कमांड2की यानीकी विनयकी बॉसको ढुंढनेके लिए इस एरियामें यह हमेशाकी चक्कर थी. वह लगभग रोजही इस एरियामें आकर बॉसको ढुंढनेके लिए घुमता रहता था. उसे खुदको बॉस ना पहचाने इसकी वही पुरी एतीयात बरतता था. न जाने कितनी बार, कमसे कम सौके उपर, वह इस एरीयामें बॉसको ढुंढनेके लिए आया होगा. लेकिन उसने कोशीश जारी रखी थी. निरंतर प्रयास करते रहना यह एक उसका गुण ही था. आज दिनभर घुम घुमकर वह थका हूवा था. शाम हो चुकी थी. शहरका मौहोल अब काफी ठंडा पडा हूवा था. हालहीमें उसे बॉसका इंटरनेटपर एक मेसेज आया था. अब यह खुनी श्रुंखला दुसरे एक शहरमेंभी शुरु करनी थी. बॉस नही चाहता था की मौहोल ठंडा पडे. वैसे दुसरे शहरमें खुनी श्रुंखला शुरु करनेके लिए और वक्त था. लेकिन विनयको दुसरे खुनी श्रुंखलामें बिलकुल रुची नही थी. उसके पहलेही उसे उसने शुरु किए खेल का अंत करना था. लेकिन अभीतक एकभी धागा हातमें नही आ रहा था. वह सोचते सोचते एक बडी बिल्डींगका काम चल रहा था वहा खाली जगहमें जाकर खडा हो गया. उसे थकनेकी वजहसे कही बैठनेकी जरुरत महसुस हूई. बैठनेके लिए कुछ है क्या यह देखनेके लिए उसने आजु बाजु देखा. एक जगह रेत का एक बडासा ढेर पडा हूवा था. कोई हमें देखेगा या कोई हमें पहचानेगा इसकी पर्वा ना करते हूए वह उस ढेरपर बैठ गया.
जहा विनय बैठा हूवा था वहांसे लगभग 200 मीटरपर एक काली कार रस्तेके किनारे रुकी हूई थी. गाडीका काला शिशा चढाया हूवा था. इसलिए अंदरका कुछ दिखाई नही दे रहा था. लेकिन अंदरसे जॉन और सॅम दुर्बिणसे विनयकी सारी हरकते निहार रहे थे.
'आज लगभग 5 दिन होगए है हम इसके पिछे है. लेकिन साला इस एरियामें क्या ढूंढ रहा है कुछ पता नही चल रहा है. " सॅमने जॉनसे कहा.
" मुझे लगता है ईसीमें सारे कत्ल का रहस्य छिपा होगा. " जॉनने कहा.
" लेकिन हम कितने दिन ऐसे इसके पिछे पिछे घुमेंगे ? " सॅमने पुछा.
" जबतक उसे जो चाहिए वह मिलता नही तब तक " जॉनने कहा.
" वह अपना अगला शिकार तो नही ढूंढ रहा है? "
" वही तो हमें ढूंढना है... लेकिन मुझे ऐसा नही लगता " जॉनने अपनी राय बताई.
बैठे बैठे विनयका सामने एक बंगलेकी तरफ ध्यान गया. सामने दरवाजे के खंबेपर पत्थरमें मालिकका नाम खुदा हूवा था. और वहा पत्थरके चारों तरफसे रोशनी आनेके लिए बल्बका इंतजाम किया था. विनयने ऐसेही वह नाम पढा.
'डॉ. कयूम खान'
विनयने वह नाम फिरसे पढा.
'डॉ. कयूम खान'
नाम पहचानका लग रहा था. यह नाम कहीतो पढा या सुना लग रहा है. विनय अपने दिमागपर जोर देकर याद करनेकी कोशीश करने लगा. वैसे उसको सब मुस्लीम नाम सरीके लगते थे. शायद इसलिए वह उसे पहचानका लग रहा हो. वह सोचने लगा. अचानक वह जहा बैठा था उसके पिछे 'घरऽऽ घरऽऽ' ऐसा जोरसे आवाज आने लगा. विनय अप्रत्यक्षित तरहसे आये आवाजसे एकदमसे चौककर लगभग खडाही होगया. उसने पिछे पलटकर देखा. पिछे बिल्डींगका कंस्ट्रक्शन चल रहा था और रेडीमीक्स काँक्रीट मशीन अभी अभी शुरु हूई थी. वह खुदको संभालते हूए बाजू हटने लगा. अचानक उसके दिमागमे मानो रोशनीसी कौंध गई.
