उपन्यास - अद्-भूत (संपूर्ण)
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उपन्यास - शून्य (संपूर्ण)
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Tuesday, March 18, 2008

Ch-58 : यादें (शून्य-उपन्यास) Hindi

रातका 1 बजा था. आज कमसे कम तिनचार दिन हूए होंगे जॉनने अपने आपको घरमें बंद करके रखा था. वक्त का, दिनका, रातका उसे कुछभी होश नही था. आजभी उसे होश आया था वह उसके पासके व्हिस्कीका स्टॉक खतम होनेके वजहसे. जैसेही उसे होश आया वैसे उसके सब दर्द जाग उठे थे. उसे अँजनीके साथ गुजारा हूवा एक एक पल याद आने लगा.

उसे कृत्रिम सांस देकर मानो उसके सांसोसे जुडा उसका रिश्ता.....

उसे मिलनेके लिये हमेशा बेचैन रहता उसका मन...

कितनाभी खुदको रोकनेकी कोशीश करनेके बावजुद उसकी घरकी तरफ मुडते उसके कदम..

उसके साथ उसकी पहली डेट...

उसका उसके साथ उत्स्फुर्त, पवित्र प्रथम प्रणय...

उसके सासोंकी गरमाहट...

उसपर होती उसके प्यारकी बारीश...

उसके साथ बिताए वे छुटी के दिन...

उसकी वे नटखट अदाए ...

रातोरात एंगेजमेंट रिंग लाकर उसे प्रपोज किया वह पल ...

उसका वह किसी लता की तरह लिपटकर किया हूवा इकरार ...

उसे निराशाके जंजालसे बाहर निकालकर दिया हूवा उसका प्रोत्साहन..

और ...

और उसका वह क्रुर कत्ल...

उसके आखोंमे आंसू तैरने लगे. आंसू बहकर उसके गालपर आगए. उसे अपने आपकीही चिढ आने लगी.

जब कत्ल का रहस्य खुल गया था तबही उसके क्यों खयालमें नही आया की पांचवे खुनके बाद छटवा खुन उसकी अपनी अँजीकाही होनेवाला है.....

यह इतनीसी बात उसके खयालमें क्यों नही आयी?..

लेकिन पांचवा कत्ल रोकने के चक्करमें वह कत्लके तफ्तीशमेंही इतना व्यस्त हो गया था की उसे छटवे खुन का खयालभी नही आया...

उसने अपने कलाईसे दोनो आंखोके आंसू पोंछ लिए. उसे अभीभी विश्वास नही हो रहा था की वह ऐसी उसे अकेला छोडकर चली गई है. उसने घरमें चारो ओर एक नजर दौडाई.

घरमें कैसा सब कुछ डरावना लग रहा था... ...

घर डरावना हो गया था या उसकी सोच वैसी हूई थी?...

उसने सामने दरवाजे की तरफ देखा. पेपरवालेने दरवाजेके निचेसे खिसकाए हूए तीन चार न्यूज पेपर जैसेकी वैसे पडे हूए थे. उसे ऐसा लग रहा था मानो वे न्यूजपेपरभी दरवाजेके निचेसे उसकी तरफ देखते हूए उसे चिढा रहे हो. वह उठ गया और दरवाजेके पास चला गया. एक पलके लिए उसे ऐसा लगा की दरवाजा खोले और बाहर थोडी देर खुली हवामे जाए.

लेकिन नही अब यह एकांतही अच्छा लगने लगा था..

उसने दरवाजेके निचे पडे हूए पेपर अंदर खिंच लिए. वही खडे होकर उसने दो चार पन्ने पलटे. सब तरफ दंगा फसाद, आग, लाठीमार, टीअर गॅस इसकीही खबरें थी. इतनाही नही अब भारतमेंभी इसकी प्रतिक्रियाएं शुरु हो गई थी. काफी जगह भारतमेंभी दंगे फसाद भडक उठे थे.

