उपन्यास - अद्-भूत
The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA.
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Monday, April 28, 2008

Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-10 : आय ऍम सॉरी

रातको होस्टेलके गलियारेमें घना अंधेरा था. गलियारेके लाईट्स या तो किसीने चोरी किये होंगे या लडकोने तोड दिए होंगे. एक काला साया धीरे धीरे उस गलियारेमे चल रहा था. और वहासे थोडीही दुरीपर जॉन, ऍन्थोनी और उसके दो दोस्त एक खंबेके पिछे छुपकर बैठे थे. उन्होने पक्का फैसला किया था की आज किसीभी हालमें इस चोरको पकडकर होस्टेलकी लगभग रोज होनेवाली चोरीयां रोकनी है. काफी समयसे वे वहां छिपकर चोरकी राह देख रहे थे. आखिर वह साया उन्हे दिखतेही उनके चेहरेपर खुशी की लहर दौड गई.

चलो इतने देरसे रुके... आखिर मेहनत रंग लाई...

खुशीके मारे उनमें खुसुर फुसुर होने लगी.

'' ए चूप रहो... यही अच्छा मौका है ... सालेको रंगे हाथ पकडनेका '' जॉनने सबको चूप रहनेकी हिदायत दी.

वे वहांसे छिपते हूए सामने जाकर एक दुसरे खंबेके पिछे छूप गए.

उन्होने चोरको पकडनेकी पुरी प्लॅनींग और तैयारी कर रखी थी. चारोंने आपसमें काम बांट लिया था. उन चारोंमें एक लडका अपने कंधेपर एक काला ब्लॅंकेट संभाल रहा था.

'' देखो... वह रुक गया ... सालेकी घोंगड रपेटही करेंगे'' जॉन धीरेसे बोला.

वह साया गलियारेमे चलते हूए एक रुमके सामने रुक गया.

'' अरे किसकी रुम है वह ?'' किसीने पुछा.

'' मेरीकी ..'' ऍन्थोनीने धीमे स्वरमे जवाब दिया.

वह काला साया मेरीके दरवाजेके सामने रुका और मेरीके दरवाजेके कीहोलमें अपने पासकी चाबी डालकर घुमाने लगा.

'' देखो उसके पास चाबीभी है '' कोई फुसफुसाया.

'' मास्टर की होगी '' किसीने कहा.

'' या डूप्लीकेट बनाकर ली होगी सालेने ''

'' अब तो वह बिलकुल मुकर नही पाएगा ... हम उसे अब रेड हॅंन्डेड पकड सकते है. '' जॉनने कहा.

जॉन और ऍन्थोनीने पिछे मुडकर उनके दो साथीयोंको इशारा किया.

'' चलो ... यह एकदम सही वक्त है '' ऍन्थोनीने कहा.

वह साया अब ताला खोलनेकी कोशीश करने लगा.

सब लोगोंने एकदम उस काले सायेपर हल्ला बोल दिया. ऍन्थोनीने उस सायेके शरीरपर उसके दोस्तके कंधेपर जो था वह ब्लॅंकेट डालकर लपेट दिया और जॉनने उस सायेको ब्लॅकेटके साथ कसकर पकड लिया.

'' पहले साले को मारो... '' कोई चिल्लाया.

सबलोग मिलकर अब उस चोरकी धुलाई करने लगे.

'' कैसा हाथ आया रे साले ... ''

'' ए साले ... दिखा अब कहां छुपाकर रखा है तुने होस्टेलका सारा चोरी किया हूवा माल''

ब्लॅंकेटके अंदरसे 'आं ऊं' ऐसा दबा हूवा स्वर आने लगा.

अचानक सामनेका दरवाजा खुला और मेरी गडबडाई हूई दरवाजेसे बाहर आगई. शायद उसे उसके रुमके सामने चल रहे धांदलीकी आहट हुई होगी. कमरेमें जल रहे लाईटकी रोशनी अब उस ब्लॅंकेटमें लिपटे चोरके शरीर पर पड गई.

'' क्या चल रहा है यहां '' मेरी घाबराये हूए हालमें हिम्मत बटोरती हूई बोली.

'' हमने चोरको पकडा है '' ऍन्थोनीने कहा.

