रातका 1 बजा था. आज कमसे कम तिनचार दिन हूए होंगे जॉनने अपने आपको घरमें बंद करके रखा था. वक्त का, दिनका, रातका उसे कुछभी होश नही था. आजभी उसे होश आया था वह उसके पासके व्हिस्कीका स्टॉक खतम होनेके वजहसे. जैसेही उसे होश आया वैसे उसके सब दर्द जाग उठे थे. उसे अँजनीके साथ गुजारा हूवा एक एक पल याद आने लगा.
उसे कृत्रिम सांस देकर मानो उसके सांसोसे जुडा उसका रिश्ता.....
उसे मिलनेके लिये हमेशा बेचैन रहता उसका मन...
कितनाभी खुदको रोकनेकी कोशीश करनेके बावजुद उसकी घरकी तरफ मुडते उसके कदम..
उसके साथ उसकी पहली डेट...
उसका उसके साथ उत्स्फुर्त, पवित्र प्रथम प्रणय...
उसके सासोंकी गरमाहट...
उसपर होती उसके प्यारकी बारीश...
उसके साथ बिताए वे छुटी के दिन...
उसकी वे नटखट अदाए ...
रातोरात एंगेजमेंट रिंग लाकर उसे प्रपोज किया वह पल ...
उसका वह किसी लता की तरह लिपटकर किया हूवा इकरार ...
उसे निराशाके जंजालसे बाहर निकालकर दिया हूवा उसका प्रोत्साहन..
और ...
और उसका वह क्रुर कत्ल...
उसके आखोंमे आंसू तैरने लगे. आंसू बहकर उसके गालपर आगए. उसे अपने आपकीही चिढ आने लगी.
जब कत्ल का रहस्य खुल गया था तबही उसके क्यों खयालमें नही आया की पांचवे खुनके बाद छटवा खुन उसकी अपनी अँजीकाही होनेवाला है.....
यह इतनीसी बात उसके खयालमें क्यों नही आयी?..
लेकिन पांचवा कत्ल रोकने के चक्करमें वह कत्लके तफ्तीशमेंही इतना व्यस्त हो गया था की उसे छटवे खुन का खयालभी नही आया...
उसने अपने कलाईसे दोनो आंखोके आंसू पोंछ लिए. उसे अभीभी विश्वास नही हो रहा था की वह ऐसी उसे अकेला छोडकर चली गई है. उसने घरमें चारो ओर एक नजर दौडाई.
घरमें कैसा सब कुछ डरावना लग रहा था... ...
घर डरावना हो गया था या उसकी सोच वैसी हूई थी?...
उसने सामने दरवाजे की तरफ देखा. पेपरवालेने दरवाजेके निचेसे खिसकाए हूए तीन चार न्यूज पेपर जैसेकी वैसे पडे हूए थे. उसे ऐसा लग रहा था मानो वे न्यूजपेपरभी दरवाजेके निचेसे उसकी तरफ देखते हूए उसे चिढा रहे हो. वह उठ गया और दरवाजेके पास चला गया. एक पलके लिए उसे ऐसा लगा की दरवाजा खोले और बाहर थोडी देर खुली हवामे जाए.
लेकिन नही अब यह एकांतही अच्छा लगने लगा था..
उसने दरवाजेके निचे पडे हूए पेपर अंदर खिंच लिए. वही खडे होकर उसने दो चार पन्ने पलटे. सब तरफ दंगा फसाद, आग, लाठीमार, टीअर गॅस इसकीही खबरें थी. इतनाही नही अब भारतमेंभी इसकी प्रतिक्रियाएं शुरु हो गई थी. काफी जगह भारतमेंभी दंगे फसाद भडक उठे थे.
मतलब अबभी मामला ठंडा नही हूवा था..
अमेरिकन लोगोने तो मानो भारतिय लोगोंको ही नही तो जो लोग दुसरे किसीभी देशके थे उनको वहांसे भगानेका सिलसिलाही शुरु किया था. और भारतमें भारतीय लोगोंने मल्टीनॅशनल कंपनीयोंको वहांसे भगानेके लिए आंदोलन शुरु किया था. उससे वह पढा नही जा रहा था. उसने वह न्यूज पेपर्स कोनेमें एक जगह डाल दिये और जहांसे उठके आया था वहा फिरसे जाकर बैठ गया. सामने टी पॉयके उपर बहुत सारी व्हिस्कीकी बॉटलें जमा हूई थी और उसके बगलमें एक खाली पडा हूवा ग्लास आराम कर रहा था. जॉनने सामने टी पॉयपर पडा रिमोट लिया और टी. व्ही. शुरु किया. एक एक चॅनल वह आगे जाने लगा. किसीभी चॅनलपर रुकनेकी उसको इच्छा नही हो रही थी. सब तरफ वही खबरें - दंगा फसाद, आगजनी, लाठीमार टीअर गॅस. उसे सब असह्य होकर उसने रिमोटका बटने चिढकर जोरसे दबाते हूए टीव्ही बंद किया और रिमोट बगलमें सोफेके गद्देपर फेंक दिया.
