डिटेक्टीव्ह सॅम और उसका एक साथी कॅफेमें बैठे थे. उनमें कुछतो गहन चर्चा चल रही थी. उनके हावभावसे लग रहा था की शायद वे हालहीमें हूए दो खुनके बारेमे चर्चा कर रहे होंगे. बिच बिचमें दोनोभी कॉफीके छोटे छोटे घुंट ले रहे थे. अचानक कॅफेमें रखे टिव्हीपर चल रही खबरोंने उनका ध्यान आकर्षीत किया.
डिटेक्टीवने जितोड कोशीश की थी की प्रेस हालहीमें चल रहे खुनको जादा ना उछाले. लेकिन उनके लाख कोशीशके बादभी मेडीयाने जानकारी हासिल की थी. आखिर डिटेक्टीव्ह सॅमकोभी कुछ मर्यादाए थी. वे एक हद तक ही बातें मिडीयासे छुपा सकते है. और कभी कभी जिस बातको हम छुपाना चाहते है उसीकोही जादा उछाला जाता है.
टीव्ही न्यूज रिडर बोल रहा था - '' कातिलने कत्ल किए और एक शक्स की लाश आज तडके पुलिसको मिली. जिस तरहसे और जिस बर्बरतासे पहला खुन हुवा था उसी बर्बरतासे या यूं कहीए उससेभी जादा बर्बतासे .. इस शक्सकोभी मारा गया. इससे कोईभी इसी नतीजेपर पहूंचेगा की इस शहरमें एक खुला सिरीयल किलर घुम रहा है.... हमारी सुत्रोंने दिए जानकारीके हिसाबसे दोनोभी शव ऐसे कमरेंमे मिले की जो जब पुलिस पहुंची तब अंदरसे बंद थे. पुलिसको जब इस बारेंमे पुछा गया तो उन्होने इस मसलेपर कुछभी टिप्पनी करनेसे इनकार किया है. जिस इलाकेमें खुन हुवा वहा आसपासके लोग अब भी इस भारी सदमेंसे उभर नही पाये है. और शहरमेंतो सब तरफ दहशतका मौहोल बन चूका है. कुछ लोगोंके कहे अनुसार जिन दो शक्स का खुन हूवा है उनके नामपर गंभीर गुनाह दाखिल है. इससे एक ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है की जो भी खुनी हो वह गुनाहगारोंकोही सजा देना चाहता है. इसकी वजहसे कुछ आम लोग तो कातिलकी वाहवा कर रहे है...''
'' अगर खुनीको मिडीया अटेंशन चाहिए था तो वह उसमें कामयाब हो चूका है .. हमने लाख कोशीश की लेकिन आखिर कबतक हमभी प्रेससे बाते छुपा पाएंगे'' डिटेक्टीव्ह सॅमने अपने साथीसे कहा. लेकिन सामने बैठा ऑफिसर कुछभी बोला नही. क्योंकी अबभी वह खबरें सुननेंमे व्यस्त था.
जोभी हो यह सब जानकारी अपने डिपार्टमेंटके लोगोंनेही लिक की है...
लेकिन अब कुछभी नही किया जा सकता है...
एक बार धनुष्यसे छूटा तिर वापस नही लाया जा सकता है..
सॅम सोच रहा था. फिर और एक विचार सॅमके दिमागमें चमका -
कही ये अपने सामने बैठेवाला ऑफिसर तो नही... जो सब जानकारीयां लिक कर रहा हो...
सॅम एक अजिब नजरसे उसकी तरफ देख रहा था. लेकिन वह अबभी टिव्हीकी खबरें सुननेमें व्यस्त था.
शहरमें सब तरफ सारी दशहत फैल चूकी थी.
एक सिरीयल किलर शहरमें खुला घुम रहा है....
पुलिस अबभी उसको पकडनेमे नाकामयाब ...
वह और कितने कत्ल करनेवाला है? ...
उसका अगला शिकार कौन होगा?..
और वह लोगोंको क्यो मार रहा है ?...
कुछ कारणवश या युंही ?...