" माय गॉड" उसके मुंहसे निकल गया.
उसने एकबार फिरसे सामने खंबेपर लिखा नाम पढा. और फिर उस रेडीमीक्स काँक्रीट मशीनकी तरफ देखा. उसके दिमागमें अब सब पहेलिया सुलझ रही थी. .
'डॉ. कयूम खान' यह तो मैने पढे आर्यभट्टके उपर लिखे रिसर्च पेपरका कोऑथर है...
और यह रेडीमीक्स काँक्रीट मशीनकी घरघर उसे एकबार बॉसके फोनपर सुनाई दी थी. ....
"मतलब डॉ. कयूम खानही अपना बॉस है !"
उसके शरीरमे अब फुर्ती दौडने लगी. वह डॉ. कयूम खानके घरकी तरफ जानेके लिए लपका. फिर ब्रेक लगे जैसा एकदम रुका.
नही अब नही...
मुझे सही समय देखकर सब बराबर प्लॅनींग करते हूए अंदर प्रवेश करना पडेगा...
उसने कैसेतो खुदको रोका.
क्रमश:...
|
उपन्यास - अद्-भूत The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA. |
Tuesday, April 1, 2008
Ch-64 : डॉ. कयूम खान (शून्य-उपन्यास) Hindi
Posted by
Sunil Doiphode
at
10:13 AM
0
comments
Labels: hindi electronic novels, hindi novel catalog, hindi novels, hindi on net, hindi sahitya, hindi upanyas, hindustani novels, indian novels, list of hindi novels, upanyas on net
Wednesday, March 26, 2008
Ch-61 : कंपाऊंड के अंदर (शून्य-उपन्यास) Hindi
दुसरे हाथसे खुनसे सना हाथ पकडते हूए जॉन उठकर खडा हो गया. खुन जादाही बह रहा था इसलिए उसने जेबसे रुमाल निकालकर उस हाथको कसकर बांध दिया. जखमी हाथको संभालते हूए वह बंगलेके दरवाजेके पास गया. वहाभी एक बडा ताला लगा हूवा था और उस तालेकोभी पुलिसका सील लगा हूवा था. उसने वही खडे होकर बंगलेके चारो ओर एक नजर दौडाई. बंगलेके अंदर जाना, कमसे कम यहांसे तो भी मुमकीन नही लग रहा था. पहले जब बंगलेकी तलाशी हूई थी तब वह बाकी लोगोंके साथही अंदर था. और उसे विश्वास था की उन्होने अंदरकी तलाशी ठिक तरहसे की थी. लेकिन उसे याद आया की बाहरके तलाशीको उतना महत्व ना देकर उसने वह जिम्मेदारी किसी एक नये पुलिसको सौंपी थी. उसने फैसला किया की पहले बंगलेके बाहरी हिस्सेकी जांच करना बेहतर होगा. वैसे कुछ मिलनेकी कोई संभावना नहीके बराबर थी. क्योंकी बिचमें बहुत दिन बित चूके थे और इसलिए बंगलेके अंदरके सबुतसे बाहरके सबुत नष्ट होनेकी जादा संभावना थी.
तोभी चान्स लेनेमें क्या हर्ज है...
शायद बंगलेके बाजुसे या पिछेसे अंदर जानेका कोई रास्ताभी मिल सकता है...
उसने जेबसे टॉर्च निकाला और टार्चका प्लॅश इधर उधर मारते हूए वह बंगलेके दाई तरफसे पिछेकी ओर जाने लगा. बिच बिचमें वह बंगलेपरभी फ्लॅश मारकर अंदर जानेके लिए कोई खिडकी है क्या वह देखने लगा. खिडकीयां थी लेकिन मजबुत जाली लगाई हूई.
