उपन्यास - अद्-भूत (संपूर्ण)
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उपन्यास - शून्य (संपूर्ण)
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उपन्यास - ब्लैकहोल (क्रमशः)
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Thursday, January 24, 2008

Ch-23: हॅपी बर्थ डे (शून्य-उपन्यास)

अँजेनी गहरी निंदमे थी. निंदमें उसका मासूम चेहरा और ही खुलकर निखरा हूवा दिख रहा था. निंदमेंही उसने अपनी करवट बदली. करवट बदलनेकी वह अदा भी दिल पिघला देनेवाली थी. इतनेमें उसेक फ्लॅटके दरवाजे की बेल बजी. उसने फिरसे करवट बदली. फिरसे दरवाजेकी बेल बजी. अब वह निंदसे जाग चूकी थी. उसेने अपनी आंखे मसलते हूए खिडकीके बाहर झांका. काला घना अंधेरा और शहर के दिए किसी टीमटीमाते तारोंकी तरह दिख रहे थे. उसने अंगडाई लेते हूए दिवारपर टंगे घडी की तरफ देखा. घडीमें बारा बजनेको एक-दो मिनट बाकी थे. फिरसे उसके दरवाजेकी बेल बजी. रातके बारा बजनेको आए. इतने रात गए कौन होगा?

वह अपने बिखरे बाल संवारते हूए बेडसे निचे उतर गई. अपने कपडे ठिक करते हूए और कौन आया होगा यह सोचते हूए वह सामने हॉल के दरवाजेकी तरफ जाने लगी. उसने दरवाजेके कीहोल से देखा. गलियारेमें अंधेरा होनेसे कुछ दिख नही रहा था. उसने दरवाजेकी चेन लगाकर कुंडी खोली और दरवाजा तिरछा करते हूए बाहर झांकने लगी. बाहर जॉन खडा था.

इतने रात गए किसलिए आया होगा ?...

" जॉन! इतने रात गए ? " वह दरवाजा खोलते हूए बोली.

जॉन मुस्कुराते हूए अंदर आया. उसके दोनो हाथ पिछेकी तरफ थे. शायद वह कुछ छिपा रहा था. उसने अंदर आतेही पिछे छिपाया हूवा एक फुलोंका बडासा गुलदस्ता निकाला और दुसरे हाथसे उसे उठाते हूए बोला,

" हॅपी बर्थ डे टू यू...

हॅपी बर्थ डे टू यू अँजेनी...

हॅपी बर्थ डे टू यू"

अँजेनीने दिवार पर टंगे घडीके तरफ देखा. बारा बजकर एक मिनट हो चूका था और घडीमे तारीख थी 16 ऑगष्ट; उसका जनमदिन ! अँजेनीके आंखोमे आंसू तैरने लगे.

" तुझे कैसे पता चला ? " वह प्रेमभरी नजरोसे उसके तरफ देखकर बोली.

" मॅडम यह मत भुलो की हम पुलिसवाले है और हमारे पास तुम्हारे सारे रेकॉर्डस् है. " जॉन मुस्कुराते हूए बोला.

" ओ जॉन थँक यू" वह जॉनके गालको चूमते हूए बोली.

जॉनने उसे कसकर अपनी बाहोंमे भरकर निचे उतारा. फिर दोनों एकदूसरेके होठोंको आवेशमें चूमने लगे.

' सोई हूई थी" जॉनने पुछा.

" हां " उसने कहा.

" यह तुम्हारा अच्छा है... उधर तूमने हमारी निंद उडाई और इधर तूम चैनसे सो रही हो. " जॉन मस्करी करते हूवे बोला.

" मैने ? " वह मुस्कुराते हूए बोली.

" हां ... आधी निंद तुमने उडाई और आधी उस खुनीने.. " जॉनने खिलखिलाकर हंसते हूए कहा.

अँजेनी मुस्कुराई; यत्नपुर्वक शायद झूट झूट. खुनीका जिक्रभी होनेपर उसे सानीकी याद आती थी.

अब दोनो एकदूसरेके कमरमें हाथ डालकर बेडरुमकी तरफ चल पडे.

