उपन्यास - अद्-भूत
The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA.
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Wednesday, March 19, 2008

Ch-59A : आर्यभट्ट (शून्य-उपन्यास) Hindi

कमांड2 निश्चिंत होकर कुर्सीपर रिलॅक्स होकर बैठा था. उसके सामने टीव्ही शुरु था. लेकिन उसका टीव्हीके तरफ ध्यान कहा था.? वह तो अपनेही धुनमें था. अबतक बॉसने बताए हूए सब काम उसने इमाने इतबारे पुरे किए थे. और उसकी वजहसे बॉसभी उसपर खुश लग रहा था. सबसे महत्वपुर्ण बात यह थी की कमांड1के कत्लका शक बॉसको उसपर नही आया था. वह बिचबिचमें टिव्हीके चॅनल्स बदलकर खबरें देख रहा था. आगजनी, दंगा फसाद, लाठीमार, यह सब खबरें देखते हूए उसे बडा मजा आ रहा था. उसके चेहरेपर एक शैतानी मुस्कुराहट फैली हूई थी. वह अपनी मस्ती दिमागसे झटककर कुर्सीपर सिधा होकर बैठ गया..

मुझे ऐसे सुस्ताकर नही चलेगा...

मुझे अब आगेकी कार्यवाहीके पिछे लगना चाहिए...

वह कुर्सीसे उठ खडा हो गया. उसने वही दोचार चक्कर लगाए और फिर कुछ ठोस निर्णय लेकर वह कमरेमें कोनेमें रखे आलमारीके पास चला गया. आलमारी खोलकर उसने आलमारीका सबसे निचेवाला ड्रॉवर खोला. ड्रॉवर का बक्सा पुरी तरह बाहर निकालकर अपने पैरके पास निचे रख दिया. ड्रॉवर निकालनेके बाद जो खाली जगह बनी थी वहांसे उसने और एक छूपा कप्पा खोला. उस कप्पेसे कुछ ढूंढकर उसने वह चिज अपने पॅन्टके दाए जेब मे रख दी. फिर उसने वह छुपा कप्पा ठिक तरहसे बंद किया, पैरके पास रखा ड्रॉवर उठाकर उसने उसके पहले जगह पर ठिक तरहसे रख दिया और आलमारी बंद कर वह कॉम्प्यूटरके पास जाकर खडा हो गया. कॉम्प्यूटर शुरु किया और कॉम्प्यूटर बूट होनेकी राह देखते हूए कमरेमे फिरसे चहलकदमी करने लगा.

अगली कार्यवाही करनेके पहले मुझे अब ठिक तरहसे तैयारी कर लेनी चाहिए...

अपना लक्ष अभीभी अधूरा है...

जिस लक्षके लिए मैने कमांड1का कत्ल करनेकी रिस्क ली, वह अभीभी पहूचसे बहुत दूर है...

उसने अपने दाए पॅन्टके जेबसे अभी अभी आलमारीसे रखा हूवा पेन ड्राइव्ह निकाला. पेनड्राईव्हकी तरफ देखते हूए वह सोचने लगा.

मुझे अब एकबार बॉसके बारेमे जो मटेरीयल कमांड1के कॉम्प्यूटरपर मिला था उसको एकबार ठिक तरहसे फिरसे पढ लेना चाहिए..

अचानक कमांड2 चहलकदमी करते हूए रुक गया. उसने कॉम्प्यूटरके मॉनिटरकी तरफ देखा. कॉम्प्यूटर बूट हो गया था. कॉम्प्यूटरके पास जाकर प्रथम उसने पेन ड्राईव्ह कॉम्प्यूटरको लगाया. कुर्सी खिंचकर कॉम्प्यूटरके सामने बैठते हूए वह किसी जादूगरकी तरह कॉम्प्यूटरको कीबोर्ड और माऊसके द्वारा अलग अलग कमांड देने लगा. उसने पहले एक बार कमांड1के मेलबॉक्ससे जो महत्वपुर्ण फाईल अपने पेन ड्राईव्हके उपर कॉपी कर रखी थी, खोली. वह एक रिसर्च पेपर था. पेपरका टायटल था.

"आर्यभट्ट्का साहित्य".

उसका अंदाजा था की इस पेपरमें दिए जानकारीके आधारपर उसे भविष्यमें ऐसी कुछ बाते मिलने वाली थी की जिसकी वजहसे उसका फायदा ही फायदा होने वाला था. कमांड1के होठोंपर एक मुस्कुराहट तैरने लगी. शायद उसे भविष्यमें जो फायदा होने वाला था उसके कल्पना मात्रसे वह गदगद हो गया था. वह पेपरमें दिए महत्वपुर्ण मुद्दे पढने लगा...

क्रमश:...