इन सारे सवालोंके जवाब किसीके पासभी नही थे.
क्रमश:...
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उपन्यास - अद्-भूत The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA. |
Tuesday, April 22, 2008
Ch-6 : दहशत ( hindi sahitya - अद्-भूत ) Hindi
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Sunil Doiphode
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Friday, April 18, 2008
Ch-4 : पॉल रॉबर्टस ( hindi sahitya - अद्-भूत ) Hindi
पॉल रॉबर्टस, काला रंग, उम्र पच्चीसके आसपास , लंबाई पौने छे फुट, घुंगराले बाल, अपने बेडरुममें सोया था. उसकी बेडरुम मतलब एक कबाडखाना था जिसमें इधर उधर फैला हूवा सामान, न्यूज पेपर्स, मॅगेझीन्स, व्हिस्कीकी खाली बोतले वह भी इधर उधर फैली हूई. मॅगेझीनके कव्हरपर जादातर लडकियोंकी नग्न तस्वीरें दिख रही थी. और बेडरुमकी सारी दिवारे उसके चहती हिरोइन्स की नग्न, अर्धनग्न तस्वीरोसे भरी हूई थी. स्टीव्हनके और पॉलके बेडरुममे काफी समानता थी. फर्क सिर्फ इतनाही था की पॉलके बेडरुमको दो खिडकियां थी और वह भी अंदरसे बंद. और बंद रुम एसी थी इसलिए नही तो शायद सावधानीके तौर थी. वह अपने जाडे, मुलायम, रेशमी गद्दीपर वैसाही जाडा, मुलायम, रेशमी तकीया सिनेसे लिपटाकर बारबार करवट बदल रहा था. शायद वह डिस्टर्ब्ड होगा. काफी समयतक उसने सोनेका प्रयास किया लेकिन उसे निंद नही आ रही थी. आखिर करवट बदल बदलकरभी निंद नही आ रही थी इसलिए वह बेडके निचे उतर गया. पैरमें स्लिपर चढाई.
क्या किया जाए ? ...
ऐसा सोचकर पॉल किचनकी तरफ चला गया. किचनमें जाकर किचनचा लाईट जलाया. फ्रीजसे पाणीकी बोतल निकाली. बडे बडे घुंट लेकर उसने एकही झटकेमें पुरी बोतल खाली कर दी. फिर वह बोतल वैसीही हाथमें लेकर वह किचनसे सिधा हॉलमें आया. हॉलमें पुरा अंधेरा छाया हूवा था. पॉल अंधारेमेही एक कुर्सीपर बैठ गया.
चलो थोडी देर टिव्ही देखते है ...
ऐसा सोचकर उसने बगलमें रखा हूवा रिमोट लेकर टिव्ही शुरु किया. जैसेही उसने टीव्ही शुरु किया डरके मारे उसके चेहरेका रंग उड गया, सारे बदनमें पसिने छुटने लगे, और उसके हाथपैर कांपने लगे. उसके सामने अभी अभी शुरु हूए टिव्हीके स्क्रिनपर एक खुनकी लकीर बहते हूए उपरसे निचेतक आयी थी. गडबडाकर वहं एकदम खडाही हूवा, और वैसेही घबराये हूये हालतमें उसने कमरका बल्ब जलाया.
कमरेंमे तो कोई नही है....
उसने टीव्हीकी तरफ देखा. टिव्हीके उपर एक मांस का टूटा हूवा टूकडा था और उसमेंसे अभीभी खुन बह रहा था.
चलते, लडखडाते हूए वह टेलीफोनके पास गया और अपने कपकपाते हाथसे उसने एक फोन नंबर डायल किया.
क्रमश:...