" क्या कुछ लोगे? चाय कॉफी? " उसने पुछा.

" हां लूंगा ना. लेकिन चाय कॉफी नही. "

" फिर ? " उसने पुछा.

बेडपर बैठते हूए उसने उसके होठोंका एक कसकर चुंबन लिया. फिर दोनो एकदुसरेको बाहोंमे भरकर बेडपर लेट गए. अचानक फिर अँजेनीको क्या लगा पता नही. वह जॉनका चेहरा अपने दोनो हाथोमे लेकर उसकी तरफ एक टक देखने लगी. उसकी आंखे आंसूओंसे भर गई.

" क्या हूवा ?" जॉनने उसकी पिठपर अपना हाथ फेरकर कहा.

वह कुछ नही बोली.

" सानीकी याद आ रही है.? " जॉनने उसके चेहरेपर आई लटे ठिक करते हूए पुछा.

" सच ... तूम कौन , कहांसे आए, कैसे मेरे जिंदगीमें आते हो और मेरी तबाह होती हूई जिंदगी संवारते हो. सबकुछ कैसे जैसे पहलेसे तय हो..' वह आंखोमें आंसू लिए बोल रही थी.

जॉनने भावावेशसे से उसे भीरसे बांहोमें भर लिया.

" तूम चिंता मत करो. धीरे धीरे सबकुछ ठिक हो जाएगा" वह उसके पिठपर थपथपाते हूए उसे सांत्वना देते हूए बोला.

अँजेनी जॉनके सिनेपर अपना सर रखकर उसके सिनेके बालोंसे खेलते हूए उसकी तरफ एकटक देखने लगी. जॉनभी उसकी तरफ देख रहा था. मानो दोनोकी आंखे एक दुसरेमें खो गई थी. जॉनका हाथ जो अबतक उसकी पिठ सहला रहा था और उसके लंबे घने बालोंसे खेल रहा था, धीरे धीरे उसके मुलायम जिस्मसे खेलने लगा. वहभी मानो उसे चूमते हूए सारा प्रेम उसपर बरसा रही थी. जॉनने उसे अपने सिनेपरसे अपने मजबूत बाहोंसे उपर खिंच लिया. वह उसके शर्टकी बटन्स खोलने लगी. जॉनभी उसके कपडे निकालने लगा. थोडीही देरमें दोनोंभी विवस्त्र हो चूके थे. जॉन उसके संगे मरमरसे बदनकी तरफ आंखे फाडफाडकर देखने लगा. वह उसमें समानेके लिए अधीर धीरे धीरे उसपर झूकने लगा. इतनेमें बाजूमें रखे जॉनके मोबाईलकी घंटी बजी. दोनोभी किसी बुत की तरह एकदम स्तब्ध हूए. जॉनने अपना हांथ बढाकर अपना मोबाईल लिया. मोबाईलके डिस्प्लेकी तरफ देखा. फोन सॅमका था. उसने बटन दबाकर फोन बंद किया और बाजूमें रख दिया. फिर दोनो मूड बनानेकी कोशीश करने लगे. मोबाईल फिरसे बजा. चिढकर उसने बटन दबाकर फोन कानको लगाया.

" हां सॅम, इतने रात गए क्या काम निकाला ? " जॉन ने नाराजगीमेंही कहा.

" सर, तिसरा खून हो चूका है " उधरसे सॅमका स्वर गुंजा.

" क्या? " जॉन एकदम से उठ गया.

जॉन अपने कपडे ढूंढने लगा.

" फिलहाल हम उधर ही जा रहे है.. किसीने फोन कर पोलीस स्टेशनको यह खबर दी." सॅमका आवाज आया.

" क्या ऍड्रेस बताया?" जॉनने कपडे पहननेकी चेष्टा करते हूए पुछा.

अँजेनीभी अब उठकर कपडे पहनने लगी थी.

" साऊथ एव्हेन्यू, प्रिन्स अपार्टमेंटस् 1004 ... उटीना हॉपर" उधरसे आवाज आया.

" क्या? इसबारभी एक औरत! ठीक है ... यू प्रोसीड विथ द टीम. मै जल्द से जल्द आकर तुम्हे जॉईन होता हूं " जॉनने अपने कपडे पहनते हूए फोन बंद किया.

