उपन्यास - अद्-भूत
The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA.
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Friday, May 9, 2008

Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-18 : वे चार और ये दोनो (Hindi books literature sahitya)

अपना पिछा हो रहा है इसका अब पुरा यकिन नॅन्सी और जॉनको हो चूका था. वे दोनोभी घबराए और गडबडाए हूए थे. यह शहर उनके लिए नया था. वे उन चारोंसे बचनेके लिए जिधर रास्ता मिलता उधर जा रहे थे. चलते चलते वे एक ऐसे सुनसान जगहपर आये की जहा लोग लगभग नही के बराबर थे. वैसे रातभी काफी हो चूकी थी. यहभी एक वहां लोग ना होनेकी वजह हो सकती थी. उसने पिछे मुडकर देखा. क्रिस्तोफर और उसके दोस्त अभीभी उनका पिछा कर रहे थे. नॅन्सीका दिल धडकने लगा. जॉनकोभी कुछ सुझ नही रहा था. अब क्या किया जाए, दोनोभी इस संभ्रममे थे. वे तेजीसे चल रहे थे और उनसे जितना दुर जा सकते है उतनी कोशीश कर रहे थे. आगे रास्तेपर तो औरभी घना अंधेरा था. वे दोनो और उनके पिछे उनका पिछा कर रहे वे चार लडके इनके अलावा उनको वहां और कोईभी नही दिख रहा था.

''लगता है उनके खयालमें आया है की हम उनका पिछा कर रहे है '' स्टीव्हन अपने साथीयोंसे बोला.

'' आने दो ... वह तो कभी ना कभी उनके खयालमें आनेही वाला था '' क्रिस्तोफरने बेफिक्र अंदाजमें कहा.

'' वे बहुत डरे हूए भी लग रहे है ... '' पॉलने कहा.

'' डरनाही तो चाहिए ... अब डरके वजहसेही अपना काम होनेवाला है... कभी कभी डरही आदमीको कमजोर बना देता है.. '' रोनॉल्डने कहा.

जॉनने पिछे मुडकर देखा तो वे चारो तेजीसे उनकी तरफ आ रहे थे.

'' नॅन्सी ... चलो दौडो... '' जॉन उसका हाथ पकडते हूए बोला.

एकदुसरेका हाथ पकडकर वे अब जोरसे दौडने लगे.

'' हमें पुलिसमें जाना चाहिए क्या ?'' नॅन्सीने दौडते हूए पुछा.

'' अब यहां कहा है पुलिस... और अगर हम ढूंढकर गएभी ... तो वेभी हमेंही ढूंढ रहे होंगे... अबतक तुम्हारे घरवालोंने पुलिसमें रिपोर्ट दर्ज की होगी ... '' जॉन दौडते हूए किसी तरह बोल पा रहा था.

दौडते हूए वे घने अंधेरेमे डूबे हूए एक संकरी गलीमें घुस गए. क्रिस्तोफर और उसके दोस्तभी उनके पिछेही थे. वे जब गलीमें घुसनेहीवाले थे की उतनेमे एक बडासा ट्रक रास्तेसे उनके और उस गलीके बिचमेंसे गुजर गया. वे ट्रक पास होनेतक रुक गए. और जब ट्रक पास हो चूका था तब उनको उस गलीमें कोई नही दिख रहा था. वे गलीमें घुस गए. गलीके दुसरे सिरे तक तेजीसे दौड गए. वहां रुककर उन्होने आजुबाजु देखा. लेकिन उन्हे जॉन और नॅन्सी कही नही दिखाई दे रहे थे.

क्रिस्तोफर और उसके दोस्त इधर उधर देखते हूए एक चौराहेपर खडे हो गए. उन्हे नॅन्सी और जॉन कहीभी नही दिखाई दे रहे थे.

'' हम सब लोग चारो तरफ फैलकर उन्हे ढूंढते है ... वे हमारे हाथसे छुटना नही चाहिए. '' क्रिस्तोफरने कहा.

चार लोग चार दिशामे, चार रस्तेसे जाकर फैल गए और उन्हे ढूंढने लगे.

नॅन्सी और जॉन रास्तेके किनारे पडे एक ड्रेनेज पाईपमें छिप गए थे. शायद ड्रेनेज पाईप्स नये डालनेके लिए या बदलनेके लिए वहां लाकर डाले होंगे. इतनेमे अचानक उन्हे उनकी तरफ दौडते हूए आ रहे किसीके पैरोकी आहट हो गई. वे अब वहांसे हिलभी नही सकते थे. वे अगर इस हालमें उन्हे मिले तो उनके पास करनेके लिए कुछ नही बचा था. उन्होने बिल्लीके जैसे अपनी आखे मुंदकर अपने आपको जितना हो सकता है उतना सिमटनेकी कोशीश की. इसके अलावा वे करभी क्या सकते थे. ?

