन था. चारो ओर अंधेरा छाया हूवा था. बिच बिचमें कुतोंका अजीब आवाज आ रहा था. वह जगह किसीकोभी डर लगेगा ऐसीही थी. लेकिन आज डॅनके डर पर उसका लालच पुरी तरहसे हावी हो चूका था.

सामने एक बडा पेढ था. यही वह पेढ था जिसके निचे कातिलने पैसे रखे थे...

अब मानो डॅनके शरीरमें खुशीकी लहरे दौड रही थी. अब कुछही और पल! कुछ पलमेंही अब मै एक बडे संपतीका मालिक बनने वाला हूं. वह अधीरतापुर्वक पेढके निचे चला गया. वहा एक बडा पत्थर रखा हूवा था. डॅनने एक पलकाभी विलंब ना लगाते हूए वह पत्थर वहासे हटाया. जैसेही उसने वह पत्थर वहा से हटाया एक बडा धमाका हुवा और उसके हाथके टूकडे टूकडे हो गए. उसके बदनमेंभी नुकीले पत्थरके टूकडे गए थे. और खुनसे लथपथ अवस्थामें उसकी जान चली गई. उसे अहसास हो गया था की उसने जैसे ठान लिया था वैसेही यह उसकी आखरी बेइमानी साबित हूई थी.

क्रमश:...

Thursday, March 13, 2008

Ch-55: दिवारपर लिखा आखरी मेसेज (शून्य-उपन्यास)

सायरन बजाती हूए पुलिसकी गाडी एका अपार्टमेंटके सामने रास्तेके किनारे आकर रुकी. गाडीसे जल्दी जल्दी जॉन और सॅम उतर गए. अभीतक प्रेस वहां नही पहूंची थी. उतनाही जॉनको अच्छा लगा. उतरने के बाद लगभग दौडतेही वे लिफ्टतक पहूंचे. दोनो लिफ्ट एंंगेज देखकर जॉनने लिफ्टका बटन दो-तीन बार दबाकर गुस्सेसे लिफ्टके दरवाजे को लात मारी. इस बारभी खून दसवे मालेपरही हूवा था. एक पलके लिए जॉनने सिढीयोंसे उपर जानेका सोचा. लेकिन दसवे मालेपर सिढीयोंसे जानेसे थोडी देर रुकना कभीभी समझदारी थी. बार बार अपने बाए हाथपर दाहिने हाथकी मुठ्ठी जोरसे मारते हूए जॉन लिफ्टकी राह देखने लगा. सॅमभी बेचैन होकर चहलकदमी करने लगा. कभी वह एक लिफ्टके सामने खडा रहता तो कभी दुसरे लिफ्टके सामने खडा होकर यूही उसका बटन दबाता. इतनेमे बाए तरफकी पहली लिफ्ट खुली. दोनोभी जल्दी जल्दी अंदर घुस गए. अंदर जातेही सॅमने 10 नंबरका बटन दबाया. लिफ्टका दरवाजा बंद हो गया और लिफ्टके डिस्प्लेपर 1... 2... 3... 4... ऐसे एक के बाद एक नंबर दिखने लगे.

लिफ्टका दरवाजा खुलतेही दोनो बाहर आकर सहमेसे इधर उधर देखने लगे. बिल्डींगकी रचना थोडी जटीलही थी. जॉनने लिफ्टमें घुसरहे एक आदमीको पुछा,

"फ्लॅट नं. 15 किधर है "

वह आदमी सिर्फ दायी तरफ हाथसे इशारा करते हूए लिफ्टमें घुस गया. सॅम और कुछ पुछे इसके पहलेही लिफ्टका दरवाजा बंद हो गया और वह आदमी लिफ्टमें गायब होगया था. दोनोंने और कोई पुछनेके लिए मिलता है क्या यह देखा. आसपासभी कोई दिख नही रहा था. उन्होने एक पल सोचा और वे दोनो दायी तरफ निकल पडे.

जॉनने फ्लॅटके दरवाजेपर देखा. 1015 नंबर लिखा हूवा था. दोनोने एक दुसरेकी तरफ देखकर स्वीकारातत्मक सर हिलाया. दोनोभी सतर्क हो गए. सॅमने अपनी बंदूक निकाली और सामने जाकर धीरेसे दरवाजा धकेला. दरवाजा खुलाही था. सॅम और जॉन सावधानीसे अंदर घुस गए. अंदर हॉलमे सब तरफ सब सामान पडा हुवा था. और उस सामानके बिचमें फर्शपर खुनके तालाबमें एक शरीर पडा हूवा था.