'' ये तुम्हारा कमरा डूप्लीकेट चाबीसे खोल रहा था. '' जॉनने कहा.

उस चोरको ब्लॅंकेटके साथ पकडे हूए हालमें जॉनको उस चोरके शरीरपर कुछ अजीबसा लगा. धांदलीमें उसने क्या है यह टटोलनेके लिए ब्लॅंकेटके अंदरसे अपने हाथ डाले. जॉनने हाथ अंदर डालनेसे उसकी उस सायेपरकी पकड ढीली हो गई और वह साया ब्लॅंकेटसे बाहर आगया.

'' ओ माय गॉड नॅन्सी! '' मेरी चिल्लाई.

नॅन्सी कोलीन उनकेही क्लासमेंकी एक सुंदर स्टूडंट थी. वह ब्लॅकेटसे बाहर आई और अभीभी असंमजसके स्थितीमें जॉन उसके दोनो उरोज अपने हाथमें कसकर पकडा हूवा था. उसने खुदको छुडा लिया और एक जोर का तमाचा जॉनके कानके निचे जड दिया.

जॉनको क्या बोले कुछ समझमें नही रहा था वह बोला, '' आय ऍम सॉरी .. आय ऍम रियली सॉरी ''

'' वुई आर सॉरी ...'' ऍन्थोनीनेभी कहा.

'' लेकिन इतने रात गए तुम यहां क्या कर रही हो?'' मेरी नॅन्सीके पास जाते हूए बोली.

'' इडीयट ... आय वॉज ट्राईंग टू सरप्राईज यू... तूम्हे जनमदिनकी शुभकामनाएं देने आई थी मै..'' नॅन्सी उसपर चिढते हूए बोली.

'' ओह ... थॅंक यू ... आय मीन सॉरी ... आय मीन आर यू ओके?'' मेरीको क्या बोले कुछ समझ नही आ रहा था.

मेरी नॅन्सीको रुममें ले गई. और जॉन फिरसे माफी मांगनेके लिए रुममे जानेलगा तो दरवाजा उसके मुंहपर धडामसे बंद होगया.


क्रमश:...

Monday, March 24, 2008

Ch-59B : आर्यभट्ट (शून्य-उपन्यास) Hindi

...भारतीय गणित और खगोलविज्ञान की शुरुवात किसने की यह कहना जरा मुश्कील है फिरभी भारतीय वेदोमें गणित और खगोलविज्ञान की सब जानकारी उपलब्ध है. बहुत ऋषींयोंने पंचांगके नियम, नक्षत्र विभाजन, वैदिक कार्यके लिए आवश्यक तिथी और महुरत निर्धारित करना, ग्रहण, अमावस्या इत्यादि जानकारी देनेके लिए अलग अलग पध्दती विकसित की. वक्त के साथ पैतामह सिध्दांत, वासिष्ठ सिध्दांत, रोमक सिध्दांत, पौलिक सिध्दांत इत्यादि विकसित हुए. लेकिन वे धीरे धीरे पुराने हूए और उनसे एकदम सही परिणाम नही आते थे. इसलिए उस वक्त लोगोंका उसपरसे भरोसा उड रहा था. लेकिन फिर आर्यभट नामके एक विद्वानने गणित और खगोलशास्त्रसे सबंधीत ज्ञानमेंकी त्रुटी दूर कर उस ज्ञानको नये सिरेसे प्रस्तुत किया.

