उपन्यास - अद्-भूत (संपूर्ण)
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Wednesday, April 2, 2008

Ch-65 : पेपर रोल (शून्य-उपन्यास) Hindi

विनय पुरी तैयारीके साथ रात एक बजेके बाद डॉ. कयूम खानके बंगलेके पास आया. बंगला बाकीके मकानोंसे अलग थलग बंसा हूवा था. इसलिए बंगलेमे पिछेसे प्रवेश करना शायद मुमकीन था. विनयने अंदाजा लगाया. एक बार फिर इधर उधर देखते हूए वह बंगलेके पिछवाडेकी तरफ जाने लगा.

विनयकी नजर पहुचेगी नही ऐसी एक जगह काली कार पार्क की हूई थी. अंदर जॉन और सॅम दुर्बिणसे विनयके हर हरकतको बारकाईसे देख रहे थे. .

" मुझे लगता है अब उसे जाकर पकडनेमें कुछ हर्ज नही होना चाहिए... नहीतो देर हो जाएगी." सॅम ने कहा.

" नही अभी नही ... मुझे पुरा यकिन है की वह अंदर खुनी श्रृंखला आगे बढानेके लिए नही जा रहा है. ' जॉनने कहा.

" फिर किसलिए जा रहा होगा ?" सॅमने पुछा.

"वहीतो हमे पता करना है " जॉनने कहा.

विनय जब बंगलेके पिछेकी तरफ जाने लगा तब अंदर बैठे हूए जॉन और सॅम एकदम अलर्ट हो गए. विनय नजरोंसे ओझल होतेही वे कारसे बाहर निकल आये.


विनय बंगलेके हॉलमें खडा था. हॉलमें अंधेरा था. सामने एक कमरा खुला दिख रहा था और उस कमरेसे धुंधली रोशनी बाहर आ रही थी. बंदूक तानकर धीरे धीरे विनय उस कमरेके दरवाजेके दिशामें चलने लगा. उसको सामने एक कुर्सीपर बैठा हूवा एक आदमीका साया दिखाई दिया. उस सायेका मुंह उस तरफ था. वह साया अंधेरेमें बैठा होनेसे वह कौन है यह पहचानना मुमकीन नही था. वह साया पैर फैलाकर कुर्सीपर आरामसे बैठा हूवा था. विनय उस सायेकी दिशामें चलने लगा. उतनेमें अचानक -

" हॅन्ड्स अप... थ्रो द गन" एक कडा आवाज हॉलमें गुंजा.

जॉन और सॅम विनयके पिछे बंदूक ताने हूए खडे थे. उन्हे वह कुर्सीपर बैठा हूवा साया भी दिख रहा था. इस अचानक हूए अप्रत्याशीत घटनासे विनय घबरा गया और गडबडा गया. उसने अपनी बंदूक जमीनपर फेंक दी और अपने दोनो हाथ उपर हवामें उठाए. सामने धुंधले रोशनीमें बैठे आदमीने अपनी पहियेवाली कुर्सी आवाजकी तरफ घुमाई. विनय अब संभलकर धीरे धीरे मुडने लगा था. सामने धुंधले रोशनीमें बैठा सायाभी उठकर खडा होनेका प्रयास करने लगा.

" डोन्ट मूव्ह" जॉनका कडा स्वर गुंजा.

विनय किसी बूत की तरह अपने जगह बिना हिले खडा हो गया. वह कुर्सीपर बैठा सायाभी अपने जगहपर बैठा रहा.

लेकिन यह क्या ?...

उस सायेके हाथमें शायद बंदूक थी.....

उसके हाथमें बंदूक दिखतेही सॅमने अपने बंदूकसे उस सायेपर गोलीयां की बरसात शुरु कर दी.

" नो...." जॉनने सॅमके हाथसे बंदूक दुसरे तरफ करनेकी कोशीश की.

उनके सामने 'धप' 'धप' ऐसे दो आवाज आये. एक वह साया गिरनेका और दुसरा विनय निचे गिरनेका. सॅमकी बंदूक बाजु हटानेके चक्करमें विनयके मस्तकमें एक गोली घुस गई थी.

" व्हॉट हॅपन्ड टू यू" जॉनने चिढकर सॅमसे कहा.

" अगर मैने बंदूक नही चलायी होती तो उसने चलाई होती " सॅमने कहा.

