जॉनको एकदम सबकुछ शांत और स्थब्ध होनेका अहसास हूवा.
'' ए उसके आंखोपर बंधा कपडा छोड रे... '' क्रिस्तोफरका चिढा हूवा स्वर गुंजा.
जॉनको उसके आंखोपरसे कोई कपडा निकाल रहा है इसका अहसास हूवा. उसका आक्रोश आंसुओंके द्वारे बाहर निकलकर वह कपडा पुरी तरह गिला हूवा था.
जैसेही उन्होने उसके आखोसे वह कपडा निकाला, उसने सामनेका दृष्य देखा. उसके जबडे कसने लगे, आंखे लाल लाल हो गई, सारा शरीर गुस्सेसे कांपने लगा था. वह खुदको छुडाने के लिए छटपटाने लगा. उसके सामने उसकी नॅन्सी निर्वस्त्र पडी हूई थी. उसकी गर्दन एक तरफ लटक रही थी. उसकी आंखे खुली थी और सफेद हो गई थी. उसका शरीर निश्चल हो चूका था. उसके प्राण कबके जा चूके थे.
अचानक उसे अहसास हूवा की उसके सरपर किसी भारी वस्तूका प्रहार हूवा और वह धीरे धीरे होश खोने लगा.
जब जॉन होशमें आया, उसे अहसास हूवा की अब वह बंधा हूवा नही था. उसके हाथ पैर बंधनसे मुक्त थे. लेकिन जहां कुछ देर पहले नॅन्सीकी बॉडी पडी हूई थी वहां अब कुछभी नही था. वह तुरंत उठकर खडा होगया, उसने चारो ओर अपनी नजर घुमाई.
वह मुझे गिरा हूवा कोई भयानक सपनातो नही था...
हे भगवान वह सपनाही हो...
वह मनही मन प्रार्थना करने लगा.
लेकिन वह सपना कैसे होगा...
'' नॅन्सी '' उसने एक आवाज दिया.
उसे मालूम था की उसे कोई प्रतिसाद आनेवाला नही है.
लेकिन एक झूटी आस...
उसके सरमें पिछेकी तरफसे बहुत दर्द हो रहा था. इसलिए उसने सरको पिछे हाथ लगाकर देखा. उसका हाथ लाल लाल खुनसे सन गया.
उन लोगोंने प्रहार कर उसे बेसुध किया था उसका वह जख्म और निशानी थी. अब उसे पक्का विश्वास हुवा था की वह कोई सपना नही था.
वह तेजीसे रुमके बाहर दौड पडा. बाहर इधर उधर ढूंढते हूए वह गलियारेसे दौड रहा था. वह लिफ्टके पास गया और लिफ्टका बटन दबाया. लिफ्टमें घुसनेसे पहले फिरसे उसने एक बार चारोंतरफ अपनी ढूंढती नजर दौडाई.
कहा गए वे लोग?...
और नॅन्सीकी बॉडी किधर है? ...
की उन्होने लगा दिया उसे ठिकाने...
वह हॉटलके बाहर आकर अंधेरेमें पागलोंकी तरह इधर उधर दौड रहा था. सब तरफ अंधेरा था. आधी रात होकर गई थी. रास्तेपरभी आने जानेवाले बहुतही कम दिखाई दे रहे थे. एक कोनेपर खडा एक टॅक्सीवाला उसे दिखाई दीया.
उसे शायद पता हो...
वह उस टॅक्सीके पास गया, टॅक्सीवालेसे पुछा. उसने दाईतरफ इशारा कर कुछ तो कहा. जॉन टॅक्सीमें बैठ गया और उसने टॅक्सीवालेको टॅक्सी उधर लेनेको कहा.
निराश, हताश हूवा जॉन धीमे गतीसे चलता हूवा अपने रुमके पास वापस आगया. रुममें जाकर उसने अंदरसे दरवाजा बंद कर लिया.
उसने बेडकी तरफ देखा. बेडशीटपर झुर्रिया पडी हूई थी. वह बेडपर बैठ गया.
क्या किया जाये ?...
पुलिसके पास जावो तो वे मुझेही गिरफ्तार करेंगे...
और खुनका इल्जाम मुझपरही लगाएंगे...
और वैसे देखा जाए तो मैही तो हू उसके खुनके लिए जिम्मेदार...
सिर्फ खुनही नही तो उसपर हूए बलात्कारके लिए भी ...
उसने अपने पैर मोडकर घूटने पेटके पास लिए और घूटनोमें अपना मुंह छिपाया. और वह फुटफुटकर रोने लगा.
रोते हूए उसका ध्यान वही कपाटके निचे गिरें कागजके टूकडेने खिंच लिया. वह खडा होगया. अपने आंसू अपने आस्तीनसे पोंछ लिए.
कागजका टूकडा? ... यहां कैसे ?...
उसने वह कागजका टूकडा उठाया.