... to be contd..

Friday, December 7, 2007

Ch-3 वर्ल्ड अंडर अंडरवर्ल्ड (शून्य-उपन्यास)

एक कोलनीमें एक छोटासा आकर्षक बंगला. बंगलेके बाहर एक कार आकर खडी हूई. कारसे उतरकर एक आदमी झटसे घरके कंपाऊंडमे घूस गया. कोई पच्चीसके आसपास उसकी उम्र होगी. उसने काला गॉगल पहन रखा था. अंदर जाते हूए आसपासके गार्डनपर अपनी नजरे दौडाते हूए वह दरवाजेके पास पहूंच गया. अपनी कारकी तरफ देखते हूए उसने दरवाजेकी बेल बजाई. दरवाजा खुलनेकी राह देखते हूए वह कोलनीके दुसरे घरोंकी तरफ देखने लगा. दरवाजा खुलने को बहुत समय लग रहा था इसलिए बंद दरवाजे के सामने वह चहलकदमी करने लगा. अंदरसे आहट सुनते ही वह दरवाजेके सामने अंदर जानेके लिए खडा होगया. दरवाजा खुला. सामने दरवाजेमें उसकाही हमउम्र एक आदमी खडा था. अंदरका आदमी दरवाजेसे हट गया और बाहरका आदमी बिना कुछ बोले अंदर चला गया. ना कुछ बातचीत ना भावोंका आदान प्रदान.

बाहरका आदमी अंदर जानेके बाद दरवाजा अंदरसे बंद हूवा. दोनोंकी रहन सहन, कद काठी, रंग इससे तो वे दोनो अमेरीकी मुलके नही लग रहे थे. दोनोही बिना कुछ बोले घर के तहखानेकी तरफ जाने लगे. घरके ढाचेसे ऐसा कतई प्रतित नही होता था की इस घरको कोई तहखाना होगा.

जो बाहरसे आया था उसने पुछा, '' बॉसका कोई मेसेज आया?''

'' नही अभीतक तो नही ... कब क्या करना है , बॉस सब महूरत देखकर करता है'' दुसरेने कहा.

पहला मन ही मन मुस्कुराया और बोला,'' कौन किस पागलपनमें उलझेगा कुछ बोल नही सकते ''

दूसरेने गंभिरतासे कहा '' कमांड2 तुझे अगर हमारे साथ काम करना है तो यह सब समझकर अपने आपमें ढालना जरुरी है... यहां सब बातें तोलमोलकर प्रिकॅलक्यूलेटेड ढंगसे की जाती है.""

कमांड2 कैसी प्रतिक्रिया व्यक्त करे ये ना समझते हूए सिर्फ कमांड1 की तरफ देखने लगा.

''कोईभी बात करनेसे पहले बॉसको उसके नतिजे की जानकारी पहलेसेही होती है.'' कमांड1ने कहा.

अब वे चलते चलते अंधेरे तहखानेमें आ पहूचें. वहां तहखानेमें बिचोबिच टेबलपर एक कॉम्प्यूटर रखा हूवा था. दोनो काम्प्यूटरके सामने जाकर खडे हूए. कमांड1ने कॉम्प्यूटरके सामने कुर्सीपर बैठते हूए कॉम्प्यूटर शुरू किया. कमांड2 उसकेही बगलमें एक स्टूलपर बैठ गया. कॉम्प्यूटरपर लिनक्स ऑपरेटींग सिस्टीम शुरू होने लगी.

'' तूझे पता है हम लिनक्स क्यों युज करते है?" कमांड1ने पुछा.

अपना अज्ञान जताते हूए कमांड2 ने सिर्फ अपना सर हिलाया.

'"कॉम्प्यूटरके लगभग सभी सॉफ्टवेअर जिसका सोर्स कोड युजर (उपभोक्ता) को नही दिया जाता कहां बनायें जातें है?'' कमांड1ने जवाब देने के बजाय दुसरा सवाल पुछा.

'' कंपनीमें...'' कमांड2ने भोले भावसे कहा.