मतलब अबभी मामला ठंडा नही हूवा था..

अमेरिकन लोगोने तो मानो भारतिय लोगोंको ही नही तो जो लोग दुसरे किसीभी देशके थे उनको वहांसे भगानेका सिलसिलाही शुरु किया था. और भारतमें भारतीय लोगोंने मल्टीनॅशनल कंपनीयोंको वहांसे भगानेके लिए आंदोलन शुरु किया था. उससे वह पढा नही जा रहा था. उसने वह न्यूज पेपर्स कोनेमें एक जगह डाल दिये और जहांसे उठके आया था वहा फिरसे जाकर बैठ गया. सामने टी पॉयके उपर बहुत सारी व्हिस्कीकी बॉटलें जमा हूई थी और उसके बगलमें एक खाली पडा हूवा ग्लास आराम कर रहा था. जॉनने सामने टी पॉयपर पडा रिमोट लिया और टी. व्ही. शुरु किया. एक एक चॅनल वह आगे जाने लगा. किसीभी चॅनलपर रुकनेकी उसको इच्छा नही हो रही थी. सब तरफ वही खबरें - दंगा फसाद, आगजनी, लाठीमार टीअर गॅस. उसे सब असह्य होकर उसने रिमोटका बटने चिढकर जोरसे दबाते हूए टीव्ही बंद किया और रिमोट बगलमें सोफेके गद्देपर फेंक दिया.

उसे अब अंदरसे लगने लगा की उसे अब इस हतोत्साहसे उभरना पडेगा...

लेकिन कैसे ?...

यही तो उसके समझमें नही आ रहा था.

अगर मैने अपने आपको किसी काममे व्यस्त कर लिया तो? ...

हां यह इससे उभरने एक अच्छा रास्ता है ...

लेकिन डिपार्टमेंटनेभी तो मुंह मोड लिया हूवा है. अभीभी उसे कामपर जानेकी इजाजत नही थी...

और वह यह सब मामला ठंडा हूए बैगर मिलनेकी कोई गुंजाईशभी नही थी...

वह उठ खडा हूवा और हॉलमें चहलकदमी करने लगा.

अबभी अगर मै कातिल को पकड पाया तो?...

कमसे कम यह बाहर बिगडा हूवा सब मौहोल ठिक होनेमे मदत होगी. लेकिन कातिल एक ना होकर वह एक संघटनाही होनेकी जादा संभावना है . संघटना हुई तो क्या हुवा?...

उस संघटनाका एकभी मेंबर अगर मेरे हाथ आया तो एक महत्वपुर्ण धागा हाथ आए जैसा होगा..

नही, कुछ तो करना चाहिए..

वह खिडकीके पास खडा होकर बाहर अंधेरेमे देखने लगा - शुन्यमें. उसकी मुठ्ठी कसने लगी.

अँजेनीकी आत्म्याको शांती मिले इसके लिए मुझे कुछ तो करना चाहिए...

लेकिन शुरुवात कहांसे करु ?..

जंगलमें एक पेढको अगर आग लगी तो वह बुझाना आसान है लेकिन यहा तो सारें जंगलमें आग लगकर फैल गई थी ...

फिर उसने फिरसे चहलकदमी करते हूए केस नए सिरेसे, शुरुसे याद करना शूरु किया.

हो सकता है कोई धागा छुट गया हो?...

पहला खून ...

दुसरा खून ....

तिसरा खून ....

एकदम उसके दिमागमे आया की -

तिसरे खुनके वक्त जो शव बिल्डींगके निचे मिला था, उसका जरुर कत्लसे कोई गहन सबंध रहा होगा...

फिर हम लोगोंने जो शव मिला था उसके मकानपर रेड डाली थी... वहां एकभी फिंगरप्रिन्ट ना हो!... ऐसा कैसे होगा...

वहाके कॉम्प्यूटरकी हार्ड डिस्कभी गायब हुई थी ...