" माय गॉड" सॅमके मुंहसे निकल गया.

" लेट मी चेक हिज बीट "

जॉनने निचे पडे हूए शरीर की नब्ज टटोली.

जॉनने सॅमकी तरफ देखा.

सॅमने जॉनको इशारेसेही पुछा.

" ही ईज डेड" जॉनने निराशायुक्त स्वरमें कहा.

सॅमने निराशासे भरी एक लंबी सांस छोडी.

और वह पुरा फ्लॅट ढूंढने के लिये अंदर चला गया.

जॉनने हमेशाकी तरह सामने दिवारपर देखा. इसबारभी खुनसे शून्य निकालनेसे कातील नही भूला था. शून्यके बिचमें खुनसे लिखनेसेभी वह नही चूका था. दूरसे कातिलने क्या लिखा है यह पहचानमें नही आ रहा था इसलिए वह दिवारके पास जाकर देखने लगा.

" शून्य जहासे शुरु होता है वही खतम होता है " दिवारपर लिखा था.

दिवारपर लिखे उस मेसेजकी तरफ देखकर जॉन सोचने लगा. उधर अंदर सॅमका कुछ ढूंढनेका आवाज आ रहा था.

सोचते सोचत अचानक जॉनके चेहरेपर डर का साया छा गया.

"सॅम..." जॉनने सॅमको अपने कपकापाते स्वरमें आवाज दिया.

सॅम झटसे अपना काम छोडकर दौडतेही बाहर आ गया.

" क्या हूवा ?" सॅम जॉनके डरे हूए चेहरेकी तरफ देखकर बोला.

अबतक जॉन खुले दरवाजेकी तरफ दौड पडा था और सॅम कुछ समझ पाए इसके पहलेही जॉन दरवाजेके बाहर सॅमके नजरोंसे ओझल हो गया था.

दरवाजेके बाहरसे जॉनका आवाज आया,

" चलो ... चलो हमें जल्दी करनी पडेगी..."

" कहा ?" सॅमने दरवाजेके बाहर जाते हूए पुछा.

बाहर कॉरीडोरमें जॉन लिफ्टकी तरफ दौड पडा था. सॅमको जॉन क्यों दौड रहा है कुछ समझ नही आ रहा था.

सिर्फ उसके हरकतोंसे कुछ तो गडबड है या होनेकी संभावनाका डर झलक रहा था.

कुछ ना समझते हूए सॅमभी उसके पिछे दौडने लगा.

लिफ्टके पास पहूंचकर जॉनने लिफ्टका बटन दबाया. इत्तफाकसे लिफ्ट वही थी. लिफ्टका दरवाजा खुला.

जॉनने सॅमकी तरफ देखकर कहा, " चलो जल्दी ... हमें तुरंत निकलना चाहिए"

जॉन सॅमके लिए ना रुकते हूए लिफ्टमें घुस गया. सॅम और जोरसे दौडते हूए लिफ्टका दरवाजा बंद होनेके पहले लिफ्टमे घुस गया.

अंदर जाते हूए सॅमने दुबारा पुछा, " लेकिन ... हम कहां जा रहे है?"

" बताता हूं ' जॉन अपनी तेज हूई सांसे ठीक करने की कोशीश करते हूए बोला.

सॅम लिफ्टमें घुसकर जॉनकी तरफ आश्चर्यसे देखते हूए उसके पास जाकर खडा होगया और धीरे धीरे लिफ्टका दरवाजा बंद हो गया.

क्रमश:...

Saturday, February 23, 2008

Ch-43: फिरसे प्रेस कॉन्फरन्स (शून्य-उपन्यास)

जॉन उसके बॉसके कॅबिनमें उनके सामने बैठा था. कॅबिनमें वे दोनोही थे. काफी देर तक दोनोमें एक अनैसर्गीक चुप्पी छाई हूई थी.

"अलेक्सकाभी पोस्टमार्टम रिपोर्ट आया है. " जॉनने उसके सामने रखे फाईलके कुछ पन्ने पलटते हूए कहा.

जॉनका बॉस आरामसे कुर्सीपर बैठकर सिगार पीते हूए शांतीसे जॉनको सुन रहा था.

" मृत्यूका कोई कारण नही पता चल रहा है.' जॉनने कहा.

उसके बॉसने मुंहमेसे सिगार निकालकर सामने रखे अॅश ट्रेमे उसकी राख झटकी.