सॅम उस काले सायेके निचे पडे शरीरकी तरफ दौडा. और जॉन विनयके निचे पडे शरीरकी तरफ दौडा. सॅमने स्टडी रूमका बडा बल्ब जलाया. निचे एक वयस्कर सफेद दाढी रखा हूवा और पुरी मुंछ मुंडाया हूवा एक शख्स पडा हूवा था. वही डॉ. कयूम था. डॉ. कयूमका शरीर एक राखके ढेरपर गिरकर राख इधर उधर बिखर गई थी. वह राख शायद कुछ कागजाद या कोई पुस्तक जलानेसे बनी हूई थी. डॉ. कयूमके हाथमें एक कागजका रोल था. उस रोलकोही अंधेरेमे बंदूक समझकर सॅमने बंदूक चलाई थी.

" उसके हाथमें कागजका रोल देखकर अपने आपपर चिढकर सॅमके मुंहसे निकल गया, " शिट ... व्हाट अ फूल आय अॅम ... यह तो सिर्फ रोल किया हूवा पेपर है.."

सॅमने निचे घुटनेपर बैठकर उस निचे गिरे आदमीकी नब्ज टटोली. उसकी नब्ज पुरी तरहसे बंद हो चूकी थी. " हि इज डेड" सॅमके मुंहसे निकल गया.

जॉनने निचे पडे हूए विनयके शरीरकी तरफ देखा. वह अबभी दर्दसे कराह रहा था. उसने निचे झुककर उसे कहां गोली लगी यह देखा और वह उसके बचनेकी कितनी संभावना है यह देखने लगा.

" इसे किसीभी हालातमें हमें बचाना पडेगा" जॉनने कहा.

उसने वैसेही वहा घुटनेपर बैठकर जेबसे मोबाईल निकाला और एक नंबर डायल करने लगा.

उधर सॅमने निचे गिरे डॉ. कयूम खानके शवके हाथसे कागजका रोल खिंच लिया. वह कागजका रोल उसने खोलकर देखा. उस कागजपर अलग अलग तारख और समय लिखा हूवा था. कही 'लाभदायक समय' तो कही 'अति लाभदायक समय' ऐसा लिखा हूवा था. कही कही 'धोकादायक समय' ऐसाभी लिखा हूवा था. उसमें डॉ. कयूमकी लगभग सब कुंडलीही लिखी हूई थी. पढते पढते सॅमका ध्यान कागजके एकदम आखिरमें गया. .

" माय गॉड !" सॅमके मुंहसे निकल गया.

" जॉन " सॅम आवाज देते हूए जॉनके पास गया.

जॉनने अभी अभी हॉस्पिटलको फोन लगाकर तुरंत यहा आनेके लिए कहा था.

"जॉन यह तो देखो " सॅमने वह कागज जॉनके सामने पकडा.

जॉनने उस कागजको हाथमें लेकर एक नजर दौडाई और वह कागज निचे फेंकते हूए कहा -

" अरे आजकल ज्योतिष्य यह एक फॅशनही हो गया है."

सॅमने वह कागज उठाया और उस कागजके आखिरमें लिखा हूवा जॉनको दिखाकर कहा-

" यह इधर देखो... यहां ... तारीख 17 रातके बारा से आगे 3 दिन 'धोकादायक समय' और यह देखो यहां रातके 12 से 2 तक 'अति धोकादायक समय' "

जॉनने वह कागद अपने हाथमें लेकर ठिकसे देखा. उसने घडीमें देखा 1 बजकर 5 मिनट हो चूके थे. और आज तारीख बराबर 17 थी. जॉन स्तब्ध होकर उस कागजकी तरफ देखने लगा. उसके चेहरेपर एक गूढतापुर्ण आश्चर्य फैल गया था. जॉन जहा खडा था वही निचे जमिनपर विनय कराह रहा था. उसने सॅमने जॉनको पढाकर सुनाया सुना था. उसे बॉसके पास रहे ज्ञानकी पुरी तरह तसल्ली हूई थी. आखिर एक दीर्घ सांस लेते हूए विनयकी गर्दन एक तरफ ढूलक गई. लेकिन उसकी वह ज्ञान हथीयानेकी इच्छा पुरी नही हो सकी थी...

क्रमश:...