अब उनके खयालमें आया की वह दौडकर आनेवाला, उन्ही चारोंमेसे एक, अब उनके पाईपके पास पहूंच गया है. वह नजदिक आतेही जॉन और नॅन्सी एकदम शांत लगभग सांसे रोककर कुछभी हरकत ना करते हूए वैसे ही छिपे रहे. वह अब पाईपके एकदम पास आकर पहूंचा था.

वह उन चारोंमेंसेही एक स्टीव्हन था. उसने आजुबाजु देखा.

'' साले कहा गायब होगए ?'' वह चिढकर अपने आपसेही बुदबुदाया.

उतनेमें स्टीव्हनका पाईपकी तरफ खयाल गया.

जरुर साले इस पाईपमें छिपे होंगे....

उसने अनुमान लगाया. वह पाईपके और करीब गया. वह अब झुककर पाईपमें देखनेही वाला था. इतनेमे....

'' स्टीव... जरा इधर तो आवो .... जल्दी '' उधरसे क्रिस्तोफरने उसे आवाज दिया.

स्टीव्हन पाईपमें झुककर देखते देखते रुक गया, उसने आवाज आया उस दिशामें देखा और मुडकर दौडते हूए उस दिशामें चला गया.

जानेवाले पैरोंका आवाज आतेही नॅन्सी और जॉनने सुकूनकी सांस ली.


क्रमश:...

Tuesday, May 6, 2008

Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-15 : फैसला

जॉनके दिमागमें विचारोकी कश्मकश चल रही थी. अब वह जो फैसला लेनेवाला था उसकी वजहसे होनेवाले सब परिणामोंके बारेमें वह सोच रहा था. नॅन्सीके साथ लायब्ररीमें किए चर्चासे दो-तीन बाते एकदम साफ हो गई थी -

एक तो नॅन्सी भलेही उपरसे ना लगे लेकिन अंदरसे वह बहुत खंबीर और जबान की पक्की है...

वह किसीभी हालमें मुझे नही छोडेगी...

या फिर वैसा सोचेगीभी नही .....

लेकिन अब उसे अपने आपकाही भरोसा नही लग रहा था.

मैभी उसकी तरह अंदरसे खंबीर और पक्का हू क्या ?...

बुरे वक्तमें मेरा उसके प्रती प्रेम वैसाही कायम रहेगा क्या ?...

या बुरे वक्तमें वह बदल सकता है ?..

वह अब खुदकोही आजमा रहा था. वक्तही वैसा आया था की उसे खुदकाही विश्वास नही लग रहा था.

परंतू नही ...

मुझे ऐसा ढिला ढाला रहकर नही चलेगा...

मुझेभी कुछ ठोस फैसला लेना होगा..

और एक बार निर्णय लिया तो फिर बादमें उसके कुछ भी परिणाम हो, मुझे उसपर कायम रहना होगा...


जॉनने आखीर मनही मन एक ठोस फैसला लिया.

अपने कमरेका दरवाजा अंदरसे बंद कर वह उसे जिसकी जरुरत पडेगी वह सारी चिजे अपने बॅगमें भरने लगा.

सबकुछ ठिक तो होगा ना ?...

मुझे मेरे घरवालोंको सब बताना चाहिए क्या ?...

सोचते सोचते उसने अपनी सारी चिजें बॅगमें भर दी.

कपडे वैगेरा बदलकर उसने कुछ बचातो नही इसकी तसल्ली की. आखरी बची हूई एक चिज डालकर उसने बॅककी चैन लगाई. चेनका एक विशीष्ट ऐसा आवाज हूवा. उसने वह बॅग उठाकर सामने टेबलपर रख दी और टेबलके सामने रखे कुर्सीपर थोडा सुस्तानेके लिए बैठ गया. वह एक-दो पलही बैठा होगा की इतनेमें उसका मोबाईल व्हायब्रेट हो गया. उसने जेबसे मोबाईल निकालकर उसका डीस्प्ले देखा. डिस्प्लेपर उसे 'नॅन्सी' ऐसे डिजीटल शब्द दिखाई दिए. वह तुरंत कुर्सीसे उठ खडा हूवा. मोबाईल बंद किया, बॅग उठाई और धीरेसे कमरेसे बाहर निकल गया.

इधर उधर देखते हूए सावधानीसे जॉन मुख्य दरवाजेसे बाहर आ गया और उसने दरवाजा बाहरसे खिंचकर बंद कर लिया. फिर जॉगींग कियेजैसा वह कंधेपर बॅग लेकर कंपाऊंडके गेटके पास गया. बाहर रास्तेपर उसे एक टॅक्सी रुकी हूई दिखाई दी. कंपाऊंड के गेटसे बाहर निकलकर उसने गेटभी खिंचकर बंद कर लिया. टॅक्सीके पास पहूंचतेही उसे टॅक्सीमें पिछली सिटपर बैठकर उसकी राह देख रही नॅन्सी दिखाई दी. दोनोंकी नजरे मिली. दोनो एकदुसरेकी तरफ देखकर मुस्कुराए. झटसे जाकर वह बॅगके साथ नॅन्सीके बगलमें टॅक्सीमें घुस गया. टॅक्सीके दरवाजेका बडा आवाज ना हो इसका खयाल रखते हूए उसने सावधानीसे दरवाजा धीरेसे खिंच लिया. दोनो एकदुसरेकी बाहोंमे घुस गए. उनके चेहरेपर एक विजयी हास्य फैल गया था.

