बेडरूममे धुंधलीसी रोशनी थी. बेडपर कोई सोया हूवा दिखाई दे रहा था. एक काले सायेने धीरे धीरे बेडरूममे प्रवेश किया. आतेही बेडरुममे इधर उधर देखते हूए वह साया दरवाजेके पास दिवारपर कुछ ढूंढने लगा. शायद वह कमरेके बल्बका स्वीच ढूंढ रहा था. दिवारपर टटोलनेके बाद उस सायेको एक जगह कुछ इलेक्ट्रीकके स्वीच मिल गए. वह साया एक एक स्वीच दबाकर देखने लगा. आखीर एक बटन दबानेके बाद कमरेका बल्ब जल गया और कमरेमे रोशनी हो गई. वह रोशनी सायेके शरीरपर भी पड गई. एक खुशीकी मंद मंद मुस्कान उस सायेके चेहरेपर दिखने लगी - बल्ब का स्वीच मिलने की खुशी.
वैसे देखा जाए तो बल्ब का स्वीच मिलना यह घटना वह साया जिस कार्यके लिए आया था उसके मुकाबले एक साधारणसी घटना....
लेकिन आदमीका स्वभाव कितना अजीब होता है...
खुशी मनानेका एक भी मौका वह दौडना नही चाहता...
हां, उसकी खुशी की परिभाषा अलग अलग हो सकती है...
अच्छी कृतीमेंही उसे आनंद मिलता है... .
लेकिन फिर उसकी अच्छे बुरे की परिभाषा अपनी अपनी... .
दुसरेके नजरीयेसे गलत कामभी उसके लिए अच्छा हो सकता है..
वह बेडरुममे आया साया दुसरा तिसरा कोई ना होकर कमांड1 था. बेडरुममें रोशनी होतेही बेडपर सोई हूई औरत जग गई और भौचक्कीसी इधर उधर देखने लगी. शायद वह उतनी गहरी निंदमे नही होगी. सामने हाथमें पिस्तौल लिए खडे कमांड1को देखतेही व घबरा गई. डर के मारे उसके हाथपैर कांपने लगे. वह अब जोरसे चिखनेही वाली थी की कमां1ने उसके पिस्तौलका ट्रीगर दबाया. पिस्तौलको शायद सायलेंन्सर लगाया होगा क्योंकी 'धप्प' ऐसा आवाज आया और सामनेकी औरत बेडपर अचेतन होकर गिर गई. उसका चिखनेके लिए खुला मुंह खुला की खुला ही रह गया.
अब कमांड1का चेहरा खुशीसे खिल गया.
" मिस उटीन हॉपर ... आय अॅम सॉरी. मरना यह तुम्हारे तकदिरमें विधातानेही लिखा था... मै कौन तुम्हे मारने वाला ... मै तो सिर्फ उसके हाथ की एक कठपुतली... " कमांड1 खुदसेही बोल रहा था.
झटसे कमांड1ने अपने कोटके दाए जेबसे एक नुकीला छुरा निकाला और खचाखच उसके निश्चल पडे शरीरपर खंजर के वार किए. जब वह खंजर पुरी तरहसे उटीनाके गर्म खुनसे सन गया तभी वह रुका. फिर वह आगे जाकर दिवारपर उस खुनसे लिखने लगा. दिवारपर एक बडा शून्य निकालकर वह आगे लिखनेहीवाला था की दूर कही उसे पुलिसके गाडीका सायरन सुनाई देने लगा. कमांड1ने खिडकीसे बाहर झांका. आवाज अभीभी दूर था. उसने जल्दी जल्दी वह खंजर फिरसे उटीनाके खुनमें डूबोया और दिवारपर वह आगेका लिखने लगा.
to be contd..
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Friday, January 25, 2008
Ch-24: मिस उटीन हॉपर (शून्य-उपन्यास)
Posted by
Sunil Doiphode
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10:45 AM
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Tuesday, January 15, 2008
Ch-15: क्या हूवा? ... (शून्य-उपन्यास)
इधर अँजेनी जॉनकी राह देख देखकर थक गई थी.
क्या हूवा होगा ? ...
जॉन कहा गया होगा?...
इतनी देरसे वह अभीतक वापस क्यों नही आया ?...
उसे चिंता होने लगी थी.
अच्छा फोन करने जाओ तो ...
तो वह अपना मोबाईल यही छोडके चला गया था .
उसे कुछ सुझाई नही दे रहा था. कभी वह अंदर जाकर उसकी राह देखती तो बाहर कुछ आवाज होनेपर फिरसे बाहर आकर देखती थी. उसे उसकी इतनी चिंता क्यो हो?
उसे खुदकाही आश्चर्य लग रहा था. इतनेमें फिरसे बाहर किसी गाडी आनेकी आहट उसे हूई. वह उठकर फिरसे बाहर आ गई. एक गाडी आकर हॉटेलके बाहर आकर रुकी थी. लेकिन वह जॉनकी गाडी नही थी. वह एक प्रायव्हेट टॅक्सी थी. वह अंदर जानेके लिए पलटी तो पिछेसे उसे आवाज आया -
'"अँजेनी''
उसने पलटकर देखा तो टॅक्सीसे जॉन उतरा था. उसके सारे बाल उलझे उलझे और शर्ट एक जगह फटा हूवा और शर्टपर काले काले मैल के धब्बे पडे हूए थे.
क्या हूवा होगा ? ...
उसे चिंता होकर वह जॉनके तरफ जाने लगी. जॉनभी लंगडता हूवा उसकी तरफ आने लगा.
"" क्या हूवा?"" वह तत्परतासे उसके पास जाते हूए वह बोली.
कुछ ना बोलते हूए जॉन लंगडते हूए उसकी तरफ चलने लगा. उसने झटसे जाकर उसे सहारा दिया.
"" हमें हॉस्पीटलमें जाना चाहिए '" अँजेनी उसे कहा कहा लगा यह देखते हूए बोली.
'' नही .... उतना कुछ खास लगा नही ... सिर्फ कुछ कुछ जगह सुजन आई हूई है..'' वह किसी तरह बोला.
'" तो भी चेकअप करनेमें क्या हर्ज है..?" वह जानेवाली टॅक्सीको रुकनेके लिए हाथ दिखाते हूए बोली.
उसने उसे सहारा देकर टॅक्सीमें बिठाया और वहभी उसके पास उसे सटकर बैठ गई.
'' थ्री कौंटीज हॉस्पिटल'" उसने टॅक्सीवालेको आदेश दिया.
'"नही ...सचमुछ वैसी कोई जरुरत नही'' जॉनने कहा.
'' तुम्हारी गाडी किधर है?"" अँजेनीने पुछा.
'" है उधर ... पिछे... रस्तेके किनारे.... बडा अॅक्सीडेंट होते होते बचा '" वह बताने लगा.
'' ड्रायव्हर ... गाडी पोलीस क्वार्टर्सको लेना '" जॉनने बिचमेंही ड्रायव्हरको आदेश दिया.
ड्रायव्हरने गाडी स्लो कर एकबार अँजेनी और फिर जॉनकी तरफ देखा. अँजेनीने 'ठीक है ... वह जहा कहता है उधरही लो' ऐसा ड्रायव्हरको इशारेसेही कहा.
.... to be contd...
Posted by
Sunil Doiphode
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