Monday, March 17, 2008

Ch-57: जैसे को तैसा (शून्य-उपन्यास) Hindi

रातका समय था. डॅनने अपने घरका दरवाजा धकेलकर थोडासा खोला और बाहर झांककर देखा. चारो तरफ अंधेरा था. वह धीरेसे घरसे बाहर निकल गया. बाहर आनेके बाद उसने चारो तरफ अपनी नजरे घुमाकर उसे कोई देखतो नही रहा इसकी तसल्ली की. कोई देख नही रहा है इस बातकी तसल्ली होतेही वह कंपाऊंडके बाहर आ गया. फिरसे रस्तेपर उसने चारो ओर अपनी नजरे दौडाई. रास्ता एकदम खाली खाली था. अब वह दाई तरफ मुडकर चलने लगा - अंधेरेमे तेजीसे कदम बढाते हूए. उसके चलनेके गतीके साथही उसके सोचनेभी गती पकड ली. पिछले बार कातिलने हमें भरपूर बक्षिसी देकर खुश कर दिया था. इस बारभी जॉन, सॅम और बॉसको अगला खुन किसका होगा इसकी जानकारी मिलने की बात उसने कातिल को फौरन बताई थी. कातिल उसपर बहूत खुश हो गया था. फिदाही हूवा था.

कातिलने उसे एक जगह बताकर वहा वह सोच भी नही सकता उतना पैसा रखनेका वादा किया था. अब वह वहांही पैसे लेनेके लिए जा रहा था. पैसेका खयाल आतेही उसके दिलमें गुदगुदी होने लगी. पिछले बार मिले पैसेसे दस गुना पैसे उसको अपने आखोंके सामने दिखने लगे. खुशीसे वह झुम उठा. उसके चलनेकी गती धीमी होगई और चालमें एक मस्ती झलकने लगी थी.

होगया अब यह आखरी...

इसके बाद ऐसी बेईमानी नही करुंगा...

इतना पैसा मिलनेके बाद मुझे ऐसी बेइमानी करनेकी फिरसे नौबतही नही आयेगी...

पैसा मिलनेके बाद नौकरी एकदम नही छोडूंगा.. नहीतो किसीको शक हो सकता है...

नौकरीमें कुछ देरतक टाईमपास करेंगे और फिर सही वक्त आतेही नौकरी छोडकर कुछ बिझीनेस करेंगे....

नहीतो पहले बिझीनेस डालूंगा और वह अच्छा खासा चलनेके बाद नौकरी छोड दूंगा....

डॅन सोच रहा था. अचानक असे अहसास हूवा की जिस जगह कातिलने पैसे रखनेका कबुला था वह जगह नजदीक आ चूकी है. वह एक पल रुका. फिरसे एकबार चारो ओर देखकर जिस जगह पर पैसे रखे थे उधर निकल गया. उसके चेहरेपर एक मुस्कुराहट झलक रही थी. स्थान एकदम निर्जन था. चारो ओर अंधेरा छाया हूवा था. बिच बिचमें कुतोंका अजीब आवाज आ रहा था. वह जगह किसीकोभी डर लगेगा ऐसीही थी. लेकिन आज डॅनके डर पर उसका लालच पुरी तरहसे हावी हो चूका था.

सामने एक बडा पेढ था. यही वह पेढ था जिसके निचे कातिलने पैसे रखे थे...

अब मानो डॅनके शरीरमें खुशीकी लहरे दौड रही थी. अब कुछही और पल! कुछ पलमेंही अब मै एक बडे संपतीका मालिक बनने वाला हूं. वह अधीरतापुर्वक पेढके निचे चला गया. वहा एक बडा पत्थर रखा हूवा था. डॅनने एक पलकाभी विलंब ना लगाते हूए वह पत्थर वहासे हटाया. जैसेही उसने वह पत्थर वहा से हटाया एक बडा धमाका हुवा और उसके हाथके टूकडे टूकडे हो गए. उसके बदनमेंभी नुकीले पत्थरके टूकडे गए थे. और खुनसे लथपथ अवस्थामें उसकी जान चली गई. उसे अहसास हो गया था की उसने जैसे ठान लिया था वैसेही यह उसकी आखरी बेइमानी साबित हूई थी.

क्रमश:...

Monday, January 28, 2008

Ch-26: ऋषी (शून्य-उपन्यास)

... हिमालयमें उस पर्बत के तले बह रहे नदी के किनारे जो गुंफा थी उस गुंफामें अभीभी वह ऋषी ध्यानस्त बैठा हूवा था. अचानक उसने अपनी आंखे खोली. उसकी आंखे लाल लाल मानो आग उगल रही थी. धीरे धीरे उसके आंखोकी लाली कम होगई और उसकी आंखे फिरसे बंद हो गई. और फिरसे जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर अपनी मर्यादाए लांघकर मुक्त रुप से होने लगा.

