उपन्यास - अद्-भूत (संपूर्ण)
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उपन्यास - शून्य (संपूर्ण)
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Tuesday, March 18, 2008

Ch-58 : यादें (शून्य-उपन्यास) Hindi

रातका 1 बजा था. आज कमसे कम तिनचार दिन हूए होंगे जॉनने अपने आपको घरमें बंद करके रखा था. वक्त का, दिनका, रातका उसे कुछभी होश नही था. आजभी उसे होश आया था वह उसके पासके व्हिस्कीका स्टॉक खतम होनेके वजहसे. जैसेही उसे होश आया वैसे उसके सब दर्द जाग उठे थे. उसे अँजनीके साथ गुजारा हूवा एक एक पल याद आने लगा.

उसे कृत्रिम सांस देकर मानो उसके सांसोसे जुडा उसका रिश्ता.....

उसे मिलनेके लिये हमेशा बेचैन रहता उसका मन...

कितनाभी खुदको रोकनेकी कोशीश करनेके बावजुद उसकी घरकी तरफ मुडते उसके कदम..

उसके साथ उसकी पहली डेट...

उसका उसके साथ उत्स्फुर्त, पवित्र प्रथम प्रणय...

उसके सासोंकी गरमाहट...

उसपर होती उसके प्यारकी बारीश...

उसके साथ बिताए वे छुटी के दिन...

उसकी वे नटखट अदाए ...

रातोरात एंगेजमेंट रिंग लाकर उसे प्रपोज किया वह पल ...

उसका वह किसी लता की तरह लिपटकर किया हूवा इकरार ...

उसे निराशाके जंजालसे बाहर निकालकर दिया हूवा उसका प्रोत्साहन..

और ...

और उसका वह क्रुर कत्ल...

उसके आखोंमे आंसू तैरने लगे. आंसू बहकर उसके गालपर आगए. उसे अपने आपकीही चिढ आने लगी.

जब कत्ल का रहस्य खुल गया था तबही उसके क्यों खयालमें नही आया की पांचवे खुनके बाद छटवा खुन उसकी अपनी अँजीकाही होनेवाला है.....

यह इतनीसी बात उसके खयालमें क्यों नही आयी?..

लेकिन पांचवा कत्ल रोकने के चक्करमें वह कत्लके तफ्तीशमेंही इतना व्यस्त हो गया था की उसे छटवे खुन का खयालभी नही आया...

उसने अपने कलाईसे दोनो आंखोके आंसू पोंछ लिए. उसे अभीभी विश्वास नही हो रहा था की वह ऐसी उसे अकेला छोडकर चली गई है. उसने घरमें चारो ओर एक नजर दौडाई.

घरमें कैसा सब कुछ डरावना लग रहा था... ...

घर डरावना हो गया था या उसकी सोच वैसी हूई थी?...

उसने सामने दरवाजे की तरफ देखा. पेपरवालेने दरवाजेके निचेसे खिसकाए हूए तीन चार न्यूज पेपर जैसेकी वैसे पडे हूए थे. उसे ऐसा लग रहा था मानो वे न्यूजपेपरभी दरवाजेके निचेसे उसकी तरफ देखते हूए उसे चिढा रहे हो. वह उठ गया और दरवाजेके पास चला गया. एक पलके लिए उसे ऐसा लगा की दरवाजा खोले और बाहर थोडी देर खुली हवामे जाए.

लेकिन नही अब यह एकांतही अच्छा लगने लगा था..

उसने दरवाजेके निचे पडे हूए पेपर अंदर खिंच लिए. वही खडे होकर उसने दो चार पन्ने पलटे. सब तरफ दंगा फसाद, आग, लाठीमार, टीअर गॅस इसकीही खबरें थी. इतनाही नही अब भारतमेंभी इसकी प्रतिक्रियाएं शुरु हो गई थी. काफी जगह भारतमेंभी दंगे फसाद भडक उठे थे.

मतलब अबभी मामला ठंडा नही हूवा था..

अमेरिकन लोगोने तो मानो भारतिय लोगोंको ही नही तो जो लोग दुसरे किसीभी देशके थे उनको वहांसे भगानेका सिलसिलाही शुरु किया था. और भारतमें भारतीय लोगोंने मल्टीनॅशनल कंपनीयोंको वहांसे भगानेके लिए आंदोलन शुरु किया था. उससे वह पढा नही जा रहा था. उसने वह न्यूज पेपर्स कोनेमें एक जगह डाल दिये और जहांसे उठके आया था वहा फिरसे जाकर बैठ गया. सामने टी पॉयके उपर बहुत सारी व्हिस्कीकी बॉटलें जमा हूई थी और उसके बगलमें एक खाली पडा हूवा ग्लास आराम कर रहा था. जॉनने सामने टी पॉयपर पडा रिमोट लिया और टी. व्ही. शुरु किया. एक एक चॅनल वह आगे जाने लगा. किसीभी चॅनलपर रुकनेकी उसको इच्छा नही हो रही थी. सब तरफ वही खबरें - दंगा फसाद, आगजनी, लाठीमार टीअर गॅस. उसे सब असह्य होकर उसने रिमोटका बटने चिढकर जोरसे दबाते हूए टीव्ही बंद किया और रिमोट बगलमें सोफेके गद्देपर फेंक दिया.

