रात हो चूकी थी. दोनोने मिलके खाना पकाया. खानेके टेबलपर सारे जिन्नस सजाके रखे. जॉनने कमरेमे अंधेरा करके टेबलपर मोमबतीयां लगाकर जलाई. दोनो टेबलपर मोमबतीके धूंदले रोशनीमे आमनेसामने एकदूसरेको प्यारसे निहारते हूए बैठ गए. खानेके जिन्नस वैसेही पडे हूए थे. उन्हे खाने पिनका कहां होश था. उनकी भूख प्यास गुम हो चूकी थी. अचानक उसे अहसास हूवा की जॉनका चेहरा फिरसे चिंतायूक्त होकर सोचमें डूब गया है. .
" हॅलो" उसने चुटकी बजाकर उसे अपने खयालोंसे बाहर लाने की कोशीस की.
" क्या सोच रहे हो?" उसने पुछा.
" यहांसे अगर गाडीसे शहर जाना हो तो कितना वक्त लगेगा ?" उसने अपने खयालोंसे बाहर आते हूए पुछा.
" लगेंगे डेड दो घंटे ... क्यो? क्यो पुछा?" उसने उसे पुछा.
" प्लीज तूम मुझे चार घंटेका समय दोगी ?"
" किसलिए ?" उसने पुछा. .
" एक अर्जंंट काम निकल आया है. दो घंटे जानेके लिए और दो घंटे आनेके लिए. बस सिर्फ चार घंटे... चार घंटेमे जाकर आता हूं. " वह उसके तरफ देखकर बोला.
उसका चेहरा मलीन हो गया.
" प्लीज " वह उसे रिक्वेस्ट करते हूए बोला.
" जाना जरुरी है क्या ?" वह र्नव्हस होते हूए बोली.
" हां बहुत जरुरी है " उसने कहा.
" लेकिन ऐसा क्या काम निकल आया ?" उसने पुछा.
" वह मै तुम्हे अभी नही बता सकता. लेकिन उधरसे वापस आनेके बाद जरुर बताऊंगा." वह उसका मूड ठिक करनेके लिए कुर्सीसे उठते हूए, हंसते हूए बोला.
वह कुछ बोले इसके पहलेही वह तेजीसे बाहरभी गया था. 'ठक..ठक' सिढीयां उतरनेका आवाज आने लगा. वह उठकर खिडकीके पास गई. खिडकीसे वह उसे गाडीतक जाते हूए देखती रही. गाडीके पास जाकर उसने मुडकर खिडकीकी तरफ देखा.
" तूम चिंता मत करो . बराबर चार घंटेमे मै वापस आवूंगा " निचेसे वह जोरसे बोलते हूए गाडीमें बैठ गया.
'खाट' गाडीका दरवाजा उसने जोरसे खिंच लिया. उसका दिल जोरजोरसे धडकने लगा. उसने गाडी शुरु कर खिडकीसे उसे 'बाय' किया और वह निकल गया. उसके चेहरेपर फिरसे मलिनता दिखने लगी. चार घंटेके लिए क्यों ना हो वह उसे बेचैन कर चला गया था.
वह क्यो गया होगा ?...
वह वापस तो आयेंगा ना ?...
या सानीजैसा उसे बिचमेंही मंझधारमें छोड जायेगा ?...
उसका सोच श्रुंखला शुरु हूई.
क्रमश:....
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उपन्यास - अद्-भूत (संपूर्ण) The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA. आप यह उपन्यास अपने दोस्तोंको ईमेलभी कर सकते है. |
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Thursday, February 14, 2008
Ch-35: चार घंटे उधार (शून्य-उपन्यास)
Posted by
Sunil Doiphode
at
9:18 AM
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