उपन्यास - अद्-भूत
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Tuesday, May 13, 2008

Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-20 : मै तुम्हे नही छोडूंगा (Hindi books literature sahitya)

जॉनको एकदम सबकुछ शांत और स्थब्ध होनेका अहसास हूवा.

'' ए उसके आंखोपर बंधा कपडा छोड रे... '' क्रिस्तोफरका चिढा हूवा स्वर गुंजा.

जॉनको उसके आंखोपरसे कोई कपडा निकाल रहा है इसका अहसास हूवा. उसका आक्रोश आंसुओंके द्वारे बाहर निकलकर वह कपडा पुरी तरह गिला हूवा था.

जैसेही उन्होने उसके आखोसे वह कपडा निकाला, उसने सामनेका दृष्य देखा. उसके जबडे कसने लगे, आंखे लाल लाल हो गई, सारा शरीर गुस्सेसे कांपने लगा था. वह खुदको छुडाने के लिए छटपटाने लगा. उसके सामने उसकी नॅन्सी निर्वस्त्र पडी हूई थी. उसकी गर्दन एक तरफ लटक रही थी. उसकी आंखे खुली थी और सफेद हो गई थी. उसका शरीर निश्चल हो चूका था. उसके प्राण कबके जा चूके थे.

अचानक उसे अहसास हूवा की उसके सरपर किसी भारी वस्तूका प्रहार हूवा और वह धीरे धीरे होश खोने लगा.

जब जॉन होशमें आया, उसे अहसास हूवा की अब वह बंधा हूवा नही था. उसके हाथ पैर बंधनसे मुक्त थे. लेकिन जहां कुछ देर पहले नॅन्सीकी बॉडी पडी हूई थी वहां अब कुछभी नही था. वह तुरंत उठकर खडा होगया, उसने चारो ओर अपनी नजर घुमाई.

वह मुझे गिरा हूवा कोई भयानक सपनातो नही था...

हे भगवान वह सपनाही हो...

वह मनही मन प्रार्थना करने लगा.

लेकिन वह सपना कैसे होगा...

'' नॅन्सी '' उसने एक आवाज दिया.

उसे मालूम था की उसे कोई प्रतिसाद आनेवाला नही है.

लेकिन एक झूटी आस...

उसके सरमें पिछेकी तरफसे बहुत दर्द हो रहा था. इसलिए उसने सरको पिछे हाथ लगाकर देखा. उसका हाथ लाल लाल खुनसे सन गया.

उन लोगोंने प्रहार कर उसे बेसुध किया था उसका वह जख्म और निशानी थी. अब उसे पक्का विश्वास हुवा था की वह कोई सपना नही था.

वह तेजीसे रुमके बाहर दौड पडा. बाहर इधर उधर ढूंढते हूए वह गलियारेसे दौड रहा था. वह लिफ्टके पास गया और लिफ्टका बटन दबाया. लिफ्टमें घुसनेसे पहले फिरसे उसने एक बार चारोंतरफ अपनी ढूंढती नजर दौडाई.

कहा गए वे लोग?...

और नॅन्सीकी बॉडी किधर है? ...

की उन्होने लगा दिया उसे ठिकाने...

वह हॉटलके बाहर आकर अंधेरेमें पागलोंकी तरह इधर उधर दौड रहा था. सब तरफ अंधेरा था. आधी रात होकर गई थी. रास्तेपरभी आने जानेवाले बहुतही कम दिखाई दे रहे थे. एक कोनेपर खडा एक टॅक्सीवाला उसे दिखाई दीया.

उसे शायद पता हो...

वह उस टॅक्सीके पास गया, टॅक्सीवालेसे पुछा. उसने दाईतरफ इशारा कर कुछ तो कहा. जॉन टॅक्सीमें बैठ गया और उसने टॅक्सीवालेको टॅक्सी उधर लेनेको कहा.

निराश, हताश हूवा जॉन धीमे गतीसे चलता हूवा अपने रुमके पास वापस आगया. रुममें जाकर उसने अंदरसे दरवाजा बंद कर लिया.

उसने बेडकी तरफ देखा. बेडशीटपर झुर्रिया पडी हूई थी. वह बेडपर बैठ गया.

क्या किया जाये ?...

पुलिसके पास जावो तो वे मुझेही गिरफ्तार करेंगे...

और खुनका इल्जाम मुझपरही लगाएंगे...

और वैसे देखा जाए तो मैही तो हू उसके खुनके लिए जिम्मेदार...

सिर्फ खुनही नही तो उसपर हूए बलात्कारके लिए भी ...

उसने अपने पैर मोडकर घूटने पेटके पास लिए और घूटनोमें अपना मुंह छिपाया. और वह फुटफुटकर रोने लगा.