कागजपर चार अंग्रजी अक्षर लिखे हूए थे - सी, आर, जे, एस. और उन अक्षरोंके सामने कुछ नंबर्स लिखे हूए थे. शायद वे कोई पत्तोके गेमके पॉईंट्स होंगे...
उसने वह कागज उलट पुलटकर देखा. कागजके पिछे एक नंबर था. शायद मोबाईल नंबर होगा.
वह दृढतापुर्वक खडा हो गया -
'' ऍसहोल्स ... मै तुम्हे छोडूंगा नही '' वह गरज उठा.
क्रमश:...
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उपन्यास - अद्-भूत The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA. |
Tuesday, May 13, 2008
Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-20 : मै तुम्हे नही छोडूंगा (Hindi books literature sahitya)
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Wednesday, April 30, 2008
Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-12 : पिछा
शामका समय था. अपनी शॉपींगसे लदी हूई बॅग संभालती हूई नॅन्सी फुटपाथसे जा रही थी. वैसे अब खरीदनेका कुछ खास नही बचा था. सिर्फ एक-दो चिजे खरीदनेकी बची थी.
वह चिजे खरीद ली की फिर घरही वापस जाना है...
वह बची हूई एक-दो चिजे लेकर जब वापस जानेके लिए निकली तब लगभग अंधेरा होनेको आया था और रास्तेपरभी बहुत कम लोग बचे थे. चलते चलते नॅन्सीके अचानक खयालमें आया की बहुत देरसे कोई उसका पिछा कर रहा है. उसकी पिछे मुडकर देखनेकी हिम्मत नही बन रही थी. वह वैसेही चलती रही. फिरभी उसका पिछा जारी है इसका उसे एहसास हूवा. अब वह घबरा गई. पिछे मुडकर ना देखते हूए वह वैसेही जोरसे आगे चलने लगी.
इतनेमे उसे पिछेसे आवाज आया , '' नॅन्सी ''
वह एक पल रुकी और फिर चलने लगी.
पिछेसे फिरसे आवाज आया, '' नॅन्सी ...''.
आवाजके लहजेसे नही लग रहा था की पिछा करने वाले का कोई गलत इरादा हो. नॅन्सीने चलते चलतेही पिछे मुडकर देखा. पिछे जॉनको देखतेही वह रुक गई. उसके चेहरेपर परेशानीके भाव भाव दिखने लगे.
यह इधरभी ..
अबतो सर पटकनेकी नौबत आई है...
वह एक बडा फुलोंका गुलदस्ता लेकर उसके पास आ रहा था. वह देखकर तो उसे एक क्षण लगाभी की सचमुछ अपना सर पटक ले. वह जॉन उसके नजदिक आनेतक रुक गई.
'' क्यो तुम मेरा लगातार पिछा कर रहे हो ?'' नॅन्सी नाराजगी जताते हूए गुस्सेसे बोली.
'' मुझपर एक एहसान करदो और भगवानके लिए मेरा पिछा करना छोड दो '' वह गुस्सेसे हाथ जोडते हूए, उसका पिछा छूडा लेनेके अविर्भावमें बोली.
गुस्सेसे वह पलट गई और फिरसे आगे पैर पटकती हूई चलने लगी. जॉनभी बिचमें थोडा फासला रखते हूए उसके पिछे पिछे चलने लगा.
जॉन फिरसे पिछा कर रहा है यह पता चलतेही वह गुस्सेसे रुक गई.
जॉनने अपनी हिम्मत बटोरकर वह फुलोंका गुलदस्ता उसके सामने पकडा और कहा, '' आय ऍम सॉरी...''
नॅन्सी गुस्सेसे तिलमिलाई. उसे क्या बोले कुछ सुझ नही रहा था. जॉनकोभी आगे क्या बोले कुछ समझ नही रहा था.
'' आय स्वीअर, आय मीन इट'' वह अपने गलेको हाथ लगाकर बोला.
नॅन्सी गुस्सेमेतो थी ही, उसने झटकेसे अपने चेहरेपर आ रही बालोंकी लटे एक तरफ हटाई. जॉनको लगा की वह फिरसे एक जोरदार तमाचा अपने गालपर जडने वाली है. डरके मारे अपनी आंखे बंद कर उसने झटसे अपना चेहरा पिछे हटाया.
उसकेभी यह खयालमें आया और वह अपनी हंसी रोक नही सकी. उसका वह डरा हूवा सहमा हूवा बच्चोके जैसा मासूम चेहरा देखकर वह खिलखिलाकर हंस पडी. उसका गुस्सा कबका रफ्फु चक्कर हो गया था. जॉनने आंखे खोलकर देखा. तबतक वह फिरसे रास्तेपर आगे चल पडी थी. थोडी देर चलनेके बाद एक मोडपर मुडनेसे पहले नॅन्सी रुक गई, उसने पिछे मुडकर जॉनकी तरफ देखा. एक नटखट मुस्कुराहटसे उसका चेहरा खिल गया था. गडबडाए हूए हालमें, संभ्रममे खडा जॉनभी उसकी तरफ देखकर मंद मंद मुस्कुराया. वह फिरसे आगे चलते हूए उस मोडपर मुडकर उसके नजरोंसे ओझल हो गई. भले ही वह उसके नजरोंसे ओझल हूई थी, फिरभी जॉन खडा होकर उधर मंत्रमुग्ध होकर देख रहा था. उसे रह रहकर उसकी वह नटखट मुस्कुराहट याद आ रही थी.