तोभी किसी खिडकीकी जाली टूटी हूई हो सकती है, जैसे कंपाऊंडका तार एक जगह टूटा हूवा था...
बंगलेके चारो ओर काफी खुली जगह थी. और उस जगहमें गार्डनभी बनाया हूवा था. लेकिन उसे कभी काटा छाटा नही जा चूका था ऐसा लग रहा था. गार्डनमें घांस और झाडी अच्छी खासी कमरतक बढी हूई थी. जॉन अंधेरेमे टॉर्चके सहारे संभालकर उस घाससे और झाडीसे रास्ता बनाते हूए आगे बढ रह था. उस उंची बढी हूई झाडीके वजहसे कुछ सबुतभी होगा तो वह मिलना मुश्कीलही लग रहा था. लेकिन एक फायदाभी था की अगर कुछ सबुत हो तो वह नष्ट होनेका कालावधी उस झाडीके वजहसे बढनेकी संभावना थी. इधर उधर टार्चकी रोशनी डालते हूए वह बंगलेके पिछवाडे आकर पहूंच गया. पिछेतो दरवाजेकोभी जाली लगी हूई थी. इसलिए वहांसे अंदर जानेकी संभावनाभी खत्म हो गई थी. फिर उसने टार्चके रोशनेमे पिछवाडेका चप्पा चप्पा छान मारा. कुछ खास नही मिल रहा था. धीरे धीरे टॉर्चके रोशनीमें घासके और झाडीके तनेके पास ढूंढते हूए उसने बंगलेको एक पुरा चक्कर लगाया. खुले मैदानमेंभी कुछ नही मिल रहा था और एकभी खिडकीकी जाली टूटी हूई नही थी.
चलो मतलब कमसे कम अबतो अंदर जाना मुमकीन नही लग रहा है...
अंदर जानेके लिए मुझे फिरसे कभी सॅमकी मदद लेनी पडेगी...
और बाहरभी एक बार फिरसे दिनके उजेलेमेंही ढूंढना उचीत होगा...
ऐसा सोचकर वह कंपाऊंडके बाहर जानेके लिए मुडा. इतनेमें एक विचार उसके जहनमें कौध गया. वह एकदमसे रुक गया. मुडकर जल्दी जल्दी बंगलेके बाई तरफसे पिछेकी ओर जाने लगा.
क्रमश:...
Posted by
Sunil Doiphode
at
9:54 AM
0
comments
Labels: hindi booklet, hindi books on net, hindi comedy katha, hindi katha, hindi katha kathan, hindi novel, hindi novels, hindi on net, hindi online novels, upanyas
Monday, March 24, 2008
Ch-59B : आर्यभट्ट (शून्य-उपन्यास) Hindi
...भारतीय गणित और खगोलविज्ञान की शुरुवात किसने की यह कहना जरा मुश्कील है फिरभी भारतीय वेदोमें गणित और खगोलविज्ञान की सब जानकारी उपलब्ध है. बहुत ऋषींयोंने पंचांगके नियम, नक्षत्र विभाजन, वैदिक कार्यके लिए आवश्यक तिथी और महुरत निर्धारित करना, ग्रहण, अमावस्या इत्यादि जानकारी देनेके लिए अलग अलग पध्दती विकसित की. वक्त के साथ पैतामह सिध्दांत, वासिष्ठ सिध्दांत, रोमक सिध्दांत, पौलिक सिध्दांत इत्यादि विकसित हुए. लेकिन वे धीरे धीरे पुराने हूए और उनसे एकदम सही परिणाम नही आते थे. इसलिए उस वक्त लोगोंका उसपरसे भरोसा उड रहा था. लेकिन फिर आर्यभट नामके एक विद्वानने गणित और खगोलशास्त्रसे सबंधीत ज्ञानमेंकी त्रुटी दूर कर उस ज्ञानको नये सिरेसे प्रस्तुत किया.