उसे अब अंदरसे लगने लगा की उसे अब इस हतोत्साहसे उभरना पडेगा...
लेकिन कैसे ?...
यही तो उसके समझमें नही आ रहा था.
अगर मैने अपने आपको किसी काममे व्यस्त कर लिया तो? ...
हां यह इससे उभरने एक अच्छा रास्ता है ...
लेकिन डिपार्टमेंटनेभी तो मुंह मोड लिया हूवा है. अभीभी उसे कामपर जानेकी इजाजत नही थी...
और वह यह सब मामला ठंडा हूए बैगर मिलनेकी कोई गुंजाईशभी नही थी...
वह उठ खडा हूवा और हॉलमें चहलकदमी करने लगा.
अबभी अगर मै कातिल को पकड पाया तो?...
कमसे कम यह बाहर बिगडा हूवा सब मौहोल ठिक होनेमे मदत होगी. लेकिन कातिल एक ना होकर वह एक संघटनाही होनेकी जादा संभावना है . संघटना हुई तो क्या हुवा?...
उस संघटनाका एकभी मेंबर अगर मेरे हाथ आया तो एक महत्वपुर्ण धागा हाथ आए जैसा होगा..
नही, कुछ तो करना चाहिए..
वह खिडकीके पास खडा होकर बाहर अंधेरेमे देखने लगा - शुन्यमें. उसकी मुठ्ठी कसने लगी.
अँजेनीकी आत्म्याको शांती मिले इसके लिए मुझे कुछ तो करना चाहिए...
लेकिन शुरुवात कहांसे करु ?..
जंगलमें एक पेढको अगर आग लगी तो वह बुझाना आसान है लेकिन यहा तो सारें जंगलमें आग लगकर फैल गई थी ...
फिर उसने फिरसे चहलकदमी करते हूए केस नए सिरेसे, शुरुसे याद करना शूरु किया.
हो सकता है कोई धागा छुट गया हो?...
पहला खून ...
दुसरा खून ....
तिसरा खून ....
एकदम उसके दिमागमे आया की -
तिसरे खुनके वक्त जो शव बिल्डींगके निचे मिला था, उसका जरुर कत्लसे कोई गहन सबंध रहा होगा...
फिर हम लोगोंने जो शव मिला था उसके मकानपर रेड डाली थी... वहां एकभी फिंगरप्रिन्ट ना हो!... ऐसा कैसे होगा...
वहाके कॉम्प्यूटरकी हार्ड डिस्कभी गायब हुई थी ...
इसका मतलब उसका उस कत्लसे जरुर कोई गहरा संबंध था...
वह बंगला अभीभी पुलीसके कब्जेमें था. उस बंगलेपर किसीनेभी अपना हक नही जताया था.
वही कहीं मुझे कोई मिसींग लिंक मिल सकती है...
जॉनको एकदम उत्साह लगने लगा था. करनेके लिए कुछतो उसे मिला था.
उस बंगलेकी फिरसे अगर ठिक तरहसे छानबीन की तो?...
लेकिन चाबीयां तो पुलिसके पास ही है ...
चलो अब पहले यहांसे बाहर निकलना जरुरी है ...
वहां जानेके बाद देखेंगे आगे क्या करना है ...
उसने अपने सारे निराशायुक्त विचार झटक दिए और एक मजबूत निश्चयके साथ वह घरके बाहर निकल गया.
क्रमश:...
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उपन्यास - अद्-भूत The horror, suspense, thriller online Hindi Novel based on my english screenplay 'Latched' registered with FWA. |
Tuesday, March 18, 2008
Ch-58 : यादें (शून्य-उपन्यास) Hindi
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Wednesday, March 12, 2008
Ch-54: हिलव्ह्यू अपार्टमेंट (शून्य-उपन्यास)
जॉन और सॅम कार्पोरेशन आफिससे बाहर आ रहे थे. बाहर आते वक्त लोगोंकी भिड, इधरसे उधर फाइल्स ले जानेवाले ऑफिस बॉइज उनके बिचमें आ रहे थे. उस भिडसे रास्ता निकालते हूए वे ऑफिसके बाहर मैदानमें आगए. मैदानमें आनेके बाद कहा उन्हे अच्छा लगा.
" सर , अब क्या करेंगे ?" सॅमने जॉनके साथ चलते चलते कहा.
वैसे देखा जाए तो अब केसका पुरा चार्ज ऑफीशियली सॅमके हाथमें था. फिरभी वह उसके डिसमीस हूए बॉस जॉनका बडप्पन नही भूला था.
" मुझे लगता है बॉसने अपनेसाथ जो दो लोग दिए है उनको हम पहले इन दो जगह पर निगरानी करनेके लिए तैनात कर देंगे. ."
" हां ... मुझे लगता है यू आर राईट '' सॅम अपने जेबसे मोबाईल निकालते हूए बोला.
सॅमने एक नंबर डायल किया.
" हॅलो ... अँथानी ... देखो ... हमें पाचवे खुनके तीन पॉसीबल अॅड्रेसेस मिले है ... उसमेंका एक अॅड्रेस मै तुम्हे बताता हूं ... वहां तुम्हे जल्दसे जल्द निगरानीके लिए जाना है... हां अॅड्रेस लिख लो..."