भारतके इतिहासमें जिसे 'गुप्तकाल' या 'सुवर्णयुग'के नामसे जानते है, उस वक्त भारतने साहित्य, कला और विज्ञान इन क्षेत्रोंमे अभूतपूर्व प्रगती की. विज्ञानके क्षेत्रमें गणित, रसायनशास्त्र और जोतिष्यशास्त्र इन विषयोंमे विशेष प्रगती की. उस वक्त आर्यभट नामके एक प्रसिध्द गणितज्ञ और जोतिष्यकार थे. वे अभीके बिहारराज्यकी राजधानी पटना (उस वक्तका पाटलीपुत्र) के पास कुसुमपुर इस गावके निवासी थे. उनका जन्म 13 एप्रिल सन् 476 को और मृत्यू सन् 520 को हूवा था. उस वक्त बौध्द धर्म और जैन धर्म बहुत प्रचलित था. लेकिन वे सनातन धर्मके अनुयायी थे. उन्होने गणित और जोतिष्य इन विषयोंमे बहुत महत्वपूर्ण और वक्तके हिसाबसे विस्मयकारी संशोधन किया था. उन्होने अपना संशोधन ग्रंथरूपमें शब्दबध्द कर अगली पिढीयोंको वह उपलब्ध हो इसकी व्यवस्था कर रखी थी. उस वक्त मगध स्थित नालंदा विश्वविद्याल ज्ञानदानका प्रमुख और प्रसिध्द केंद्र था. वहा देश विदेशसे विद्यार्थी ज्ञानार्जन करनेकेलिए आते थे. वहा खगोलशास्त्रके अध्ययनके लिए एक विशेष विभाग था. एक प्राचीन श्लोकके अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालयके कभी कुलपतीभी थे.

आर्यभटने लिखे तीन ग्रंथोंकी जानकारी सद्य:स्थितीमें उपलब्ध है. दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र. लेकिन जाणकारोंके हिसाबसे उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था. 'आर्यभट्ट सिध्दांत' लेकिन उसके सिर्फ 34 श्लोकही अब उपलब्ध है. उनके इस ग्रंथका सातवे शतकमें जादा उपयोग होता था. लेकिन यह ग्रंथ बाकी ग्रंथोंकी तरह उपयोगमें होते हूए भी उसका ऐसा लोप क्यो हूवा होगा ? यह एक अनाकलनीय पहेली है.

आर्यभट पहले आचार्य थे की जिन्होने ज्योतिषशास्त्रमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया. 'आर्यभट्टीय' ग्रंथमें उन्होने ज्योतिष्यशास्त्रके मूलभूत सिध्दांतके बारेमें लिखा. इस ग्रंथमें 121 श्लोक है जो उन्होने चार खंडोमें विभाजीत कीये है.

गीतपादीका नामके पहले खंडमें ग्रहका परिभ्रमण काल, राशी , अवकाशमें ग्रहोंकी कक्षा इस विषयपर जानकारी दी है.

गीतपाद नामके दुसरे खंडमें उन्होने गणितके

वर्गमूल, घनमूल, त्रिकोणका क्षेत्रफल, ज्या (sine) इत्यादींका

विश्लेषन किया है.

उन्होने वृतका व्यास और परिधी इनमेंका संबंध जिसे हम

पाई(Pi) कहते है, उन्होने वह 3.1416 इतना, मतलब लगभग सही आंका था.

इस ग्रंथमें उन्होने बीजगणितके

(अ+ब)2 = (अ2+2अब+ब2)

का भी विस्तृत विष्लेशण किया है.

इस ग्रंथके 'कालक्रिया' इस तिसरे खंडमें

कालके अलग अलग भाग, ग्रहोंका परिभ्रमण , संवत्सर, अधिक मास, क्षय तिथी, वार ,सप्ताह

इनकी गणना इस बारेंमे विवेचन दिया है.

इसी ग्रंथमें एक जगह उन्होने संक्षिप्त स्वरूपमें संख्या लिखनेकी पध्दतीके बारेंमे लिखा है.

तिसरा खंड 'गोलपाद' नामसे प्रचलित है और उसमें खगोल विज्ञानके बारेमे जानकारी है.

सूर्य, चंद्र, राहू ,केतू और बाकी ग्रहोंकी स्थीती , दिन और रातका कारण, राशींका उदय, ग्रहणका कारण इत्यादि विश्लेशन इस खंडमें मिलता है.

आजके वक्तके बडे बडे वैज्ञानिक अबभी आश्चर्य चकीत रह जाते है की उस वक्त आर्यभटने पाई (Pi), वृत्तका क्षेत्रफळ , ज्या (sine) इत्यादिं बातोंका विश्लेषन कैसे किया होगा.