वह सचमुछ मुस्कुराई थी या मुझे वैसा आभास हूवा ....
नही नही आभास कैसे होगा ...
यह सच है की वहं मुस्कुराई थी ...
वह मुस्कुराई इसका मतलब उसने मुझे माफ किया ऐसा समझना चाहिए क्या? ...
हां वैसा समझनेमें कोई दिक्कत नही...
लेकिन उसका वह मुस्कुराना कोई मामूली मुस्कुराना नही था...
उसके उस मुस्कुराहटमें औरभी कुछ गुढ अर्थ छिपा हूवा था...
क्या था वह अर्थ?...
जॉन वह अर्थ समझनेकी कोशीश करने लगा. और जैसे जैसे वह अर्थ उसके समझमें आ रहा था उसकेभी चेहरेपर वही, वैसीही मुस्कुराहट फैलने लगी.
क्रमश:...
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Tuesday, April 15, 2008
Ch-1 : चिख ( hindi novel - अद्-भूत ) Hindi
घना अंधेरा और उपरसे उसमें जोरोसे बरसती बारीश. सारा आसमंत झिंगुरोंकी 'किर्र' आवाजसे गुंज रहा था. एक बंगलेके बगलमें खडे एक विशालकाय वृक्षपर एक बारीशसे भिगा हूवा उल्लू बैठा हूवा था. उसकी इधर उधर दौडती नजर आखीर सामने बंगलेके एक खिडकीपर जाकर रुकी. वह बंगलेकी ऐकलौती ऐसी खिडकी थी की जिससे अंदरसे बाहर रोशनी आ रही थी. घरमें उस खिडकीसे दिख रहा वह जलता हुवा लाईट छोडकर सारे लाईट्स बंद थे. अचानक वहा उस खिडकीके पास आसरेके लिए बैठा कबुतरोंका एक झुंड वहांसे फडफडाता हूवा उड गया. शायद वहां उन कबुतरोंको कोई अदृष्य शक्तीका अस्तीत्व महसुस हूवा होगा. खिडकीके कांच सफेद रंगके होनेसे बाहरसे अंदरका कुछ नही दिख रहा था. सचमुछ वहा कोई अदृष्य शक्ती पहूंच गई थी ? और अगर पहूंची थी तो क्या उसे अंदर जाना था? लेकिन खिडकी तो अंदर से बंद थी.
बेडरुममें बेडपर कोई सोया हूवा था. उस बेडवर सोए सायेने अपनी करवट बदली और उसका चेहरा उस तरफ हो गया. इसलिए वह कौन था यह पहचानना मुश्कील था. बेडके बगलमें एक ऐनक रखी हूई थी. शायद जो भी कोई सोया हूवा था उसने सोनेसे पहले अपनी ऐनक निकालकर बगलमें रख दी थी. बेडरुममे सब तरफ दारुकी बोतलें, दारुके ग्लास, न्यूज पेपर्स, मासिक पत्रिकाएं इत्यादी सामान इधर उधर फैला हूवा था. बेडरुमका दरवाजा अंदरसे बंद था और उसे अंदरसे कुंडी लगाई हूई थी. बेडरुमको सिर्फ एकही खिडकी थी और वहभी अंदरसे बंद थी - क्योंकी वह एक एसी रुम थी. जो साया बेडपर सोया था उसने फिरसे एकबार अपनी करवट बदली और अब उस सोए हुए साएका चेहरा दिखने लगा. स्टीव्हन स्मीथ, उम्र लगभग पच्चीस छब्बीस, पतला शरीर, चेहरेपर कहीं कहीं छोटे छोटे दाढीके बाल उगे हूए, आंखोके आसपास ऐनककी वजहसे बने काले गोल गोल धब्बे. वह कुछतो था जो धीरे धीर स्टीव्हनके पास जाने लगा. अचानक निंदमेंभी स्टीव्हनको आहट हूई और वह हडबडाकर जग गया. उसके सामने जो भी था वह उसपर हमला करनेके लिए तैयार होनेसे उसके चेहरेपर डर झलक रहा था, पुरा बदन पसिना पसिना हुवा था. वह अपना बचाव करनेके लिए उठने लगा. लेकिन वह कुछ करे इसके पहलेही उसने उसपर, अपने शिकारपर हमला बोल दिया था. पुरे आसमंतमें स्टीव्हनकी एक बडी, दर्दनाक, असहाय चिख गुंजी. और फिर सब तरफ फिरसे सन्नाटा छा गया ... एकदम पहले जैसा...