उसे अब अंदरसे लगने लगा की उसे अब इस हतोत्साहसे उभरना पडेगा...

लेकिन कैसे ?...

यही तो उसके समझमें नही आ रहा था.

अगर मैने अपने आपको किसी काममे व्यस्त कर लिया तो? ...

हां यह इससे उभरने एक अच्छा रास्ता है ...

लेकिन डिपार्टमेंटनेभी तो मुंह मोड लिया हूवा है. अभीभी उसे कामपर जानेकी इजाजत नही थी...

और वह यह सब मामला ठंडा हूए बैगर मिलनेकी कोई गुंजाईशभी नही थी...

वह उठ खडा हूवा और हॉलमें चहलकदमी करने लगा.

अबभी अगर मै कातिल को पकड पाया तो?...

कमसे कम यह बाहर बिगडा हूवा सब मौहोल ठिक होनेमे मदत होगी. लेकिन कातिल एक ना होकर वह एक संघटनाही होनेकी जादा संभावना है . संघटना हुई तो क्या हुवा?...

उस संघटनाका एकभी मेंबर अगर मेरे हाथ आया तो एक महत्वपुर्ण धागा हाथ आए जैसा होगा..

नही, कुछ तो करना चाहिए..

वह खिडकीके पास खडा होकर बाहर अंधेरेमे देखने लगा - शुन्यमें. उसकी मुठ्ठी कसने लगी.

अँजेनीकी आत्म्याको शांती मिले इसके लिए मुझे कुछ तो करना चाहिए...

लेकिन शुरुवात कहांसे करु ?..

जंगलमें एक पेढको अगर आग लगी तो वह बुझाना आसान है लेकिन यहा तो सारें जंगलमें आग लगकर फैल गई थी ...

फिर उसने फिरसे चहलकदमी करते हूए केस नए सिरेसे, शुरुसे याद करना शूरु किया.

हो सकता है कोई धागा छुट गया हो?...

पहला खून ...

दुसरा खून ....

तिसरा खून ....

एकदम उसके दिमागमे आया की -

तिसरे खुनके वक्त जो शव बिल्डींगके निचे मिला था, उसका जरुर कत्लसे कोई गहन सबंध रहा होगा...

फिर हम लोगोंने जो शव मिला था उसके मकानपर रेड डाली थी... वहां एकभी फिंगरप्रिन्ट ना हो!... ऐसा कैसे होगा...

वहाके कॉम्प्यूटरकी हार्ड डिस्कभी गायब हुई थी ...

इसका मतलब उसका उस कत्लसे जरुर कोई गहरा संबंध था...

वह बंगला अभीभी पुलीसके कब्जेमें था. उस बंगलेपर किसीनेभी अपना हक नही जताया था.

वही कहीं मुझे कोई मिसींग लिंक मिल सकती है...

जॉनको एकदम उत्साह लगने लगा था. करनेके लिए कुछतो उसे मिला था.

उस बंगलेकी फिरसे अगर ठिक तरहसे छानबीन की तो?...

लेकिन चाबीयां तो पुलिसके पास ही है ...

चलो अब पहले यहांसे बाहर निकलना जरुरी है ...

वहां जानेके बाद देखेंगे आगे क्या करना है ...

उसने अपने सारे निराशायुक्त विचार झटक दिए और एक मजबूत निश्चयके साथ वह घरके बाहर निकल गया.

क्रमश:...

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About Hindi

Hindi is the name given to an Indo-Aryan language, or a dialect continuum of languages, spoken in northern and central India (the "Hindi belt")Native speakers of Hindi dialects between them account for 41% of the Indian population (2001 Indian census). That is the reason because of which the entertainment industry in India mainly use Hindi. And the idustry which is also called as bollywood is the second largest industry producing movies in the world. As defined in the Constitution, Hindi is the official language of India and is one of the 22 scheduled languages specified in the Eighth Schedule to the Constitution. Official Hindi is often described as Modern Standard Hindi, which is used, along with English, for administration of the central government. Standard Hindi is a sanskritised register derived from the khari boli dialect. Urdu is a different, persianised, register of the same dialect. Taken together, these registers are historically also known as Hindustani.