अब उनकी टॅक्सी घरसे बहुत दुर तेजीसे दौड रही थी. वे दोनो तेजीसे दौडती टॅक्सीके खिडकीसे आरहे तेज हवाके झोकेंका आनंद ले रहे थे. लेकिन उन्हे क्या पता था की एक काला साया पिछे एक दुसरी टॅक्सीमें बैठकर उनका पिछा कर रहा था.....


.... डिटेक्टीव्ह बेकर हकिकत बयान करते हूए रुक गया. डिटक्टीव सॅमने वह क्यों रुका यह जाननेके लिए उसके तरफ देखा. डिटेक्टीव्ह बेकरने सामने रखा ग्लास उठाकर पाणीका एक घूंट लिया. तबतक ऑफिसबॉयने चाय पाणी लाया था. डिटेक्टीव्हने वह उसके सामने बैठे डिटेक्टीव सॅम और उसके साथ आये एक ऑफिसरको परोसनेके लिए ऑफिसबायको इशारा किया.


क्रमश:...

Thursday, April 24, 2008

Hindi novel - अद्-भूत : Ch-8 : गोल्फ

डिटेक्टीव सॅम गोल्फ खेल रहा था. रोजमर्राके तनाव से मुक्तीके लिए यह एक अच्छा खासा उपाय उसने ढूंडा था. उसने एक जोरका शॉट मारनेके बाद बॉल आकाशसे होकर होल की तरफ लपक गया. बॉलने दो तिन बार गिरकर उछला और आखीर होलसे लगभग छे फिटकी दुरीपर लूढकते हूए रुका. सॅम बॉलके पास गया. जमीनके चढाई और ढलानका उसने अंदाजा लिया. बॉलके उपरसे टी घुमाकर उसे कितने जोरसे मारना पडेगा ईसका अनुमान लगाया. और बडी सावधानीसे, सही दिशामें, सही जोर लगाकर उसने हलकेही एक शॉट लगाया और बॉल लूढकते हूए बराबर होलमें जाकर समा गया. डिटेक्टीवके चेहरेपर एक जित की खुशी झलकने लगी. इतनेमें अचानक सॅमका मोबाईल बजा. डिटेक्टीव्हने डिस्प्ले देखा. लेकिन फोन नंबर तो पहचानका नही लग रहा था. उसने एक बटन दबाकर फोन अटेंड किया, ''यस''

'' डिटेक्टीव बेकर हियर'' उधरसे आवाज आया.

'' हा बोलो'' सॅम दुसरे गेमकी तैयारी करते हुए बोला.

'' मेरे जानकारीके हिसाबसे आप हालहीमें चल रहे सिरियल केसके इंचार्च हो ... बराबर?'' उधरसे बेकरने पुछा. .

'' जी हां '' सॅमने सिरीयल किलरका जिक्र होतेही अगला गेम खेलने का विचार त्याग दिया और वह आगे क्या बोलता है यह ध्यानसे सुनने लगा.

'' अगर आपको कोई ऐतराज ना हो ... मतलब अगर आज आप फ्री हो तो... क्या आप इधर मेरे पुलिस स्टेशनमें आ सकते हो?... मेरे पास इस केसके बारेमें कुछ महत्वपुर्ण जानकारी है... शायद आपके काम आयेगी..''

'' ठिक है ... कोई बात नही .. '' कहते हूए बगल से गुजर रहे लडकेको सामान उठानेका इशारा करते हूए सॅमने कहा.

सॅमने बेकरसे फोनपर मिलनेका वक्त वगैरे सब तय किया और वह सामान उठाकर ले जा रहे लडकेके साथ वापस हो लिया.


क्रमश:...

Wednesday, April 23, 2008

Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-7 : रोनाल्ड पार्कर

रोनाल्ड पार्कर, उम्र पच्चीस के आसपास, स्टायलीस्ट, रुबाबदार, अपने बेडरुमें सोया था. वह रह रहकर बेचैनीसे अपनी करवट बदल रहा था. इससे ऐसा लग रहा था की आज उसका दिमाग कुछ जगहपर नही था. थोडी देर करवट बदलकर सोनेकी कोशीश करनेके बादभी उसे निंद नही आ रही थी यह देखकर वह बेडसे उठकर बाहर आ गया, इधर उधर एक नजर दौडाई, और फिरसे बेडपर जाकर बैठ गया. उसने बेडके बगलमें रखा एक मॅगझीन उठाया और उसे खोलकर पढते हूए फिरसे बेडपर लेट गया. वह उस मॅगझीनके पन्ने, जिसपर लडकियोंकी नग्न तस्वीरे छपी थी, पलटने लगा.