क्रमश:...
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Tuesday, April 1, 2008
Ch-64 : डॉ. कयूम खान (शून्य-उपन्यास) Hindi
कमांड2की यानीकी विनयकी बॉसको ढुंढनेके लिए इस एरियामें यह हमेशाकी चक्कर थी. वह लगभग रोजही इस एरियामें आकर बॉसको ढुंढनेके लिए घुमता रहता था. उसे खुदको बॉस ना पहचाने इसकी वही पुरी एतीयात बरतता था. न जाने कितनी बार, कमसे कम सौके उपर, वह इस एरीयामें बॉसको ढुंढनेके लिए आया होगा. लेकिन उसने कोशीश जारी रखी थी. निरंतर प्रयास करते रहना यह एक उसका गुण ही था. आज दिनभर घुम घुमकर वह थका हूवा था. शाम हो चुकी थी. शहरका मौहोल अब काफी ठंडा पडा हूवा था. हालहीमें उसे बॉसका इंटरनेटपर एक मेसेज आया था. अब यह खुनी श्रुंखला दुसरे एक शहरमेंभी शुरु करनी थी. बॉस नही चाहता था की मौहोल ठंडा पडे. वैसे दुसरे शहरमें खुनी श्रुंखला शुरु करनेके लिए और वक्त था. लेकिन विनयको दुसरे खुनी श्रुंखलामें बिलकुल रुची नही थी. उसके पहलेही उसे उसने शुरु किए खेल का अंत करना था. लेकिन अभीतक एकभी धागा हातमें नही आ रहा था. वह सोचते सोचते एक बडी बिल्डींगका काम चल रहा था वहा खाली जगहमें जाकर खडा हो गया. उसे थकनेकी वजहसे कही बैठनेकी जरुरत महसुस हूई. बैठनेके लिए कुछ है क्या यह देखनेके लिए उसने आजु बाजु देखा. एक जगह रेत का एक बडासा ढेर पडा हूवा था. कोई हमें देखेगा या कोई हमें पहचानेगा इसकी पर्वा ना करते हूए वह उस ढेरपर बैठ गया.
जहा विनय बैठा हूवा था वहांसे लगभग 200 मीटरपर एक काली कार रस्तेके किनारे रुकी हूई थी. गाडीका काला शिशा चढाया हूवा था. इसलिए अंदरका कुछ दिखाई नही दे रहा था. लेकिन अंदरसे जॉन और सॅम दुर्बिणसे विनयकी सारी हरकते निहार रहे थे.
'आज लगभग 5 दिन होगए है हम इसके पिछे है. लेकिन साला इस एरियामें क्या ढूंढ रहा है कुछ पता नही चल रहा है. " सॅमने जॉनसे कहा.
" मुझे लगता है ईसीमें सारे कत्ल का रहस्य छिपा होगा. " जॉनने कहा.
" लेकिन हम कितने दिन ऐसे इसके पिछे पिछे घुमेंगे ? " सॅमने पुछा.
" जबतक उसे जो चाहिए वह मिलता नही तब तक " जॉनने कहा.
" वह अपना अगला शिकार तो नही ढूंढ रहा है? "
" वही तो हमें ढूंढना है... लेकिन मुझे ऐसा नही लगता " जॉनने अपनी राय बताई.
बैठे बैठे विनयका सामने एक बंगलेकी तरफ ध्यान गया. सामने दरवाजे के खंबेपर पत्थरमें मालिकका नाम खुदा हूवा था. और वहा पत्थरके चारों तरफसे रोशनी आनेके लिए बल्बका इंतजाम किया था. विनयने ऐसेही वह नाम पढा.
'डॉ. कयूम खान'
विनयने वह नाम फिरसे पढा.
'डॉ. कयूम खान'
नाम पहचानका लग रहा था. यह नाम कहीतो पढा या सुना लग रहा है. विनय अपने दिमागपर जोर देकर याद करनेकी कोशीश करने लगा. वैसे उसको सब मुस्लीम नाम सरीके लगते थे. शायद इसलिए वह उसे पहचानका लग रहा हो. वह सोचने लगा. अचानक वह जहा बैठा था उसके पिछे 'घरऽऽ घरऽऽ' ऐसा जोरसे आवाज आने लगा. विनय अप्रत्यक्षित तरहसे आये आवाजसे एकदमसे चौककर लगभग खडाही होगया. उसने पिछे पलटकर देखा. पिछे बिल्डींगका कंस्ट्रक्शन चल रहा था और रेडीमीक्स काँक्रीट मशीन अभी अभी शुरु हूई थी. वह खुदको संभालते हूए बाजू हटने लगा. अचानक उसके दिमागमे मानो रोशनीसी कौंध गई.