एक जंगलमें एक पर्णकुटी थी. पर्णकुटीके सामने आंगनमें तिन लोग बैठे हूए थे. वे आपसमें कुछ बाते और चर्चा कर रहे थे. उन्होने उनके सामने छोटी छोटी लकडीयोंके छोटे छोटे समुह बनाये थे. एक समुहसे लकडीयां निकालकर दुसरे समुहमें डालना या फिर एक समुहसे लकडीया निकालकर उसका दुसरा समुह बनाना ऐसा उनका चल रहा था. ऐसा करते हूवे वे आपसमें चर्चाभी कर रहे थे. उनके हावभावसे ऐसा प्रतित हो रहा था की वे उनकी किसी दूविधाके बारेमें बात कर रहे हो. उतनेमें उनके पिछेसे वह ऋषी आगया. उसकी आहट होतेही वे तिनो मुडकर उसकी तरफ देखने लगे.

ऋषीने तिनोंपर अपना दृष्टीक्षेप डाला.

" मुझे पता है तुम लोग किस दूविधामें हो " ऋषीने गूढ अंदाजमें कहा.

तिनोंके चेहरेपर आश्चर्य झलकने लगा.

हमारे मनमे क्या चल रहा है यह इस ऋषीको कैसे पता. ?...

वे कुछ बोले उससे पहलेही वह ऋषी चलते हूए उनके पाससे सामने निकल गया. वे उस ऋषीकी जाती हूई आकृतीको देखने लगे.

ऋषी एकदम रुक गया और उनकी तरफ मुडकर बोला , " चिंता मत करो मै तुम्हे तुम्हारी दुविधासे जल्दीही तुम्हे मुक्त करुंगा "

वह ऋषी फिरसे मुडकर अपना रास्ता चलने लगा. वे तिनो खुले मुंहसे आश्चर्यसे उस ऋषीकी जाती हूई आकृतीको वह आकृती अदृष्य होनेतक देखते रहे....

क्रमश:...

Ch-25: घात प्रतिघात (शून्य-उपन्यास)

तेजीसे सब कुछ निपटाकर कमांड1 फ्लॅटके दरवाजेसे दौडकर लिफ्टके पास गया. थोडीही देर पहले उसे सायरनका आवाज बिल्डीग के निचे आकर बंद हूवा ऐसा महसूस हूवा था. उसने लिफ्टके डिस्प्लेपर देखा. लिफ्ट उपर आ रही थी. वह घबरा गया.

कही पुलिस बिल्डींगमें तो नही आए ?..

और शायद वह उपर ही आ रहे थे ...

उसके चेहरेपर अब डर झलकने लगा था. क्या करे कुछ सुझ नही रहा था. उसने इस डरे हूए हालतेमेंभी तेजीसे फैसला लिया और वह सिढीयोंसे उपरकी तरफ दौडने लगा. थोडी देरमें उसके खयालमें आया की दौडते हूए उसके जुतोंका आवाज हो रहा है. उसने अपने जूते निकालकर वही छोड दिए और वह वैसेही उपर तेजीसे दौडने लगा. दौडते हूए निचे क्या हो रहा होगा इसकी तरफ भी उसका ध्यान था. आखीर वह बिल्डींगके टेरेसपर आकर पहूंच गया. टेरेसपर उसने इधर उधर देखा. उपर चमचमाते चांदनीसे भरा आकाश और आजूबाजू चमचमाते इलेक्ट्रीक लाईटसे भरा शहर. दौडनेके वजह से वह हांफ रहा था और उसे पसीना आया था. उपर ठंडी हवा चल रही थी. पसिनेसे सने उसके गरम शरीर को वह ठंडक पहूचा रही थी. उसे थोडी राहतसी महसुस हूई. लेकिन रुकनेके लिए वक्त कहां था? बिल्डींगके सामनेकी तरफ उसने झांककर देखा. बिल्डींगके सामने पुलिसकी गाडी खडी थी. गाडीके पास तीन हथीयारोंसे लेस पुलिस खडे थे. उसे एक समझमें नही आ रहा था की -

खुनके बारेमें पुलिस को पता कैसे चला ?...

ऐसाभी हो सकता है की वे दुसरेही किसी जुर्मके सिलसिलेमें वे वहां आये हों...

लेकिन वह अगर दूसरे किसी अपराधके सिलसिलेमें यहां आए होंगे और ऐसेमे अगर मै पकडा गया तो वह एक घोर इत्तेफाक ही कहना पडेगा...