सेक्स इज द बेस्ट वे टू डायव्हर्ट यूवर माईंन्ड ...

उसने सोचा. अचानक दुसरे कमरेसे 'धप्प' ऐसा कुछ आवाज उसे सुनाई दिया. वह चौंककर उठ बैठा , मॅगॅझीन बगलमें रख दिया और वैसीही डरे सहमे हालमें वह बेडसे निचे उतर गया.

यह कैसी आवाज .....

पहले तो कभी नही आई थी ऐसी आवाज... .

लेकिन आवाज आनेके बाद मै इतना क्यो चौक गया...

या हो सकता है आज अपनी मनकी स्थीती पहलेसेही अच्छी ना होनेसे ऐसा हूवा होगा...

धीरे धीरे इधर उधर देखते हूए वह बेडरुमके दरवाजेके पास गया. दरवाजेकी कुंडी खोली और धीरेसे थोडासा दरवाजा खोलकर अंदर झांककर देखा.

सब घरमें ढुंढनेके बाद रोनाल्डने हॉलमें प्रवेश किया. हॉलमें घना अंधेरा था. हॉलमेंका लाईट जलाकर उसने डरते हूएही चारो तरफ एक नजर दौडाई.

लेकिन कुछभीतो नही...

सबकुछ वहीका वही रखा हूवा ...

उसने फिरसे लाईट बंद किया और किचनकी तरफ निकल पडा.

किचनमेंभी अंधेरा था. वहांका लाईट जलाकर उसने चारोतरफ एक नजर दौडाई. अब उसका डर काफी कम हो चूका था. .

कहा कुछ तो नही ...

इतना डरनेकी कुछ जरुरत नही थी... .

वह पलटनेके लिए मुडनेही वाला था की किचनमें सिंकमें रखे किसी चिजने उसका ध्यान आकर्षीत किया. उसकी आंखे आश्चर्य और डर की वजहसे बडी हूई थी. एक पलमें इतने ठंडमेंभी उसे पसिना आया था. हाथपैर कांपनए लगे थे. उसके सामने सिंकमें खुनसे सना एक मांसका टूकडा रखा हूवा था. एक पलकाभी समय ना गंवाते हूए वह वहा से भाग खडा हूवा. क्या किया जाए उसे कुछ सुझ नही रहा था. गडबडाये और घबराये हूए हालमें वह सिधा बेडरुममे भाग गया और उसने अंदरसे कुंडी बंद कर ली थी.


क्रमश:...