इसका मतलब उसका उस कत्लसे जरुर कोई गहरा संबंध था...

वह बंगला अभीभी पुलीसके कब्जेमें था. उस बंगलेपर किसीनेभी अपना हक नही जताया था.

वही कहीं मुझे कोई मिसींग लिंक मिल सकती है...

जॉनको एकदम उत्साह लगने लगा था. करनेके लिए कुछतो उसे मिला था.

उस बंगलेकी फिरसे अगर ठिक तरहसे छानबीन की तो?...

लेकिन चाबीयां तो पुलिसके पास ही है ...

चलो अब पहले यहांसे बाहर निकलना जरुरी है ...

वहां जानेके बाद देखेंगे आगे क्या करना है ...

उसने अपने सारे निराशायुक्त विचार झटक दिए और एक मजबूत निश्चयके साथ वह घरके बाहर निकल गया.

क्रमश:...

Wednesday, March 12, 2008

Ch-54: हिलव्ह्यू अपार्टमेंट (शून्य-उपन्यास)

जॉन और सॅम कार्पोरेशन आफिससे बाहर आ रहे थे. बाहर आते वक्त लोगोंकी भिड, इधरसे उधर फाइल्स ले जानेवाले ऑफिस बॉइज उनके बिचमें आ रहे थे. उस भिडसे रास्ता निकालते हूए वे ऑफिसके बाहर मैदानमें आगए. मैदानमें आनेके बाद कहा उन्हे अच्छा लगा.

" सर , अब क्या करेंगे ?" सॅमने जॉनके साथ चलते चलते कहा.

वैसे देखा जाए तो अब केसका पुरा चार्ज ऑफीशियली सॅमके हाथमें था. फिरभी वह उसके डिसमीस हूए बॉस जॉनका बडप्पन नही भूला था.

" मुझे लगता है बॉसने अपनेसाथ जो दो लोग दिए है उनको हम पहले इन दो जगह पर निगरानी करनेके लिए तैनात कर देंगे. ."

" हां ... मुझे लगता है यू आर राईट '' सॅम अपने जेबसे मोबाईल निकालते हूए बोला.

सॅमने एक नंबर डायल किया.

" हॅलो ... अँथानी ... देखो ... हमें पाचवे खुनके तीन पॉसीबल अॅड्रेसेस मिले है ... उसमेंका एक अॅड्रेस मै तुम्हे बताता हूं ... वहां तुम्हे जल्दसे जल्द निगरानीके लिए जाना है... हां अॅड्रेस लिख लो..."

सॅमने एक निवासीका नाम और अॅड्रेस अँथनीको बताया.

वह आगे बोला , "... और फौरन उधर जावो ... उसके जानको खतरा है..."

सॅमने फोन कट कर दिया. फिर उसने और एक नंबर डायल किया. उसके साथ दिए दुसरे पुलिसकोभी दुसरे एक अॅड्रेसपर फौरन तैनात होनेके लिए कहा.

" अब इस तिसरे अॅड्रेसका क्या करेंगे?...बॉसने तो अपने साथ सिर्फ दो लोग ही दिये थे..." जॉनने सॅमसे पुछा.

" एक काम करेंगे ... बॉसको फोन करके अपना अबतकका प्रोग्रेस बताएंगे और और एक जण को मांग लेंगे .. ताकी उसको हम इस तिसरे पत्ते पर तैनात कर सकेंगे"

" बॉस और एक आदमी हमें देगा ? ... मुझे तो संदेह है " जॉनने अपना संदेह व्यक्त किया.

" देखते तो है ..."

सॅम बॉसका फोन डायल करने लगा. इतनेमें उसकाही फोन बजा. जॉनने उसके मोबाईलके डिस्प्लेकी तरफ देखा. फोन बॉसकाही था. सॅमने तुरंत फोन अटेंड किया.

"एक अॅड्रेस बोलता हू ... लिख लो..." उधरसे बॉसने कहा.