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Sunil Doiphode
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Monday, March 24, 2008
Ch-59B : आर्यभट्ट (शून्य-उपन्यास) Hindi
...भारतीय गणित और खगोलविज्ञान की शुरुवात किसने की यह कहना जरा मुश्कील है फिरभी भारतीय वेदोमें गणित और खगोलविज्ञान की सब जानकारी उपलब्ध है. बहुत ऋषींयोंने पंचांगके नियम, नक्षत्र विभाजन, वैदिक कार्यके लिए आवश्यक तिथी और महुरत निर्धारित करना, ग्रहण, अमावस्या इत्यादि जानकारी देनेके लिए अलग अलग पध्दती विकसित की. वक्त के साथ पैतामह सिध्दांत, वासिष्ठ सिध्दांत, रोमक सिध्दांत, पौलिक सिध्दांत इत्यादि विकसित हुए. लेकिन वे धीरे धीरे पुराने हूए और उनसे एकदम सही परिणाम नही आते थे. इसलिए उस वक्त लोगोंका उसपरसे भरोसा उड रहा था. लेकिन फिर आर्यभट नामके एक विद्वानने गणित और खगोलशास्त्रसे सबंधीत ज्ञानमेंकी त्रुटी दूर कर उस ज्ञानको नये सिरेसे प्रस्तुत किया.
भारतके इतिहासमें जिसे 'गुप्तकाल' या 'सुवर्णयुग'के नामसे जानते है, उस वक्त भारतने साहित्य, कला और विज्ञान इन क्षेत्रोंमे अभूतपूर्व प्रगती की. विज्ञानके क्षेत्रमें गणित, रसायनशास्त्र और जोतिष्यशास्त्र इन विषयोंमे विशेष प्रगती की. उस वक्त आर्यभट नामके एक प्रसिध्द गणितज्ञ और जोतिष्यकार थे. वे अभीके बिहारराज्यकी राजधानी पटना (उस वक्तका पाटलीपुत्र) के पास कुसुमपुर इस गावके निवासी थे. उनका जन्म 13 एप्रिल सन् 476 को और मृत्यू सन् 520 को हूवा था. उस वक्त बौध्द धर्म और जैन धर्म बहुत प्रचलित था. लेकिन वे सनातन धर्मके अनुयायी थे. उन्होने गणित और जोतिष्य इन विषयोंमे बहुत महत्वपूर्ण और वक्तके हिसाबसे विस्मयकारी संशोधन किया था. उन्होने अपना संशोधन ग्रंथरूपमें शब्दबध्द कर अगली पिढीयोंको वह उपलब्ध हो इसकी व्यवस्था कर रखी थी. उस वक्त मगध स्थित नालंदा विश्वविद्याल ज्ञानदानका प्रमुख और प्रसिध्द केंद्र था. वहा देश विदेशसे विद्यार्थी ज्ञानार्जन करनेकेलिए आते थे. वहा खगोलशास्त्रके अध्ययनके लिए एक विशेष विभाग था. एक प्राचीन श्लोकके अनुसार आर्यभट नालंदा विश्वविद्यालयके कभी कुलपतीभी थे.
आर्यभटने लिखे तीन ग्रंथोंकी जानकारी सद्य:स्थितीमें उपलब्ध है. दशगीतिका, आर्यभट्टीय और तंत्र. लेकिन जाणकारोंके हिसाबसे उन्होने और एक ग्रंथ लिखा था. 'आर्यभट्ट सिध्दांत' लेकिन उसके सिर्फ 34 श्लोकही अब उपलब्ध है. उनके इस ग्रंथका सातवे शतकमें जादा उपयोग होता था. लेकिन यह ग्रंथ बाकी ग्रंथोंकी तरह उपयोगमें होते हूए भी उसका ऐसा लोप क्यो हूवा होगा ? यह एक अनाकलनीय पहेली है.
आर्यभट पहले आचार्य थे की जिन्होने ज्योतिषशास्त्रमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया. 'आर्यभट्टीय' ग्रंथमें उन्होने ज्योतिष्यशास्त्रके मूलभूत सिध्दांतके बारेमें लिखा. इस ग्रंथमें 121 श्लोक है जो उन्होने चार खंडोमें विभाजीत कीये है.
गीतपादीका नामके पहले खंडमें ग्रहका परिभ्रमण काल, राशी , अवकाशमें ग्रहोंकी कक्षा इस विषयपर जानकारी दी है.