'' मेरा मतलब कौनसे देशमें?''

'' अमेरिकामें'' कमांड2ने जवाब दिया.

'' तुझे पता होगाही की जिस सॉफ्टवेअरका सोर्स कोड कस्टमरको दिया जाता है उसे 'ओपन सोर्स' सॉफ्टवेअर कहते है... मतलब उस सॉफ्टवेअरमें क्या होता है यह कस्टमर जान सकता है... ... और जिस सॉफ्टवेअरका कोड कस्टमरको नही दिया जाता उस सॉफ्टवेअरमें ऐसा बहुत कुछ हो सकता है... जो की होना नही चाहिए." कमांड1 कह रहा था.

'"मतलब?'" कमांड2 ने बिचमेंही टोका.

'"मतलब तुझे पताही होगा की मायक्रोसॉफ्ट कंपनीने एक बार ऐलान किया था की वे उनके प्रतिस्पर्धीयोंको काबूमें रखनेके लिए उनके सॉफ्टवेअर विंन्डोज ऑपरेटींग सीस्टीममें कुछ 'टॅग्ज' इस्तेमाल करने वाले है...'' कमांड1 कह रहा था.

'' हां ... तो ?'' कमांड2 कमांड1 आगे क्या कहता है यह सुनने लगा.

''और उन 'टॅग्ज' की वजहसे कंपनीको जो चाहिए वही प्रोग्रॅम ठीक ढंगसे काम करेंगे... और दुसरे यातो बहुत धीमी गतीसे चलेंगे, बराबर नही चलेंगे या चलेंगेही नही.'' कमांड1ने कहा.

'' लेकिन उसका अपने लिनक्स इस्तेमाल करनेसे क्या वास्ता?'' कमांड2ने पुछा.

'' वास्ता है... बल्की बहुत नजदीकी वास्ता है... सुनो ... अगर वे अपने प्रतिस्पर्धीयोंको काबुमें करनेके लिए ऐसे 'टॅग्ज' इस्तेमाल कर सकते है की जिसकी वजहसे उनके प्रतिस्पर्धीयोंका पुरा खातमा हो जाए ... तो ऐसाभी मुमकीन है की वे उनके सॉफ्टवेअर और हार्डवेअरमें ऐसे कुछ 'टॅग्ज' इस्तेमाल करेंगे की जिसकी वजह से पुरी दुनिया की महत्वपुर्ण जानकारी इंटरनेटके द्वारा उनके पास पहूंच जाए ... उसमें हमारे जैसे लोगोंकी गतिविधीयाँ भी आगई... खासकर 9-11 के बाद यह सब उनके लिए बहुत महत्वपुर्ण होगया है...'' कमांड1 ने कमांड2की तरफ देखते हूए उसकी प्रतिक्रिया लेते हूए कहा.

'' हां तुम सही कहते हो... ऐसा हो सकता है'' कमांड2 ने अपनी राय बताते हूए कहा.

'' इसलिए मैने क्या किया पता है? ... लिनक्स का सोर्स कोड लेकर उसे कंपाईल किया... और फिर उसे अपने कॉम्प्यूटरमें इन्स्टॉल किया... अपनेसे जो हो सकता है वह सभी तरह की एतीहात बरतना जरुरी है...'' कमांड1 बोल रहा था.

उसके बोलनेमे गर्व और खुदका बडप्पन झलक रहा था.

'' अरे यह अमेरिका क्या चीज है तुझे पताही नही ... सारी दुनियापर राज करनेका उनका सपना है... और उसके लिए वह किसीभी हदतक गिर सकते है...'' कमांड1 आगे बोल रहा था.

कमांड2ने कमांड1 की तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

'' चांदपर सबसे पहले आदमी कब पहूँचा? ... तुमने स्कुलमें पढाही होगा ना?..'' कमांड1 ने सवाल किया.

'' अमेरिकाने भेजे यान द्वारा 1969 को नील आर्मस्ट्राँग सबसे पहले चांदपर पहूंचा.'' कमांड2 ने झटसे स्कुली बच्चे की तरह जवाब दिया.

