यह उपन्यास मेरे अंग्रेजी स्क्रिनप्ले 'लॅच्ड' (Horror, Suspense, thiller) पर आधारीत है. यह स्किनप्ले फिल्म रायटर्स असोसिएशन, (FWA) यहां पंजीकृत किया गया है। यह उपन्यास मराठी मे पहलेही शुरू किया जा चुका है ।
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उपन्यास - अद्-भूत The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA. |
Thursday, April 10, 2008
Hindi Novels - अगला उपन्यास अद-भूत (Horror, Suspense, thiller) अब इस ब्लॉगपर शुरू होगा.
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Monday, April 7, 2008
Ch-67A : शुन्यसे शुन्यकी ओर (शून्य-उपन्यास) Hindi
जॉनकी कार तेज गतिसे रास्तेपर दौड रही थी. कार जैसे जैसे शहरके बाहर जा रही थी वैसे वैसे रास्तेपर यातायात कम होती नजर आ रही थी. जॉनको अकेलापण कुछ जादाही महसूस होने लगा. जॉन रास्तेके किनारे देखने लगा. रास्तेके किनारेभी अब मकानोकी भिड कम होती नजर आ रही थी. थोडा आगे जाकर जॉनकी कार रास्तेके बायी तरफ मुडकर एक कच्चे रास्तेपर दौडने लगी. गाडी चलाते वक्त रास्तेपर मानो धुलके बादल उठ रहे थे. उस वजहसे और रास्ताभी कच्चा होनेसे जॉनके गाडीकी गती कम हो गई थी. आखीर जॉनकी गाडी एक बडे खाली फेन्सके पास रुक गई. गाडी रास्तेके किनारे पार्क कर जॉन गाडीसे उतर गया. गाडीके पिछले सिटपर रखा एक बडा फुलोंका हार उसने अपने हाथोंमें लिया. उसने सामने देखा. फेन्सके दरवाजेपर एक बडा सिमेटरीका पुराना हूवा बोर्ड लगा हूवा था. जॉन वह फुलोंका बडा गोल हार (रीथ) लेकर सिमेटरीमें दाखील हूवा. अंदर जानेके बाद उसका दिल और ही भारी भारी हो गया था. उसके चलनेकी गती धीमी हो गई थी. वह वैसेही भारी मनसे अंदर जाकर एक समाधीके सामने खडा हो गया. उसने समाधीपर खुदे अक्षरोंपर एक नजर घुमाई. वह अँजेनीकी समाधी थी. थोडी देर वैसेही स्तब्ध खडे रहकर उसने झुककर वह गोल हार उसके समाधीपर रखा और घूटने टेककर वह शांतीसे आंखे मुंदकर उसको आत्मशांती मिलनेके लिए प्रार्थना करने लगा. उसे उसकी वह गंभीर, अल्लड, भोली, लोभस, अदाए याद आने लगी. उसका दिल भर आने लगा था.
उसने अँजेनीके साथ पूरी जिंदगी व्यतित करनेका निश्चय किया था. लेकिन नियतीके सामने उसके निश्चयको क्या किमत थी?..
शून्य...
उसखी आंखे भर आयी और उससे आंसू बहने लगे. एक वडासा आंसू बहते हूए उसके गालपरसे होकर अँजेनीके समाधीपर रखे गोल हारके एकदम बिचोबिच जाकर गिरा. थोडी देर बाद उसने किनारेंको आंसू लगी हूई अपनी पलके खोली. उसकी नजर सामने रखे गोल हारकी तरफ गई.
' सचमुछ कितना अनोखा है आदमीका जिवन..' वह सोचने लगा. '... शून्यसे आना और आखिर शून्यमेंही विलीन हो जाना'
क्रमश:...