रोते हूए उसका ध्यान वही कपाटके निचे गिरें कागजके टूकडेने खिंच लिया. वह खडा होगया. अपने आंसू अपने आस्तीनसे पोंछ लिए.

कागजका टूकडा? ... यहां कैसे ?...

उसने वह कागजका टूकडा उठाया.

कागजपर चार अंग्रजी अक्षर लिखे हूए थे - सी, आर, जे, एस. और उन अक्षरोंके सामने कुछ नंबर्स लिखे हूए थे. शायद वे कोई पत्तोके गेमके पॉईंट्स होंगे...

उसने वह कागज उलट पुलटकर देखा. कागजके पिछे एक नंबर था. शायद मोबाईल नंबर होगा.

वह दृढतापुर्वक खडा हो गया -

'' ऍसहोल्स ... मै तुम्हे छोडूंगा नही '' वह गरज उठा.


क्रमश:...

Tuesday, April 22, 2008

Ch-6 : दहशत ( hindi sahitya - अद्-भूत ) Hindi

डिटेक्टीव्ह सॅम और उसका एक साथी कॅफेमें बैठे थे. उनमें कुछतो गहन चर्चा चल रही थी. उनके हावभावसे लग रहा था की शायद वे हालहीमें हूए दो खुनके बारेमे चर्चा कर रहे होंगे. बिच बिचमें दोनोभी कॉफीके छोटे छोटे घुंट ले रहे थे. अचानक कॅफेमें रखे टिव्हीपर चल रही खबरोंने उनका ध्यान आकर्षीत किया.
डिटेक्टीवने जितोड कोशीश की थी की प्रेस हालहीमें चल रहे खुनको जादा ना उछाले. लेकिन उनके लाख कोशीशके बादभी मेडीयाने जानकारी हासिल की थी. आखिर डिटेक्टीव्ह सॅमकोभी कुछ मर्यादाए थी. वे एक हद तक ही बातें मिडीयासे छुपा सकते है. और कभी कभी जिस बातको हम छुपाना चाहते है उसीकोही जादा उछाला जाता है.
टीव्ही न्यूज रिडर बोल रहा था - '' कातिलने कत्ल किए और एक शक्स की लाश आज तडके पुलिसको मिली. जिस तरहसे और जिस बर्बरतासे पहला खुन हुवा था उसी बर्बरतासे या यूं कहीए उससेभी जादा बर्बतासे .. इस शक्सकोभी मारा गया. इससे कोईभी इसी नतीजेपर पहूंचेगा की इस शहरमें एक खुला सिरीयल किलर घुम रहा है.... हमारी सुत्रोंने दिए जानकारीके हिसाबसे दोनोभी शव ऐसे कमरेंमे मिले की जो जब पुलिस पहुंची तब अंदरसे बंद थे. पुलिसको जब इस बारेंमे पुछा गया तो उन्होने इस मसलेपर कुछभी टिप्पनी करनेसे इनकार किया है. जिस इलाकेमें खुन हुवा वहा आसपासके लोग अब भी इस भारी सदमेंसे उभर नही पाये है. और शहरमेंतो सब तरफ दहशतका मौहोल बन चूका है. कुछ लोगोंके कहे अनुसार जिन दो शक्स का खुन हूवा है उनके नामपर गंभीर गुनाह दाखिल है. इससे एक ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है की जो भी खुनी हो वह गुनाहगारोंकोही सजा देना चाहता है. इसकी वजहसे कुछ आम लोग तो कातिलकी वाहवा कर रहे है...''
'' अगर खुनीको मिडीया अटेंशन चाहिए था तो वह उसमें कामयाब हो चूका है .. हमने लाख कोशीश की लेकिन आखिर कबतक हमभी प्रेससे बाते छुपा पाएंगे'' डिटेक्टीव्ह सॅमने अपने साथीसे कहा. लेकिन सामने बैठा ऑफिसर कुछभी बोला नही. क्योंकी अबभी वह खबरें सुननेंमे व्यस्त था.
जोभी हो यह सब जानकारी अपने डिपार्टमेंटके लोगोंनेही लिक की है...
लेकिन अब कुछभी नही किया जा सकता है...
एक बार धनुष्यसे छूटा तिर वापस नही लाया जा सकता है..
सॅम सोच रहा था. फिर और एक विचार सॅमके दिमागमें चमका -
कही ये अपने सामने बैठेवाला ऑफिसर तो नही... जो सब जानकारीयां लिक कर रहा हो...
सॅम एक अजिब नजरसे उसकी तरफ देख रहा था. लेकिन वह अबभी टिव्हीकी खबरें सुननेमें व्यस्त था.
शहरमें सब तरफ सारी दशहत फैल चूकी थी.
एक सिरीयल किलर शहरमें खुला घुम रहा है....
पुलिस अबभी उसको पकडनेमे नाकामयाब ...
वह और कितने कत्ल करनेवाला है? ...
उसका अगला शिकार कौन होगा?..
और वह लोगोंको क्यो मार रहा है ?...
कुछ कारणवश या युंही ?...
इन सारे सवालोंके जवाब किसीके पासभी नही थे.
क्रमश:...