" यस सर ....प्लीज '' पहले बॉस क्या बोलता है यह सुन लेंगे और फिर अपना प्रोग्रेस उसको बताएंगे ऐसा सॅमने सोचा.

सॅमने जॉनके जेबसे पेन और एक कागज अॅड्रेस लिखनेके लिए लिया.

" याहोता क्राफ्ट, बी-1011 हिलव्ह्यू अपार्टमेंटस, केटी लेन-3" उधरसे बॉसने एक अॅड्रेस बताया.

यह तो उनके पास था वह तिसरा अॅड्रेस था...

लेकिन बॉसको कैसे पता चला वह अॅड्रेस?...

हमने तो बताया नही था ....

" ...वहा फौरन पहूंचो ... पाचवा खूनभी हो चूका है " बॉसने आगे कहा.

उधरसे फोन कट होगया. बॉसको वह अॅड्रेस कैसे पता चला यह पहेली अब सॅमके लिए पहेली नही रही थी.

" हमें देर हो गई है " हताश होकर सॅमने जॉनसे कहा.

" क्या हूवा ?" जॉनने आश्चर्यसे पुछा.

" पाचवा कत्लभी हो गया है ... याहोता क्राफ्टका"

क्रमश:...

Friday, February 15, 2008

Ch-36: प्रपोज (शून्य-उपन्यास)

अभीभी अँजेनी खानेके टेबलपर बैठी थी. टेबलपर जलाई मोमबत्तीयां आखीर बुझ गई थी. टेबलपर सिर्फ बचा था इधर उधर फैला हूवा मोम. उसके दिलका हालभी कुछ उस मोम जैसाही था. जल जलकर जमे जैसा. टेबलपर खाना वैसाका वैसा रखा हूवा था. राह देख देखकर थकनेके बाद वह कुर्सीसे उठ गई. उतनेमे घडीका गजर बजा. बारा बार. कोई मानो उसके दिलपर घांव कर रहा हो ऐसा उसे लग रहा था. रातके बारा बज चूके थे. .

वह बराबर आठ बजे यहांसे गया था... .

मतलब चार घंटे हो चूके थे. ...

वह शायद कॉटेजके आसपासही पहूंचा होगा...

वह खिडकीके पास जाकर बाहर झांककर देखने लगी. कॉटेजकी तरफ आनेवाला रास्ता एकदम सुनसान था. ना किसीकी आहट ना किसी वाहन के लाईट्स. वह काफी समयतक रास्ते पर आखे लगाए रास्ता ताकती रही. अचानक उसे दो दिए रास्तेसे सामने आते हूए दिखाई दिए. वे उसकी तरफही आ रहे थे. उसका चेहरा खुशीसे खील गया.

वही होगा ...

जरुर जॉन ही होगा ...

वह दूर रास्तेपर आगे सरकते गाडीके लाईटस की तरफ देखने लगी. जैसे जैसे गाडीके दिए नजदीक आने लगे उसका दिल खुशीसे नाचने लगा.

जॉनके बारेमै मैने संदेह नही करना चाहिए था ...

उसे अपराधी लगने लगा था. गाडी अब सामने चौराहे तक आ पहूची थी.

गाडी एक टर्न लेगी और फिर अपने कॉटेजके तरफ आयेगी. ...

लेकिन यह क्या ?...

गाडी चौराहेपर कॉटेजकी तरफ ना मुडते हूए सिधे सामने निकल गई....

फिरसे निराशा उसके चेहरेपर दिखने लगी. अपने मनकी विषण्ण भावना दूर करनेके लिए वह कमरेमे चहलकदमी करने लगी. बिच बिचमें वह खिडकीसे बाहर झांकती थी. सामने रस्ता फिरसे पहले जैसा खाली खाली दिखने लगा था. चहलकदमी करते हूए उसने फिरसे दिवार पर टंगे घडीकी तरफ देखा. साडे बारा बज चूके थे. जॉनका अभीतक कोई अता पता नही था. उसे अब अकेलपन का डर लगने लगा था. उसने फिरसे एकबार खिडकीसे बाहर झांका. उसकी आशा फिरसे अंकुरीत होने लगी. फिरसे गाडीके दो दिए उसे रास्तेपर सरकते हूए दिखाई दिए.