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Thursday, March 27, 2008
Ch-62 : लता (शून्य-उपन्यास) Hindi
बंगलेके बाई तरफ एक जगह एक फुलोंसे लदी हूई लता थी. फुलोकी खुशबुभी मन मोह लेनेवाली थी. वह लता बंगलेके दिवारका, खिडकीका और पाईपका सहारा लेते हूए उपर टेरेसतक पहूंच गई थी. उसने टॉर्चकी रोशनी डालते हूये उस लता को निचेसे उपरतक गौरसे देखा. वह फुलोंसे पुरीतरह लदी हूई थी. फिर उसने उसकी तरफ उपरसे निचे तक गौरसे देखा. लताके तले बहुत सारा कचरा पडा हूवा था. निचे पॉलीथीन बॅग्ज, कागजके मसले हूए टूकडे, इस तरह का बहुत सारा कचरा पडा हूवा था. जॉन घूटनोपर बैठकर उस कचरेमे कुछ मिलता है क्या यह देखने लगा. उसने अपने जेबसे एक बडीसी पॉलीथीन बॅग निकाली और उसमें वह वहा के कचरेसे जो भी महत्वपुर्ण लगा या महत्वपुर्ण होनेकी संभावना थी ऐसा कचरा उस बॅगमे ठूसने लगा. उस कचरेमें ढूंढनेके बाद उसने उस लता को पकडकर जोर जोरसे हिलाया. उसके शरीरपर फुलोंकी बरसात होने लगी. और कुछ गिरनेका 'धप.. धप' ऐसा आवाज आने लगा. उसने टॉर्च के रोशनीमें गौरसे देखा तो उस लताके टहनीयोंमे अटका हूवा और कुछ कचरा निचे गिर गया था. उसमेंकाभी कुछ छाटकर उसने अपने बॅगमें ठूंस दिया. उसे एक पॉलीथीनकी बॅग मिल गई. उसका मुंह गांठ मारकर बंधा हूवा था. उसने वह पॉलीथीन बॅग हिलाकर देखी. अंदरसे कुछ बजनेका आवाज आ रहा था. जो भी होगा बादमें देखेंगे...
ऐसा सोचकर उसने वह बॅगभी अपने बॅगमें डाल दी.
चलो अब बहुत हो गया...
अब मुझे चलना चाहिए...
जॉनने बॅग उठाई और कंपाऊंडकी तरफ वापस जानेके लिए निकल पडा.
जॉनको घर आते आते सुबहके चार बज चूके थे. वह पुरी तरहसे थक चूका था. पॉलीथीन बॅग निचे रखकर दुसरे जखमी हाथको संभालते हूऐ उसने क्वार्टरका दरवाजा खोला. उसे याद आगया की एकबार ऐसेही जब उसका अॅक्सीडेंट हुवा था तब अँजेनीने उसे संभालते हूए घर लाया था. और क्वार्टरका ताला उसनेही खोला था. उसकी याद आतेही उसका मन फिरसे खट्टू होगया.
दरवाजा खोलते खोलते उसे याद आया -
अरे व्हिस्कीकी बॉटल लाना तो मै भूलही गया....
मै बाहर निकलने का एक उद्देश व्हिस्कीकी बॉटल्स लाना यह था और वही मै भूल गया ...
दरवाजा खोलकर निचे रखे पॉलीथीनकी थैलीकी तरफ देखकर उसने सोचा -
चलो तो अपना दर्द भूलनेके लिए अपने पास और एक काम है...
इस कचरेमें कुछ महत्वपुर्ण मिलता है क्या यह ढूंढना...
पॉलीथीनकी थैली उठाकर वह घरके अंदर चला गया. अंदरसे दरवाजा बंद कर लिया और सोफेपर बैठकर वह उस थैलीसे एक एक मसला हूवा कागज बाहर निकालकर उसे ठिक कर उसमें कुछ मिलता है क्या यह देखने लगा. सब कागजके टूकडे टटोलकर खतम होगए लेकिन कुछ खास नही मिल रहा था. फिर वह वहांसे उठाकर लाई पॉलीथीन बॅग्ज खोलकर देखने लगा. कुछ बॅग्जमें बचे हूए, सडे हूए मुंगफलीके दाने थे. तो कुछ बॅग्जकी बहुतही गंदी बदबू आ रही थी. आखिर उसे एक गांठ मारी हूई पॉलीथीनकी थैली मिल गई. उसने उस थैलीकी गांठ बडी सावधानीसे खोली. अंदरसे बदबू आयेगी इस अनुमानसे मुंह बाजू हटाया. लेकिन अंदरसे कोई बदबू नही आयी. उसने थैलीमें झांककर देखा. अंदर कुछ कांचके टूकडे थे.
टूटे ग्लासके होंगे....
वह सोफेसे उठकर निचे मॅटपर घुटने टेंककर बैठ गया. उसने वे टूकडे बडी सावधानीसे थैलीसे बाहर मॅटपर उंडेल दिए. दो-तीन टूकडोंपर उसे खुनके दाग दिखाई दिए.
अरे वा यह तो कातिलका या उसके साथीका खुन दिख रहा है...
उसने खुनके दागवाला एक टूकडा हलकेसे अपने हाथमें लिया.
अब मुझे इस धागेसेही कातिलतक पहूचना है...
लेकिन क्या इस खुनसे मै कातिलके बारेमें कुछ जानकारी पा सकता हू ?
वह सारी संभावनाए टटोलकर देखने लगा. और फिर अचानक उसकी आंखे खुशीसे चमकने लगी. उस कांचके टूकडेपर उसे खुनसे सने हाथके और उंगलियोंके निशान दिखाई देने लगे.
" यस्स" वह खुशीसे चिल्लाया.