सॅमने एक निवासीका नाम और अॅड्रेस अँथनीको बताया.
वह आगे बोला , "... और फौरन उधर जावो ... उसके जानको खतरा है..."
सॅमने फोन कट कर दिया. फिर उसने और एक नंबर डायल किया. उसके साथ दिए दुसरे पुलिसकोभी दुसरे एक अॅड्रेसपर फौरन तैनात होनेके लिए कहा.
" अब इस तिसरे अॅड्रेसका क्या करेंगे?...बॉसने तो अपने साथ सिर्फ दो लोग ही दिये थे..." जॉनने सॅमसे पुछा.
" एक काम करेंगे ... बॉसको फोन करके अपना अबतकका प्रोग्रेस बताएंगे और और एक जण को मांग लेंगे .. ताकी उसको हम इस तिसरे पत्ते पर तैनात कर सकेंगे"
" बॉस और एक आदमी हमें देगा ? ... मुझे तो संदेह है " जॉनने अपना संदेह व्यक्त किया.
" देखते तो है ..."
सॅम बॉसका फोन डायल करने लगा. इतनेमें उसकाही फोन बजा. जॉनने उसके मोबाईलके डिस्प्लेकी तरफ देखा. फोन बॉसकाही था. सॅमने तुरंत फोन अटेंड किया.
"एक अॅड्रेस बोलता हू ... लिख लो..." उधरसे बॉसने कहा.
" यस सर ....प्लीज '' पहले बॉस क्या बोलता है यह सुन लेंगे और फिर अपना प्रोग्रेस उसको बताएंगे ऐसा सॅमने सोचा.
सॅमने जॉनके जेबसे पेन और एक कागज अॅड्रेस लिखनेके लिए लिया.
" याहोता क्राफ्ट, बी-1011 हिलव्ह्यू अपार्टमेंटस, केटी लेन-3" उधरसे बॉसने एक अॅड्रेस बताया.
यह तो उनके पास था वह तिसरा अॅड्रेस था...
लेकिन बॉसको कैसे पता चला वह अॅड्रेस?...
हमने तो बताया नही था ....
" ...वहा फौरन पहूंचो ... पाचवा खूनभी हो चूका है " बॉसने आगे कहा.
उधरसे फोन कट होगया. बॉसको वह अॅड्रेस कैसे पता चला यह पहेली अब सॅमके लिए पहेली नही रही थी.
" हमें देर हो गई है " हताश होकर सॅमने जॉनसे कहा.
" क्या हूवा ?" जॉनने आश्चर्यसे पुछा.
" पाचवा कत्लभी हो गया है ... याहोता क्राफ्टका"
क्रमश:...
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Tuesday, February 26, 2008
Ch-45: आय ऍम सॉरी (शून्य-उपन्यास)
बॉस पत्रकाररोंकी भीडसे जो छूटा तो सिधा 'खाट..खाट' जुतोंका आवाज करते हूए अपने कॅबीनकी तरफ निकल पडा. जॉनभी पत्रकारोको टालते हूए भीडसे बाहर आ गया और बॉसके पिछे पिछे चल पडा.
बॉस ऐसा भी धोखा दे सकता है...
पिछले बारभी सब बॉसनेही रिपोर्टरोंके सामने बताया. उसमें जॉनका कुछ भी हाथ नही था... वैसे देखा जाए तो बॉसनेही लगभग जबरदस्ती उसे छुटीपर भेजा था...
जॉनको बॉसका बहुत गुस्सा आ रहा था.
हर बार डिक्टेटरशीप करनेकी और कुछ गलत हूवा तो किसीकोतो भी फसानेका...
जॉन बॉसका काम करने का तरीका अब समझने लगा था.
जॉनकोही क्या किसीकोभी यह हजम ना होनेवाली बात थी. जॉन तेजीसे बॉसके पिछे पिछे जाने लगा. उसे बॉससे सफाई लेनी थी.
बॉस उसके कॅबिनके पास आकर पहूंचा. जॉन बॉसके पिछेही था. बॉसको जॉनकी आहट आई होगी या फिर जॉन उसके पिछे पिछे आएगा इसका अंदाजा हूवा होगा. कॅबिनके अंदर जानेके पहले अचानक ब्रेक लगेजैसा बॉस एकदम रुका. उसके पिछे जॉनभी रुका. बॉस पिछे पलटकर धीरे धीरे जॉनके पास आने लगा. जॉनके एकदम सामने आकर वह रुका. अब वह जॉनके सामने खंबीरतासे खडा होकर उसकी आंखोमे आंखे डालकर देखने लगा. जॉन अभीभी गुस्सेमे था. वह भी गुस्सेसे बॉसके आंखोसे आंखे मिलाकर देखने लगा.
" ऐसे क्या गुस्सेसे देख रहे हो? मुझे क्या खावोगे?" बॉस जॉनपर चिल्लाया.
बॉस अपनी हमशाकी ट्रीक आजमा रहा था. लेकिन इस बार जॉन बिलकुल विचलीत नही हूवा.