Monday, April 21, 2008

Ch-5 : मांस का टूकडा ( hindi sahitya - अद्-भूत ) Hindi

बाहर एक कॉलनीके प्लेग्राऊंडपर छोटे बच्चे खेल रहे थे. इतनेमें कर्कश आवाजमें सायरन बजाती हूई एक पुलिसकी गाडी वहांसे, बगलके रास्तेसे तेजीसे गुजरने लगी. सायरनका कर्कश आवाज सुनतेही कुछ खेल रहे छोटे बच्चे घबराकर अपने अपने मां बापकी तरफ दौड पडे. पुलिसकी गाडी आयी उसी गतिमें वहांसे गुजर गई और सामने एक मोड पर दाई तरफ मुड गई.
पुलिसकी गाडी सायरन बजाती हूई एक मकानके सामने आकर रुक गई. गाडी रुके बराबर डिटेक्टीव्ह सॅमके नेतृत्वमें एक पुलिसका दल गाडीसे उतरकर मकानकी तरफ दौड पडा.
'' तुम लोग जरा मकानके आसपास देखो...'' सॅमने उनमेंके अपने दो साथीयोंको हिदायत दी. वे दोनो बाकी साथीयोंको वही छोडकर एक दाई तरफसे और दुसरा बाई तरफसे इधर उधर देखते हूए मकानके पिछवाडे दौडने लगे. बाकीके पुलिस और सॅम दौडकर आकर मकानके मुख्य द्वारके सामने इकठ्ठा होगए. उसमेंके एकने , जेफने बेलका बटन दबाया. बेल तो बज रही थी लेकिन अंदर कुछ भी आहट नही सुनाई दे रही थी. थोडी देर राह देखकर जेफने फिरसे बेल दबाई. , इसबार दरवाजा भी खटखटाया.
'' हॅलो ... दरवाजा खोलो.. '' किसीने दरवाजा खटखटाते हूए अंदर आवाज दी.
लेकिन अंदर कोई हलचल या आहट नही थी. आखिर चिढकर सॅमने आदेश दिया , '' दरवाजा तोडो ''
जेफ और और एक दो साथी मिलकर दरवाजा जोर जोरसे ठोक रहे थे.
'' अरे इधर धक्का मारो''
'' नही अंदरकी कुंडी यहा होनी चाहिए... यहां जोरसे धक्का मारो ''
'' और जोरसे ''
'' सब लोग सिर्फ दरवाजा तोडनेमें मत लगे रहो ... कुछ लोग हमें गार्ड भी करो ''
सब गडबडमें आखिर दरवाजा धक्के मार मारकर उन्होने दरवाजा तोड दिया.
दरवाजा तोडकर दलके सब लोग घरमें घुस गए. डिटेक्टीव्ह सॅम हाथमें बंदूक लेकर सावधानीसे अंदर जाने लगा. उसके पिछे पिछे हाथमें बंदूक लेकर बाकी लोग एकदुसरेको गार्ड करते हूए अंदर घुसने लगे. अपनी अपनी बंदूक तानकर वे सब लोग तुरंत घरमें फैलने लगे. लेकिन हॉलमेंही एक विदारक दृष्य उनका इंतजार कर रहा था. जैसेही उन्होने वह दृष्य देखा, उनके चेहरेका रंग उड गया था. उनके सामने सोफेपर पॉल गीरा हूवा था, गर्दन कटी हूई, सब चिजे इधर उधर फैली हूई, उसकी आंखे बाहर आई हूई थी, और सर एक तरफ ढूलका हूवा था. उसकाभी खुन उसी तरहसे हूवा था जिस तरहसे स्टिव्हनका. सारी चिजे इधर उधर फैली हूई थी इससे यह प्रतित हो रहा था की यह भी मरने के पहले बहुत तडपा होगा.
'' घरमें बाकी जगह ढुंढो '' सॅमने आदेश दिया.
टीमके तिनचार मेंबर्स मकानमें कातिलको ढूंढनेके लिए इधर उधर फैल गए.
'' बेडरुममेंभी ढूंढो '' सॅमने ने जाने वालोंको हिदायद दी.
डिटेक्टीव्ह सॅमने कमरेंमे चारो तरफ एक नजर दौडाई. सॅमको टिव्हीके स्क्रिनपर बहकर निचेकी ओर गई खुनकी लकीर और उपर रखा हूवा मांसका टूकडा दिख गया. सॅमने इन्व्हेस्टीगेशन टीमके एक मेंबर को इशारा किया. वह तुरंत टिव्हीके पास जाकर वहा सबूत इकठ्ठा करनेमें जूट गया. बादमें सॅमने हॉलकी खिडकीयोंकी तरफ देखा. इसबार भी सारी खिडकीयां अंदरसे बंद थी. अचानक सोफेपर गीरे किसी चिजने सॅमका ध्यान खिंच लिया. वह वहा चला गया, जो था वह उठाकर देखा. वह एक बालोंका गुच्छा था, सोफेपर बॉडीके बगलमें पडा हूवा. वे सब लोग आश्चर्यसे कभी उस बालोंके गुच्छेकी तरफ देखते तो कभी एक दुसरेकी तरफ देखते. इन्व्हेस्टीगेशन टीमके एक मेंबरने वह बालोंका गुच्छा लेकर प्लास्टीकके बॅगमें आगेकी तफ्तीशके लिए सिलबंद किया. जेफ गडबडाया हूवा कभी उस बालोंके गुच्छेको देखता तो कभी टिव्हीपर रखे उस मांसके टूकडेकी तरफ. उसके दिमागमें... उसकेही क्यों बाकी लोगोंके दिमागमेंभी एक ही समय काफी सारे सवाल मंडरा रहे थे. लेकिन पुछे तो किसको पुछे?
क्रमश:...

Thursday, March 27, 2008

Ch-62 : लता (शून्य-उपन्यास) Hindi

बंगलेके बाई तरफ एक जगह एक फुलोंसे लदी हूई लता थी. फुलोकी खुशबुभी मन मोह लेनेवाली थी. वह लता बंगलेके दिवारका, खिडकीका और पाईपका सहारा लेते हूए उपर टेरेसतक पहूंच गई थी. उसने टॉर्चकी रोशनी डालते हूये उस लता को निचेसे उपरतक गौरसे देखा. वह फुलोंसे पुरीतरह लदी हूई थी. फिर उसने उसकी तरफ उपरसे निचे तक गौरसे देखा. लताके तले बहुत सारा कचरा पडा हूवा था. निचे पॉलीथीन बॅग्ज, कागजके मसले हूए टूकडे, इस तरह का बहुत सारा कचरा पडा हूवा था. जॉन घूटनोपर बैठकर उस कचरेमे कुछ मिलता है क्या यह देखने लगा. उसने अपने जेबसे एक बडीसी पॉलीथीन बॅग निकाली और उसमें वह वहा के कचरेसे जो भी महत्वपुर्ण लगा या महत्वपुर्ण होनेकी संभावना थी ऐसा कचरा उस बॅगमे ठूसने लगा. उस कचरेमें ढूंढनेके बाद उसने उस लता को पकडकर जोर जोरसे हिलाया. उसके शरीरपर फुलोंकी बरसात होने लगी. और कुछ गिरनेका 'धप.. धप' ऐसा आवाज आने लगा. उसने टॉर्च के रोशनीमें गौरसे देखा तो उस लताके टहनीयोंमे अटका हूवा और कुछ कचरा निचे गिर गया था. उसमेंकाभी कुछ छाटकर उसने अपने बॅगमें ठूंस दिया. उसे एक पॉलीथीनकी बॅग मिल गई. उसका मुंह गांठ मारकर बंधा हूवा था. उसने वह पॉलीथीन बॅग हिलाकर देखी. अंदरसे कुछ बजनेका आवाज आ रहा था. जो भी होगा बादमें देखेंगे...

