उपन्यास - अद्-भूत
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Wednesday, March 26, 2008

Ch-61 : कंपाऊंड के अंदर (शून्य-उपन्यास) Hindi

दुसरे हाथसे खुनसे सना हाथ पकडते हूए जॉन उठकर खडा हो गया. खुन जादाही बह रहा था इसलिए उसने जेबसे रुमाल निकालकर उस हाथको कसकर बांध दिया. जखमी हाथको संभालते हूए वह बंगलेके दरवाजेके पास गया. वहाभी एक बडा ताला लगा हूवा था और उस तालेकोभी पुलिसका सील लगा हूवा था. उसने वही खडे होकर बंगलेके चारो ओर एक नजर दौडाई. बंगलेके अंदर जाना, कमसे कम यहांसे तो भी मुमकीन नही लग रहा था. पहले जब बंगलेकी तलाशी हूई थी तब वह बाकी लोगोंके साथही अंदर था. और उसे विश्वास था की उन्होने अंदरकी तलाशी ठिक तरहसे की थी. लेकिन उसे याद आया की बाहरके तलाशीको उतना महत्व ना देकर उसने वह जिम्मेदारी किसी एक नये पुलिसको सौंपी थी. उसने फैसला किया की पहले बंगलेके बाहरी हिस्सेकी जांच करना बेहतर होगा. वैसे कुछ मिलनेकी कोई संभावना नहीके बराबर थी. क्योंकी बिचमें बहुत दिन बित चूके थे और इसलिए बंगलेके अंदरके सबुतसे बाहरके सबुत नष्ट होनेकी जादा संभावना थी.

तोभी चान्स लेनेमें क्या हर्ज है...

शायद बंगलेके बाजुसे या पिछेसे अंदर जानेका कोई रास्ताभी मिल सकता है...

उसने जेबसे टॉर्च निकाला और टार्चका प्लॅश इधर उधर मारते हूए वह बंगलेके दाई तरफसे पिछेकी ओर जाने लगा. बिच बिचमें वह बंगलेपरभी फ्लॅश मारकर अंदर जानेके लिए कोई खिडकी है क्या वह देखने लगा. खिडकीयां थी लेकिन मजबुत जाली लगाई हूई.

तोभी किसी खिडकीकी जाली टूटी हूई हो सकती है, जैसे कंपाऊंडका तार एक जगह टूटा हूवा था...

बंगलेके चारो ओर काफी खुली जगह थी. और उस जगहमें गार्डनभी बनाया हूवा था. लेकिन उसे कभी काटा छाटा नही जा चूका था ऐसा लग रहा था. गार्डनमें घांस और झाडी अच्छी खासी कमरतक बढी हूई थी. जॉन अंधेरेमे टॉर्चके सहारे संभालकर उस घाससे और झाडीसे रास्ता बनाते हूए आगे बढ रह था. उस उंची बढी हूई झाडीके वजहसे कुछ सबुतभी होगा तो वह मिलना मुश्कीलही लग रहा था. लेकिन एक फायदाभी था की अगर कुछ सबुत हो तो वह नष्ट होनेका कालावधी उस झाडीके वजहसे बढनेकी संभावना थी. इधर उधर टार्चकी रोशनी डालते हूए वह बंगलेके पिछवाडे आकर पहूंच गया. पिछेतो दरवाजेकोभी जाली लगी हूई थी. इसलिए वहांसे अंदर जानेकी संभावनाभी खत्म हो गई थी. फिर उसने टार्चके रोशनेमे पिछवाडेका चप्पा चप्पा छान मारा. कुछ खास नही मिल रहा था. धीरे धीरे टॉर्चके रोशनीमें घासके और झाडीके तनेके पास ढूंढते हूए उसने बंगलेको एक पुरा चक्कर लगाया. खुले मैदानमेंभी कुछ नही मिल रहा था और एकभी खिडकीकी जाली टूटी हूई नही थी.

चलो मतलब कमसे कम अबतो अंदर जाना मुमकीन नही लग रहा है...

अंदर जानेके लिए मुझे फिरसे कभी सॅमकी मदद लेनी पडेगी...

और बाहरभी एक बार फिरसे दिनके उजेलेमेंही ढूंढना उचीत होगा...

ऐसा सोचकर वह कंपाऊंडके बाहर जानेके लिए मुडा. इतनेमें एक विचार उसके जहनमें कौध गया. वह एकदमसे रुक गया. मुडकर जल्दी जल्दी बंगलेके बाई तरफसे पिछेकी ओर जाने लगा.
क्रमश:...

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