Monday, March 10, 2008

Ch-52: ब्रम्ह है परिपूर्ण (शून्य-उपन्यास)

हिमालय के पर्बतोंकी गोदमें बहते नदी के तटपर जो गुंफा थी उसमें ध्यानमग्न अवस्थामें बैठा ऋषी, अचानक चौंककर अपने समाधी अवस्थासे बाहर आ गया. उसकी आंखे लाल थी और चेहरेपर कुछ रहस्य सुलझनेका गुढ आनंद झलक रहा था. उसके चेहरेपर एक रहस्यमय मुस्कुराहट फैल गई. धीरे धीरे अपने आप उसकी आंखे फिरसे बंद हो गई. और फिर वक्त, जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर सब मर्यादाएं लांघकर बंधनमुक्त होकर होने लगा.

जंगलमें पर्णकुटीके पास तिन लोग आपसमे कुछ चर्चा कर रहे थे. इतनेमें वहा वह ऋषी आगया. उसकी आहट होतेही सबलोग पलटकर उसकी तरफ देखने लगे.

यह तो वही ऋषी है...

जो उनको पहले एक बार मिला था...

उनको उसके लब्ज याद आ गए-

" चिंता मत करो.. मै तुम्हे तुमारे दुविधासे बाहर निकालूंगा "

वे बडी आस से उसकी तरफ देखने लगे.

ऋषीके चेहरेपर एक गूढ मुस्कुराहट दिखने लगी.

" आप लोगोंकी पहेली सुलझीही समझो " ऋषी गूढभाव से बोला.

" क्या? ... हमारी पहेली सुलझी?" तिनोंके मुंहसे खुशीसे निकला.

ऋषीने एक संस्कृत श्लोकका जोरसे उच्चारण किया -


ॐ पूर्णं अद: पूर्णं इदं, पूर्णात् पूर्णं उदच्यते ।

पूर्णस्य पूर्णं आदाय, पूर्णं एवाव शिष्यते ॥


"अर्थात जब पूर्णका पूर्णसे संयोग होता है या पूर्णसे पूर्ण निकाला जाता है तब बाकी पूर्णही रहता है. ब्रह्म यह परिपूर्ण है... इसलिए ब्रह्ममें बह्म मिलाया जाए तो या ब्रह्मसे ब्रह्मको निकाला जाए तो आखीर बाकी ब्रह्मही रहता है.

यहां पूर्ण और ब्रह्म यानीकी अगणित हो सकता है... जैसा दिन हो तो रात आतीही है, प्रकाश के विरुध्द अंधेरा होता है... वैसे जहा पूर्ण यानी अगणित हो वहां उसका विरुद्ध रिक्तता यानी शून्य आनाही चाहिए."

सामने नदीकी तरफ इशारा करके फिर ऋषीने आगे कहा, " उस पाणीमे बुलबुले देखो कैसे बनते है और कैसे नष्ट होते है "

" ऐसी एक चिज है की वह कभी कुछभी नही और कभी कभी सबकुछ है... वह जहांसे शुरु होती है खतमभी वही होती है... वह ऐसी चिज है की जिससे यह ब्रह्मांड, आप और मै तैयार हुए है... वह ऐसी चिज है की जिसमे सबको एक दिन समा जाना है "

बोलते बोलते ऋषी उन तिनोंके इर्द गिर्द गोल गोल चल रहा था.

"ऋषीवर, हम लोग गणितपर संशोधन कर रहे है हमें हमारे पहेली का गणिती हल चाहिए ; ना की आध्यात्मिक ' उनमेंसे एकने कहा.

" हां, आप लोगोंका संशोधन आपलोगोंको जिस वजहसे अपूर्ण लग रहा है वह आपके पहेलीका हल जितना गणिती है उतनाही आध्यात्मिक है. "

फिर ऋषीने सबको उठकर एक तरफ आने के लिए कहा और गोल गोल चलकर पैरके निशानोंसे जो गोल बना था उसकी तरफ निर्देश कर कहा,

'' तुम्हे तुम्हारा संशोधन पुरा करनेके लिए जिस बात की जरुरत थी वह है शुन्य"

तिनोंके चेहरेपर खुशी झलक रही थी.

ऋषीने कहा " शून्य जहा शुरु होता है खतम भी वही होता है"

एकने बडासा गोल निकाला.

ऋषीने कहा " कभी शून्य कुछभी नही"

एकने 0 को 6 मे जोडकर 6 ही आता है ऐसे लिखा.

ऋषीने आगे कहा " कभी शून्य सबकुछ है यानी सर्वसमावेशक है"

दुसरेने 0 बार 6 करनेसे 0 आता है ऐसा लिखा.

उन तिनोंके संशोधन कार्यको अब गती मिली थी. वे तिनो अपने कार्यमें व्यस्त हो गए. जब वे व्यस्तसा से जागे तब उन्होने आजूबाजू देखा. तो ऋषी वहा नही था.

उनके चेहरेपर आश्चर्य झलक रहा था. .

कहा गया वह ऋषी?...

शायद वह शून्यमें विलीन हूवा था....

क्रमश:...

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