ऐसा सोचकर उसने वह बॅगभी अपने बॅगमें डाल दी.

चलो अब बहुत हो गया...

अब मुझे चलना चाहिए...

जॉनने बॅग उठाई और कंपाऊंडकी तरफ वापस जानेके लिए निकल पडा.

जॉनको घर आते आते सुबहके चार बज चूके थे. वह पुरी तरहसे थक चूका था. पॉलीथीन बॅग निचे रखकर दुसरे जखमी हाथको संभालते हूऐ उसने क्वार्टरका दरवाजा खोला. उसे याद आगया की एकबार ऐसेही जब उसका अॅक्सीडेंट हुवा था तब अँजेनीने उसे संभालते हूए घर लाया था. और क्वार्टरका ताला उसनेही खोला था. उसकी याद आतेही उसका मन फिरसे खट्टू होगया.

दरवाजा खोलते खोलते उसे याद आया -

अरे व्हिस्कीकी बॉटल लाना तो मै भूलही गया....

मै बाहर निकलने का एक उद्देश व्हिस्कीकी बॉटल्स लाना यह था और वही मै भूल गया ...

दरवाजा खोलकर निचे रखे पॉलीथीनकी थैलीकी तरफ देखकर उसने सोचा -

चलो तो अपना दर्द भूलनेके लिए अपने पास और एक काम है...

इस कचरेमें कुछ महत्वपुर्ण मिलता है क्या यह ढूंढना...

पॉलीथीनकी थैली उठाकर वह घरके अंदर चला गया. अंदरसे दरवाजा बंद कर लिया और सोफेपर बैठकर वह उस थैलीसे एक एक मसला हूवा कागज बाहर निकालकर उसे ठिक कर उसमें कुछ मिलता है क्या यह देखने लगा. सब कागजके टूकडे टटोलकर खतम होगए लेकिन कुछ खास नही मिल रहा था. फिर वह वहांसे उठाकर लाई पॉलीथीन बॅग्ज खोलकर देखने लगा. कुछ बॅग्जमें बचे हूए, सडे हूए मुंगफलीके दाने थे. तो कुछ बॅग्जकी बहुतही गंदी बदबू आ रही थी. आखिर उसे एक गांठ मारी हूई पॉलीथीनकी थैली मिल गई. उसने उस थैलीकी गांठ बडी सावधानीसे खोली. अंदरसे बदबू आयेगी इस अनुमानसे मुंह बाजू हटाया. लेकिन अंदरसे कोई बदबू नही आयी. उसने थैलीमें झांककर देखा. अंदर कुछ कांचके टूकडे थे.

टूटे ग्लासके होंगे....

वह सोफेसे उठकर निचे मॅटपर घुटने टेंककर बैठ गया. उसने वे टूकडे बडी सावधानीसे थैलीसे बाहर मॅटपर उंडेल दिए. दो-तीन टूकडोंपर उसे खुनके दाग दिखाई दिए.

अरे वा यह तो कातिलका या उसके साथीका खुन दिख रहा है...

उसने खुनके दागवाला एक टूकडा हलकेसे अपने हाथमें लिया.

अब मुझे इस धागेसेही कातिलतक पहूचना है...

लेकिन क्या इस खुनसे मै कातिलके बारेमें कुछ जानकारी पा सकता हू ?

वह सारी संभावनाए टटोलकर देखने लगा. और फिर अचानक उसकी आंखे खुशीसे चमकने लगी. उस कांचके टूकडेपर उसे खुनसे सने हाथके और उंगलियोंके निशान दिखाई देने लगे.

" यस्स" वह खुशीसे चिल्लाया.

दुसरे खुनके दाग लगे टूकडेभी उसने सावधानीसे उठाकर गौरसे देख लिए. उसपरभी उंगलियोंके निशान दिख रहे थे. वैसेही वे कांचके टूकडे हाथमें लेकर वह फोनके पास चला गया. वे टूकडे बगलमें एक टेबलपर रखकर उसने एक नंबर डायल किया.

" सॅम... मै तुम्हारे उधर आ रहा हू... अभी ... एक बहुतही महत्वपुर्ण धागा मेरे हाथ लगा है..." वह अपनी खुशी छिपा नही पाकर उत्साहभरे स्वरमें फोनपर बोल रहा था.

क्रमश:...