''सभी स्कुली बच्चोंके दिमाग मे यही कुटकुटकर भरा हूवा है ... और अभीभी भरा जा रहा है... लेकिन सच क्या है इसके बारेमे लोगोंने कभी सोचा है?... जो व्हीडीओ अमेरिकाने टी व्ही पर सारी दुनिया को दिखाया उसमें अमेरिकाका झंडा मस्त लहराता हूवा दिख रहा था... चांदपर अगर हवाही नही है ... तो वह झंडा कैसा लहरेगा ... जो लोग चांद पर उतरे उनके साये... यान की बदली हूई जगह... ऐसे न जाने कितने सबुत है जो दर्शाते है की अमेरीकाका यान चांदपर गयाही नही था...'' कमांड1 आवेशमें आकर बोल रहा था.

'' क्या बात करता है तू ... फिर यह सब क्या झूट है? ...'' कमांड2 ने आश्चर्यसे पुछा.

'' झूठ ही नही ... सफेद झूठ... इतनाही नही उस वक्त सॅटेलाईटसे जमीन की ली हूई तस्वीरोंमे जो सेट उन लोगोंने बनाया था उसकी तस्वीर भी मिली है...''

'' ठिक है मान लेते है की यह सब झूठ ... लेकिन अमेरिका यह सब किसलिए करेगा?''

'' हां यह अच्छा सवाल है ... की उन्होने वह सब क्यों किया? ... इतना सारा झंझट करने की उन्हे क्या जरुरत थी? ... जिस वक्त अमेरिकाने उनका यान चांदपर उतरनेका दावा किया तब रशीया अमेरिकाका सबसे बडा प्रतिस्पर्धी था... हम रशीयासे दो कदम आगे है यह दिखानेके लिये उन्होने यह सब किया ... और उसमें वे कामयाबभी रहे...'' हर एक शब्दके साथ कमांड1का आवेश बढता दिखाई दे रहा था.

'' माय गॉड... मतलब इतना बडा धोखा और वह भी सारी दुनियाको...'' कमांड2के मुंहसे निकल गया.

'' अमेरिका अब अंग्रेज पहले जिस रास्तेसे जा रहे थे उस रस्ते से चल रहा है... दुसरे वर्ल्ड वार के पहले ब्रिटीश लोगोंने सारी दुनियापर राज किया... उस वक्त कहते थे की उनकी जमिनपर सुरज कभी डूबता नही था... अब अमेरिकाभी वही करनेका प्रयास कर रही है.... फर्क सिर्फ इतना है की ब्रिटीश लोगोंने आमनेसामने राज किया और ये अब छुपे रहकर राज करना चाहते है... मतलब 'प्रॉक्सी रूलींग'. अफगाणिस्थान, इराक, कुवेत, साऊथ कोरिया यहाँ पर वे क्या कर रहे है ... प्रॉक्सी रूलींग ... और क्या?''

'' हां तुम बिलकुल सही कहते हो...'' कमांड2ने सहमती दर्शाई.

'' और यही अमेरिकाका अधिपत्य, प्रभुत्व खतम करना अपना परम हेतू है ..'' कमांड1ने जोशमें कहा.

कमांड2के चेहरेसे ऐसा लग रहा था की वह उसकी बातोंसे बहुत प्रभावित हुवा है. और कमांड1के चेहरेपर कमांड2को ब्रेन वॉश करनेमें उसे जो सफलता मिली थी उसका आनंद झलक रहा था.

इतनेमें शुरु हुए कॉम्प्यूटरका बझर बजा. कमांड1को ईमेल आई थी. कमांड1ने मेलबॉक्स खोला. उसमें बॉसकी मेल थी.

'' एक बात मेरे समझमें नही आती की यह बॉस है कौन?'' कमांड2ने उत्सुकतापुर्वक पुछा.

'' यह किसीकोभी पता नही ... सिवाय खुद बॉसके... और इस बातसे हमें कोई सरोकार नही की बॉस कौन है?... क्योंकी हम सब लोगोंको एक सुत्रमें जिस बातने जोडा है वह कोई एक व्यक्ती ना होकर ... एक विचारधारा है... वह विचारधाराही सबसे महत्वपुर्ण है... आज बास है कल नही होगा... लेकिन उसकी विचारधारा हमेशा जिंदा रहना चाहिए...'' कमांड1 मेल खोलते वक्त बोल रहा था.