दुसरे खुनके दाग लगे टूकडेभी उसने सावधानीसे उठाकर गौरसे देख लिए. उसपरभी उंगलियोंके निशान दिख रहे थे. वैसेही वे कांचके टूकडे हाथमें लेकर वह फोनके पास चला गया. वे टूकडे बगलमें एक टेबलपर रखकर उसने एक नंबर डायल किया.
" सॅम... मै तुम्हारे उधर आ रहा हू... अभी ... एक बहुतही महत्वपुर्ण धागा मेरे हाथ लगा है..." वह अपनी खुशी छिपा नही पाकर उत्साहभरे स्वरमें फोनपर बोल रहा था.
क्रमश:...
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Wednesday, March 26, 2008
Ch-61 : कंपाऊंड के अंदर (शून्य-उपन्यास) Hindi
दुसरे हाथसे खुनसे सना हाथ पकडते हूए जॉन उठकर खडा हो गया. खुन जादाही बह रहा था इसलिए उसने जेबसे रुमाल निकालकर उस हाथको कसकर बांध दिया. जखमी हाथको संभालते हूए वह बंगलेके दरवाजेके पास गया. वहाभी एक बडा ताला लगा हूवा था और उस तालेकोभी पुलिसका सील लगा हूवा था. उसने वही खडे होकर बंगलेके चारो ओर एक नजर दौडाई. बंगलेके अंदर जाना, कमसे कम यहांसे तो भी मुमकीन नही लग रहा था. पहले जब बंगलेकी तलाशी हूई थी तब वह बाकी लोगोंके साथही अंदर था. और उसे विश्वास था की उन्होने अंदरकी तलाशी ठिक तरहसे की थी. लेकिन उसे याद आया की बाहरके तलाशीको उतना महत्व ना देकर उसने वह जिम्मेदारी किसी एक नये पुलिसको सौंपी थी. उसने फैसला किया की पहले बंगलेके बाहरी हिस्सेकी जांच करना बेहतर होगा. वैसे कुछ मिलनेकी कोई संभावना नहीके बराबर थी. क्योंकी बिचमें बहुत दिन बित चूके थे और इसलिए बंगलेके अंदरके सबुतसे बाहरके सबुत नष्ट होनेकी जादा संभावना थी.
तोभी चान्स लेनेमें क्या हर्ज है...
शायद बंगलेके बाजुसे या पिछेसे अंदर जानेका कोई रास्ताभी मिल सकता है...
उसने जेबसे टॉर्च निकाला और टार्चका प्लॅश इधर उधर मारते हूए वह बंगलेके दाई तरफसे पिछेकी ओर जाने लगा. बिच बिचमें वह बंगलेपरभी फ्लॅश मारकर अंदर जानेके लिए कोई खिडकी है क्या वह देखने लगा. खिडकीयां थी लेकिन मजबुत जाली लगाई हूई.
तोभी किसी खिडकीकी जाली टूटी हूई हो सकती है, जैसे कंपाऊंडका तार एक जगह टूटा हूवा था...
बंगलेके चारो ओर काफी खुली जगह थी. और उस जगहमें गार्डनभी बनाया हूवा था. लेकिन उसे कभी काटा छाटा नही जा चूका था ऐसा लग रहा था. गार्डनमें घांस और झाडी अच्छी खासी कमरतक बढी हूई थी. जॉन अंधेरेमे टॉर्चके सहारे संभालकर उस घाससे और झाडीसे रास्ता बनाते हूए आगे बढ रह था. उस उंची बढी हूई झाडीके वजहसे कुछ सबुतभी होगा तो वह मिलना मुश्कीलही लग रहा था. लेकिन एक फायदाभी था की अगर कुछ सबुत हो तो वह नष्ट होनेका कालावधी उस झाडीके वजहसे बढनेकी संभावना थी. इधर उधर टार्चकी रोशनी डालते हूए वह बंगलेके पिछवाडे आकर पहूंच गया. पिछेतो दरवाजेकोभी जाली लगी हूई थी. इसलिए वहांसे अंदर जानेकी संभावनाभी खत्म हो गई थी. फिर उसने टार्चके रोशनेमे पिछवाडेका चप्पा चप्पा छान मारा. कुछ खास नही मिल रहा था. धीरे धीरे टॉर्चके रोशनीमें घासके और झाडीके तनेके पास ढूंढते हूए उसने बंगलेको एक पुरा चक्कर लगाया. खुले मैदानमेंभी कुछ नही मिल रहा था और एकभी खिडकीकी जाली टूटी हूई नही थी.
चलो मतलब कमसे कम अबतो अंदर जाना मुमकीन नही लग रहा है...
अंदर जानेके लिए मुझे फिरसे कभी सॅमकी मदद लेनी पडेगी...
और बाहरभी एक बार फिरसे दिनके उजेलेमेंही ढूंढना उचीत होगा...