फिर एकदमसे बकरी बनकर बॉसने जॉनके कंधेपर अपना सांत्वनाभरा हाथ रख कर कहा,
" आय अॅम सॉरी जॉन. वक्त ही कुछ ऐसा था की मै कुछ नही कर सका "
इस बार जॉन गडबडायाभी नही. वह अभीभी बॉसकी आंखोसे आंखे मिलाकर गुस्सेसे एकटक देख रहा था. बॉसको अहसास हूवा की उसकी ट्रीक काम नही आई थी.
" आय अॅम रिअली सॉरी " बासॅने जॉनका कंधा थपथपाकर अपना हाथ पिछे लिया.
बॉस एकदमसे मुडकर फिरसे 'खाट खाट' ऐसा जुतोंका आवाज करते हूए कॅबिनमें घुस गया. बॉसने एक तिरमें दो निशाने साधे थे. पुलिस डिपार्टमेंटको लोगोंकी नजरोंसे निचा होनेसे बचाया था और जॉनको बरबाद कर डिपार्टमेंटमें अपना खौफ और महत्व और मजबुतीसे बढाया था.
क्रमश:...
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Friday, February 15, 2008
Ch-36: प्रपोज (शून्य-उपन्यास)
अभीभी अँजेनी खानेके टेबलपर बैठी थी. टेबलपर जलाई मोमबत्तीयां आखीर बुझ गई थी. टेबलपर सिर्फ बचा था इधर उधर फैला हूवा मोम. उसके दिलका हालभी कुछ उस मोम जैसाही था. जल जलकर जमे जैसा. टेबलपर खाना वैसाका वैसा रखा हूवा था. राह देख देखकर थकनेके बाद वह कुर्सीसे उठ गई. उतनेमे घडीका गजर बजा. बारा बार. कोई मानो उसके दिलपर घांव कर रहा हो ऐसा उसे लग रहा था. रातके बारा बज चूके थे. .
वह बराबर आठ बजे यहांसे गया था... .
मतलब चार घंटे हो चूके थे. ...
वह शायद कॉटेजके आसपासही पहूंचा होगा...
वह खिडकीके पास जाकर बाहर झांककर देखने लगी. कॉटेजकी तरफ आनेवाला रास्ता एकदम सुनसान था. ना किसीकी आहट ना किसी वाहन के लाईट्स. वह काफी समयतक रास्ते पर आखे लगाए रास्ता ताकती रही. अचानक उसे दो दिए रास्तेसे सामने आते हूए दिखाई दिए. वे उसकी तरफही आ रहे थे. उसका चेहरा खुशीसे खील गया.
वही होगा ...
जरुर जॉन ही होगा ...
वह दूर रास्तेपर आगे सरकते गाडीके लाईटस की तरफ देखने लगी. जैसे जैसे गाडीके दिए नजदीक आने लगे उसका दिल खुशीसे नाचने लगा.
जॉनके बारेमै मैने संदेह नही करना चाहिए था ...
उसे अपराधी लगने लगा था. गाडी अब सामने चौराहे तक आ पहूची थी.
गाडी एक टर्न लेगी और फिर अपने कॉटेजके तरफ आयेगी. ...
लेकिन यह क्या ?...
गाडी चौराहेपर कॉटेजकी तरफ ना मुडते हूए सिधे सामने निकल गई....
फिरसे निराशा उसके चेहरेपर दिखने लगी. अपने मनकी विषण्ण भावना दूर करनेके लिए वह कमरेमे चहलकदमी करने लगी. बिच बिचमें वह खिडकीसे बाहर झांकती थी. सामने रस्ता फिरसे पहले जैसा खाली खाली दिखने लगा था. चहलकदमी करते हूए उसने फिरसे दिवार पर टंगे घडीकी तरफ देखा. साडे बारा बज चूके थे. जॉनका अभीतक कोई अता पता नही था. उसे अब अकेलपन का डर लगने लगा था. उसने फिरसे एकबार खिडकीसे बाहर झांका. उसकी आशा फिरसे अंकुरीत होने लगी. फिरसे गाडीके दो दिए उसे रास्तेपर सरकते हूए दिखाई दिए.
अभी जरुर वही होगा ...
वह फिरसे खिडकीके पास खडी होकर लाईट्सकी तरफ लगातार देखने लगी.
यह गाडी जॉनकी हो सकती है .. और नही भी हो सकती...
लेकिन दिल ऐसा होता है की आदमी को आशा लगाए देता है... ...
अचानक चौराहेपर आनेके बाद गाडीके दिए गायब हो गए.
क्या हूवा ?..
गाडी वहा रुकी तो नही ?...
या फिर गाडी आ रही है ऐसा सिर्फ आभास..?...
वह खिडकीसे हटकर फिरसे कमरेमे चहलकदमी करने लगी. अचानक उसे निचे गाडी के हॉर्नका आवाज आया. वह खिडकीकी तरफ दौडी और उसने बाहर झांककर देखा. जॉन गाडीसे उतर रहा था. उसके जानमे जान आगई. वह दरवाजेके तरफ दौडते हूए चली गई. दरवाजा खोलकर जॉनकी तरफ वह लगभग दौडते हूएही लपकी. सामनेसे जॉनभी दौडते हूए आ रहा था. वह दौडतेही जॉनकी बाहोंमे समा गई.