अभी जरुर वही होगा ...

वह फिरसे खिडकीके पास खडी होकर लाईट्सकी तरफ लगातार देखने लगी.

यह गाडी जॉनकी हो सकती है .. और नही भी हो सकती...

लेकिन दिल ऐसा होता है की आदमी को आशा लगाए देता है... ...

अचानक चौराहेपर आनेके बाद गाडीके दिए गायब हो गए.

क्या हूवा ?..

गाडी वहा रुकी तो नही ?...

या फिर गाडी आ रही है ऐसा सिर्फ आभास..?...

वह खिडकीसे हटकर फिरसे कमरेमे चहलकदमी करने लगी. अचानक उसे निचे गाडी के हॉर्नका आवाज आया. वह खिडकीकी तरफ दौडी और उसने बाहर झांककर देखा. जॉन गाडीसे उतर रहा था. उसके जानमे जान आगई. वह दरवाजेके तरफ दौडते हूए चली गई. दरवाजा खोलकर जॉनकी तरफ वह लगभग दौडते हूएही लपकी. सामनेसे जॉनभी दौडते हूए आ रहा था. वह दौडतेही जॉनकी बाहोंमे समा गई.

" कितना वक्त लगाया ? ..." वह जॉनके सिनेपर हलके हलके मुक्के मारते हूए बोली.

" कितनी घबरा गई थी मै .....मुझे तो लगा की तुम मुझे यही छोड जावोगे..." उसकी आंखोमें देखते हूए वह बोली.

" नासमझ हो... ऐसा कभी हो सकता है क्या ?" वह उसके कंधेपर हाथ डालकर उसे कॉटेजमे लाते हूए बोला.

दोनोभी एकदुसरेके कमर मे हाथ डाले सिढीयां चढने लगे.

" अबतो बोलोगे ... कहां गए थे?" उसने पुछा.

" बताता हूं ... बताता हू... थोडा सब्रतो करोगी" वह बोला.

अब दोनो कॉटेजमे आगए. अँजेनीने अंदर आतेही सामनेका दरवाजा बंद किया. और वह क्या बोलता है इसका बेसब्रीसे इंतजार करते हूए उसके आगे पिछे करने लगी. वह सिधा अंदर डायनींग टेबलके पास गया. वह भी उसके पिछे पिछे वहा गई. उसने फिरसे खानेके टेबलपर मोमबतीयां जलाई. घरके सारे लाईट्स बंद किये. अँजेनी कुछ ना समझते हूए सिर्फ उसके पिछे पिछे जा रही थी. उसने उसके कंधे को पकडकर उसे उसके सामने कुर्सीपर बिठाया.

" बैठो, बैठो .. मै तुम्हे बताता हू की मै कहा गया था..." वह उसे बोला.

वहभी उसके सामने बैठ गया. थोडी देर दोनो शांत बैठे रहे. फिर जॉनने उसकी आंखोमें देखते हूए उसके मुलायम हाथ अपने हाथोंमे लिए. मोमबत्तीयोंके रोशनीमें उसका चेहरा और ही निखर आया था. जॉनका आने के बाद यह क्या चल रहा है यह ना समझते हूए वह असमंजससी उसके तरफ देख रही थी.

" अँजेनी तूम मुझसे शादी करोगी ?" उसने उसके आंखोमे आखे डालकर देखते हूए उसे प्रपोज किया.

अँजेनीको तो एकदम भर आए जैसा हुवा.

लेकिन खुदकी भावनाए संभालते हूए वह बोली, " इज धीस सम काईंंड ऑफ जोक?"