गीतपाद नामके दुसरे खंडमें उन्होने गणितके
वर्गमूल, घनमूल, त्रिकोणका क्षेत्रफल, ज्या (sine) इत्यादींका
विश्लेषन किया है.
उन्होने वृतका व्यास और परिधी इनमेंका संबंध जिसे हम
पाई(Pi) कहते है, उन्होने वह 3.1416 इतना, मतलब लगभग सही आंका था.
इस ग्रंथमें उन्होने बीजगणितके
(अ+ब)2 = (अ2+2अब+ब2)
का भी विस्तृत विष्लेशण किया है.
इस ग्रंथके 'कालक्रिया' इस तिसरे खंडमें
कालके अलग अलग भाग, ग्रहोंका परिभ्रमण , संवत्सर, अधिक मास, क्षय तिथी, वार ,सप्ताह
इनकी गणना इस बारेंमे विवेचन दिया है.
इसी ग्रंथमें एक जगह उन्होने संक्षिप्त स्वरूपमें संख्या लिखनेकी पध्दतीके बारेंमे लिखा है.
तिसरा खंड 'गोलपाद' नामसे प्रचलित है और उसमें खगोल विज्ञानके बारेमे जानकारी है.
सूर्य, चंद्र, राहू ,केतू और बाकी ग्रहोंकी स्थीती , दिन और रातका कारण, राशींका उदय, ग्रहणका कारण इत्यादि विश्लेशन इस खंडमें मिलता है.
आजके वक्तके बडे बडे वैज्ञानिक अबभी आश्चर्य चकीत रह जाते है की उस वक्त आर्यभटने पाई (Pi), वृत्तका क्षेत्रफळ , ज्या (sine) इत्यादिं बातोंका विश्लेषन कैसे किया होगा.
आर्यभट एक युगप्रवर्तक थे. उन्होने अपने वक्तके प्रचलित अंधश्रध्दांओंको झुटा ठहराया. उन्होने सारी दुनियाको बताया की पृथ्वी चंद्र और अन्य ग्रहोंको खुदका प्रकाश नही होता और वे सुरजकी वजहसे प्रकाशित होते है. पृथ्वीके जिस भागपर सूर्यप्रकाश पडता है वहां दिन और जहा सूर्यप्रकाश नही पडता वहा रात ऐसाभी उन्होने बताया था. पृथ्वीपर अलग अलग शहरोंमे सुर्योदय और सुर्यास्त का वक्त इसमें फर्क क्यो होता है इसके कारणोंका विश्लेषनभी उन्होने विस्तृततरहसे किया है. उन्होने यहभी जाहिर किया की पृथ्वी गोल है और वह खुदके आसके सभोवताल घुमती है. उन्होने इस मान्यताको तोडा की पृथ्वी ही ब्रह्मांडका केंद्र है और सुरज और बाकी ग्रह उसके सभोवताल घुमते है. उन्होने पृथ्वीका आकार, गती, और परिधीका अंदाज भी लगाया था. और सूर्यग्रहण और चंद्रग्रहणके बारेमेंभी संशोधन किया था.
उन्होने त्रेतालीस लाख बीस हजार वर्षका एक महायुग बताया और एक महायुगको चार हिस्सोमे
सत्ययुग, त्रेतायुग, द्वापारयुग और कलियुग इस तरह विभागीत किया. इन चारो युगोंका काल उन्होने दस लाख अस्सी हजार साल इतना आंका है.
भविष्यमें चंद्र और सूर्य ग्रहण कब कब होगे यह निकालनेके लिए उन्होने एक सूत्रका विकास किया और उस सुत्रके हिसाबसे उनकी भविष्यवाणी कभीभी गलत नही निकली.
ज्योतिष्यके अलावा गणितशास्त्रमेंभी आर्यभटने नये नये सिंध्दांतोका अविश्कार किया. भारतमें सबसे पहले उन्होने बिजगणितके ज्ञानका विस्तारसे प्रचार किया. शून्य सिध्दांत और दशमलव संख्याप्रणालीका आविश्कार भारतमें सबसे पहले किसने किया यह बताना जरा मुश्कील है फिरभी आर्यभटने उसका प्रयोग अपने ग्रंथमें कुशलतासे किया हूवा मिलता है. उनकी कामयाबी भारतमेंही नही तो बाहर विदेशमेंभी फैली थी. अरब विद्वानोंको उनके जोतिष्य ज्ञानका बहुत अभिमान था और वे उन्हे 'अरजभट' नामसे पहचानते थे.