ऐसा सोचकर वह कंपाऊंडके बाहर जानेके लिए मुडा. इतनेमें एक विचार उसके जहनमें कौध गया. वह एकदमसे रुक गया. मुडकर जल्दी जल्दी बंगलेके बाई तरफसे पिछेकी ओर जाने लगा.
क्रमश:...
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Tuesday, March 25, 2008
Ch-60 : देर रात गए (शून्य-उपन्यास) Hindi
रातके ढाई बज चूके थे. रातके भयाण संन्नाटेमें जॉन अकेलाही गाडी तेजीसे चलाते हूए शहरमें घुम रह था. दंगोंकी वजहसे आजकल रास्ते जल्दीही खाली हो जाते थे. और अब तो रातके ढाई बजनेकी वजहसे इस वक्त रास्तेपर कोईभी नही दिख रहा था. अपनेही धुनमें एक चौकसे तेजीसे गुजरते हूए जॉनको पिछेसे सायरनका आवाज सुनाई दिया. उसने मिररमें देखा. एक पुलिसकी गाडी उसका पिछा कर रही थी.
गाडी रोकु या नही ?...
जॉनने एक क्षण के लिए सोचा और फिर गाडीका ब्रेक दबाया. उसने अपनी गाडी रस्तेके किनारे खडी की. पिछेसे पुलिसकी गाडी आकर उसके गाडीके आगे जाकर रुकी. पहले पुलिसने जॉनकी गाडीकी तरफ और फिर गाडीके अंदर झांककर देखा. अबतक जॉन उतरकर गाडीके बाहर आया था. दो पुलिस उतरकर उसके पास गए.
" इतनी रात गए कहा जा रहे हो आप?" एक पुलिसने उसकी तरफ आते आते दुरसेही पुछा.
जॉन कुछ नही बोला. दोनो उसके पास आकर रुके. उनमेंसे दुसरा जॉनकी तरफ गौरसे देखने लगा.
" जॉन सर आप!" दुसरा एकदम जॉनको पहचानते हूए बोला.
जॉन उसे पहचानता नही था. लेकिन शायद वह उसे पहचानता था. वैसेभी शहरमें चल रहे सिरीयल किलर केसकी वजहसे जॉनका अत्यधीक प्रचार हो चूका था. वह डीसमीस होनेसे पहले लगभग रोज उसका फोटो एकतो पेपरमें आता था या फिर टीव्हीपर दिखता था. .
" हां मै जॉन... निंद नही आ रही थी इसलिए ऐसेही एक चक्कर मार रहा था' जॉनने कहा.
" नो प्रॉब्लेम सर... यू कॅरी ऑन प्लीज" वह विनम्रतासे बोला.
जॉन गाडीमें बैठ गया. वे दोनो वही खडे होकर जॉनके गाडीकी शुरु होनेकी राह देखने लगे. जॉनने गाडी शुरु की और उनकी तरफ हाथ हिलाकर वह फिरसे तेजीसे वहांसे चला गया.
जॉनकी गाडी एका सुनसान ऐरीयामें एक मकानके सामने आकर रुकी. वह कमांड1का घर था. तिसरे कत्लके वक्त जब कमांड1का शव बिल्डींगके निचे पडा हूवा मिला था तब उन्होने इस घरपर रेड मारकर उसकी चप्पा चप्पा तलाशी ली थी. गाडी रास्तेके किनारे लगाकर वह गाडीसे उतर गया. पहले उसने इधर उधर नजर दौडाई. सब तरफ एक भयाण सन्नाटा छाया हूवा था. रातका वक्त और उपरसे शहरमें दंगे फसाद फैले हूए. वह चलते हूए बंगलेके कंपाऊंड गेटके पास गया. गेटको ताला लगा हूवा था और तालेपर पुलिस डिपार्टमेंटका सिल लगाया हूवा था. उसने एक चक्कर लगाकर बंगलेके कंपाऊड वॉलसे कहीसे घुसनेकी संभावना है क्या यह देखा. कंपाऊंड वॉलपर कांटोवाला तार लगा हूवा था. उसने देखा की गेटके दायी तरफ एक जगह उपरका तार टूटा हूवा है. जॉनको वहांसे अंदर घुसना संभव लग रहा था.
लेकिन अंदर जाए या ना जाए ?...
पहलेही उसे डिसमीस किया हूवा. और ऐसी स्थीतीमें पुलिसका सिल होते हूवे अगर मै छूपकर अंदर गया और उन्हे पता चला तो उन्हे अलगही शक होनेकी संभावना है...
होने दो... कुछ भी होने दो ...