भारतके इतिहासमें जिसे 'गुप्तकाल' या 'सुवर्णयुग'के नामसे जानते है, उस वक्त भारतने साहित्य, कला और विज्ञान इन क्षेत्रोंमे अभूतपूर्व प्रगती की. विज्ञानके क्षेत्रमें गणित, रसायनशास्त्र और जोतिष्यशास्त्र इन विषयोंमे विशेष प्रगती की. उस वक्त आर्यभट नामके एक प्रसिध्द गणितज्ञ और जोतिष्यकार थे. वे अभीके बिहारराज्यकी राजधानी पटना (उस वक्तका पाटलीपुत्र) के पास कुसुमपुर इस गावके निवासी थे. उनका जन्म 13 एप्रिल सन् 476 को और मृत्यू सन् 520 को हूवा था. उस वक्त बौध्द धर्म और जैन धर्म बहुत प्रचलित था. लेकिन वे सनातन धर्मके अनुयायी थे. उन्होने गणित और जोतिष्य इन विषयोंमे बहुत महत्वपूर्ण और वक्तके हिसाबसे विस्मयकारी संशोधन किया था. उन्होने अपना संशोधन ग्रंथरूपमें शब्दबध्द कर अगली पिढीयोंको वह उपलब्ध हो इसकी व्यवस्था कर रखी थी. उस वक्त मगध स्थित नालंदा विश्वविद्याल ज्ञानदानका प्रमुख और प्रसिध्द केंद्र था. वहा देश विदेशसे विद्यार्थी ज्ञानार्जन करनेकेलिए आते थे. वहा खगोलशास्त्रके अध्ययनके लिए एक विशेष विभाग था. एक प्राचीन श्लोकके अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालयके कभी कुलपतीभी थे.
आर्यभटने लिखे तीन ग्रंथोंकी जानकारी सद्य:स्थितीमें उपलब्ध है. दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र. लेकिन जाणकारोंके हिसाबसे उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था. 'आर्यभट्ट सिध्दांत' लेकिन उसके सिर्फ 34 श्लोकही अब उपलब्ध है. उनके इस ग्रंथका सातवे शतकमें जादा उपयोग होता था. लेकिन यह ग्रंथ बाकी ग्रंथोंकी तरह उपयोगमें होते हूए भी उसका ऐसा लोप क्यो हूवा होगा ? यह एक अनाकलनीय पहेली है.
आर्यभट पहले आचार्य थे की जिन्होने ज्योतिषशास्त्रमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया. 'आर्यभट्टीय' ग्रंथमें उन्होने ज्योतिष्यशास्त्रके मूलभूत सिध्दांतके बारेमें लिखा. इस ग्रंथमें 121 श्लोक है जो उन्होने चार खंडोमें विभाजीत कीये है.
गीतपादीका नामके पहले खंडमें ग्रहका परिभ्रमण काल, राशी , अवकाशमें ग्रहोंकी कक्षा इस विषयपर जानकारी दी है.
गीतपाद नामके दुसरे खंडमें उन्होने गणितके
वर्गमूल, घनमूल, त्रिकोणका क्षेत्रफल, ज्या (sine) इत्यादींका
विश्लेषन किया है.
उन्होने वृतका व्यास और परिधी इनमेंका संबंध जिसे हम
पाई(Pi) कहते है, उन्होने वह 3.1416 इतना, मतलब लगभग सही आंका था.
इस ग्रंथमें उन्होने बीजगणितके
(अ+ब)2 = (अ2+2अब+ब2)
का भी विस्तृत विष्लेशण किया है.
इस ग्रंथके 'कालक्रिया' इस तिसरे खंडमें
कालके अलग अलग भाग, ग्रहोंका परिभ्रमण , संवत्सर, अधिक मास, क्षय तिथी, वार ,सप्ताह
इनकी गणना इस बारेंमे विवेचन दिया है.
इसी ग्रंथमें एक जगह उन्होने संक्षिप्त स्वरूपमें संख्या लिखनेकी पध्दतीके बारेंमे लिखा है.
तिसरा खंड 'गोलपाद' नामसे प्रचलित है और उसमें खगोल विज्ञानके बारेमे जानकारी है.