आर्यभट एक युगप्रवर्तक थे. उन्होने अपने वक्तके प्रचलित अंधश्रध्दांओंको झुटा ठहराया. उन्होने सारी दुनियाको बताया की पृथ्वी चंद्र और अन्य ग्रहोंको खुदका प्रकाश नही होता और वे सुरजकी वजहसे प्रकाशित होते है. पृथ्वीके जिस भागपर सूर्यप्रकाश पडता है वहां दिन और जहा सूर्यप्रकाश नही पडता वहा रात ऐसाभी उन्होने बताया था. पृथ्वीपर अलग अलग शहरोंमे सुर्योदय और सुर्यास्त का वक्त इसमें फर्क क्यो होता है इसके कारणोंका विश्लेषनभी उन्होने विस्तृततरहसे किया है. उन्होने यहभी जाहिर किया की पृथ्वी गोल है और वह खुदके आसके सभोवताल घुमती है. उन्होने इस मान्यताको तोडा की पृथ्वी ही ब्रह्मांडका केंद्र है और सुरज और बाकी ग्रह उसके सभोवताल घुमते है. उन्होने पृथ्वीका आकार, गती, और परिधीका अंदाज भी लगाया था. और सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहणके बारेमेंभी संशोधन किया था.

उन्होने त्रेतालीस लाख बीस हजार वर्षका एक महायुग बताया और एक महायुगको चार हिस्सोमे

सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापारयुग और कलियुग इस तरह विभागीत किया. इन चारो युगोंका काल उन्होने दस लाख अस्सी हजार साल इतना आंका है.

भविष्यमें चंद्र और सूर्य ग्रहण कब कब होगे यह निकालनेके लिए उन्होने एक सूत्रका विकास किया और उस सुत्रके हिसाबसे उनकी भविष्यवाणी कभीभी गलत नही निकली.

ज्योतिष्यके अलावा गणितशास्त्रमेंभी आर्यभटने नये नये सिंध्दांतोका अविश्कार किया. भारतमें सबसे पहले उन्होने बिजगणितके ज्ञानका विस्तारसे प्रचार किया. शून्य सिध्दांत और दशमलव संख्याप्रणालीका आविश्कार भारतमें सबसे पहले किसने किया यह बताना जरा मुश्कील है फिरभी आर्यभटने उसका प्रयोग अपने ग्रंथमें कुशलतासे किया हूवा मिलता है. उनकी कामयाबी भारतमेंही नही तो बाहर विदेशमेंभी फैली थी. अरब विद्वानोंको उनके जोतिष्य ज्ञानका बहुत अभिमान था और वे उन्हे 'अरजभट' नामसे पहचानते थे.

तो इस तरह आर्यभट जिन्होने बीजगणितका विकास किया था और ज्योतिष गणितमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया, उनको भारतीय गणितमें और जोतिष्यशास्त्रमें अगर मिल का पत्थर कहा जाए तो गलत नही होगा. उस वक्त लगभग सब ग्रंथ श्लोकके रुपमें रहते थे और उनको खासकर मुखद्गद कर एक पिढीसे दुसरी पिढीके पास सौंपा जाता था. उनका 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ सातवे शतकमें व्यापक रुपसे उपयोगमें लाया जाकरभी वह आगे लोप हूवा यह बात उस ग्रंथमें लिखे ज्ञानके बारेमें एक गूढ जिज्ञासा जागृत करती है. उनका अचूक निकष रहे गणित इस विषयसे और उन्होने जो ज्ञान उनके ग्रंथमें दिया वह एकदम सही रहता था इसकी तरफ गौर करते हूए उनका जो ग्रंथ लोप हुवा जिसमें जोतिष्य ज्ञानके बारेमें ऐसा कुछ लिखा होगा की जो गुप्त रखनेका किसीकोभी मोह हुवा होगा. ऐसाभी हो सकता है की वह ज्ञान गलत हातोंमे पडनेसे विघातक हो सकता था...