अँजेनी जानेके पश्चात वैसेभी जॉन खुदके जानके बारेमें बेफिक्र हो गया था. उसका सोचना जारीही था जब जॉन कंपाऊंड वॉलके उपर चढने लगा. चढना थोडा मुश्कील जा रहा था. दिवार उंची थी और पकडनेके लिएभी कुछ नही था. जॉनने उछलकर दिवारके उपर टटोलकर देखा - पकडनेके लिए कुछ मिलता है क्या. दिवारपर कुछ पकडनेके लिए उसके हाथ आया. उसने उसे कसकर पकडते हूए वह दिवारपर चढ गया. लेकिन चढते हूए उसे उसके हाथमें बहुत जादा दर्द महसुस हूवा. चढनेके बाद जब उसने देखा तो उसने टूटी हूई कांटोवाली तार ही हाथमे पकडी हूई थी. उसने झटसे वह तार हाथसे छोडी, हाथकी तरफ देखा, तो हाथसे खुनकी धार निकल रही थी. वैसेही उस हाथको दुसरे हाथसे पकडकर उसने दिवारकी दुसरी तरफ, कंपाऊंडके अंदर छलांग लगाई.
क्रमश:...
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Monday, March 24, 2008
Ch-59B : आर्यभट्ट (शून्य-उपन्यास) Hindi
...भारतीय गणित और खगोलविज्ञान की शुरुवात किसने की यह कहना जरा मुश्कील है फिरभी भारतीय वेदोमें गणित और खगोलविज्ञान की सब जानकारी उपलब्ध है. बहुत ऋषींयोंने पंचांगके नियम, नक्षत्र विभाजन, वैदिक कार्यके लिए आवश्यक तिथी और महुरत निर्धारित करना, ग्रहण, अमावस्या इत्यादि जानकारी देनेके लिए अलग अलग पध्दती विकसित की. वक्त के साथ पैतामह सिध्दांत, वासिष्ठ सिध्दांत, रोमक सिध्दांत, पौलिक सिध्दांत इत्यादि विकसित हुए. लेकिन वे धीरे धीरे पुराने हूए और उनसे एकदम सही परिणाम नही आते थे. इसलिए उस वक्त लोगोंका उसपरसे भरोसा उड रहा था. लेकिन फिर आर्यभट नामके एक विद्वानने गणित और खगोलशास्त्रसे सबंधीत ज्ञानमेंकी त्रुटी दूर कर उस ज्ञानको नये सिरेसे प्रस्तुत किया.
भारतके इतिहासमें जिसे 'गुप्तकाल' या 'सुवर्णयुग'के नामसे जानते है, उस वक्त भारतने साहित्य, कला और विज्ञान इन क्षेत्रोंमे अभूतपूर्व प्रगती की. विज्ञानके क्षेत्रमें गणित, रसायनशास्त्र और जोतिष्यशास्त्र इन विषयोंमे विशेष प्रगती की. उस वक्त आर्यभट नामके एक प्रसिध्द गणितज्ञ और जोतिष्यकार थे. वे अभीके बिहारराज्यकी राजधानी पटना (उस वक्तका पाटलीपुत्र) के पास कुसुमपुर इस गावके निवासी थे. उनका जन्म 13 एप्रिल सन् 476 को और मृत्यू सन् 520 को हूवा था. उस वक्त बौध्द धर्म और जैन धर्म बहुत प्रचलित था. लेकिन वे सनातन धर्मके अनुयायी थे. उन्होने गणित और जोतिष्य इन विषयोंमे बहुत महत्वपूर्ण और वक्तके हिसाबसे विस्मयकारी संशोधन किया था. उन्होने अपना संशोधन ग्रंथरूपमें शब्दबध्द कर अगली पिढीयोंको वह उपलब्ध हो इसकी व्यवस्था कर रखी थी. उस वक्त मगध स्थित नालंदा विश्वविद्याल ज्ञानदानका प्रमुख और प्रसिध्द केंद्र था. वहा देश विदेशसे विद्यार्थी ज्ञानार्जन करनेकेलिए आते थे. वहा खगोलशास्त्रके अध्ययनके लिए एक विशेष विभाग था. एक प्राचीन श्लोकके अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालयके कभी कुलपतीभी थे.
आर्यभटने लिखे तीन ग्रंथोंकी जानकारी सद्य:स्थितीमें उपलब्ध है. दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र. लेकिन जाणकारोंके हिसाबसे उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था. 'आर्यभट्ट सिध्दांत' लेकिन उसके सिर्फ 34 श्लोकही अब उपलब्ध है. उनके इस ग्रंथका सातवे शतकमें जादा उपयोग होता था. लेकिन यह ग्रंथ बाकी ग्रंथोंकी तरह उपयोगमें होते हूए भी उसका ऐसा लोप क्यो हूवा होगा ? यह एक अनाकलनीय पहेली है.