Monday, March 31, 2008

Ch-63 : रेकॉर्ड डिटेल्स (शून्य-उपन्यास) Hindi

सॅम और जॉन एक कॉम्प्यूटरके सामने बैठे थे. कॉम्प्यूटरपर एक सॉफ्टवेअर रन हो रहा था. उस साफ्टवेअरके सहाय्यतासे वे उनको मिले उंगलीयोंके निशान कॉम्पूटरपर गुनाहगारोंके डाटाबेसमें ढुंढ रहे थे. डाटाबेसमें गुनाहगारोंके लाखो करोडो उंगलियोंके निशान स्टोअर करके रखे होंगे. उस हर उंगलियोंके निशान के साथ उनके पासके उंगलियोंके निशान जोडकर देखना वैसे बडा कठीन काम था. लेकिन आजकल काम्प्यूटरकी वजहसे वह बहुत आसान हो गया था. कॉम्प्यूटर एक सेकंडमें कमसे कम हजारो उंगलियोंके निशान जोडकर देखता होगा. और वहभी बहुत बारीकीसे, एक भी छोटीसे छोटी महत्वपुर्ण जानकारी ना छोडते हूए. मतलब सब निशानोंको जोडकर देखनेके लिए कुछ ही मिनीटोंका अवधी लगने वाला था. वे दोनो बेसब्रीसे कॉम्प्यूटरके मॉनिटरकी तरफ देखने लगे. मॉनिटरपर कितने लोगोंके उंगलियोंके निशान जोडकर देखे यह बतानेवाला एक काऊंटर तेजीसे आगे बढ रहा था. वह काऊंटर शून्यसे शुरु होकर अबतक सात लाखके उपर पहूंच गया था. आखिर अचानक वह काऊंटर 757092 पर रुका .

मॉनिटरपर एक मेसेज झलकने लगा " मॅच फाऊंन्ड".

दोनोंके चेहरे खुशीसे खिल उठे. उन्होने एकदुसरेकी तरफ देखकर एक विजयी मुस्कुराहट बिखेरी और फिर मॉनिटरपर वह किसका रेकॉर्ड है यह देखने लगे.


॥।रेकॉर्ड डिटेल्स ॥।


नाम - विनय जोशी

उम्र - 30 साल

गुनाह - फोर्जरी

निशाणी - बायें हाथको छे उंगलिया.

नॅशनॅलिटी - अमेरिकन


दोनोभी गुनाहगारकी पुरी जानकारी पढने लगे. उसमें गुनाहगारके तीन फोटोभी थे. एक दाई तरफसे लिया हूवा , दुसरा बायी तरफसे लिया हूवा और तिसरा सामनेसे लिया हूवा.

" यह सब जानकारी हमे शहरके सब पुलिस थानोंपर जल्द से जल्द भेजना चाहिए." सॅमने कहा.

" हां सही है ... लेकिन मुझे एक डर है " जॉनने कहा.

सॅमने उसकी तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

" की इसबारभी अगर यह जानकारी कातिलतक पहूंच गई तो ? " जॉनने अपनी चिंता जाहिर की.

" इसबार नही पहूंचेगी. उस डॅनको उसके कियेकी सजा मिल चूकी है." सॅमने कहा.

फिर उन्होने उस गुनाहगारकी फोटोके साथ सारी जानकारी शहरके सब पुलिस थानोंपर भेज दी. और वैसा कोई शख्स नजर आतेही ही उसपर वॉच रखकर तुरंत सॅमको सुचीत करनेके लिए बताया गया. क्योंकी वह सिर्फ एक धागा हो सकता है. वहतो उनके हाथका सिर्फ एक मोहरा हो सकता था. असली गुनाहगार कोई और ही हो सकता है. पुरी केसकी तहतक जाकर असली गुनाहगारतक पहूंचना सबसे महत्वपुर्ण था.

क्रमश:...

Thursday, March 6, 2008

Ch-50B: ऑडीओ (शून्य-उपन्यास)

" मेरे हिंदूस्थानी भाईयों और बहनो..."

बिचमें एक लांबा पॉज था.

बोर्डरूमके सब लोगोंने एक दुसरेकी तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

ऑडीओका आवाज फिरसे बोर्डरूममें घुमने लगा. .