" नही नही ... मै सिरीयसली बोल रहा हूं " वह बोला.

" देखो जॉन पहलेही तूम इतनी देर नही थे तो मुझे अकेलापन महसूस हो रहा था... कम से कम ऐसे वक्त ऐसा फालतू मजाक मत करो." वह बोली.

" नही अँजी ... मै मजाक नही कर रहा हूं " वह उसे विश्वास दिलानेका प्रयास करने लगा.

जॉनने उसे पहली बार प्यारसे 'अँजी' कहा था. वह उसकी आखोंमे देखकर उसकी भावनाए टटोलनेकी कोशीश करने लगी.

" तुम्हे सच नही लग रहा है ना ..."

उसने अपने कोटके जेबसे एक छोटा लाल बॉक्स निकालते हूए कहा ,

" यह देखो मैने तुम्हारे लिए क्या लाया है ..."

" क्या है ?" उसने प्रश्नार्थक मुद्रामें पुछा.

उसने बॉक्स खोलकर उसके सामने पकडते हूए कहा,

" एंंगेजमेंट रिंग ... ऑफ कोर्स इफ यू अॅग्री.."

उसने फिरसे एकबार उसे पुछा , " विल यू मॅरी मी प्लीज"

अँजेनीके आंखोमें आंसू तैरने लगे.

" इसके लिए गये थे तूम सिटीमें ?" उसका गला भर आया था.

उसने उसकी आंखोमें देखते हूए 'हां' मे अपनी गर्दन हिलाई.

वह कुर्सीसे उठकर खडी हो गई. वह भी अपने कुर्सीसे खडा हूवा. वह आवेगके साथ उसके बाहोंमे समा गई. .

" यस आय विल" उसके भरे हूए गले से शब्द निकले.

जॉनके चेहरेपर खुशी और समाधान फैल गया. वह अतीव आनंदसे उसे उठाते हूए उसे चूमने लगा. उसने फिर धीरेसे उसे निचे उतारते हूए बॉक्स से अंगूठी निकालकर धीरेसे उसकी तिसरी उंगलीमें सरका दी.

क्रमश:...

Wednesday, February 13, 2008

Ch-34B: फिशींग (शून्य-उपन्यास)

थोडी देर दोनो शांत थे.

फिर जॉन ने कहा " अब मै एक पहेली पुछता हूं."

अँजेनीने आंखोहीसे 'हां' कहा.

" नंबर शून्य नंबर एट को क्या बोला होगा?" जॉन ने पुछा.

शून्य ... शून्यका जिक्र होतेही अँजेनीके चेहरेपर एक उदासी छा गयी. उसके चेहरेपरसे वह अल्लड हंसी गायब हो चूकी थी. जॉनके खयालमें आया की उसने शून्यका जिक्र नही करना चाहिए था.

" आय अॅम सॉरी..." वह उसकी पिठ थपथपाते हूए बोला.

वह कुछ ना बोलते हूए पाणीमें हूक हिलाने लगी.

" रियली आय अॅम सॉरी ... मेरे खयालमेंही नही आया" उसने फिरसे कहा.

" इट्स ऑलराईट ..." वह खुदकी भावनाए संवारते हूए बोली. " तूमही बोलो ... मै नही बता पा रही हूं."

" क्या ?" जॉनने पुछा.

" अरे शून्य नंबर एट को क्या बोला वह बतावो. " वह फिरसे उल्लड होने की चेष्टा करते हूए बोली.

जॉन कुछ नही बोला.

" बोलो ना " वह उसका चेहरा अपनी तरफ करते हूए बोली.

जॉन उसकी तरफ देखकर हंसते हूए बोला. " हार गई ...इतने जल्दी. "

" हां ... बोलो ना. " वह उत्सुकतापुर्वक बोली.

" शून्य नंबर एट को बोला ... नाईस बेल्ट" जॉन हंसते हूए बोला.

" अरे वा...नाईस "

वहभी उसके साथ हंसने लगी.