Monday, March 24, 2008

Ch-59B : आर्यभट्ट (शून्य-उपन्यास) Hindi

...भारतीय गणित और खगोलविज्ञान की शुरुवात किसने की यह कहना जरा मुश्कील है फिरभी भारतीय वेदोमें गणित और खगोलविज्ञान की सब जानकारी उपलब्ध है. बहुत ऋषींयोंने पंचांगके नियम, नक्षत्र विभाजन, वैदिक कार्यके लिए आवश्यक तिथी और महुरत निर्धारित करना, ग्रहण, अमावस्या इत्यादि जानकारी देनेके लिए अलग अलग पध्दती विकसित की. वक्त के साथ पैतामह सिध्दांत, वासिष्ठ सिध्दांत, रोमक सिध्दांत, पौलिक सिध्दांत इत्यादि विकसित हुए. लेकिन वे धीरे धीरे पुराने हूए और उनसे एकदम सही परिणाम नही आते थे. इसलिए उस वक्त लोगोंका उसपरसे भरोसा उड रहा था. लेकिन फिर आर्यभट नामके एक विद्वानने गणित और खगोलशास्त्रसे सबंधीत ज्ञानमेंकी त्रुटी दूर कर उस ज्ञानको नये सिरेसे प्रस्तुत किया.

भारतके इतिहासमें जिसे 'गुप्तकाल' या 'सुवर्णयुग'के नामसे जानते है, उस वक्त भारतने साहित्य, कला और विज्ञान इन क्षेत्रोंमे अभूतपूर्व प्रगती की. विज्ञानके क्षेत्रमें गणित, रसायनशास्त्र और जोतिष्यशास्त्र इन विषयोंमे विशेष प्रगती की. उस वक्त आर्यभट नामके एक प्रसिध्द गणितज्ञ और जोतिष्यकार थे. वे अभीके बिहारराज्यकी राजधानी पटना (उस वक्तका पाटलीपुत्र) के पास कुसुमपुर इस गावके निवासी थे. उनका जन्म 13 एप्रिल सन् 476 को और मृत्यू सन् 520 को हूवा था. उस वक्त बौध्द धर्म और जैन धर्म बहुत प्रचलित था. लेकिन वे सनातन धर्मके अनुयायी थे. उन्होने गणित और जोतिष्य इन विषयोंमे बहुत महत्वपूर्ण और वक्तके हिसाबसे विस्मयकारी संशोधन किया था. उन्होने अपना संशोधन ग्रंथरूपमें शब्दबध्द कर अगली पिढीयोंको वह उपलब्ध हो इसकी व्यवस्था कर रखी थी. उस वक्त मगध स्थित नालंदा विश्वविद्याल ज्ञानदानका प्रमुख और प्रसिध्द केंद्र था. वहा देश विदेशसे विद्यार्थी ज्ञानार्जन करनेकेलिए आते थे. वहा खगोलशास्त्रके अध्ययनके लिए एक विशेष विभाग था. एक प्राचीन श्लोकके अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालयके कभी कुलपतीभी थे.

आर्यभटने लिखे तीन ग्रंथोंकी जानकारी सद्य:स्थितीमें उपलब्ध है. दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र. लेकिन जाणकारोंके हिसाबसे उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था. 'आर्यभट्ट सिध्दांत' लेकिन उसके सिर्फ 34 श्लोकही अब उपलब्ध है. उनके इस ग्रंथका सातवे शतकमें जादा उपयोग होता था. लेकिन यह ग्रंथ बाकी ग्रंथोंकी तरह उपयोगमें होते हूए भी उसका ऐसा लोप क्यो हूवा होगा ? यह एक अनाकलनीय पहेली है.

आर्यभट पहले आचार्य थे की जिन्होने ज्योतिषशास्त्रमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया. 'आर्यभट्टीय' ग्रंथमें उन्होने ज्योतिष्यशास्त्रके मूलभूत सिध्दांतके बारेमें लिखा. इस ग्रंथमें 121 श्लोक है जो उन्होने चार खंडोमें विभाजीत कीये है.

गीतपादीका नामके पहले खंडमें ग्रहका परिभ्रमण काल, राशी , अवकाशमें ग्रहोंकी कक्षा इस विषयपर जानकारी दी है.

गीतपाद नामके दुसरे खंडमें उन्होने गणितके

वर्गमूल, घनमूल, त्रिकोणका क्षेत्रफल, ज्या (sine) इत्यादींका

विश्लेषन किया है.

उन्होने वृतका व्यास और परिधी इनमेंका संबंध जिसे हम

पाई(Pi) कहते है, उन्होने वह 3.1416 इतना, मतलब लगभग सही आंका था.

इस ग्रंथमें उन्होने बीजगणितके

(अ+ब)2 = (अ2+2अब+ब2)

का भी विस्तृत विष्लेशण किया है.

इस ग्रंथके 'कालक्रिया' इस तिसरे खंडमें

कालके अलग अलग भाग, ग्रहोंका परिभ्रमण , संवत्सर, अधिक मास, क्षय तिथी, वार ,सप्ताह

इनकी गणना इस बारेंमे विवेचन दिया है.

