बंदीगृहमें चारो ओर अंधेरा फैला हूवा था. जॉर्ज एक कोठडीमे गुमसुमसा किसी सोचमें डूबा हूवा एक कोनेमें बैठा हूवा था. अचानक वह उठ खडा हूवा और अपने पहने हूए कपडे पागलोंकी तरह फाडने लगा. कपडे फाडनेके बाद उसने कोठरीमे इधर उधर पडे फटे कपडेके टूकडे जमा किये. उस टूकडोका वह फिरसे एक गुड्डा बनाने लगा. गुड्डा तैयार होनेके बाद उसके चेहरेपर एक रहस्यसे भरी, डरावनी हंसी फैल गई.
'' मि. ख्रिस्तोफर ऍन्डरसन... अब तुम्हारी बारी है... समझे'' वह पागलोकी तर उस गुड्डेसे बोलने लगा.
वहां ड्यूटीपर तैनात पुलिस काफी समयसे जॉर्जकी हरकतोपर बराबर नजर रखे हूए था. जैसेही उसने जॉर्ज बातचीत सुनी वह तेजीसे उठकर फोनके पास गया - अपने वरिष्ठ अधिकारीको इत्तला करनेके लिए.
ख्रिस्तोफर अपने घरमें, हॉलमें पिते हूए बैठा था. साथही वह चेहरेपर काफी सारी चिंताए लेकर एक के बाद एक लगातार सिगारेट पिये जा रहा था. थोडी देरसे वह उठ खडा हूवा और सोचते हूए कमरेमें धीरे धीरे चहलकदमी करने लगा. उसकी चालसे वह काफी थका हूवा मालूम पड रहा था. या फिर मदीराके चढे हूवे नशेसे वह वैसा लग रहा होगा. थोडी देर चहलकदमी करनेके बाद वह फिरसे कुर्सीपर बैठ गया और अपनीही सोचमें डूब गया. अचानक उसे घरमें किसी उपस्थीतीका अहसास हूवा. कोई किचनमे बर्तनोंसे छेडखानी कर रहा हो ऐसा लग रहा था.
किचनमें इस वक्त कौन होगा ?...
सब दरवाजे खिडकियां तो बंद है... .
की यहभी कोई आभास है ?...
अचानक एक बडा बर्तन फर्शपर गिरनेका आवाज होगया. क्रिस्तोफर एकदम उठकर खडा हो गया.
क्या हूवा होगा.?
उसका दिल जोर जोरसे धडकने लगा.
मै फालतूही घबरा रहा हू... कोई बिल्ली वैगेरा होगी. ...
उसने खुदको समझानेकी कोशीश की और धीरे धीरे चलते हूए, कोई आहट आती है क्या यह सुनते हूए, वह किचनमें जाने लगा.
किचनसे अब आवाजें आना बंद हूवा था. कुछ आहटभी नही थी. वह किचनके दरवाजेकेपास गया. और धीरेसे किचनका दरवाजा तिरछा करते हूए उसने अंदर झांककर देखा.
किचनमेंतो कोई नही दिख रहा है ...
वह किचनमें घुस गया. अंदर जानेके बाद उसने इधर उधर नजर दौडाकर देखा, पुरे किचनका एक राऊंड लगाया.
कहा? .. कुछ तो नही...
या मुझे सिर्फ आभास हो रहे है...
लेकिन जमिनपर एक खाली बर्तन पडा हूवा था.
वह संभ्रमकी स्थितीमें किचनसे वापस जानेके लिए मुडाही था की उसे अब हॉलसे कुछ टूटनेका आवाज आ गया. ख्रिस्तोफर चौंक गया और दौडते हूए हॉलमें चला गया.
हॉलमें उसे उसका व्हिस्कीका ग्लास निचे जमिनपर गिरकर टूटा हूवा मिला. व्हिस्की निचे गिरकर इधर उधर फैली हूई थी. उसने आसपास नजर दौडाई. कोई नही था.
ख्रिस्तोफरकी नशा पुरी तरह उतर चूकी थी.
साला कोई तो नही...
यह क्या हो रहा है मुझे ? ...
ग्लास निचे कैसे गिर गया?...
वह सोचते हूए फिरसे कुर्सीपर बैठ गया. उब उसने पुरी की पुरी बॉटलही मुंहको लगाई थी.
क्रमश:...
