हिमालय के पर्बतोंकी गोदमें बहते नदी के तटपर जो गुंफा थी उसमें ध्यानमग्न अवस्थामें बैठा ऋषी, अचानक चौंककर अपने समाधी अवस्थासे बाहर आ गया. उसकी आंखे लाल थी और चेहरेपर कुछ रहस्य सुलझनेका गुढ आनंद झलक रहा था. उसके चेहरेपर एक रहस्यमय मुस्कुराहट फैल गई. धीरे धीरे अपने आप उसकी आंखे फिरसे बंद हो गई. और फिर वक्त, जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर सब मर्यादाएं लांघकर बंधनमुक्त होकर होने लगा.
जंगलमें पर्णकुटीके पास तिन लोग आपसमे कुछ चर्चा कर रहे थे. इतनेमें वहा वह ऋषी आगया. उसकी आहट होतेही सबलोग पलटकर उसकी तरफ देखने लगे.
यह तो वही ऋषी है...
जो उनको पहले एक बार मिला था...
उनको उसके लब्ज याद आ गए-
" चिंता मत करो.. मै तुम्हे तुमारे दुविधासे बाहर निकालूंगा "
वे बडी आस से उसकी तरफ देखने लगे.
ऋषीके चेहरेपर एक गूढ मुस्कुराहट दिखने लगी.
" आप लोगोंकी पहेली सुलझीही समझो " ऋषी गूढभाव से बोला.
" क्या? ... हमारी पहेली सुलझी?" तिनोंके मुंहसे खुशीसे निकला.
ऋषीने एक संस्कृत श्लोकका जोरसे उच्चारण किया -
ॐ पूर्णं अद: पूर्णं इदं, पूर्णात् पूर्णं उदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णं आदाय, पूर्णं एवाव शिष्यते ॥
"अर्थात जब पूर्णका पूर्णसे संयोग होता है या पूर्णसे पूर्ण निकाला जाता है तब बाकी पूर्णही रहता है. ब्रह्म यह परिपूर्ण है... इसलिए ब्रह्ममें बह्म मिलाया जाए तो या ब्रह्मसे ब्रह्मको निकाला जाए तो आखीर बाकी ब्रह्मही रहता है.
यहां पूर्ण और ब्रह्म यानीकी अगणित हो सकता है... जैसा दिन हो तो रात आतीही है, प्रकाश के विरुध्द अंधेरा होता है... वैसे जहा पूर्ण यानी अगणित हो वहां उसका विरुद्ध रिक्तता यानी शून्य आनाही चाहिए."
सामने नदीकी तरफ इशारा करके फिर ऋषीने आगे कहा, " उस पाणीमे बुलबुले देखो कैसे बनते है और कैसे नष्ट होते है "
" ऐसी एक चिज है की वह कभी कुछभी नही और कभी कभी सबकुछ है... वह जहांसे शुरु होती है खतमभी वही होती है... वह ऐसी चिज है की जिससे यह ब्रह्मांड, आप और मै तैयार हुए है... वह ऐसी चिज है की जिसमे सबको एक दिन समा जाना है "
बोलते बोलते ऋषी उन तिनोंके इर्द गिर्द गोल गोल चल रहा था.
"ऋषीवर, हम लोग गणितपर संशोधन कर रहे है हमें हमारे पहेली का गणिती हल चाहिए ; ना की आध्यात्मिक ' उनमेंसे एकने कहा.
" हां, आप लोगोंका संशोधन आपलोगोंको जिस वजहसे अपूर्ण लग रहा है वह आपके पहेलीका हल जितना गणिती है उतनाही आध्यात्मिक है. "
फिर ऋषीने सबको उठकर एक तरफ आने के लिए कहा और गोल गोल चलकर पैरके निशानोंसे जो गोल बना था उसकी तरफ निर्देश कर कहा,
'' तुम्हे तुम्हारा संशोधन पुरा करनेके लिए जिस बात की जरुरत थी वह है शुन्य"
तिनोंके चेहरेपर खुशी झलक रही थी.
ऋषीने कहा " शून्य जहा शुरु होता है खतम भी वही होता है"
एकने बडासा गोल निकाला.
ऋषीने कहा " कभी शून्य कुछभी नही"
एकने 0 को 6 मे जोडकर 6 ही आता है ऐसे लिखा.
ऋषीने आगे कहा " कभी शून्य सबकुछ है यानी सर्वसमावेशक है"
दुसरेने 0 बार 6 करनेसे 0 आता है ऐसा लिखा.
उन तिनोंके संशोधन कार्यको अब गती मिली थी. वे तिनो अपने कार्यमें व्यस्त हो गए. जब वे व्यस्तसा से जागे तब उन्होने आजूबाजू देखा. तो ऋषी वहा नही था.
उनके चेहरेपर आश्चर्य झलक रहा था. .
कहा गया वह ऋषी?...
शायद वह शून्यमें विलीन हूवा था....
क्रमश:...
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Monday, March 10, 2008
Ch-52: ब्रम्ह है परिपूर्ण (शून्य-उपन्यास)
Posted by
Sunil Doiphode
at
10:03 AM
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