वैसे तो कमांड2ने यह रिसर्च पेपर पहलेभी पढा था. फिरभी कमांड2का दिल उत्साहीत हूवा था. बॉसकी शुन्यके बारेंमे, वेदकालीन गणित और जोतिष्याशास्त्रके बारेमें रुची देखते हूए और उनका एकदम सही वक्त बतानेका कौशल्य देखते हूए उसको अब विश्वास हो चला था की बॉसको 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ मिला होगा. कमांड2का अब लगभग आधा काम हुवा था, लेकिन आधा, जो की सबसे महत्वपूर्ण था, वह बचा था. उसको सबसे पहले बॉसचा पत्ता लगना बहुत जरुरी लग रहा था. पहले एक बार जब बॉसका फोन आया था तब उसका नंबर उसके फोनपर नही आया था. बॉसने यह करामात कैसी की थी इसका उसे कुछ पता नही लग अहा था. लेकीन फिरभी उसने बॉसको ढुंढनेका मानो बिडाही उठाया था. उसने टेलीफोन कंपनीमें जाकर बॉसको ट्रेस करनेका प्रयत्न किया था. टेलिफोन कंपनीवाले उसे कुछ खास मदत नही कर पाए थे. लेकिन टेलिफोन कंपनीको एक नयाही अविष्कार हुवा था. उनकी फ्रिक्वेन्सी कोई चोरी कर रहा था इसका. इसके अलावा एक मोटे तौरपर फोन किस इलाकेसे आया था इतनाही वे बता पाए थे. जो इलाका उन्होने बताया था वह काफी बडा था. और ना बॉसका नाम ना चेहरा मालूम होनेसे कमांड2को उसे ढुंढना बडा मुश्कील हो गया था. फिरभी लगभग रोज कमांड2 उस इलाकेमे किसी पागल की तरह घुमता था. और जब घुम घुमकर थक जाता था तबही घरकी ओर रुख करता था. लेकिन बॉसका पत्ता मिलनेके कोई आसार नही नजर आ रहे थे. शायद इतनी बार वह किसी पागल की तरह उस इलाकेमें घुमा, ना जाने कभी बॉस उसके सामनेसेभी गया होगा. लेकिन वह उसे कैसे पहचाननेवाला था. ?

क्रमश:..

Monday, March 10, 2008

Ch-52: ब्रम्ह है परिपूर्ण (शून्य-उपन्यास)

हिमालय के पर्बतोंकी गोदमें बहते नदी के तटपर जो गुंफा थी उसमें ध्यानमग्न अवस्थामें बैठा ऋषी, अचानक चौंककर अपने समाधी अवस्थासे बाहर आ गया. उसकी आंखे लाल थी और चेहरेपर कुछ रहस्य सुलझनेका गुढ आनंद झलक रहा था. उसके चेहरेपर एक रहस्यमय मुस्कुराहट फैल गई. धीरे धीरे अपने आप उसकी आंखे फिरसे बंद हो गई. और फिर वक्त, जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर सब मर्यादाएं लांघकर बंधनमुक्त होकर होने लगा.

जंगलमें पर्णकुटीके पास तिन लोग आपसमे कुछ चर्चा कर रहे थे. इतनेमें वहा वह ऋषी आगया. उसकी आहट होतेही सबलोग पलटकर उसकी तरफ देखने लगे.

यह तो वही ऋषी है...

जो उनको पहले एक बार मिला था...

उनको उसके लब्ज याद आ गए-

" चिंता मत करो.. मै तुम्हे तुमारे दुविधासे बाहर निकालूंगा "

वे बडी आस से उसकी तरफ देखने लगे.

ऋषीके चेहरेपर एक गूढ मुस्कुराहट दिखने लगी.

" आप लोगोंकी पहेली सुलझीही समझो " ऋषी गूढभाव से बोला.

" क्या? ... हमारी पहेली सुलझी?" तिनोंके मुंहसे खुशीसे निकला.

ऋषीने एक संस्कृत श्लोकका जोरसे उच्चारण किया -


ॐ पूर्णं अद: पूर्णं इदं, पूर्णात् पूर्णं उदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णं आदाय, पूर्णं एवाव शिष्यते ॥


"अर्थात जब पूर्णका पूर्णसे संयोग होता है या पूर्णसे पूर्ण निकाला जाता है तब बाकी पूर्णही रहता है. ब्रह्म यह परिपूर्ण है... इसलिए ब्रह्ममें बह्म मिलाया जाए तो या ब्रह्मसे ब्रह्मको निकाला जाए तो आखीर बाकी ब्रह्मही रहता है.