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उपन्यास - अद्-भूत (संपूर्ण) The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA. आप यह उपन्यास अपने दोस्तोंको ईमेलभी कर सकते है. |
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Monday, June 2, 2008
Books Library - Novels - अद-भूत / Aghast CH 33 अब तुम्हारी बारी है
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Sunil Doiphode
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Monday, January 21, 2008
Ch-20: बॉसका मेसेज. ... (शून्य-उपन्यास)
वह मेल और उसकी अटॅचमेंट्स पूरी तरह पढनेके बाद कमांड2 कॉम्प्यूटरसे उठ गया. उसके चेहरेपर एक संतोष झलक रहा था. वह सब जानकारी उसने उसके दिमागमें, दिलमें और इतनाही नही अपने पास रखे थंब ड्राईव्हमेभी संजोकर रखी थी. वह वहासे जानेके लिए मुडनेही वाला था इतनेमें काम्प्यूटरका बझर बजा. उसने देखा तो कमांड1को मेल आई थी. उसने जाकर कमांड1के खुले मेलबॉक्समें देखा तो मेल बॉसकीही थी. वह फिरसे कॉम्प्यूटरके सामने बैठ गया, मेल खोली. मेलके साथ एक अटॅचमेंट थी. उसने अटॅचमेंट खोली तो वह एक मॅडोनाकी सुंदर सेक्सी तस्वीर थी. बॉस मॅडोनाका जरा जादाही फॅन लगता है... .
उसने सोचा. अबतक कमांड2 कमांड1का देख देखकर तस्वीरमें छिपा हूवा मेसेज कैसा खोलनेका यह सिख गया था. उसने तस्वीरमें छिपा मेसेज खोला. उसमें आगेकी कार्यवाईके बारेंमे लिखा था. आगेका खून कब, किसका करनेका यह सब विस्तारसे लिखा था. आज 15 तारीख थी और आगेके खुनके लिए 17 तारीख मुकम्मल की थी. उस मेलमें 17 तारीख के रात 1 से 3 का वक्त एकदम अनुकल है ऐसा लिखा था. और 16 तारख का पूरा दिन और रात बहूत ही खतरनाक वक्त है ऐसा लिखा था. कमांड2 ने वह पूरा मेसेज एक जगह कॉपी करके रखा. क्योंकी वह मेसेज एकबार खोलनेके बाद खत्म हो जाता था. उसे बॉसने उस तरहसे प्रोग्रॅम किया था. कमांड2ने वह मेल बंद की. मेसेज अब खत्म हो चूका था. अचानक कमांड2 अपने कुर्सीसे उठकर खडा हो गया और दिमाग में कुछ तुफान उठे जैसा रुममें कॉम्प्यूटरके आसपास चहलकदमी करने लगा. उसके दिमागमें कुछ कश्मकश चल रही थी यह स्पष्ट रुपसे दिख रहा था. आखीर वह अपनी चहलकदमी रोककर कॉम्प्यूटरके सामने रखी कुर्सीपर जाकर बैठ गया. वह शायद कुछ निश्चयतक पहूंच गया था.
उसने बॉसका आया हूवा मेसेज बदलनेका निर्णय लिया था.... .
उसने वह मेसेज 'इडीट' करनेके लिए ओपन किया. फिर एकबार इधर उधर देखते हूए उसने अपना इरादा पक्का किया और फिर वह मेसेज 'इडीट' करने लगा. खुनके लिए जो उचीत वक्त दिया था वह 17 तारीख रात 1 से 3 ऐसा लिखा था उसने वह बदलकर 16 तारीख रात 1 से 3 ऐसा किया. उस मेसेजमें 16 तारख की पुरी रात और दिन अति खतरनाक है ऐसा जिक्र किया था. वह बदलकर उसने 17 तारीख ऐसा किया. मतलब खुनके लिए जो उचीत वक्त था वह खतरनाक है ऐसे और जो खतरनाक था वह उचीत है ऐसा उलट फेर उसने मेसेजमें किया था.
ऐसा उसने क्यो किया?
उसके दिमागमें क्या खिचडी पक रही थी यह बताना बहुत मुश्किल था.
शायद उसका उसके बॉसके भविष्यकथनपर भरोसा नही था. शायद उसे उसका बॉस जो भविष्य बताता है वह सच होता है की नही यह देखना था.
लेकिन अगर उसके बॉसने बताया हूवा सच हूवा तो ?..
ऐसी स्थीतीमें कमांड1 और उसके खुदके जानको खतरा था. फिर इसमेंसे कुछतो रस्ता निकालना पडेगा...
वह सोचने लगा.
आखीर उसने फैसला किया की इस बार वह कमांड1के साथ नही जाएगा. कुछ बहाना बनाकर वह कमांड1को अकेला जानेके लिए विवश करने वाला था.
... to be contd...
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Sunil Doiphode
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