सूर्य, चंद्र, राहू ,केतू और बाकी ग्रहोंकी स्थीती , दिन और रातका कारण, राशींका उदय, ग्रहणका कारण इत्यादि विश्लेशन इस खंडमें मिलता है.
आजके वक्तके बडे बडे वैज्ञानिक अबभी आश्चर्य चकीत रह जाते है की उस वक्त आर्यभटने पाई (Pi), वृत्तका क्षेत्रफळ , ज्या (sine) इत्यादिं बातोंका विश्लेषन कैसे किया होगा.
आर्यभट एक युगप्रवर्तक थे. उन्होने अपने वक्तके प्रचलित अंधश्रध्दांओंको झुटा ठहराया. उन्होने सारी दुनियाको बताया की पृथ्वी चंद्र और अन्य ग्रहोंको खुदका प्रकाश नही होता और वे सुरजकी वजहसे प्रकाशित होते है. पृथ्वीके जिस भागपर सूर्यप्रकाश पडता है वहां दिन और जहा सूर्यप्रकाश नही पडता वहा रात ऐसाभी उन्होने बताया था. पृथ्वीपर अलग अलग शहरोंमे सुर्योदय और सुर्यास्त का वक्त इसमें फर्क क्यो होता है इसके कारणोंका विश्लेषनभी उन्होने विस्तृततरहसे किया है. उन्होने यहभी जाहिर किया की पृथ्वी गोल है और वह खुदके आसके सभोवताल घुमती है. उन्होने इस मान्यताको तोडा की पृथ्वी ही ब्रह्मांडका केंद्र है और सुरज और बाकी ग्रह उसके सभोवताल घुमते है. उन्होने पृथ्वीका आकार, गती, और परिधीका अंदाज भी लगाया था. और सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहणके बारेमेंभी संशोधन किया था.
उन्होने त्रेतालीस लाख बीस हजार वर्षका एक महायुग बताया और एक महायुगको चार हिस्सोमे
सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापारयुग और कलियुग इस तरह विभागीत किया. इन चारो युगोंका काल उन्होने दस लाख अस्सी हजार साल इतना आंका है.
भविष्यमें चंद्र और सूर्य ग्रहण कब कब होगे यह निकालनेके लिए उन्होने एक सूत्रका विकास किया और उस सुत्रके हिसाबसे उनकी भविष्यवाणी कभीभी गलत नही निकली.
ज्योतिष्यके अलावा गणितशास्त्रमेंभी आर्यभटने नये नये सिंध्दांतोका अविश्कार किया. भारतमें सबसे पहले उन्होने बिजगणितके ज्ञानका विस्तारसे प्रचार किया. शून्य सिध्दांत और दशमलव संख्याप्रणालीका आविश्कार भारतमें सबसे पहले किसने किया यह बताना जरा मुश्कील है फिरभी आर्यभटने उसका प्रयोग अपने ग्रंथमें कुशलतासे किया हूवा मिलता है. उनकी कामयाबी भारतमेंही नही तो बाहर विदेशमेंभी फैली थी. अरब विद्वानोंको उनके जोतिष्य ज्ञानका बहुत अभिमान था और वे उन्हे 'अरजभट' नामसे पहचानते थे.
तो इस तरह आर्यभट जिन्होने बीजगणितका विकास किया था और ज्योतिष गणितमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया, उनको भारतीय गणितमें और जोतिष्यशास्त्रमें अगर मिल का पत्थर कहा जाए तो गलत नही होगा. उस वक्त लगभग सब ग्रंथ श्लोकके रुपमें रहते थे और उनको खासकर मुखद्गद कर एक पिढीसे दुसरी पिढीके पास सौंपा जाता था. उनका 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ सातवे शतकमें व्यापक रुपसे उपयोगमें लाया जाकरभी वह आगे लोप हूवा यह बात उस ग्रंथमें लिखे ज्ञानके बारेमें एक गूढ जिज्ञासा जागृत करती है. उनका अचूक निकष रहे गणित इस विषयसे और उन्होने जो ज्ञान उनके ग्रंथमें दिया वह एकदम सही रहता था इसकी तरफ गौर करते हूए उनका जो ग्रंथ लोप हुवा जिसमें जोतिष्य ज्ञानके बारेमें ऐसा कुछ लिखा होगा की जो गुप्त रखनेका किसीकोभी मोह हुवा होगा. ऐसाभी हो सकता है की वह ज्ञान गलत हातोंमे पडनेसे विघातक हो सकता था...