आर्यभट पहले आचार्य थे की जिन्होने ज्योतिषशास्त्रमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया. 'आर्यभट्टीय' ग्रंथमें उन्होने ज्योतिष्यशास्त्रके मूलभूत सिध्दांतके बारेमें लिखा. इस ग्रंथमें 121 श्लोक है जो उन्होने चार खंडोमें विभाजीत कीये है.
गीतपादीका नामके पहले खंडमें ग्रहका परिभ्रमण काल, राशी , अवकाशमें ग्रहोंकी कक्षा इस विषयपर जानकारी दी है.
गीतपाद नामके दुसरे खंडमें उन्होने गणितके
वर्गमूल, घनमूल, त्रिकोणका क्षेत्रफल, ज्या (sine) इत्यादींका
विश्लेषन किया है.
उन्होने वृतका व्यास और परिधी इनमेंका संबंध जिसे हम
पाई(Pi) कहते है, उन्होने वह 3.1416 इतना, मतलब लगभग सही आंका था.
इस ग्रंथमें उन्होने बीजगणितके
(अ+ब)2 = (अ2+2अब+ब2)
का भी विस्तृत विष्लेशण किया है.
इस ग्रंथके 'कालक्रिया' इस तिसरे खंडमें
कालके अलग अलग भाग, ग्रहोंका परिभ्रमण , संवत्सर, अधिक मास, क्षय तिथी, वार ,सप्ताह
इनकी गणना इस बारेंमे विवेचन दिया है.
इसी ग्रंथमें एक जगह उन्होने संक्षिप्त स्वरूपमें संख्या लिखनेकी पध्दतीके बारेंमे लिखा है.
तिसरा खंड 'गोलपाद' नामसे प्रचलित है और उसमें खगोल विज्ञानके बारेमे जानकारी है.
सूर्य, चंद्र, राहू ,केतू और बाकी ग्रहोंकी स्थीती , दिन और रातका कारण, राशींका उदय, ग्रहणका कारण इत्यादि विश्लेशन इस खंडमें मिलता है.
आजके वक्तके बडे बडे वैज्ञानिक अबभी आश्चर्य चकीत रह जाते है की उस वक्त आर्यभटने पाई (Pi), वृत्तका क्षेत्रफळ , ज्या (sine) इत्यादिं बातोंका विश्लेषन कैसे किया होगा.
आर्यभट एक युगप्रवर्तक थे. उन्होने अपने वक्तके प्रचलित अंधश्रध्दांओंको झुटा ठहराया. उन्होने सारी दुनियाको बताया की पृथ्वी चंद्र और अन्य ग्रहोंको खुदका प्रकाश नही होता और वे सुरजकी वजहसे प्रकाशित होते है. पृथ्वीके जिस भागपर सूर्यप्रकाश पडता है वहां दिन और जहा सूर्यप्रकाश नही पडता वहा रात ऐसाभी उन्होने बताया था. पृथ्वीपर अलग अलग शहरोंमे सुर्योदय और सुर्यास्त का वक्त इसमें फर्क क्यो होता है इसके कारणोंका विश्लेषनभी उन्होने विस्तृततरहसे किया है. उन्होने यहभी जाहिर किया की पृथ्वी गोल है और वह खुदके आसके सभोवताल घुमती है. उन्होने इस मान्यताको तोडा की पृथ्वी ही ब्रह्मांडका केंद्र है और सुरज और बाकी ग्रह उसके सभोवताल घुमते है. उन्होने पृथ्वीका आकार, गती, और परिधीका अंदाज भी लगाया था. और सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहणके बारेमेंभी संशोधन किया था.
उन्होने त्रेतालीस लाख बीस हजार वर्षका एक महायुग बताया और एक महायुगको चार हिस्सोमे
सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापारयुग और कलियुग इस तरह विभागीत किया. इन चारो युगोंका काल उन्होने दस लाख अस्सी हजार साल इतना आंका है.
भविष्यमें चंद्र और सूर्य ग्रहण कब कब होगे यह निकालनेके लिए उन्होने एक सूत्रका विकास किया और उस सुत्रके हिसाबसे उनकी भविष्यवाणी कभीभी गलत नही निकली.
ज्योतिष्यके अलावा गणितशास्त्रमेंभी आर्यभटने नये नये सिंध्दांतोका अविश्कार किया. भारतमें सबसे पहले उन्होने बिजगणितके ज्ञानका विस्तारसे प्रचार किया. शून्य सिध्दांत और दशमलव संख्याप्रणालीका आविश्कार भारतमें सबसे पहले किसने किया यह बताना जरा मुश्कील है फिरभी आर्यभटने उसका प्रयोग अपने ग्रंथमें कुशलतासे किया हूवा मिलता है. उनकी कामयाबी भारतमेंही नही तो बाहर विदेशमेंभी फैली थी. अरब विद्वानोंको उनके जोतिष्य ज्ञानका बहुत अभिमान था और वे उन्हे 'अरजभट' नामसे पहचानते थे.