" माय गॉड" उसके मुंहसे निकल गया.
उसने एकबार फिरसे सामने खंबेपर लिखा नाम पढा. और फिर उस रेडीमीक्स काँक्रीट मशीनकी तरफ देखा. उसके दिमागमें अब सब पहेलिया सुलझ रही थी. .
'डॉ. कयूम खान' यह तो मैने पढे आर्यभट्टके उपर लिखे रिसर्च पेपरका कोऑथर है...
और यह रेडीमीक्स काँक्रीट मशीनकी घरघर उसे एकबार बॉसके फोनपर सुनाई दी थी. ....
"मतलब डॉ. कयूम खानही अपना बॉस है !"
उसके शरीरमे अब फुर्ती दौडने लगी. वह डॉ. कयूम खानके घरकी तरफ जानेके लिए लपका. फिर ब्रेक लगे जैसा एकदम रुका.
नही अब नही...
मुझे सही समय देखकर सब बराबर प्लॅनींग करते हूए अंदर प्रवेश करना पडेगा...
उसने कैसेतो खुदको रोका.
क्रमश:...
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Monday, March 17, 2008
Ch-57: जैसे को तैसा (शून्य-उपन्यास) Hindi
रातका समय था. डॅनने अपने घरका दरवाजा धकेलकर थोडासा खोला और बाहर झांककर देखा. चारो तरफ अंधेरा था. वह धीरेसे घरसे बाहर निकल गया. बाहर आनेके बाद उसने चारो तरफ अपनी नजरे घुमाकर उसे कोई देखतो नही रहा इसकी तसल्ली की. कोई देख नही रहा है इस बातकी तसल्ली होतेही वह कंपाऊंडके बाहर आ गया. फिरसे रस्तेपर उसने चारो ओर अपनी नजरे दौडाई. रास्ता एकदम खाली खाली था. अब वह दाई तरफ मुडकर चलने लगा - अंधेरेमे तेजीसे कदम बढाते हूए. उसके चलनेके गतीके साथही उसके सोचनेभी गती पकड ली. पिछले बार कातिलने हमें भरपूर बक्षिसी देकर खुश कर दिया था. इस बारभी जॉन, सॅम और बॉसको अगला खुन किसका होगा इसकी जानकारी मिलने की बात उसने कातिल को फौरन बताई थी. कातिल उसपर बहूत खुश हो गया था. फिदाही हूवा था.
कातिलने उसे एक जगह बताकर वहा वह सोच भी नही सकता उतना पैसा रखनेका वादा किया था. अब वह वहांही पैसे लेनेके लिए जा रहा था. पैसेका खयाल आतेही उसके दिलमें गुदगुदी होने लगी. पिछले बार मिले पैसेसे दस गुना पैसे उसको अपने आखोंके सामने दिखने लगे. खुशीसे वह झुम उठा. उसके चलनेकी गती धीमी होगई और चालमें एक मस्ती झलकने लगी थी.
होगया अब यह आखरी...
इसके बाद ऐसी बेईमानी नही करुंगा...
इतना पैसा मिलनेके बाद मुझे ऐसी बेइमानी करनेकी फिरसे नौबतही नही आयेगी...
पैसा मिलनेके बाद नौकरी एकदम नही छोडूंगा.. नहीतो किसीको शक हो सकता है...
नौकरीमें कुछ देरतक टाईमपास करेंगे और फिर सही वक्त आतेही नौकरी छोडकर कुछ बिझीनेस करेंगे....
नहीतो पहले बिझीनेस डालूंगा और वह अच्छा खासा चलनेके बाद नौकरी छोड दूंगा....
डॅन सोच रहा था. अचानक असे अहसास हूवा की जिस जगह कातिलने पैसे रखनेका कबुला था वह जगह नजदीक आ चूकी है. वह एक पल रुका. फिरसे एकबार चारो ओर देखकर जिस जगह पर पैसे रखे थे उधर निकल गया. उसके चेहरेपर एक मुस्कुराहट झलक रही थी. स्थान एकदम निर्जन था. चारो ओर अंधेरा छाया हूवा था. बिच बिचमें कुतोंका अजीब आवाज आ रहा था. वह जगह किसीकोभी डर लगेगा ऐसीही थी. लेकिन आज डॅनके डर पर उसका लालच पुरी तरहसे हावी हो चूका था.
सामने एक बडा पेढ था. यही वह पेढ था जिसके निचे कातिलने पैसे रखे थे...