यहां पूर्ण और ब्रह्म यानीकी अगणित हो सकता है... जैसा दिन हो तो रात आतीही है, प्रकाश के विरुध्द अंधेरा होता है... वैसे जहा पूर्ण यानी अगणित हो वहां उसका विरुद्ध रिक्तता यानी शून्य आनाही चाहिए."

सामने नदीकी तरफ इशारा करके फिर ऋषीने आगे कहा, " उस पाणीमे बुलबुले देखो कैसे बनते है और कैसे नष्ट होते है "

" ऐसी एक चिज है की वह कभी कुछभी नही और कभी कभी सबकुछ है... वह जहांसे शुरु होती है खतमभी वही होती है... वह ऐसी चिज है की जिससे यह ब्रह्मांड, आप और मै तैयार हुए है... वह ऐसी चिज है की जिसमे सबको एक दिन समा जाना है "

बोलते बोलते ऋषी उन तिनोंके इर्द गिर्द गोल गोल चल रहा था.

"ऋषीवर, हम लोग गणितपर संशोधन कर रहे है हमें हमारे पहेली का गणिती हल चाहिए ; ना की आध्यात्मिक ' उनमेंसे एकने कहा.

" हां, आप लोगोंका संशोधन आपलोगोंको जिस वजहसे अपूर्ण लग रहा है वह आपके पहेलीका हल जितना गणिती है उतनाही आध्यात्मिक है. "

फिर ऋषीने सबको उठकर एक तरफ आने के लिए कहा और गोल गोल चलकर पैरके निशानोंसे जो गोल बना था उसकी तरफ निर्देश कर कहा,

'' तुम्हे तुम्हारा संशोधन पुरा करनेके लिए जिस बात की जरुरत थी वह है शुन्य"

तिनोंके चेहरेपर खुशी झलक रही थी.

ऋषीने कहा " शून्य जहा शुरु होता है खतम भी वही होता है"

एकने बडासा गोल निकाला.

ऋषीने कहा " कभी शून्य कुछभी नही"

एकने 0 को 6 मे जोडकर 6 ही आता है ऐसे लिखा.

ऋषीने आगे कहा " कभी शून्य सबकुछ है यानी सर्वसमावेशक है"

दुसरेने 0 बार 6 करनेसे 0 आता है ऐसा लिखा.

उन तिनोंके संशोधन कार्यको अब गती मिली थी. वे तिनो अपने कार्यमें व्यस्त हो गए. जब वे व्यस्तसा से जागे तब उन्होने आजूबाजू देखा. तो ऋषी वहा नही था.

उनके चेहरेपर आश्चर्य झलक रहा था. .

कहा गया वह ऋषी?...

शायद वह शून्यमें विलीन हूवा था....

क्रमश:...

Thursday, February 7, 2008

Ch-31: पॉलीटीक्स (शून्य-उपन्यास)


जॉन ड्रॉइंग रूममे बैठकर धीरे धीरे व्हिस्कीके घूंट ले रहा था. उसके चेहरेसे साफ झलक रहा था की वह डिस्टर्ब था. इतनेमें उसकी डोअर बेल बजी. वह व्हिस्कीका ग्लास टीपॉयपर रखकर खडा होगया. सामने जाकर उसने दरवाजा खोला. दरवाजेमें उसके सामने अँजेनी खडी थी.

" मै कितने देरसे तुम्हारा मोबाईल ट्राय कर रही हूं. तुम्हारा मोबाईल बंद है क्या?" अँजेनी दरवाजेसे अंदर आते हूए बोली.

" प्रेसवालोंके फोनपर फोन आ रहे है... इसलिए बंद करके रखा" जॉन दरवाजा बंद करते हूए बोला.

अँजेनीने ड्रॉइंग रूममें आनेके बाद टीपॉयपर रखा व्हिस्कीका ग्लास देखा और फिर जॉनके चेहरेके तरफ गौरसे देखने लगी.

" क्या हूवा ? अपसेट दिख रहे हो" अँजेनीने उसे पुछा.

" बैठो ... बताता हूं " उसने खुद एक कुर्सीपर बैठते हूए और अँजेनीको सामने रखे कुर्सीपर बैठनेका इशारा करते हूए कहा.