तो इस तरह आर्यभट जिन्होने बीजगणितका विकास किया था और ज्योतिष गणितमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया, उनको भारतीय गणितमें और जोतिष्यशास्त्रमें अगर मिल का पत्थर कहा जाए तो गलत नही होगा. उस वक्त लगभग सब ग्रंथ श्लोकके रुपमें रहते थे और उनको खासकर मुखद्गद कर एक पिढीसे दुसरी पिढीके पास सौंपा जाता था. उनका 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ सातवे शतकमें व्यापक रुपसे उपयोगमें लाया जाकरभी वह आगे लोप हूवा यह बात उस ग्रंथमें लिखे ज्ञानके बारेमें एक गूढ जिज्ञासा जागृत करती है. उनका अचूक निकष रहे गणित इस विषयसे और उन्होने जो ज्ञान उनके ग्रंथमें दिया वह एकदम सही रहता था इसकी तरफ गौर करते हूए उनका जो ग्रंथ लोप हुवा जिसमें जोतिष्य ज्ञानके बारेमें ऐसा कुछ लिखा होगा की जो गुप्त रखनेका किसीकोभी मोह हुवा होगा. ऐसाभी हो सकता है की वह ज्ञान गलत हातोंमे पडनेसे विघातक हो सकता था...
वैसे तो कमांड2ने यह रिसर्च पेपर पहलेभी पढा था. फिरभी कमांड2का दिल उत्साहीत हूवा था. बॉसकी शुन्यके बारेंमे, वेदकालीन गणित और जोतिष्याशास्त्रके बारेमें रुची देखते हूए और उनका एकदम सही वक्त बतानेका कौशल्य देखते हूए उसको अब विश्वास हो चला था की बॉसको 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ मिला होगा. कमांड2का अब लगभग आधा काम हुवा था, लेकिन आधा, जो की सबसे महत्वपूर्ण था, वह बचा था. उसको सबसे पहले बॉसचा पत्ता लगना बहुत जरुरी लग रहा था. पहले एक बार जब बॉसका फोन आया था तब उसका नंबर उसके फोनपर नही आया था. बॉसने यह करामात कैसी की थी इसका उसे कुछ पता नही लग अहा था. लेकीन फिरभी उसने बॉसको ढुंढनेका मानो बिडाही उठाया था. उसने टेलीफोन कंपनीमें जाकर बॉसको ट्रेस करनेका प्रयत्न किया था. टेलिफोन कंपनीवाले उसे कुछ खास मदत नही कर पाए थे. लेकिन टेलिफोन कंपनीको एक नयाही अविष्कार हुवा था. उनकी फ्रिक्वेन्सी कोई चोरी कर रहा था इसका. इसके अलावा एक मोटे तौरपर फोन किस इलाकेसे आया था इतनाही वे बता पाए थे. जो इलाका उन्होने बताया था वह काफी बडा था. और ना बॉसका नाम ना चेहरा मालूम होनेसे कमांड2को उसे ढुंढना बडा मुश्कील हो गया था. फिरभी लगभग रोज कमांड2 उस इलाकेमे किसी पागल की तरह घुमता था. और जब घुम घुमकर थक जाता था तबही घरकी ओर रुख करता था. लेकिन बॉसका पत्ता मिलनेके कोई आसार नही नजर आ रहे थे. शायद इतनी बार वह किसी पागल की तरह उस इलाकेमें घुमा, ना जाने कभी बॉस उसके सामनेसेभी गया होगा. लेकिन वह उसे कैसे पहचाननेवाला था. ?
क्रमश:..
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Wednesday, March 19, 2008
Ch-59A : आर्यभट्ट (शून्य-उपन्यास) Hindi
कमांड2 निश्चिंत होकर कुर्सीपर रिलॅक्स होकर बैठा था. उसके सामने टीव्ही शुरु था. लेकिन उसका टीव्हीके तरफ ध्यान कहा था.? वह तो अपनेही धुनमें था. अबतक बॉसने बताए हूए सब काम उसने इमाने इतबारे पुरे किए थे. और उसकी वजहसे बॉसभी उसपर खुश लग रहा था. सबसे महत्वपुर्ण बात यह थी की कमांड1के कत्लका शक बॉसको उसपर नही आया था. वह बिचबिचमें टिव्हीके चॅनल्स बदलकर खबरें देख रहा था. आगजनी, दंगा फसाद, लाठीमार, यह सब खबरें देखते हूए उसे बडा मजा आ रहा था. उसके चेहरेपर एक शैतानी मुस्कुराहट फैली हूई थी. वह अपनी मस्ती दिमागसे झटककर कुर्सीपर सिधा होकर बैठ गया..
