उपन्यास - अद्-भूत
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Wednesday, February 27, 2008

Ch-46: गुगल सर्च (शून्य-उपन्यास)

एकदम हताश, निराश, बुझा हूवा चेहरा लेकर जॉन अॅँजेनीके सामने बैठा था.

" साला ब्लडी बॉस. ..उसने मुझे दगा दिया. " जॉन गुस्सेसे टेबलपर अपनी कसी हूही मुठ्ठी जोरसे मारते हूए बोला.

अॅँजेली उठकर जॉनके पास गई और उसे सहलाते हूए उसके बालोंमे अपना हाथ फेरने लगी.

'' ऐसा लगा की बंदूक सरेंडर करनेके पहले बंदूक की नाल उसके कनपटीमे रखू और सब की सब गोलीयां दाग दूं उसके मस्तकमें ' जॉन फिरसे गुस्सेसे बोला.

अॅँजेलीने उसके बालोंसे अपना हाथ निकाल लिया. और उसके सामने खडी होकर उसे समझानेके सुरमें बोली, '' देखो जॉन, बॉसपर चिढकर कुछ नही होनेवाला ... बॉसने जोभी किया अपनी चमडी बचानेके लिए. उसकी जगह कोईभी होता तो शायद वह वही करता. "

" नही ... पहलेसेही वह मेरे उपर खफा था... वह मौकेकी तलाशमेंही था और कभी ना कभी वह दगा देने वाला था. " जॉनने उसे तोडते हूए कहा.

" लेकिन बॉसने तुम्हे दगा दिया और उसके लिए तुम्हे क्या करना चाहिए यह बात अब उतनी महत्वपुर्ण नही रही. "

जॉनने उसकीतरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

" तूम तुमपर लगे आरोप कैसे निकाल सकते हो यह अब सबसे महत्वपुर्ण है."

" मुझ पर लगे आरोप मै कैसे निकाल सकता हूं ?" जॉनने निराशायुक्त स्वरमें कहा.

" तुमपर लगे आरोप निकालनेका अब एकही रास्ता है "

जॉनने फिरसे उसकी तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

" ... और वह है खुनीको पकडना " उसने जॉनको मानो रास्ता दिखानेकी कोशीश करते हूए कहा.

" पर वह कैसे मुमकीन है ? मेरे सब अधिकार , शस्त्र उन्होने निकाल लीये है. अब अगर मैने प्रयास कीया भी तो भी वह पर टूटे परींदेने आसमानमें उंची उडान भरनेकी कोशीश करने जैसा होगा. "

" नही. ऐसा एकदम हताश होकर नही चलेगा. यह सच है की अब काम बडा जोखीम भरा हो गया है. लेकिन तुम्हारे पास उसके सिवा कुछ चारा भी तो नही है'

जॉन कुर्सीसे उठ गया और खिडकीके पास जाकर खडा हो गया. उसे बाहर रात के अंधेरेमें आसपासके लाईटस की रोशनीमें चमकता हूवा गोल तालाब का पाणी दिखाई दिया.

एकदम शांत ना हलचल ना कोई आवाज...

उस चंचल पाणीको मानो तालाबके किनारोंने बांधा हूवा लग रहा था... .

उसे लग रहा था की शायद उसकी अवस्थाभी कुछ उस पाणी जैसीही थी....

वह गोल तालाबका किनारा देखकर उसे फिरसे शुन्यका खयाल आया. वह स्तब्धतासे काफी समयतक उस तालाबकी तरफ एकटक देखता रहा.

फिर धुमकर वह धीरेसे अँजेनीके पास जाकर खडा हो गया. काफी समयकी चुप्पीके बाद उसेने अँजेनीको एक सवाल पुछा,

" झीरोकी खोज किसने की यह तुम्हे पता है क्या ?"

ईस अचानक सवालसे गडबडाकर अँजेनीने कहा " नही ... लेकिन क्यो?"

जॉन फिरसे खिडकीके पास गया. सोचमें डूबकर वह फिरसे खिडकीके बाहर देखने लगा. फिर बेचैन होकर वह कमरेमे चहलकदमी करने लगा.

अँजेनी उसके दिमागमें क्या चल रहा होगा यह समझनेका प्रयास करती हूई उसके तरफ देखने लगी. लेकिन अँजेनीको उसके खयालोंका कुछ अंदाजा नही हो रहा था.

अचानक रुककर कॉम्प्यूटरकी तरफ निर्देश करते हूए उसने कहा,

"अँजी, जरा वह कॉम्प्यूटरतो शुरु करो"

" कॉम्प्यूटर... किस लिए?" अँजेनीने पुछा.

वह कुछ नही बोला. फिरसे बेचैनीसे कमरेमे चहलकदमी करने लगा. अँजेनी कॉम्प्यूटरके पास गई और उसने कॉम्प्यूटर शुरु किया.

जॉन अपनी चहलकदमी रोककर उसकेपास जाकर कॉम्प्यूटरके सामने बैठ गया और कॉम्प्यूटर बूट होनेकी राह देखने लगा. अँजेनी मॉनिटरकी तरफ देखते हूए कॉम्प्यूटर बूट होनेकी राह देखने लगी.

कॉम्प्यूटर बूट होतेही एकदम शांत था जॉन अचानक हरकतमे आगया. जॉन तेजीसे कीबोर्डकी बटन्स और माऊसकी बटन्स दबाने लगा.

अँजेनीने उससे कुछ ना बोलते हूए शांत रहनाही बेहतर समझा. वह कॉम्प्यूटरके स्क्रीनपर वह क्या कर रहा है यह देखने लगी.

जॉनने पहले इंटरनेट कनेक्ट किया. फिर ब्राऊजरपर डबल क्लीक किया.

ब्राऊजर ओपन होतेही उसने उस ब्राऊजरके 'अॅडेस' के जगह टाईप किया.

"गुगल डॉट कॉम"

गुगल सर्च इंजीनकी साईट ओपन हो गई.

गुगलमें उसने सर्च स्ट्रींग टाईप की.

"झीरो इन्व्हेन्शन"

जॉनके दिमागमें क्या चल रहा था यह सब अब अँजेनीके खयालमें आने लगा था.

" हां, मुझेभी लगता है... शून्यकी खोज किसने की ? इस सवालमेंही कातील कौन है ? और वह कत्ल क्यो कर रहा है ? इन सवालोंका जवाब छिपे होगे. " अँजेनी उत्साहसे बोली.

जॉनका तेजीसे की बोर्ड और माऊसकी बटन्स दबाना शुरुही था. की बोर्ड और माऊसकी बटन्स की आवाजसे उसका दिल मानो भर आने लगा था. हमेशा सानी जब ऐसाही कॉम्प्यूटरपर बैठकर काम करता था और ऐसाही की बोर्डका और माऊसका आवाज आता था तब उसे ऐसाही होता था.

वैसीही भावना अब उसे जॉनके बारेमेंभी लगने लगी थी...

चलो एक तो ठिक हूवा जॉन नये जोशके साथ फिरसे काम करने लगा है ...

उसे बहुत अच्छा और हलका हलका महसुस हो रहा था.

" तूम तुम्हारा चलने दो. मै एक गरम गरम मस्त कॉफी लाती हूं " ऐसा कहते हूए अँजेनी किचनमें चली गई.

क्रमश:...

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