अब मानो डॅनके शरीरमें खुशीकी लहरे दौड रही थी. अब कुछही और पल! कुछ पलमेंही अब मै एक बडे संपतीका मालिक बनने वाला हूं. वह अधीरतापुर्वक पेढके निचे चला गया. वहा एक बडा पत्थर रखा हूवा था. डॅनने एक पलकाभी विलंब ना लगाते हूए वह पत्थर वहासे हटाया. जैसेही उसने वह पत्थर वहा से हटाया एक बडा धमाका हुवा और उसके हाथके टूकडे टूकडे हो गए. उसके बदनमेंभी नुकीले पत्थरके टूकडे गए थे. और खुनसे लथपथ अवस्थामें उसकी जान चली गई. उसे अहसास हो गया था की उसने जैसे ठान लिया था वैसेही यह उसकी आखरी बेइमानी साबित हूई थी.
क्रमश:...
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Tuesday, March 4, 2008
Ch-49C: मिटींग (शून्य-उपन्यास)
....जॉनने बोर्डरूममे इकठ्ठा हूए सबको झीरोके खोजके इतिहासके बारेमें संक्षीप्तमें जानकारी दी.
" और इस झीरोमेंही कत्लका रहस्य छिपा हूवा है... भारतीय इतिहासमें जगह जगह झीरोका उल्लेख 'शून्य' इस नामसे मिलता है. "
जॉनने एक दीर्घ सांस ली और आगे बोलने लगा.
" पहला खून हूवा उसका नाम सानी मतलब वह 'एस' (S) इस अक्षरसे शुरु होता है. दुसरा खून हूवा उसका नाम हूयाना यानी की वह 'एच' (H) इस अक्षरसे शुरु होता है. तिसरा खून जिसका हूवा उसका नाम उटीना जो की 'यू' (U) इस अक्षरसे शुरु होता है. और अब हालहीमें जिसका खुन हूवा उसका नाम 'नियोल' जो की 'एन' (N) इस अक्षरसे सुरू होता है. मतलब 'एस् एच् यू एन वाय ए' (SHUNYA) 'शून्य' यानीकी अब जो खून होनेवाला है उसका नाम 'वाय' (Y) इस अक्षरसेही शुरु होगा इसमें कोई दोराय नही होनी चाहिए"
जॉनने किये त्रुटी रहित विश्लेषनसे सब लोग उसपर खुश लग रहे थे - बॉसभी.
" लेकिन इस शहरमें जिसका नाम 'वाय' (Y) इस अक्षरसे शुरु होनेवाले हजारो या लाखो लोग होंगे. तब क्या हम उन सब लोगोंको प्रोटेक्शन देंगे?" बॉसने आपनी अडचन चाहिर की.
" इतने लोगोंको संरक्षण देना तो लगभग नामुमकीन होगा !" सॅम ने कहा.
" नही... और एक बात मुझे इस सब मामलेमें मिली है ... जिसकी वजहसे हम लोगोंका टारगेट नॅरो डाऊन होनेवाला है " जॉनने कहा.
और एक आशाका किरन दिखेजैसे सब लोग जॉनकी तरफ उत्सुकतासे देखने लगे. फिर जॉन अपने कुर्सीसे उठ गया और सामने टंगे शहरके नक्षेके पास गया. वह अपने पासके कुछ कागजभी साथ ले गया. फिर अपने पासके कागजकी तरफ देखते हूए उसने सामने नक्षेपर लाल स्केच पेनसे एक क्रॉस किया.
" पहला खून हूए सानीका घर शहरमें लगभग यहांपर है. "
सब लोग जॉन क्या बताना चाहता है यह समझनेका प्रयास करने लगे.
जॉनने अपने पासके कागजसे देख देखकर सामने नक्शेपर और एक लाल क्रॉस किया.
" दुसरा खून हूए हूयानाका घर यहां कही है.. "
उसने और एक क्रॉस नक्शेपर मारते हूए कहा,
" तिसरा खून उटिनाका हूवा और उसका घर यहा पर है.. "
" और आखरी खून नियोलका हूवा और उसका घर"
जॉनने फिरसे एकबार अपने पासके कागजकी तरफ देखते हूए नक्शेपर एक क्रॉस करते हूए कहा, , "ये .. यहा है "
सबके चेहरेपर अभीभी संभ्रम था .
" लेकिन इससे क्या साबीत होनेवाल है .?" सॅमने प्रश्न उपस्थित किया .
" मतलब .....एक तो तुम्हे क्या कहना है यह तुम्हेही नही समझ आ रहा है ... या फिर हमारे सरके उपरसे जा रहा है.. " बॉसने कहा.
" जरा ध्यान देकर देखो .... सोचो ... तुम्हारे कुछ खयालमें आता है क्या ?"
जॉनने एकबार बोर्डरूममें बैठे सब लोगोंकी उपरसे नजरे घुमाई.
काफी समय चुप्पीमें गया. सब लोग उससे कुछ साबीत होता है क्या यह देखने लगे.
फिर जॉनने सामनेके नक्शेपर हरे डॉटस देते हूए सब लाल क्रॉसके उपरसे एक वक्र लकिर निकाली. वह वक्र लकिर जहांसे निकाली थी वहां फिरसे जोड दी. फिर उस डॉटसके उपरसे एक मोटी हरी लकीर निकाली. और क्या आश्चर्य उस नक्शेके उपर एक सर्कल दिखने लगा.