" कितना वक्त लगाया ? ..." वह जॉनके सिनेपर हलके हलके मुक्के मारते हूए बोली.
" कितनी घबरा गई थी मै .....मुझे तो लगा की तुम मुझे यही छोड जावोगे..." उसकी आंखोमें देखते हूए वह बोली.
" नासमझ हो... ऐसा कभी हो सकता है क्या ?" वह उसके कंधेपर हाथ डालकर उसे कॉटेजमे लाते हूए बोला.
दोनोभी एकदुसरेके कमर मे हाथ डाले सिढीयां चढने लगे.
" अबतो बोलोगे ... कहां गए थे?" उसने पुछा.
" बताता हूं ... बताता हू... थोडा सब्रतो करोगी" वह बोला.
अब दोनो कॉटेजमे आगए. अँजेनीने अंदर आतेही सामनेका दरवाजा बंद किया. और वह क्या बोलता है इसका बेसब्रीसे इंतजार करते हूए उसके आगे पिछे करने लगी. वह सिधा अंदर डायनींग टेबलके पास गया. वह भी उसके पिछे पिछे वहा गई. उसने फिरसे खानेके टेबलपर मोमबतीयां जलाई. घरके सारे लाईट्स बंद किये. अँजेनी कुछ ना समझते हूए सिर्फ उसके पिछे पिछे जा रही थी. उसने उसके कंधे को पकडकर उसे उसके सामने कुर्सीपर बिठाया.
" बैठो, बैठो .. मै तुम्हे बताता हू की मै कहा गया था..." वह उसे बोला.
वहभी उसके सामने बैठ गया. थोडी देर दोनो शांत बैठे रहे. फिर जॉनने उसकी आंखोमें देखते हूए उसके मुलायम हाथ अपने हाथोंमे लिए. मोमबत्तीयोंके रोशनीमें उसका चेहरा और ही निखर आया था. जॉनका आने के बाद यह क्या चल रहा है यह ना समझते हूए वह असमंजससी उसके तरफ देख रही थी.
" अँजेनी तूम मुझसे शादी करोगी ?" उसने उसके आंखोमे आखे डालकर देखते हूए उसे प्रपोज किया.
अँजेनीको तो एकदम भर आए जैसा हुवा.
लेकिन खुदकी भावनाए संभालते हूए वह बोली, " इज धीस सम काईंंड ऑफ जोक?"
" नही नही ... मै सिरीयसली बोल रहा हूं " वह बोला.
" देखो जॉन पहलेही तूम इतनी देर नही थे तो मुझे अकेलापन महसूस हो रहा था... कम से कम ऐसे वक्त ऐसा फालतू मजाक मत करो." वह बोली.
" नही अँजी ... मै मजाक नही कर रहा हूं " वह उसे विश्वास दिलानेका प्रयास करने लगा.
जॉनने उसे पहली बार प्यारसे 'अँजी' कहा था. वह उसकी आखोंमे देखकर उसकी भावनाए टटोलनेकी कोशीश करने लगी.
" तुम्हे सच नही लग रहा है ना ..."
उसने अपने कोटके जेबसे एक छोटा लाल बॉक्स निकालते हूए कहा ,
" यह देखो मैने तुम्हारे लिए क्या लाया है ..."
" क्या है ?" उसने प्रश्नार्थक मुद्रामें पुछा.
उसने बॉक्स खोलकर उसके सामने पकडते हूए कहा,
" एंंगेजमेंट रिंग ... ऑफ कोर्स इफ यू अॅग्री.."
उसने फिरसे एकबार उसे पुछा , " विल यू मॅरी मी प्लीज"
अँजेनीके आंखोमें आंसू तैरने लगे.
" इसके लिए गये थे तूम सिटीमें ?" उसका गला भर आया था.
उसने उसकी आंखोमें देखते हूए 'हां' मे अपनी गर्दन हिलाई.
वह कुर्सीसे उठकर खडी हो गई. वह भी अपने कुर्सीसे खडा हूवा. वह आवेगके साथ उसके बाहोंमे समा गई. .
" यस आय विल" उसके भरे हूए गले से शब्द निकले.
जॉनके चेहरेपर खुशी और समाधान फैल गया. वह अतीव आनंदसे उसे उठाते हूए उसे चूमने लगा. उसने फिर धीरेसे उसे निचे उतारते हूए बॉक्स से अंगूठी निकालकर धीरेसे उसकी तिसरी उंगलीमें सरका दी.
क्रमश:...