तो इस तरह आर्यभट जिन्होने बीजगणितका विकास किया था और ज्योतिष गणितमें अंकगणित, बीजगणित और रेखागणितको शामील किया, उनको भारतीय गणितमें और जोतिष्यशास्त्रमें अगर मिल का पत्थर कहा जाए तो गलत नही होगा. उस वक्त लगभग सब ग्रंथ श्लोकके रुपमें रहते थे और उनको खासकर मुखद्गद कर एक पिढीसे दुसरी पिढीके पास सौंपा जाता था. उनका 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ सातवे शतकमें व्यापक रुपसे उपयोगमें लाया जाकरभी वह आगे लोप हूवा यह बात उस ग्रंथमें लिखे ज्ञानके बारेमें एक गूढ जिज्ञासा जागृत करती है. उनका अचूक निकष रहे गणित इस विषयसे और उन्होने जो ज्ञान उनके ग्रंथमें दिया वह एकदम सही रहता था इसकी तरफ गौर करते हूए उनका जो ग्रंथ लोप हुवा जिसमें जोतिष्य ज्ञानके बारेमें ऐसा कुछ लिखा होगा की जो गुप्त रखनेका किसीकोभी मोह हुवा होगा. ऐसाभी हो सकता है की वह ज्ञान गलत हातोंमे पडनेसे विघातक हो सकता था...
वैसे तो कमांड2ने यह रिसर्च पेपर पहलेभी पढा था. फिरभी कमांड2का दिल उत्साहीत हूवा था. बॉसकी शुन्यके बारेंमे, वेदकालीन गणित और जोतिष्याशास्त्रके बारेमें रुची देखते हूए और उनका एकदम सही वक्त बतानेका कौशल्य देखते हूए उसको अब विश्वास हो चला था की बॉसको 'आर्यभट्ट सिंध्दांत' यह ग्रंथ मिला होगा. कमांड2का अब लगभग आधा काम हुवा था, लेकिन आधा, जो की सबसे महत्वपूर्ण था, वह बचा था. उसको सबसे पहले बॉसचा पत्ता लगना बहुत जरुरी लग रहा था. पहले एक बार जब बॉसका फोन आया था तब उसका नंबर उसके फोनपर नही आया था. बॉसने यह करामात कैसी की थी इसका उसे कुछ पता नही लग अहा था. लेकीन फिरभी उसने बॉसको ढुंढनेका मानो बिडाही उठाया था. उसने टेलीफोन कंपनीमें जाकर बॉसको ट्रेस करनेका प्रयत्न किया था. टेलिफोन कंपनीवाले उसे कुछ खास मदत नही कर पाए थे. लेकिन टेलिफोन कंपनीको एक नयाही अविष्कार हुवा था. उनकी फ्रिक्वेन्सी कोई चोरी कर रहा था इसका. इसके अलावा एक मोटे तौरपर फोन किस इलाकेसे आया था इतनाही वे बता पाए थे. जो इलाका उन्होने बताया था वह काफी बडा था. और ना बॉसका नाम ना चेहरा मालूम होनेसे कमांड2को उसे ढुंढना बडा मुश्कील हो गया था. फिरभी लगभग रोज कमांड2 उस इलाकेमे किसी पागल की तरह घुमता था. और जब घुम घुमकर थक जाता था तबही घरकी ओर रुख करता था. लेकिन बॉसका पत्ता मिलनेके कोई आसार नही नजर आ रहे थे. शायद इतनी बार वह किसी पागल की तरह उस इलाकेमें घुमा, ना जाने कभी बॉस उसके सामनेसेभी गया होगा. लेकिन वह उसे कैसे पहचाननेवाला था. ?
क्रमश:..
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Sunil Doiphode
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