" लेकिन मुझे यकिन है की उसे इन्शुलिनका ओवरडोज देकर मारा गया होगा. ... इन्शुलीनके ओवरडोजसे ऐसाही होता है. पोस्टमार्टममें मृत्यूका कोई कारण नही मिलता और कुछ साबीतभी नही किया जा सकता. ... कभी कभी तो वह कत्ल है या नैसर्गिक मृत्यू यहभी पता नही चल पाता.

जॉनका बॉस कुर्सीसे उठ गया और सिगार पिते हूए खिडकीसे बाहर देखने लगा. फिर पलटकर उसने जॉनसे कहा ,

" देखो जॉन हम यहा नियोलके कत्लके सिलसिलेमे बैठे है... तूमने बिचमेंही इस अलेक्सका क्या लगा रखा है..."

" क्योंकी उसकाभी इस खुनसे संबध है.." जॉन खंबीरतासे बोला.

" उसका इस कत्लसे क्या वास्ता ? तुम पागल तो नही हूए ? वह साला अॅलेक्स कैसे मरा कुछ भी पता नही... और तुम उसको इस केससे जोड रहे हो. " बॉस चिढकर बोला.

" संबंध है इसलिए जोड रहा हू" जॉन आवाज चढाकर बोला.

" अॅलेक्सको शायद उस कातिलका पता चल चूका था... इसलिए उसने अलेक्सकाही खातमा कर डाला.

इतनेमें एक पियून अंदर आगया. पियूनके आहटसे दोनोंका संवाद रुक गया. दोनोंने उस पियूनकी तरफ देखा. पियूनने बॉसके पास जाकर झूककर कहा,

" साहब , बाहर रिपोर्टर लोगोंकी भीड जमा हो गई है."

पियूनने पैगाम दिया और वह वहांसे चला गया.

" रिपोर्टर इस वक्त ? इन लोगोंका क्या दिमाग खराब हो गया है ?.." जॉनका बॉस आश्चर्यसे बोला.

" साले यहां वहां जमा हो जाते है... इनको सिर्फ खबर चाहिए...कौन मरा, कैसे मरा इसका इनको कुछ लेना देना नही होता... " बॉस चिढकर बोला.

" मैनेही शामको प्रेस कॉन्फरंन्स है ऐसा एलान किया था" जॉनने कहा.

" प्रेस कॉन्फरंन्स? तूमने ऐलान किया?... अब यह तो खुदके पैरपर पत्थर मार लेने जैसा होगया... पहलेही सब लोग और मिडीया भडकी हूई है. अब ये लोग हम सबको कच्चा चबा जाएंगे. यह फालतूका काम करनेके पहले तुमने किसको पुछा?"

अब बॉस जॉनपर बहुत आगबबुला हो गया था.

" सर सुबह उनको टालनेके लिए मेरे मुंहसे निकल गया" जॉन अपना बचाव करते हूए बोला.

" मुंहसे निकल गया? मतलब गलतीया तुम करते जावो और निपटना हमें पडे " बॉस कडे स्वरमें बोला.

" सर ... पिछले बार अगर मैने कहा वैसा अगर आप मानते तो यह नौबत हमपर नही आती. " अब जॉनभी अपना आपा खोने लगा था.

" तुम्हे क्या लगता है? पिछली बार तुम्हारा अगर मैने सुना होता तो यह जो नौबत आई है वक कबकी आ चूकी होती... तूमने इन्वेस्टीगेशनमें इतना वक्त लगाया इस बातको जादा उछाला नही जाए उसकी मैने भरसक कोशीश की थी. वैसे तुम्हे मैने ऑप्शन भी दिया था. जल्द से जल्द कातिलका पता लगावो या तुमसे होता नही ऐसा कहकर कमसे कम दुसरेकोभी तो करने दो."

जॉनको क्या बोला जाए कुछ सुझ नही रहा था.

जॉन थोडा नरम रुख अपनाकर बोला " लेकिन अब उन्हे क्या बताया जाये?"

" तुम उसकी चिंता मत करो ... मै सब संभाल लूंगा " बॉसनेभी गिरगटकी तरह अपना रंग बदलते हूए जॉनको तसल्ली देनेके लहजेमें कहा.

बॉसकी तसल्लीसे जॉनको थोडा सुकुन पहूंचा.

बॉसने सिगार सामने रखे अॅश ट्रेमें मसलकर बुझाई और कुर्सीसे उठते हूए बोला "चलो... मेरे साथ"

बॉस उठकर खुले दरवाजेसे 'खाट खाट' जुतोंका आवाज करते हूए बाहर निकल गया और उसके पिछे जॉन चूपचाप चलने लगा.

क्रमश:...

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