वैसे तो कमांड2ने यह रिसर्च पेपर पहलेभी पढा था. फिरभी कमांड2का दिल उत्साहीत हूवा था. बॉसकी शुन्यके बारेंमे, वेदकालीन गणित और जोतिष्याशास्त्रके बारेमें रुची देखते हूए और उनका एकदम सही वक्त बतानेका कौशल्य देखते हूए उसको अब विश्वास हो चला था की बॉसको 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ मिला होगा. कमांड2का अब लगभग आधा काम हुवा था, लेकिन आधा, जो की सबसे महत्वपूर्ण था, वह बचा था. उसको सबसे पहले बॉसचा पत्ता लगना बहुत जरुरी लग रहा था. पहले एक बार जब बॉसका फोन आया था तब उसका नंबर उसके फोनपर नही आया था. बॉसने यह करामात कैसी की थी इसका उसे कुछ पता नही लग अहा था. लेकीन फिरभी उसने बॉसको ढुंढनेका मानो बिडाही उठाया था. उसने टेलीफोन कंपनीमें जाकर बॉसको ट्रेस करनेका प्रयत्न किया था. टेलिफोन कंपनीवाले उसे कुछ खास मदत नही कर पाए थे. लेकिन टेलिफोन कंपनीको एक नयाही अविष्कार हुवा था. उनकी फ्रिक्वेन्सी कोई चोरी कर रहा था इसका. इसके अलावा एक मोटे तौरपर फोन किस इलाकेसे आया था इतनाही वे बता पाए थे. जो इलाका उन्होने बताया था वह काफी बडा था. और ना बॉसका नाम ना चेहरा मालूम होनेसे कमांड2को उसे ढुंढना बडा मुश्कील हो गया था. फिरभी लगभग रोज कमांड2 उस इलाकेमे किसी पागल की तरह घुमता था. और जब घुम घुमकर थक जाता था तबही घरकी ओर रुख करता था. लेकिन बॉसका पत्ता मिलनेके कोई आसार नही नजर आ रहे थे. शायद इतनी बार वह किसी पागल की तरह उस इलाकेमें घुमा, ना जाने कभी बॉस उसके सामनेसेभी गया होगा. लेकिन वह उसे कैसे पहचाननेवाला था. ?
क्रमश:..
Posted by
Sunil Doiphode
at
10:06 AM
0
comments
Labels: hindi books on internet, hindi ebooks, hindi enovels, hindi novel, hindi novels, hindi on internet, hindi on net, hindi online, hindi online novels, hindi sahitya, upanyas
Monday, March 10, 2008
Ch-52: ब्रम्ह है परिपूर्ण (शून्य-उपन्यास)
हिमालय के पर्बतोंकी गोदमें बहते नदी के तटपर जो गुंफा थी उसमें ध्यानमग्न अवस्थामें बैठा ऋषी, अचानक चौंककर अपने समाधी अवस्थासे बाहर आ गया. उसकी आंखे लाल थी और चेहरेपर कुछ रहस्य सुलझनेका गुढ आनंद झलक रहा था. उसके चेहरेपर एक रहस्यमय मुस्कुराहट फैल गई. धीरे धीरे अपने आप उसकी आंखे फिरसे बंद हो गई. और फिर वक्त, जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर सब मर्यादाएं लांघकर बंधनमुक्त होकर होने लगा.
जंगलमें पर्णकुटीके पास तिन लोग आपसमे कुछ चर्चा कर रहे थे. इतनेमें वहा वह ऋषी आगया. उसकी आहट होतेही सबलोग पलटकर उसकी तरफ देखने लगे.
यह तो वही ऋषी है...
जो उनको पहले एक बार मिला था...
उनको उसके लब्ज याद आ गए-
" चिंता मत करो.. मै तुम्हे तुमारे दुविधासे बाहर निकालूंगा "
वे बडी आस से उसकी तरफ देखने लगे.