"यह देखो यह क्या निकला"
" सर्कल" एकने कहा. .
" सर्कल नही... यह शून्य है " जॉनने गूढ भावसे कहा.
सामने बैठे सभी लोगोंके चेहरेपर सबकुछ बोध होनेके आनंदयुक्त और उत्साहपूर्ण भाव आ गये थे.
" यस्स... यू आर जिनीयस जॉन!" सॅमके मुंहसे अनायास ही निकल गया.
बॉसने सॅमकी तरफ नाराजगीसे देखा.
" पहला क्रास यहां, दुसरा यहां , यहां तिसरा और यहां चौथा. "
जॉन नक्शेपर क्रॉसकी तरफ निर्देश करते हूए बोला.
" मतलब पांचवा क्रास यही कही होना चाहिए. "
जॉनने चक्रपर चौथे और पहले क्रॉसके बिचमें जो खाली जगह थी वहा एक पांचवा क्रॉस निकाला.
" इस पांचवे क्रॉसके एरियामेंही कातिल का अगला निशाना छूपा हूवा है और उसका नाम 'वाय'(Y) इस अक्षरसे शुरु होता है . यह दो जानकारीयोंमे बैठनेवाले लगभग तिन या चार मकान होंगे. और वह भी पॉसीब्ली दसवे मालेपर ... क्योंकी हर खुनके वक्त कातिलने दसवा मालाही चूना है "
" यस ....इन मकानोंपर अगर हम नजर रखते है तो कातिलको हम जरुर पकड पायेंगे.." सॅमने उत्साहसे भरे स्वरमें कहा.
इतनेमें एक पियून अंदर आकर बॉसके पास जाकर धीरेसे बोला,
" साहब , आपका अर्जंंट फोन है "
बॉस कुर्सीसे उठ गया.
" यू कॅरी ऑन. आय वील बी बॅक सून" बॉस जॉनको और बाकी लोगोंको बोलते हूए 'खाट खाट' जुतोंका आवाज करते हूए बोर्डरूमसे बाहर निकल गया.
क्रमश:...
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Monday, February 18, 2008
Ch-38: डीटेक्टीव्ह का फोन (शून्य-उपन्यास)
ठंडसे एकदूसरेका बचाव करनेके लिए एक दूसरेको कसकर लिपटकर जॉन और अँजेनी टेरेसपरही सोए थे. सुबह पंछीयोंकी चहचहाटसे अँजेनी जाग गई. उसने अपनी आनंदभरी और गहरी निंद से हूए भारी आंखे खोलनेकी कोशीश की. उसे आंखे खोलनेका मन नही हो रहा था. उसे वैसेही जॉनकी बाहोंमे मानो पुरी जिंदगी रहनेका मन कर रहा हो. वैसेही लेटे हूए अवस्था मे उसने हलके अपनी आखे थोडीसी खोलकर देखा. पुरबकी ओर सुबहकी लाली छाई हूई थी. सुबह हो गई .. अब उठना ही चाहिए... उसने अपने कपडे पहनते हूए जॉनको धीरेसे हिलाया.
" जॉन ऊठो, देखो सुबह हो गई.."
"उं..." जॉनने सुस्तीमें अंगडाई ली और उसे फिरसे अपनी बाहोंमे खिंच लिया.
उसने खुदको छुडाते हूए अपने कपडे पहने और फिर उसे जगानेके लिए हिलाया. वह उठ गया. किलकीली आखोंसे इधर उधर देखा और फिर उसकी गोदमें सर रखकर सो गया. उसकी बालोंमे अपनी नाजूक उंगलीया फेरते हूए वह मुस्कुराने लगी. इतनेमें उन्हे अहसास हूवा की शायद निचे बेडरुममें रखा हूवा जॉनका मोबाईल बज रहा है.
" जॉन देखोतो, तुम्हारा मोबाईल बज रहा है.."
यहां आनेके बाद पहली बार जॉनका मोबाईल बजा था. वह एकदमसे उठ खडा हूवा. कपडे पहनते हूए जल्दी जल्दी निचे जाने लगा. वह भी उसके साथ हो ली.
हां जॉनकाही मोबाईल बज रहा था...
मोबाईल उठाकर जॉनने डिस्प्लेकी तरफ देखा. डिटेक्टीव्ह अॅलेक्सका फोन था.
इतनी सुबह अॅलेक्सका फोन ?...
जरुर कोई महत्वपुर्ण बात होगी...
झटसे जॉनने बटन दबाकर मोबाईल कानको लगाया.
" हं बोलो अॅलेक्स " जॉनने कहा.
" जॉन एक बहुत महत्वपुर्ण खबर है... " उधरसे आवाज आया.
अचानक मोबाईलके सिग्नलमे कुछतो डिस्टर्बन्स आने लगा. कुछ सुनाई नही दे रहा था.