" किसी ना किसी तरह कोई हमपर आजतक राज करते आया है. हमे जैसे गुलामी की आदत सी हो गई है. इससे पहले 150 साल तक हमपर ब्रिटीश लोगोंने राज किया ... और बुरी तरह... किसी जानवरो की तरह हमसे बर्ताव किया. यह लोगोंका हमपर राज करने का सिलसिला अभीभी जारी है. अभीभी हमपर कोई राज कर रहा है. यह सुनकर आपको आश्चर्य हो रहा होगा. लेकिन यह सच है और यह आश्चर्य की नही शर्म की बात है. हमारे गुजरे हूए कल पर थोडी नजर डाली जाएँ तो यह जो आजका प्रगत विज्ञान है. इसकी नींव हमने रची हुई है. लेकिन उसे कोई मानने को तैयार नही. वह विज्ञान इन प्रगत देशोंने या तो हमसे चुराया है या अपने ताकद की जोर पर जबरदस्ती हमसे हथीया लिया है. उदाहरण के तौरपर है शून्य. शून्य का शोध हमने लगाया है. लेकिन यह कोई मानने के लिए तैयार नही. पायथॅगोरस थेरम उसका शोध हमारे पूर्वज वैज्ञानिक आर्यभट्टने लगाया. लेकिन आज वह किसी और के नाम से प्रचलित है ज्या (sine) का शोधभी आर्यभटने लगाया है. ये होगए गणिती क्षेत्र के शोध और संशोधन. स्वास्थविज्ञानमें विविध जडीबूटीयाँ, उनके औषधीय उपयोग. इन सबको अनदेखा करते हूए अमेरिकाका हल्दीका पेटेंट अपने झोलीमें डालनेका प्रयास किसीको नागवार गुजरा नही क्योंकी वह एक शक्तीशाली देश है. अपने शक्तीके जोर पर वे कुछ भी करने की क्षमता रखते है. अपने शक्ती के जोर पर वे किसी झूठ को सच का सुनहरी मुलामा देकर मिडीया का सहारा लेकर सारे विश्वपर थोपते है. ऎैसे बहुत सारे शोध है जो हमने लगाये हूए है लेकिन वह आज कोई दुसरे लोगोंने चुराकर अपने नाम पर कर लिए है या फिर वे अपने ताकत के जोरो पर उसको वे अपना संशोधन या शोध बताते है. इससे एक बात साबीत होती है की हम दिमागी तौर पर ना कभी कीसी देशसे कम थे ना है. हाँ आज भी नही है. आज इस वक्त अमेरिका, युरोप मे हमारा ब्रेन ड्रेन हो चूका है. यह बात यह साबीत करती है की आज भी दिमागी तौर पर हम किसीसे कम नही है. हमारे पास दिमाग होते हूए भी यह सब क्यो हो रहा है? उसके लिये हमारी सोई हूई राष्ट्रीयता और इन प्रगत देशोंकी हमारे प्रति नीतीयाँ और उनका हमारे अंदरूनी मामलेमें हस्तक्षेप है.

उन लोगोंका हमारे प्रती ध्यान खिंचकर उन्हे झिंजोरने के लिए और अपने हिंदू लोगोंका सोया हूवा धर्माभीमान , अभिमान और राष्ट्रीयता जगाने के लिए हमने यह 'झीरो मिस्ट्री' हत्या श्रृंखला अभियान चलाया है. क्योंकी सोये को जगाया जा सकता है लेकीन सोनेका ढोंग करने वाले को जगाने के लिए किसी बडे धमाको की जरूरत होती है. हाँ इस वक्त हमें बडे धमाके की जरूरत है. क्योंकी हमेशा हमारे अहिंसा और शांतीप्रीय भाव को लोगोंने गलत तरीके से लिया है और उसकी वजहसे वे हमे कमजोर समझते है. यह तो सिर्फ पहला कदम है. हमें अपना खोया हूवा वैभव पाने के लिए और बहुत कुछ करना बाकी है. मुझे आशाही नही बल्की विश्वास है की आप सब हिंदू लोग इस अभियान मे हमारा तहे दिलसे साथ देंगे. हिंदूज आर मच मोर कॅपॅबल बी रेडी फॉर रूलींग द र्वल्ड ...

... जय हिंद! "


मेसेज हिंदीमें था. बोर्डरूमें किसीकोभी हिंन्दी नही आती थी. लेकिन बोर्डरुममें बैठे एक भारतीय मुलके एक अधिकारीके वजहसे बाकी लोगोंको समझनेमं दिक्कत नही हूई. मेसेज सुनते वक्त बिचबिचमें वह अपने साथीयोंको इंग्लीशमें ट्रान्सलेट कर बता रहा था.