मुझे ऐसे सुस्ताकर नही चलेगा...
मुझे अब आगेकी कार्यवाहीके पिछे लगना चाहिए...
वह कुर्सीसे उठ खडा हो गया. उसने वही दोचार चक्कर लगाए और फिर कुछ ठोस निर्णय लेकर वह कमरेमें कोनेमें रखे आलमारीके पास चला गया. आलमारी खोलकर उसने आलमारीका सबसे निचेवाला ड्रॉवर खोला. ड्रॉवर का बक्सा पुरी तरह बाहर निकालकर अपने पैरके पास निचे रख दिया. ड्रॉवर निकालनेके बाद जो खाली जगह बनी थी वहांसे उसने और एक छूपा कप्पा खोला. उस कप्पेसे कुछ ढूंढकर उसने वह चिज अपने पॅन्टके दाए जेब मे रख दी. फिर उसने वह छुपा कप्पा ठिक तरहसे बंद किया, पैरके पास रखा ड्रॉवर उठाकर उसने उसके पहले जगह पर ठिक तरहसे रख दिया और आलमारी बंद कर वह कॉम्प्यूटरके पास जाकर खडा हो गया. कॉम्प्यूटर शुरु किया और कॉम्प्यूटर बूट होनेकी राह देखते हूए कमरेमे फिरसे चहलकदमी करने लगा.
अगली कार्यवाही करनेके पहले मुझे अब ठिक तरहसे तैयारी कर लेनी चाहिए...
अपना लक्ष अभीभी अधूरा है...
जिस लक्षके लिए मैने कमांड1का कत्ल करनेकी रिस्क ली, वह अभीभी पहूचसे बहुत दूर है...
उसने अपने दाए पॅन्टके जेबसे अभी अभी आलमारीसे रखा हूवा पेन ड्राइव्ह निकाला. पेनड्राईव्हकी तरफ देखते हूए वह सोचने लगा.
मुझे अब एकबार बॉसके बारेमे जो मटेरीयल कमांड1के कॉम्प्यूटरपर मिला था उसको एकबार ठिक तरहसे फिरसे पढ लेना चाहिए..
अचानक कमांड2 चहलकदमी करते हूए रुक गया. उसने कॉम्प्यूटरके मॉनिटरकी तरफ देखा. कॉम्प्यूटर बूट हो गया था. कॉम्प्यूटरके पास जाकर प्रथम उसने पेन ड्राईव्ह कॉम्प्यूटरको लगाया. कुर्सी खिंचकर कॉम्प्यूटरके सामने बैठते हूए वह किसी जादूगरकी तरह कॉम्प्यूटरको कीबोर्ड और माऊसके द्वारा अलग अलग कमांड देने लगा. उसने पहले एक बार कमांड1के मेलबॉक्ससे जो महत्वपुर्ण फाईल अपने पेन ड्राईव्हके उपर कॉपी कर रखी थी, खोली. वह एक रिसर्च पेपर था. पेपरका टायटल था.
"आर्यभट्ट्का साहित्य".
उसका अंदाजा था की इस पेपरमें दिए जानकारीके आधारपर उसे भविष्यमें ऐसी कुछ बाते मिलने वाली थी की जिसकी वजहसे उसका फायदा ही फायदा होने वाला था. कमांड1के होठोंपर एक मुस्कुराहट तैरने लगी. शायद उसे भविष्यमें जो फायदा होने वाला था उसके कल्पना मात्रसे वह गदगद हो गया था. वह पेपरमें दिए महत्वपुर्ण मुद्दे पढने लगा...
क्रमश:...
Posted by
Sunil Doiphode
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9:43 AM
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Tuesday, March 11, 2008
Ch-53: वाय स्टार (शून्य-उपन्यास)
जॉन और सॅम कॉर्पोरेशनके ऑफीसमें बैठे थे. जॉनने अपने हातमे जो नक्षा था वह एक ऑफिसरके सामने खोलकर टेबलपर फैलाया. वह शहरका नक्षा था और उसपर पांच क्रास निकालकर उसमेंसे एक गोल चक्र निकाला था. जॉनने पांचवे क्रॉसकी तरफ इशारा कर ऑफीसरसे कहा,
" मि. पिटरसन हमें इस एरियामें रह रहे और जिनके नाम 'वाय' (Y) इस अक्षरसे शुरु होते हो ऐसे लोगोंकी लिस्ट चाहिए "
" इस एरियाके और 'वाय' (Y) इस अक्षरसे शुरु होनेवाले निवासी? मुझे लगता है हमें उसके लिए कॉम्प्यूटरकी सहायता लेनी पडेगी "
फिर पीटरसन खडा होते हूए बोला,
" आवो मेरे सा