ऋषीके चेहरेपर एक गूढ मुस्कुराहट दिखने लगी.
" आप लोगोंकी पहेली सुलझीही समझो " ऋषी गूढभाव से बोला.
" क्या? ... हमारी पहेली सुलझी?" तिनोंके मुंहसे खुशीसे निकला.
ऋषीने एक संस्कृत श्लोकका जोरसे उच्चारण किया -
ॐ पूर्णं अद: पूर्णं इदं, पूर्णात् पूर्णं उदच्यते ।
पूर्णस्य पूर्णं आदाय, पूर्णं एवाव शिष्यते ॥
"अर्थात जब पूर्णका पूर्णसे संयोग होता है या पूर्णसे पूर्ण निकाला जाता है तब बाकी पूर्णही रहता है. ब्रह्म यह परिपूर्ण है... इसलिए ब्रह्ममें बह्म मिलाया जाए तो या ब्रह्मसे ब्रह्मको निकाला जाए तो आखीर बाकी ब्रह्मही रहता है.
यहां पूर्ण और ब्रह्म यानीकी अगणित हो सकता है... जैसा दिन हो तो रात आतीही है, प्रकाश के विरुध्द अंधेरा होता है... वैसे जहा पूर्ण यानी अगणित हो वहां उसका विरुद्ध रिक्तता यानी शून्य आनाही चाहिए."
सामने नदीकी तरफ इशारा करके फिर ऋषीने आगे कहा, " उस पाणीमे बुलबुले देखो कैसे बनते है और कैसे नष्ट होते है "
" ऐसी एक चिज है की वह कभी कुछभी नही और कभी कभी सबकुछ है... वह जहांसे शुरु होती है खतमभी वही होती है... वह ऐसी चिज है की जिससे यह ब्रह्मांड, आप और मै तैयार हुए है... वह ऐसी चिज है की जिसमे सबको एक दिन समा जाना है "
बोलते बोलते ऋषी उन तिनोंके इर्द गिर्द गोल गोल चल रहा था.
"ऋषीवर, हम लोग गणितपर संशोधन कर रहे है हमें हमारे पहेली का गणिती हल चाहिए ; ना की आध्यात्मिक ' उनमेंसे एकने कहा.
" हां, आप लोगोंका संशोधन आपलोगोंको जिस वजहसे अपूर्ण लग रहा है वह आपके पहेलीका हल जितना गणिती है उतनाही आध्यात्मिक है. "
फिर ऋषीने सबको उठकर एक तरफ आने के लिए कहा और गोल गोल चलकर पैरके निशानोंसे जो गोल बना था उसकी तरफ निर्देश कर कहा,
'' तुम्हे तुम्हारा संशोधन पुरा करनेके लिए जिस बात की जरुरत थी वह है शुन्य"
तिनोंके चेहरेपर खुशी झलक रही थी.
ऋषीने कहा " शून्य जहा शुरु होता है खतम भी वही होता है"
एकने बडासा गोल निकाला.
ऋषीने कहा " कभी शून्य कुछभी नही"
एकने 0 को 6 मे जोडकर 6 ही आता है ऐसे लिखा.
ऋषीने आगे कहा " कभी शून्य सबकुछ है यानी सर्वसमावेशक है"
दुसरेने 0 बार 6 करनेसे 0 आता है ऐसा लिखा.
उन तिनोंके संशोधन कार्यको अब गती मिली थी. वे तिनो अपने कार्यमें व्यस्त हो गए. जब वे व्यस्तसा से जागे तब उन्होने आजूबाजू देखा. तो ऋषी वहा नही था.
उनके चेहरेपर आश्चर्य झलक रहा था. .
कहा गया वह ऋषी?...
शायद वह शून्यमें विलीन हूवा था....
क्रमश:...
Posted by
Sunil Doiphode
at
10:03 AM
0
comments
Labels: free hindi books, free hindi ebooks, free hindi novels, hindi books, hindi literatures, hindi novela, hindi on internet, hindi on net, hindibook, hindinovel, read hindi novels on internet