बोर्डरूममें एक अजीब सन्नाटा फैला हूवा था.

" माय गॉड" बॉसके मुंहसे निकल गया.

" इट इज अ टेररीझम?" सॅमने पुछा.

" नो. नॉट सिप्ली टेररीझम इट्स हिंदू टेररीझम... अर्लीयर वुई वेअर व्हीक्टीम ऑफ मुस्लीम टेररीझम. नाऊ इटस् हिंदू टेररीझम आल्सो इन द लिस्ट" बॉसने कहा.

" सर मुझे लगता है हमें किसीभी हालमें अगला कत्ल होनेसे बचाना चाहिए. " जॉनने कहा.

" मि. जॉन अब यह मामला सिर्फ एक सिरीयल मर्डर केस नही रहा है.... नाऊ इट हॅज बिकम अ फेनॉमेनॉन" बॉसने कहा.

" लेकिन अगर हम यह अगला कत्ल होनेसे अगर रोक सके ... और कातिलको पकड सके ... तो इसपर जरुर कुछ नियंत्रण आयेगा " जॉनने अपनी राय व्यक्त की.

" अब क्या क्या टाल सकते है हम... अब पहलेसेही सारी अमरिकामें भारतीय अमेरिकन और अमेरिकन लोगोंमें दंगे भडक चूके है. और कातिल एक ना होकर एक टेररीस्ट संघटना है. हिंदू टेररिस्ट संघटना "

' लेकिन यह दंगे इतने जल्दी एकदमसे कैसे शुरु हूए? '' सॅमने आश्चर्य व्यक्त करते हूए कहा. .

" 9/11 के दरम्यान लोगोंका गुस्सा एक सीमातक यानी की उनकी थ्रेशोल्ड लेव्हलतक पहूंच गया था. ... और अब यह और एक टेररीझम सुनकर उनका गुस्सा आऊट र्बस्ट होगया है.." बॉसने मानो लोगोंके आचरण का विश्लेशण किया. वैसे मॉब बिहेवीयर और मॉब टेन्डंसीके बारेमे बॉसका अच्छा खासा अध्ययन था. फिरसे पियून अंदर आया.

" साहब, मेयरका फोन" पीयूनने बॉसके कानकेपास झूककर अदबसे कहा.

बॉस उठ खडा हूवा.

" चला उठो .. अब हमें यह दंगा फसाद काबूमें लाना पडेगा."

बॉस बाहर जाने लगा. जॉन छोडकर सब लोग उठकर बॉसके पिछे पिछे जाने लगे. जॉन नाउम्मीद होकर सब जानेवालोंको देखता रहा.

क्रमश:...

Monday, February 18, 2008

Ch-38: डीटेक्टीव्ह का फोन (शून्य-उपन्यास)

ठंडसे एकदूसरेका बचाव करनेके लिए एक दूसरेको कसकर लिपटकर जॉन और अँजेनी टेरेसपरही सोए थे. सुबह पंछीयोंकी चहचहाटसे अँजेनी जाग गई. उसने अपनी आनंदभरी और गहरी निंद से हूए भारी आंखे खोलनेकी कोशीश की. उसे आंखे खोलनेका मन नही हो रहा था. उसे वैसेही जॉनकी बाहोंमे मानो पुरी जिंदगी रहनेका मन कर रहा हो. वैसेही लेटे हूए अवस्था मे उसने हलके अपनी आखे थोडीसी खोलकर देखा. पुरबकी ओर सुबहकी लाली छाई हूई थी. सुबह हो गई .. अब उठना ही चाहिए... उसने अपने कपडे पहनते हूए जॉनको धीरेसे हिलाया.

" जॉन ऊठो, देखो सुबह हो गई.."

"उं..." जॉनने सुस्तीमें अंगडाई ली और उसे फिरसे अपनी बाहोंमे खिंच लिया.

उसने खुदको छुडाते हूए अपने कपडे पहने और फिर उसे जगानेके लिए हिलाया. वह उठ गया. किलकीली आखोंसे इधर उधर देखा और फिर उसकी गोदमें सर रखकर सो गया. उसकी बालोंमे अपनी नाजूक उंगलीया फेरते हूए वह मुस्कुराने लगी. इतनेमें उन्हे अहसास हूवा की शायद निचे बेडरुममें रखा हूवा जॉनका मोबाईल बज रहा है.

" जॉन देखोतो, तुम्हारा मोबाईल बज रहा है.."

यहां आनेके बाद पहली बार जॉनका मोबाईल बजा था. वह एकदमसे उठ खडा हूवा. कपडे पहनते हूए जल्दी जल्दी निचे जाने लगा. वह भी उसके साथ हो ली.