काफी समय दोनो चूप थे. दोनोभी अपने अपने हूक्स हिलाकर देखनेमें व्यस्त थे.

" तुम्हे मछली पकाने आती है ?" अँजेनीने जॉनके पास खिसकर कहा.

अपना भारी लगता हूवा हूक खिंचकर देखते हूए जॉनने कहा " नही"

" फिर हम मछलियां क्यो पकड रहे है ?" अँजेनीने पुछा.

" अरे ... क्यो मतलब खाने के लिए" जॉन उसकी तरफ आश्चर्यसे देखते हूए बोला.

" फिर इसका कोई फायदा नही " अँजेनीने कहा.

" मतलब ? "

" मतलब मुझेभी मछलीयां पकाना नही आता"

" क्या? " वह आश्चर्यसे बोला.

" हां, अगर तुम्हे वैसेही बिना पकाये हूए खानेकी हो तो कोई बात नही. " वह मजाकमें बोली.

" तुम्हेभी नही बनाने आती ? कोई बात नही हम पकाकर तो देख सकते है... ट्राय करनेमें क्या दिक्कत है..? " उसने सुझाया.

" और अगर नही पका पाये तो"

" तो जैसे बनती है वैसीही खा एंगे. कमसे कम बिना पकी खानेकीतो नौबत तो नही आयेंगी. " वह हंसते हूए बोला.

इतनेमें अँजेनीको अहसास हूवा की उसका हूक भारी लग रहा है. उसने हूक हिलाकर देखा. शायद उसके हूकमें मछली अटक गई थी. उसने अपना हूक लपेटना शुरु किया. एक भूरे शेडकी सफेद मछली छटपटाते हूए हूकके साथ उसके पास आने लगी. उसने धीरेसे उसे हूकसे निकालकर बगलमें पत्थरपर रखे टोकरीमें डाला और वह फिरसे हूक पाणीमे छोडने लगी. इतनेमें तितलीजैसा कुछतो उसके नाकको लगके पाणीमें गिरे जैसा उसे लगा. उसने नाकको हाथसे पोंछ लिया और फिर उसी हाथसे अपने चेहरेपर लहराती लटोंको संवारते हूए हूक पाणीमे छोडनेमें व्यस्त हूई.

जॉन अचानक उसकी तरफ देखकर जोर जोरसे हंसने लगा.

उसने जॉनके तरफ देखकर पुछा , " क्या हूवा ?"

" तुम्हारी मछली कहा है ? " उसने पुछा.

उसने पिछे रखे टोकरीमें देखा तो मछली वहां नही थी.

" कहा गई ? " वह इधर उधर देखने लगी.

" सचमुछ कहा गई ?" वह मुस्कुराते हूए बोली.

उसे मजा आ रहा था.

" गयी वहां पाणीमें छलांग लगाकर... और साथमें तुम्हारे नाकपर चपटी मारकर" वह फिरसे जोरसे हंसते हूए बोला.

" अच्छा तो वह मछली थी... " उसके खयालमें आया तो वह अपने नाकको हाथ लगाते हूए बोली और वह भी उसके साथ जोरसे हंसने लगी.

क्रमश:...

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About Hindi

Hindi is the name given to an Indo-Aryan language, or a dialect continuum of languages, spoken in northern and central India (the "Hindi belt")Native speakers of Hindi dialects between them account for 41% of the Indian population (2001 Indian census). That is the reason because of which the entertainment industry in India mainly use Hindi. And the idustry which is also called as bollywood is the second largest industry producing movies in the world. As defined in the Constitution, Hindi is the official language of India and is one of the 22 scheduled languages specified in the Eighth Schedule to the Constitution. Official Hindi is often described as Modern Standard Hindi, which is used, along with English, for administration of the central government. Standard Hindi is a sanskritised register derived from the khari boli dialect. Urdu is a different, persianised, register of the same dialect. Taken together, these registers are historically also known as Hindustani.