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Saturday, December 29, 2007
Ch-8 : और एक ? ... (शून्य-उपन्यास)
जॉनकी गाडी एक भीड भाड वाले रस्ते से दौडने लगी. बादमें इधर उधर मुडते हूए वह गाडी एक पॉश बस्तीमें एक अपार्टमेंटके पास आकर रुकी. जॉन वहा पहूचनके पहले ही वहां पुलिस की टीम आकर पहूँची थी. इस बार पुलिस के अलावा वहां मिडीयाकी उपस्थीतीभी थी. भीडकी वजहसे रस्ता ब्लॉक होनेको आया था. जैसेही जॉनने गाडी पार्क की और वह गाडीसे बाहर आगया मिडीयावालोने उसे घेर लिया. भलेही वह एक प्राईव्हेट गाडीसे आया था और युनिफॉर्ममें नही था फिरभी पता नही मिडीयावालोंको वह इस केससे सबंधीत होनेकी भनक कैसे लगी थी?
"'मि. जॉन वुई वुड लाईक टू हिअर यूअर कमेंट ऑन द केस प्लीज '" कोई उसके सामने कॅमेरा और माईक्रोफोन लेकर आया.
"'प्लीज बाजू हटो .... मुझे अंदर जाने दो ... पहले मुझे इन्व्हेस्टीगेशन पूरा करने दो ... उसके बादही मै अपनी कमेंट दे पाऊंगा "' जॉन भीडमेंसे बाहर निकलने की कोशीश करते हूए बोला.
फिरभी वहांसे कोई हटनेके लिए तैयार नही था. बडी मुश्कीलसे उस भिडसे रस्ता निकालते हूए जॉन अपार्टमेंटकी तरफ जाने लगा. दुसरे कुछ पुलिस उसे जानेके लिए जगह बनानेके लिए उसकी मदत करने लगे.
जॉन लिफ्टसे अपार्टमेंटके दसवे मालेपर पहूँच गया. सामनेही एक फ्लॅटके सामने पुलिसकी भीड थी. जॉन फ्लॅटमें घुसतेही उसके सामने सॅम आया.
"सर, इधर '' सॅम जॉनको बेडरूमकी तरफ ले गया.
बेडरूममे खुनसे लथपथ एक स्त्री का शव पडा हूवा था और सामने दिवारपर फिरसे खुनसे एक बडासा गोल निकाला हुवा था. इस बार उस गोलके अंदर खुनसे 0+6=6 और 0x6=0 ऐसा लिखा हूवा था. जॉन सामने जाकर दिवारकी तरफ गौरसे देखने लगा.
'' कौन औरत है यह?"" जॉनने सॅमको पुछा.
" हुयाना फिलीकिन्स ... कोई टी व्ही आर्टीस्ट है '" सॅमने कहा.
'' यहाँ क्या अकेली रह रही थी?'' जॉनने पुछा.
'" हाँ सर, ... पडोसीयोंका तो यही कहना है ... उनके अनुसार बिच बिचमें कोई आता था उसे मिलने... लेकिन हरबार वह कोई अलग ही शख्स रहता था. '" सॅमने उसे मिले जानकारी का सारांश बयान किया.
'' खुनीने दिवारपर 0+6=6 और 0x6=0 ऐसा लिखा है ... इससे कमसे कम इतना तो पता चलता है की वह गोल यानी की शुन्यही है .. लेकिन 0+6=6 और 0x6=0 इसका क्या मतलब? ... कही वह हमे गुमराह करनेकी कोशीश तो नही कर रहा है?" जॉनने अपना तर्क प्रस्तुत किया.
'" अॅडीटीव्ह आयडेंटीटी प्रॉपर्टी और झीरो मल्टीप्लीकेशन प्रॉपर्टी ... गणितमें पढाया हूवा थोडा थोडा याद आ रहा है......'' सॅम ने कहा.
"' वह सब ठीक है ... लेकिन उस खुनीको क्या कहना है यह तो पता चले?'' जॉनने जैसे खुदसेही पुछ लिया.
दोनो सोचने लगे. उस सवाल का जवाब दोनोंके पास नही था.
'"बाकीके कमरे देखे क्या?'" जॉनने पुछा.
"' हां, तलाशी जारी है''" सॅम ने कहा.
फोटोग्राफर फोटो ले रहे थे. फिंगर प्रिन्ट एक्सपर्ट कुछ हाथके, उंगलीयोंके निशान मिलते है क्या यह ढूढ रहे थे.
'' मोटीव्ह के बारेमें कुछ ?'" जॉनने बेडरूमसे बाहर आते हूए सॅमसे पुछा.
'" नही सर ... लेकिन इतना जरुर है की पहला खुन जिसने किया था उसनेही यह खुनभी किया होगा.'' सॅम अपना अंदाजा बयान कर रहा था.
'" हां ... बराबर है ... यह कोई सिरियल किलरकाही मसला लग रहा है "" जॉनने सॅमका समर्थन करते हूए कहा.
...contd...
Tuesday, November 27, 2007
Ch-1:हैप्पी गो अनलकी (शून्य-उपन्यास)
Next post 'Chapter-2' will be posted on or before 5 Dec 2007
हिमालय की वह उंचे पर्वतोंकी श्रुंखला और पर्वतोंपर लहराते हूए, आसमानमें बादलोंसे बातें करते हूए उंचे पेढ. आगे बर्फ से ढंकी हूई पर्वतोंकी ढलान चमक रही थी. उस चमकती ढलानसे लगकर कहीं दूरसे किसी सांप की तरह बल खाती हूई एक नदी गुजर रही थी. शुभ्र और अमृत की तरह निर्मल उस नदीका पाणी बहते हूए आसमंतमें जैसे एक मधूर धुन बिखेरता हूवा जा रहा था.