हां जॉनकाही मोबाईल बज रहा था...

मोबाईल उठाकर जॉनने डिस्प्लेकी तरफ देखा. डिटेक्टीव्ह अॅलेक्सका फोन था.

इतनी सुबह अॅलेक्सका फोन ?...

जरुर कोई महत्वपुर्ण बात होगी...

झटसे जॉनने बटन दबाकर मोबाईल कानको लगाया.

" हं बोलो अॅलेक्स " जॉनने कहा.

" जॉन एक बहुत महत्वपुर्ण खबर है... " उधरसे आवाज आया.

अचानक मोबाईलके सिग्नलमे कुछतो डिस्टर्बन्स आने लगा. कुछ सुनाई नही दे रहा था.

" हॅलो हॅलो " जॉन ट्राय करने लगा.

" हॅलो" उधरसे प्रतिसाद आया.

" हं, बोलो ... क्या खबर है ?" जॉनने पुछा.

" खुनीके ठिकानेका पता चल चूका है... तूम जल्दीसे जल्दी ... " उधरसे बात पुरी होनेसे पहलेही कुछ न समजनेवाले टूटे हूए बोल जैसे आवाज आने लगे. और फिरतो वह भी आना बंद हूवा.

" हॅलो हॅलो" जॉनने बोलनेका प्रयास किया.

उसने उसके मोबाईलके डिस्प्लेके तरफ देखा. उसके मोबाईलका सिग्नल गया था.

शायद शहरसे दूर होनेके कारण इस इलाकेमे सिग्नल बराबर नही आ रहा होगा... .

" क्या हूवा ? किसका फोन है ?" अँजेनीने पुछा.

वह फोन लेकर बाल्कनीमें गया. लेकिन सिग्नल आनेका नाम नही ले रहा था.

" अँजी जल्दी तैयार हो जावो.. हमें अब यहांसे जल्दसे जल्द निकलना होगा.." बोलते हूए जॉन बाल्कनीसे सिढीयोंकी तरफ लपका.

सिढीयोंसे दौडते हूए वह टेरेसपर गया. कुछ ना समझते हूए अँजेनीभी उसके पिछे पिछे टेरसपर गई. टेरेसपरभी उसके मोबाईलका सिग्नल नही आ रहा था.

"अॅलेक्सका फोन था ... खुनीके बारेमें कुछतो महत्वपुर्ण जानकारी मिली है उसको शायद ... लेकिन बिचमेंही सिग्नल चला गया... " मोबाईलका डिस्प्ले अँजेनीको दिखाते हूए जॉनने कहा.

क्रमश:...

Monday, February 4, 2008

Ch-29: बॉसका फोन (शून्य-उपन्यास)


कमांड2ने अपनी जगह बदली थी. वह अपने नए अड्डेमें तहखानेमें कॉम्प्यूटरके सामने बैठा हूवा था. उसका चेहरा अभीभी खुशीसे दमक रहा था.

कमांड1को मारनेके बाद अपना आगेका रास्ता आसान होगया...

वह सोच रहा था. वह देखनेमेतो कॉम्प्यूटरपर मेल चेक कर रहा था लेकिन उसके दिमागमे और ही कुछ चल रहा था. इतनेमे उसका मोबाईल बजा. उसने मोबाईलपर नंबर देखा. लेकिन मोबाईलके डिस्प्लेपर कुछभी नंबर नही आया था.

किसका फोन होगा ?...

पुलिस तो नही होगी?...

उसने मोबाईलका एक बटन दबाकर मोबाईल कानको लगाया,

" हॅलो " टर्राए हूए स्वरमें वह बोला.

उधरसे कुछभी आवाज नही आ रहा था. सिर्फ 'घरघर' ऐसा किसी चिजका आवाज आ रहा था.

" हॅलो... कौन बोल रहा है ? " उसका आवाज अब सौम्य हूवा था.

" बॉस, मै बॉस बोल रहा हूं " उधरसे आवाज आया.

" बॉस? यस बॉस " कमांड2 खुदको नार्मल रखनेकी कोशीश करते हूए बोला.

" कमांड1का पता चला मुझे" बॉसने कहा.

" हां सर, बहूत बुरा हुवा " कमांड2 सिचूएशनको समझनेकी कोशीश करते हूए बोला.

" किसने मारा उसे " बॉसने पुछा.

" मारा ? मुझे तो लगा वह उपरसे निचे गिर गया होगा. " कमांड2ने मासूमियतसे कहा.

" लगा ? मतलब ? तूम नही थे उसके साथ? " बॉसने आश्चर्यसे पुछा.