मेलमें सिर्फ 'हाय' ऐसा लिखा हूवा था और मेलको कोई फाईल अटॅच की हूई थी. कमांड1 ने अटॅचमेंट ओपन की. वह मॅडोनाकी एक 'बोल्ड' तस्वीर थी.

'' यह क्या भेजा बॉसने?'' कमांड2 ने आश्चर्यसे पुछा.

'' तुम अभी बच्चे हो... धीरे धीरे सब समझ जावोगे... बस इतनाही जान लो की दिखाने के दात और खाने के दात हमेशा अलग रहते है... '' कमांड1 तस्वीर की तरफ देखकर मुस्कुराते हूए बोला.

कमांड1 ने बडी चपलतासे कॉम्प्यूटरके कीबोर्डके चार पाच बटन दबाए. सामने मॉनिटरपर एक सॉफ्टवेअर खुल गया. कमांड1ने मॅडोनाके उस तस्वीरको डबल क्लीक किया. एक निले रंग का प्रोग्रेस बार धीरे धीरे आगे बढने लगा. कमांड1 ने कमांड2की तरफ रहस्यतापुर्ण ढंग से देखा.

'' लेकिन यह क्या कर रहे हो ... स...'' कमांड2ने कहा.

कमांड1ने झटसे कमांड2के मुंहपर हाथ रखकर उसकी बोलती बंद की.

'' गलतीसेभी तुम्हारे मुंहमें मेरा नाम नही आना चाहिए... तुझे पता है... दिवार के भी कान होते है...''

''सॉरी'' कमांड2 अपने गलती का अहसास होते हूए बोला.

'' यहां गलतियोंको माफ नही किया जाता...'' कमांड1ने दृढतापुर्वक कहा.

तबतक प्रोग्रेस बार आगे बढते हूए पुरीतरह निला हो चूका था.

'' इसे स्टेग्नोग्राफी कहते है ... मतलब तस्वीरोंमे संदेश छुपाना... देखनेवालोंको सिर्फ तस्वीर दिखाई देगी ... लेकिन इस तस्वीरमेंभी बहोत सारी महत्वपुर्ण जानकारी छिपाई जा सकती है...'' कमांड1 उसे समझा रहा था.

'' लेकिन अगर यह तस्वीर यहां पहूचनेसे पहले किसी और के हाथ लगी तो?'' कमांड2 अपनी शंका उपस्थीत की.

'' यह सब जानकारी सिर्फ इस सॉफ्टवेअरके द्वारा ही बाहर निकाली जा सकती है... और उसे पासवर्ड लगता है.... यह सॉफ्टवेअर बॉसने खुद बनाया हूवा है.... इसलिये यह किसी दुसरे के पास रहने का तो सवाल ही पैदा नही होता'' कमांड1ने उसके सवाल का यथोचीत उत्तर दिया था.

'' कौनसी जानकारी छिपाई गई है इस तस्वीर में ... जरा देखु तो'' कमांड2 उत्सुकतावश देखने लगा.

इतनेमें मॉनिटरपर एक मेसेज दिखने लगा. '' अगले काम की तैयारी शुरु करो ... उसका वक्त बादमें बताया जाएगा.''
...contd..

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About Hindi

Hindi is the name given to an Indo-Aryan language, or a dialect continuum of languages, spoken in northern and central India (the "Hindi belt")Native speakers of Hindi dialects between them account for 41% of the Indian population (2001 Indian census). That is the reason because of which the entertainment industry in India mainly use Hindi. And the idustry which is also called as bollywood is the second largest industry producing movies in the world. As defined in the Constitution, Hindi is the official language of India and is one of the 22 scheduled languages specified in the Eighth Schedule to the Constitution. Official Hindi is often described as Modern Standard Hindi, which is used, along with English, for administration of the central government. Standard Hindi is a sanskritised register derived from the khari boli dialect. Urdu is a different, persianised, register of the same dialect. Taken together, these registers are historically also known as Hindustani.