उंचे उंचे पेढ की सरसराहट , पंछींयोंकी चहचहाट, बहते नदी की मधूर धुन. इन कुदरती बातोंसे कौनसा युग चल रहा होगा यह बताना लगभग नामुमकीन. हजारो, लाखो सालोंसे चल रहे इन कुदरती करिश्मों में अगर मानवी उत्थान का प्रतीक समझे जाने वाली बातोंकी उपस्थीती ना हो तो पुराना युग क्या? और आधुनिक युग क्या? ... दोनो एक समान. ऐसी इस जगह पर्वत की गोदमें नदीके किनारे एक पुरानी गुंफा थी. उस गुंफा के आस पास उंची हरी हरी घास हवा के साथ लहरा रही थी. गुंफामे एक ऋषी ध्यानस्थ बैठा हूवा था. सरपर बढी हूई जटायें, दाढी मुंछ बढ बढकर थकी हूई. न जाने कितने सालसे तप कर रहे ऋषी के चेहरेपर एक तेज, एक गांभीर्य झलक रहा था. आसपासके वातावरण से अनजान , या यूं कहीए वक्त, जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर युगो युगोतक चल रहा होगा. अनादि, अनंत, सनातन कालसे विचर करते हूए उस ऋषीकी सुक्ष्म अहसास ने इस आधुनिक युग में प्रवेश किया ...
अमेरिकाके एक शहरमें एक रस्ते के फुटपाथपर शामके समय लोग अपनी आधूनिकता की शानमें अपने ही धुनमें चले जा रहे थे. रस्तेपर आलिशान गाडीयाँ दौड रही थी. लोग अपने आपमे ही इतने व्यस्त और मशगुल थे की उन्हे दुसरों की तरफ ध्यान देने की बिलकुल फुरसत नही थी. सब कैसे अनुशाशीत ढंग से एक स्वयंचलित यंत्र की तरह चल रहा था. चलते हूए सबकी नजर कैसी अपनी नाक की दिशा में सिधी थी. हो सकता है उन्हे इधर उधर देखते हूए चलना भी अपने शिष्टाचार के खिलाफ लगता होगा. ऐसेही लोगोंकी भिडमें चलती हूई एक बाईस तेईस साल की सुंदरी अँजेनी अपने हाथमें शॉपींग बॅग लिये एक दुकान मे जानेके लिये मुडी. चलते हूए एक हाथसे बडी खुबसुरतीसे वह बिच बिचमें अपने चेहरे पर आती लटोंको पिछे की ओर हटा रही थी. उसकी लबालब भरे शॉपिंग बॅगसे लग रहा था की उसकी खरीदारी लगभग पुरी हो गयी होगी, बस कुछ दो-एक चिजें रह गई होगी. अचानक एक पुलिस व्हन सायरन बजाती हूई रास्ते से गुजरने लगी. लोगोंका अनुशाशन जैसे भंग हो गया. अँजेनी दुकानमें जाते हूए रुक गई और मुडकर क्या हूवा यह देखने लगी. कोई चलते चलते रुककर, तो कोई चलते चलते मुडकर क्या हूवा यह देखने लगे. न जाने कितने दिनोंके बाद कुछ लोगोंके भावहिन चेहरे पर डर के भाव उमटने लगे थे. कुछ लोग तो चेहरे पर बिना कुछ भाव लाए उस व्हन की तरफ देखने लगे. शायद चेहरेपर कुछ भाव जताना भी उनको नागवार लगता होगा. पुलिस व्हन आई उसी गतीमें गुजर गई. रस्ता थोडी देर तक जैसे पाणी में पत्थर गिरने से निकलने वाले तरंग की तरह विचलित हूवा और फिर थोडी देरमें पुर्ववत हुवा. जैसे कुछ हूवा ही ना हो. अँजेनी फिरसे मुडकर दुकानमें जाने लगी. उसे क्या मालूम था? की अभी अभी जो व्हॅन रस्ते से गुजर गई उसका उसके जिंदगी से भी कुछ सरोकार होगा.
पुलिस व्हॅन एक साफ सुधरी कोलोनीमें एक अपार्टमेंट के निचे रुक गई. बस्तीमें एक अजीब सन्नाटा छाया हूवा था. पुलिस व्हॅनसे तप्तरताके साथ पुलिस ऑफीसर जॉन और उसकी टीम उतर गई. जो लोग अपार्टमेंटके बाल्कनीमें बैठकर सुस्ता रहे थे वह अचंभेसे निचे पुलिस व्हॅनकी तरफ देखने लगे. उतरते ही जॉन और उसकी टीम अपार्टमेंट की लिफ्ट की तरफ दौड गई. ड्रायव्हरने व्हॅन अंदर ले जाकर पार्किंग लॉटमें पार्क की. जॉन और उसके सहकारीयोंने लिफ्टके पास आकर देखा तो लिफ्ट जगह पर नही थी. जॉनने लिफ्टका बटन दबाया. बहुत देर से राह देखकरभी लिफ्ट निचे नही आ रही थी.