" नही सर, मै नही था. आपने दिए वक्तसे एक दिन पहले और वह भी बुरे वक्तमें वह जा रहा था इसलिए मै नही गया उसके साथ. वह बोल रहा था की एक बार मुझे आजमाकर देखना है की बॉसका कहां कहातक बराबर आता है. " कमांड2 बोल रहा था.

" फिर देखा ? देखनेके लिए जिंदा भी रहना पडता है... मूरख! मुफ्तमे अपनी जान गवा बैठा. जहरका इम्तेहान लेने निकलाथा बेवकुफ. " बॉस गुस्सेसे बोल रहा था.

" फिर पुलिसको किसने बताया ? और इतने जल्दी पुलिस कैसे क्या आगई वहा? " बॉसने आगे पुछा.

" बॉस उसनेही बताया होगा. उसने पिछले बारभी पुलिसको बतानेकी जरा जल्दीही की थी. " कमांड2ने कहा.

थोडी देर उधरसे कुछभी आवाज नही आया. सिर्फ किसी चिजका घरघर आवाज आ रहा था.

" तूमने अपनी जगह बदली यह बहुत अच्छा किया. " बॉस ने कहा.

" हा सर, मुझे अंदाजा था की कमांड1की पहचान होनेके बाद पुलिस उसके घरपर रेड करेगी करके. "

" कमसे कम अब उससे सबक लो और आगे ऐसी बेवकुफी मत करो. अभी और अपना बहुत सारा काम बाकी है. " बॉस उसे हिदायत देते हूए बोला.

" हां सर " कमांड2ने अदबसे कहा.

उधरसे फोन कट हूवा.


क्रमश:...

Monday, January 28, 2008

Ch-26: ऋषी (शून्य-उपन्यास)



... हिमालयमें उस पर्बत के तले बह रहे नदी के किनारे जो गुंफा थी उस गुंफामें अभीभी वह ऋषी ध्यानस्त बैठा हूवा था. अचानक उसने अपनी आंखे खोली. उसकी आंखे लाल लाल मानो आग उगल रही थी. धीरे धीरे उसके आंखोकी लाली कम होगई और उसकी आंखे फिरसे बंद हो गई. और फिरसे जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर अपनी मर्यादाए लांघकर मुक्त रुप से होने लगा.

एक जंगलमें एक पर्णकुटी थी. पर्णकुटीके सामने आंगनमें तिन लोग बैठे हूए थे. वे आपसमें कुछ बाते और चर्चा कर रहे थे. उन्होने उनके सामने छोटी छोटी लकडीयोंके छोटे छोटे समुह बनाये थे. एक समुहसे लकडीयां निकालकर दुसरे समुहमें डालना या फिर एक समुहसे लकडीया निकालकर उसका दुसरा समुह बनाना ऐसा उनका चल रहा था. ऐसा करते हूवे वे आपसमें चर्चाभी कर रहे थे. उनके हावभावसे ऐसा प्रतित हो रहा था की वे उनकी किसी दूविधाके बारेमें बात कर रहे हो. उतनेमें उनके पिछेसे वह ऋषी आगया. उसकी आहट होतेही वे तिनो मुडकर उसकी तरफ देखने लगे.

ऋषीने तिनोंपर अपना दृष्टीक्षेप डाला.

" मुझे पता है तुम लोग किस दूविधामें हो " ऋषीने गूढ अंदाजमें कहा.

तिनोंके चेहरेपर आश्चर्य झलकने लगा.

हमारे मनमे क्या चल रहा है यह इस ऋषीको कैसे पता. ?...

वे कुछ बोले उससे पहलेही वह ऋषी चलते हूए उनके पाससे सामने निकल गया. वे उस ऋषीकी जाती हूई आकृतीको देखने लगे.

ऋषी एकदम रुक गया और उनकी तरफ मुडकर बोला , " चिंता मत करो मै तुम्हे तुम्हारी दुविधासे जल्दीही तुम्हे मुक्त करुंगा "

वह ऋषी फिरसे मुडकर अपना रास्ता चलने लगा. वे तिनो खुले मुंहसे आश्चर्यसे उस ऋषीकी जाती हूई आकृतीको वह आकृती अदृष्य होनेतक देखते रहे....

क्रमश:...