इसी ग्रंथमें एक जगह उन्होने संक्षिप्त स्वरूपमें संख्या लिखनेकी पध्दतीके बारेंमे लिखा है.

तिसरा खंड 'गोलपाद' नामसे प्रचलित है और उसमें खगोल विज्ञानके बारेमे जानकारी है.

सूर्य, चंद्र, राहू ,केतू और बाकी ग्रहोंकी स्थीती , दिन और रातका कारण, राशींका उदय, ग्रहणका कारण इत्यादि विश्लेशन इस खंडमें मिलता है.

आजके वक्तके बडे बडे वैज्ञानिक अबभी आश्चर्य चकीत रह जाते है की उस वक्त आर्यभटने पाई (Pi), वृत्तका क्षेत्रफळ , ज्या (sine) इत्यादिं बातोंका विश्लेषन कैसे किया होगा.

आर्यभट एक युगप्रवर्तक थे. उन्होने अपने वक्तके प्रचलित अंधश्रध्दांओंको झुटा ठहराया. उन्होने सारी दुनियाको बताया की पृथ्वी चंद्र और अन्य ग्रहोंको खुदका प्रकाश नही होता और वे सुरजकी वजहसे प्रकाशित होते है. पृथ्वीके जिस भागपर सूर्यप्रकाश पडता है वहां दिन और जहा सूर्यप्रकाश नही पडता वहा रात ऐसाभी उन्होने बताया था. पृथ्वीपर अलग अलग शहरोंमे सुर्योदय और सुर्यास्त का वक्त इसमें फर्क क्यो होता है इसके कारणोंका विश्लेषनभी उन्होने विस्तृततरहसे किया है. उन्होने यहभी जाहिर किया की पृथ्वी गोल है और वह खुदके आसके सभोवताल घुमती है. उन्होने इस मान्यताको तोडा की पृथ्वी ही ब्रह्मांडका केंद्र है और सुरज और बाकी ग्रह उसके सभोवताल घुमते है. उन्होने पृथ्वीका आकार, गती, और परिधीका अंदाज भी लगाया था. और सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहणके बारेमेंभी संशोधन किया था.

उन्होने त्रेतालीस लाख बीस हजार वर्षका एक महायुग बताया और एक महायुगको चार हिस्सोमे

सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापारयुग और कलियुग इस तरह विभागीत किया. इन चारो युगोंका काल उन्होने दस लाख अस्सी हजार साल इतना आंका है.

भविष्यमें चंद्र और सूर्य ग्रहण कब कब होगे यह निकालनेके लिए उन्होने एक सूत्रका विकास किया और उस सुत्रके हिसाबसे उनकी भविष्यवाणी कभीभी गलत नही निकली.

ज्योतिष्यके अलावा गणितशास्त्रमेंभी आर्यभटने नये नये सिंध्दांतोका अविश्कार किया. भारतमें सबसे पहले उन्होने बिजगणितके ज्ञानका विस्तारसे प्रचार किया. शून्य सिध्दांत और दशमलव संख्याप्रणालीका आविश्कार भारतमें सबसे पहले किसने किया यह बताना जरा मुश्कील है फिरभी आर्यभटने उसका प्रयोग अपने ग्रंथमें कुशलतासे किया हूवा मिलता है. उनकी कामयाबी भारतमेंही नही तो बाहर विदेशमेंभी फैली थी. अरब विद्वानोंको उनके जोतिष्य ज्ञानका बहुत अभिमान था और वे उन्हे 'अरजभट' नामसे पहचानते थे.

तो इस तरह आर्यभट जिन्होने बीजगणितका विकास किया था और ज्योतिष गणितमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया, उनको भारतीय गणितमें और जोतिष्यशास्त्रमें अगर मिल का पत्थर कहा जाए तो गलत नही होगा. उस वक्त लगभग सब ग्रंथ श्लोकके रुपमें रहते थे और उनको खासकर मुखद्गद कर एक पिढीसे दुसरी पिढीके पास सौंपा जाता था. उनका 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ सातवे शतकमें व्यापक रुपसे उपयोगमें लाया जाकरभी वह आगे लोप हूवा यह बात उस ग्रंथमें लिखे ज्ञानके बारेमें एक गूढ जिज्ञासा जागृत करती है. उनका अचूक निकष रहे गणित इस विषयसे और उन्होने जो ज्ञान उनके ग्रंथमें दिया वह एकदम सही रहता था इसकी तरफ गौर करते हूए उनका जो ग्रंथ लोप हुवा जिसमें जोतिष्य ज्ञानके बारेमें ऐसा कुछ लिखा होगा की जो गुप्त रखनेका किसीकोभी मोह हुवा होगा. ऐसाभी हो सकता है की वह ज्ञान गलत हातोंमे पडनेसे विघातक हो सकता था...


वैसे तो कमांड2ने यह रिसर्च पेपर पहलेभी पढ