वह सामने रखी हूई कुर्सी उसके तरफ खिसकाकर उसके पास जाकर बैठ गई। उसने व्हिस्कीका ग्लास फिरसे उठाकर होठोंको लगाया ।

" ऐसे अंदर ही अंदर गुमसुम रहनेसे अच्छा है अपने प्रॉब्लेम्स अपने किसी करिबी व्यक्तीके साथ शेअर करना ' अँजेनी उसका हाथ अपने हाथमें लेते हूए बोली ।

उसने उसका दुसरा हाथ उसके हाथपर रख दिया ।

" क्या कुछ डिपार्टमेंटमें प्रॉब्लेम हूवा ?" अँजेनीने उसका हाथ थपथपाकर कहा ।

" बोलता हूं... सब कुछ बोलता हूं. " व्हिस्कीका ग्लास बगलमें रखते हूए वह बोला ।

जॉनने एक दीर्घ सांस ली और उसे बोलने लगा -


जॉन उसके बॉसके , यानीकी शहर पोलीस शाखा प्रमुखके सामने बैठा हूवा था ।

" सर, उस बिल्डींगके निचे मिले शवकी तफ्तीश कर यह कुछ जानकारी हासील की है।" जॉन अपने सामने रखे फाईलके पन्ने उलट पुलटकर देखते हूए बोला।

बॉसने सिर्फ " हां " कहा।

जॉनके बॉसने अपने मुंहमें रखे सिगारका एक बडा कश लिया ।

" उस शवके जेबमें बंदूक मिली ... अबतकके तिनो खुन उसी बंदूकसे हूए है ।."

बॉसने अपने मुंहमेंके सिगार की राख सामने टेबलपर रखे अॅश ट्रेमे झटकते हूए कहा ,

" मतलब हम जिस खुनीकी तलाश कर रहे थे वह अपने आपही, मरा हूवा क्यों ना हो, अपने शिकंजे मे आ पहूंचा । "

" सर, मुझे लगता है इतने जल्दी इस नतिजेतक पहूंचना जल्दबाजी होगी. " जॉनने कहा.

" देखो जॉन, अब पुलिसके गलेतक पाणी पहूंच चूका है... अब यह शब्दोंसे खेलनेका वक्त नही है। फिलहाल हालात सामान्य होनेके लिए हमें कुछतो ठोस कदम उठाना जरुरी है । और अपना निष्कर्ष गलत है ऐसा तुम्हे क्यो लगता है ? " बॉसने जॉनके आंखोमें लगातार देखते हूए कहा.

" वैसी बहुत बाते है ." जॉनने फाईलके कुछ पन्ने पलटते हूए कहा.

" उदाहरणके तौरपर ? " बॉसने सिगार बुझाते हूए पुछा.

" नंबर एक - असली खुनीने किसीको मारकर उसके जेबमें बंदूक डाली होगी .. ऐसा भी हो सकता है... . और यह सब वह अपने उपरका ध्यान दुसरी तरफ हटानेके लिए कर सकता है...

नंबर दो - जब हमने वह मरे हूए आदमीके घर पर रेड किया तब उसके कॉम्प्यूटरकी हार्डडिस्क गायब थी. उसके पिछे अलग अलग हेतू हो सकते है... जैसे वह अकेला ना होकर उसके साथ बहुत सारे साथी उसको सामील हो .. जैसे मैने पहले बताया वैसे खुनी दुसराही कोई होकर वह ये सब अपनेपरका ध्यान दुसरी तरफ हटानेके लिए कर सकता है... या फिर वह एक मामुली चोरीभी हो सकती है... "

जॉन बॉसकी प्रतिक्रिया देखनेके लिए रुका.

" हां , और कुछ " बॉसने उसे और कुछ कहना है तो आगे कहने के लिए सुचीत करते हूए कहा.

" नंबर तीन - इस बार खुनकी जानकारी खुनीने ना देते हूए किसी औरही आदमीने दी थी ... क्योंकी जहांसे फोन आया था वहांसे खुनीको खुनके वक्त तक खुनके जगह पहूंचना लगभग नामुमकीन था. और अगर इस बारका अपवाद अगर छोडा तो इसके पहले हरबार खुनीने खुनके जगहसेही फोन किया था. कोई उनकेही टीमका आदमी बेईमानीपर उतर आया हो या किसीको इसकी भनक लगी हो जो की अपनी पहचान बताना नही चाहता हो"

जॉनने बचा हूवा सब लगभग एकही सांसमें बोल दिया और अब वह बॉसके प्रतिक्रिया की राह देखने लगा.