Wednesday, December 26, 2007

Ch-7 : दिल है कि ... (शून्य-उपन्यास)


(Next post ch-8 will be published on or before 30 Dec 07)
जॉन कारमें जा रहा था. हॉस्पिटलसे डॉक्टरने उसे फोन कर बताया था की अँजेनीको डिस्चार्ज दिया गया है. डॉक्टरके अनुसार मेडीकली वह पुरी तरहसे संवर गई थी. सिर्फ मेंटली और इमोशनली संवरनेमें उसे थोडा वक्त लग सकता था. सानीके पोस्टमार्टमके रिपोर्टभी आए थे. जॉनको उस सिलसिलेमें अँजेनीसे थोडी बातचीत करनी थी. बातचीत वह फोनपरभी कर सकता था. लेकिन दिलको कितनाभी समझाने की कोशीश करने पर भी दिल है की मानता नही था. उसे मिलनेकी उसकी इच्छा जितना रोकने की कोशीश करो उतनी तिव्र हो चली थी. उसने उसे मुंहसे कृत्रिम सांसे दी तब उसे उसका कुछ विषेश नही लगा था. लेकिन अब उसे उसके होठोंका वह मुलायम स्पर्श रह रहकर याद आ रहा था. उसने कर्र ऽऽ.. गाडीका. ब्रेक लगाया. गाडीको मोड लिया और निकल गया - अँजेनीके घरकी तरफ.


जॉनकी कार अँजेनीके अपार्टमेंटके निचे आकर रुकी. उसने गाडी पार्किंगकी तरफ मोड ली. पार्किंगमे कुछ समय वह वैसाही गाडीमें बैठा रहा. आखीर अपने मन से चल रहे कश्मकशसे उभरकर वह गाडीसे उतर गया. लंबे लंबे कदमसे वह लिफ्टकी तरफ गया. लिफ्ट खुलीही थी, उसमें वह घुस गया. लिफ्ट बंद होकर उपरकी तरफ दौडने लगी.

लिफ्ट रुक गई. लिफ्टमें डिस्प्लेपर 10 आंकडा आया था. लिफ्टका दरवाजा खुला और जॉन बाहर निकल गया. अँजेनीका फ्लॅटका दरवाजा अंदर से बंद था. वह दरवाजेके पास गया. फिर वहा थोडी देर अपने दरवाजा खटखटाऊ की नही यह सोचकर चहलकदमी करने लगा. वह डोअर दबानेही वाला था की अचानक सामनेका दरवाजा खुला. दरवाजेमें अँजेनी खडी थी. जॉन का चेहरा ऐसा हुवा मानो उसे चोरी करते हूए पकडा गया हो.

'' क्या हूवा? '' अँजेनी हसते हूए बोली.

इतना खिलखिलाकर हसते हूए जॉन उसे पहली बार देख रहा था.

"' किधर? कहा? ... कुछ नही... मुझे तुम्हारे यहा इस केसके सिलसिलेमें आना था... नही मतलब आया हूँ '' जॉन अपने चेहरेके भाव जितने हो सकते है उतने छिपाते हूए बोला.

'' आवो ना फिर... अंदर आवो... '' अँजेनी फिरसे हसते हूए बोली.

अँजेनीने उसे घरके अंदर लेकर दरवाजा बंद किया.


जॉन और अँजेनी ड्रॉईंगरूममें बैठे हूए थे.

" पोस्टमार्टमके रिपोर्टके अनुसार ... सानीको पिस्तौल की गोली सिनेमें बाई तरफ एकदम हार्टके बिचोबिच लगी... इसलिये वह गोल जो दिवारपर निकाला था वह उसने निकालनेका कोई सवालही पैदा नही होता'' जॉनने अपना तर्क प्रस्तूत किया.

'' मतलब वह आकार जरुर खुनीनेही निकाला होगा'' अँजेनीने कहा.

थोडा सोचकर वह आगे बोली , '' लेकिन गोल निकालकर उसे क्या जताना होगा? ""

'' वही तो... सबसे बडा सवाल अब हमारे सामने है"" जॉनने कहा.

'' अगर इस तरह से और कोई खुन इससे पहले हूवा है क्या यह अगर देखा तो?'' अँजेनीने अपना विचार व्यक्त किया.

'' वह हम सब पहलेही देख चूके है... पिछले रेकॉर्डमें इस तरह का एकभी खुन मौजूद नही है"" जॉनने कहा.

इतनेमे जॉनका मोबाईल बजा. उसने बटन दबाकर वह कानको लगाया, "यस ...सॅम"

जॉनने उधरसे सॅमको सुना और वह एकदम उठकर खडा होगया, " क्या?"

अँजेनी क्या हूवा यह समझनेकी कोशीश करती हूई आश्चर्यसे उसके तरफ देखने लगी.

'' मुझे जाना पडेगा '' जॉनने कहा और दरवाजेकी तरफ जानेको निकला.

जॉनने मोबाईल बंद कर अपने जेबमें रखा.

जाते जाते अँजेनीको उसने सिर्फ इतनाही कहा , "मै तुझे बादमे मिलता हूँ ... मुझे अब जल्दसे जल्द वहाँ पहूँचना पडेगा.

अँजेनी कुछ बोले इसके पहले जॉन जा चूका था.

(to be contd...)