लेकिन उसे पुरा भरोसा था की बॉसने दिए वक्तमें ऐसी अनहोनी नही होनी थी. अबतक ऐसा कभी नही हूवा था..

अब यहांसे कैसे खिसका जाए?...

वह सोचने लगा.

एक बात पक्की थी की बिल्डींगके सामनेसे खिसकना लगभग नामुमकीन था...

दुसरा कोई विकल्प ढूंढनेके लिए वह इधर उधर देखने लगा. बिल्डींगके दाए बायेंसेभी निकलना मुमकीन नही था. एक तो उतरनेको कुछ नही था और किसी तरह उतरो तो पुलिसके सामनेसेही जाना पड सकता था. फिर कमांड1 धीरे धीरे बिल्डींगके पिछले हिस्सेमें आकर वहांसे निकलनेके बारेंमे ताकझाक करने लगा. पिछे उतरनेको पाईप थे. वह देखकर उसके जानमें जान आ गई. लेकिन पिछे दुसरे एक बिल्डींगपर लगे सोडीयम लँपकी रोशनी पड रही थी. इसलिए उतरते वक्त किसीके नजरमें आना मुमकीन था. वह और कुछ विकल्प है क्या इसके बारेंमें सोचने लगा. उसके पास जादा वक्त नही था.

अगर गलतीसेभी पुलीस यहा टेरेसपर आ गई तो ?...

तो वह अपने आप ही उनके कब्जेमें आनेवाला था....

उसने बिल्डींगका पिछला हिस्सा निचे उतरनेके हिसाबसे और एकबार ठिक ढंगसे देखने का फैसाला किया. इसलिए वह पिछे के तरफ की पॅराफिट वॉलपर चढ गया. पाईप उपरसे निचे जमीनतक थे. शायद ड्रेनेज पाईप थे. पाईपपर जगह जगह किले लगाए हूए थे इसलिए उतरने के लिए पकडना आसान था. अचानक उसके खयालमें आया की उसके पिछे टेरेसपर कुछ हरकत हूई है. जबतक वह पलटकर देखता एक काला साया उसपर झपट पडा और उसने पुरा जोर लगाकर कमांड1को टेरेसके निचे धकेला. इस अचानक हूए हमलेसे कमांड1 गडबडा गया. उसे खुदको संभालनेकाभी वक्त नही मिला. वह बिल्डींगसे निचे गिरने लगा. गिरते वक्त उसका चेहरा उपर टेरेसकी तरफही था. वह काला साया टेरेससे झुककर उसे निचे गिरता हूवा देख रहा था. पिछेसे आ रहे सोडीयम लॅंप के रोशनीमें उसे उस काले साएका चेहरा दिखाई दिया. वह उस चेहरेकी तरफ आंखे फाडफाडकर देखने लगा. इधर निचे गिरकर मरनेका डर और सामने उस काले साए का चेहरा देखकर उसके डरमें और आश्चर्यमें जैसे औरही इजाफा हो रहा था.

वह चेहरा कमांड2का था ...

उसे विश्वासही नही हो रहा था....

उसने एकबार फिरसे तसल्ली कर ली.

हां वह चेहरा, उसका दोस्त जिसपर उसने पुरी तरहसे भरोसा किया था उस कमांड2काही था...

लेकिन उसने ऐसा क्यों किया ?...

वह उस सवालपर सोचकर कुछ नतिजेतक पहूंचनेके पहलेही वह निचे फर्शपर गिर गया. लगभग 15-16 माले उपरसे निचे गिरकर उसके सरके टूकडे टूकडे हूए थे और तत्काल उसकी जान चली गई थी. इधर उपर उसे निचे गिरते हूए देख रहे कमांड2के चेहरेपर एक गुढ मुस्कुराहट बिखेर गई.



क्रमश:...

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About Hindi

Hindi is the name given to an Indo-Aryan language, or a dialect continuum of languages, spoken in northern and central India (the "Hindi belt")Native speakers of Hindi dialects between them account for 41% of the Indian population (2001 Indian census). That is the reason because of which the entertainment industry in India mainly use Hindi. And the idustry which is also called as bollywood is the second largest industry producing movies in the world. As defined in the Constitution, Hindi is the official language of India and is one of the 22 scheduled languages specified in the Eighth Schedule to the Constitution. Official Hindi is often described as Modern Standard Hindi, which is used, along with English, for administration of the central government. Standard Hindi is a sanskritised register derived from the khari boli dialect. Urdu is a different, persianised, register of the same dialect. Taken together, these registers are historically also known as Hindustani.