जॉनका बॉस उसके कुर्सीसे धीरेसे उठ गया. खिडकीके बाहर देखते हूए उसने नई सिगार सुलगाई. फिर सिगारके लंबे कश लेते हूए उसने जॉनके इर्द गिर्द एक चक्कर लगाई -

" होगया तुम्हारा ?" बॉसने उसके तरफ घुरकर देखते हूए कहा.

जॉनने सिर्फ अपना सर हिलाया.

" देखो जॉन, तुम्हे पताही है की इस घटना की वजहसे अपने पुलिसकी प्रतिमा कितनी मलीन हो चूकी है. और तुम जो कह रहे हो वह सारी संभावनाएं है. उसका अपने पास कोई ठोस सबुत नही है. "

जॉनका बॉस कमरेमें चहलकदमी करते हूए बोल रहा था.

" लेकिन सर.." जॉनने बिचमें बोलनेका प्रयास किया.

उसे रोकते हूए बॉसने कहा,

" मुझे लगता है इस केसपर काम करके और लगातार तणावके वजहसे तूम शारिरीक और मानसिक तरहसे थक चूके हो... और थकनेके बाद बहुत बार ऐसा होता है... आदमी गडबडा जाता है... और फिर वह तरह तरहके निष्कर्ष निकालने लगता है."

" नही सर, वैसा नही ." जॉनने अपना पक्ष रखने का प्रयास किया.

" देखो , मै क्या कहता हूं ध्यान देकर सुनो " बॉस अब कडे स्वरमें बोल रहा था,

" अब एक प्रेस कॉन्फरंस लेनी पडेगी. उसमें एक साथ केसकी सारी जानकारी देकर अपने पुलिस डिपार्टमेंटकी बची कुची लाज रखनी पडेगी. और फिर ..... और फिर तुम एक महिनेके लिए छुट्टीपर चले जावो... मै तुम्हारी छुट्टी अभी सँक्शन कराये देता हूं ... फिर तुम तुम्हारी दोस्त अँजेनीको लेकर किसी हिलस्टेशनको जावो... छुट्टीया मनाने के लिए... बाकी चिंता तुम मत करो... मै सब बंदोबस्त करता हूं. "

जॉनने एकदम चौंककर उसके बॉसकी तरफ देखा. अपने बॉसको अपने और अँजेनीके बारेमें कैसे पता चला? उसकी आंखोमे अभीभी आश्चर्य और अविश्वास तैर रहा था. .

" आय अॅम सॉरी... इट्स यूवर पर्सनल मॅटर... बट इटस् माय प्रोफेशनल वे ऑफ वर्कींग .... मुझे सबपर पैनी नजर रखनी पडती है"

जॉन कुछ बोले इसके पहलेही बॉसने कुर्सीके पिछे टंगा हूवा अपना ओव्हरकोट उठाया और वह दरवाजेकी तरफ जाने लगा.

दरवाजेमें रुककर जॉनकी तरफ पलटकर देखते हूए वह बोला, " कल सुबह दस बजे मैने प्रेस कॉन्फरंस बुलाई है. क्या बोलना है वह सब मै देखता हूं. यू जस्ट बी देअर."

जॉनके जवाब की राह ना देखते हूए बॉस खाट खाट जूतोंका आवाज करते हूए वहांसे निकल गया. जॉन संभ्रमसे कभी बॉसको जाते हूए देख रहा था तो कभी अपने हाथमेंके फाईल और कागजादोंकी तरफ देखते हूए वहां खडा रहा.

क्रमश:...

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5. मृगजल (लव्ह ड्रामा, सायकॉलॉजीकल थ्रीलर)
6. फेराफेरी (कॉमेडी)
7. लव्ह लाईन (लव्ह, कॉमेडी, सस्पेन्स)
8. ब्लॅकहोल (हॉरर, मिस्ट्री, सस्पेन्स)