" हॅलो हॅलो " जॉन ट्राय करने लगा.
" हॅलो" उधरसे प्रतिसाद आया.
" हं, बोलो ... क्या खबर है ?" जॉनने पुछा.
" खुनीके ठिकानेका पता चल चूका है... तूम जल्दीसे जल्दी ... " उधरसे बात पुरी होनेसे पहलेही कुछ न समजनेवाले टूटे हूए बोल जैसे आवाज आने लगे. और फिरतो वह भी आना बंद हूवा.
" हॅलो हॅलो" जॉनने बोलनेका प्रयास किया.
उसने उसके मोबाईलके डिस्प्लेके तरफ देखा. उसके मोबाईलका सिग्नल गया था.
शायद शहरसे दूर होनेके कारण इस इलाकेमे सिग्नल बराबर नही आ रहा होगा... .
" क्या हूवा ? किसका फोन है ?" अँजेनीने पुछा.
वह फोन लेकर बाल्कनीमें गया. लेकिन सिग्नल आनेका नाम नही ले रहा था.
" अँजी जल्दी तैयार हो जावो.. हमें अब यहांसे जल्दसे जल्द निकलना होगा.." बोलते हूए जॉन बाल्कनीसे सिढीयोंकी तरफ लपका.
सिढीयोंसे दौडते हूए वह टेरेसपर गया. कुछ ना समझते हूए अँजेनीभी उसके पिछे पिछे टेरसपर गई. टेरेसपरभी उसके मोबाईलका सिग्नल नही आ रहा था.
"अॅलेक्सका फोन था ... खुनीके बारेमें कुछतो महत्वपुर्ण जानकारी मिली है उसको शायद ... लेकिन बिचमेंही सिग्नल चला गया... " मोबाईलका डिस्प्ले अँजेनीको दिखाते हूए जॉनने कहा.
क्रमश:...
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Sunil Doiphode
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10:26 AM
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Tuesday, February 5, 2008
Ch-30A: प्रेस कॉंन्फरंन्स (शून्य-उपन्यास)
खुले मैदानमे एक उंची जगह एक टेबल रखा हूवा था. टेबलपर अलग अलग टीव्ही चॅनल्सके टॅग लगाए हूए मायक्रोफोन रखे हूए थे. टेबलके सामने खुली जगहमें कुछ कुर्सीयां रखी हूई थी. वहां प्रेसवालोंने भीड की हूई थी. कुछ प्रेसवाले कुर्सीपर बैठकर प्रेसकॉन्फरन्समें शहर पुलीस शाखाप्रमुख आनेकी राह देख रहे थे. कुछ पत्रकार छोटे छोटे समूह बनाकर कुछ चर्चा कर रहे थे. चर्चा वही. फिलहाल शहरमें चल रहे खुनी श्रुंखलाकी.
" बहुत दिनोंसे वही वही खबरें एक रुटीनसा होगया था. इस खुनकी वजहसे वह रुटीन दूर होगया ऐसा लगता है. " एकने कहा.
" मतलब, तुम्हे कही ऐसा तो नही कहना है की यह खुन हो रहे है यह अच्छा हो रहा है.." दुसरेने व्यंगपूर्वक कहा.
" अरे वैसा नही " पहला गडबडाकर बोला.
" अरे मतलब वैसाही है. लेकीन खुले ढंगसे कहभी नही सकते..." दुसरा हसकर बोला.
फिर दोनो एकसाथ हसने लगे.
" साला, क्या करेंगे अपना कामही कुछ ऐसा है... दुसरे लोगोंके जानपर हमें खबरें बनानी पडती है... " और एक तिसरा बोला.
" हां वही तो... अगर खबरें ना हो तो अपना पेट कैसे भरेगा... ?"
" अरे जब मै नया नया इस क्षेत्रमें आया... तब रोज सुबह भगवानसे प्रार्थना करता था ... हे भगवान, कमसे कम आजतो एक खबर मिलने दे..."
" मतलब... संक्षेपमें... भगवान आज तो भी कोई अॅक्सीडेंट , खून'
' ... या कुछतो चटपटा घटीत होने दे. "
पहिलेने तिसरेकी ताली लेते हूए अपना वाक्य पूरा किया.
दुसरी तरफ टी व्ही चॅनल्सवाले अपने कॅमेरे लेकर तैयार थे. उनमेंभी चर्चा शुरू थी.
" अरे रोज कितना बुरा घटीत होता है इस दुनियामें..." एकने कहा.
" यह अच्छा है की हमें वह सब अपने इस खुली आंखोसे देखना नही पडता..." दुसरेने कहा.
" खुली आंखोसे नही तो कैसे देखते है हम?" दुसरेने आश्चर्य व्यक्त करते हूए कहा.
" अरे मतलब यह कॅमेरा रहता है ना अपने