" शिट" चिढे हूए जॉनके मुंह से निकल गया.
अधिरतासे जॉन बार बार लिफ्टका बटन दबाने लगा. थोडी देरमें लिफ्ट निचे आ गई. जॉनने लिफ्टका बटन फिरसे दबाया. लिफ्टका दरवाजा खुल गया. अंदर काला टी शर्ट पहना हूवा एकही आदमी था. उस हालातमें भी उसके टी शर्टपर लिखे अक्षरोंने जॉन का ध्यान आकर्षित किया. उस काले टी शर्टपर सफेद अक्षरोंसे लिखा हुवा था -
' झीरो'.
वह आदमी बाहर आतेही जॉन और उसके साथीदार लिफ्टमें घुस गए. लिफ्टमें जातेही जॉनने 10 नं. फ्लोअरका बटन दबाया. लिफ्ट बंद होकर उपरकी तरफ दौडने लगी.
10 नं. फ्लोअरपर लिफ्ट रुक गई. जॉनके साथ सब लोग बाहर आ गए. उन्होने देखा की उनके सामने ही एक फ्लॅटका दरवाजा पुरा खुला हूवा था. सब लोग उस खुले फ्लॅटकी तरफ दौड पडे. वे सब लोग एक दुसरे को कव्हर करते हूए धीरे धीरे फ्लॅटके अंदर जाने लगे. हॉलमें कोई नही था. जॉन और उसके और दो साथीदार बेडरुमकी तरफ जाने लगे. बचे हूए कुछ किचनमें, स्टडी रुममें और बाकी कमरे देखने लगे. किचन और स्टडी रुम खालीही थी. जॉनको बेडरूममें जाते वक्त ही अंदर सब सामान बिखरा हूवा दीख गया. उसने अपने साथीदारको इशारा किया. जॉन और उसके दो साथीदार सतर्तकासे धीरे धीरे बेडरुममें जाने लगे. वे एक दुसरेको कव्हर करते हूए अंदर जातेही उनको सामने बेडरुममे एक भयानक दृष्य दिखाई दिया. एक खुन से लथपथ आदमी बेडपर लिटा हूवा था. उसके शरीर में कुछ हरकत नही दिख रही थी. या तो वह मर गया था या फिर बेहोश हो गया होगा. जॉनने सामने जाकर उसकी नब्ज टटोली. वह तो कबका मर चुका था.
'' इधर है ... इधर''
जॉनके साथ आया एक साथीदार चिल्लाया.
अब जॉनके पिछे उसके बाकी साथीदार भी अंदर आगए. जॉनने आजुबाजू अपनी मुआयना करती हूई नजर दौडाई. अचानक उसका ध्यान जिस दिवार को बेड सटकर लगा हूवा था उस दिवार ने आकर्षीत किया. दिवार पर खुन की छींटे उड गई थी या खुन से कुछ लिखा हूवा था. जॉनने गौर करकर देखा तो वह खुनसे कुछ लिखा हूवाही प्रतित हो रहा था क्योकी दिवारपर खुनसे एक गोल निकाला हूवा था.
गोल... गोल का क्या मतलब होगा...
जॉन सोचने लगा.
और वह खुन उस मरे हूए आदमी का है या और किसीका?...
वह गोल खुनी ने निकाला होगा या फिर जो मर गया उसने मरनेसे पहले वह निकाला होगा?
'' यू पिपल कॅरी ऑन ''
जॉनने अपने टीमको उनकी इन्वेस्टीगेशन प्रोसीजर शुरु करने को कहा.
उसके साथीदार अपने अपने काममें व्यस्त हो गए. जॉनने अपनी पैनी नजर एकबार फिरसे बेडरुमकी सब चिजे निहारते हूए दौडाई. बेडरुममें कोनेमें एक टेबल रखा हूवा था. टेबलपर एक तस्वीर थी. तस्वीरके बाजुमें कुछ खत और लिफाफ़े पडे हूए थे. जॉन ने एक लिफाफ़ा उठाया. उसपर लिखा हूवा था-
''प्रति - सानी कार्टर'.
इसका मतलब जो मर गया था उसका नाम सानी कार्टर था और वह सब खत उसे पोस्टसे आये हूए थे. जॉन बाकी लिफाफ़े और खत उठाकर देखने लगा. वे खत छानते हूए जॉन खिडकीके पास गया. उसने खिडकीसे बाहर झांककर देखा. बाहर बडा खुबसुरत दृष्य था - एक गोल नयनरम्य तालाब का. उस तालाब को हरी हरी हरीयालीने घेर रखा था. वह दृष्य देखकर जॉन कुछ पलोंके लिये अपने आसपासके मौहोल को भूल सा गया. तालाब की तरफ देखते देखते तालाब के आकारने उसे अपने आसपासके मौहोलसे फिरसे जोड दिया. क्योंकी तालाब का आकार लगभग गोलही था. जॉन फिरसे सोचने लगा-
'' दिवारपर... गोलसा क्या निकाला होगा?''
अचा




