थोडी देर दोनो शांत थे.
फिर जॉन ने कहा " अब मै एक पहेली पुछता हूं."
अँजेनीने आंखोहीसे 'हां' कहा.
" नंबर शून्य नंबर एट को क्या बोला होगा?" जॉन ने पुछा.
शून्य ... शून्यका जिक्र होतेही अँजेनीके चेहरेपर एक उदासी छा गयी. उसके चेहरेपरसे वह अल्लड हंसी गायब हो चूकी थी. जॉनके खयालमें आया की उसने शून्यका जिक्र नही करना चाहिए था.
" आय अॅम सॉरी..." वह उसकी पिठ थपथपाते हूए बोला.
वह कुछ ना बोलते हूए पाणीमें हूक हिलाने लगी.
" रियली आय अॅम सॉरी ... मेरे खयालमेंही नही आया" उसने फिरसे कहा.
" इट्स ऑलराईट ..." वह खुदकी भावनाए संवारते हूए बोली. " तूमही बोलो ... मै नही बता पा रही हूं."
" क्या ?" जॉनने पुछा.
" अरे शून्य नंबर एट को क्या बोला वह बतावो. " वह फिरसे उल्लड होने की चेष्टा करते हूए बोली.
जॉन कुछ नही बोला.
" बोलो ना " वह उसका चेहरा अपनी तरफ करते हूए बोली.
जॉन उसकी तरफ देखकर हंसते हूए बोला. " हार गई ...इतने जल्दी. "
" हां ... बोलो ना. " वह उत्सुकतापुर्वक बोली.
" शून्य नंबर एट को बोला ... नाईस बेल्ट" जॉन हंसते हूए बोला.
" अरे वा...नाईस "
वहभी उसके साथ हंसने लगी.
काफी समय दोनो चूप थे. दोनोभी अपने अपने हूक्स हिलाकर देखनेमें व्यस्त थे.
" तुम्हे मछली पकाने आती है ?" अँजेनीने जॉनके पास खिसकर कहा.
अपना भारी लगता हूवा हूक खिंचकर देखते हूए जॉनने कहा " नही"
" फिर हम मछलियां क्यो पकड रहे है ?" अँजेनीने पुछा.
" अरे ... क्यो मतलब खाने के लिए" जॉन उसकी तरफ आश्चर्यसे देखते हूए बोला.
" फिर इसका कोई फायदा नही " अँजेनीने कहा.
" मतलब ? "
" मतलब मुझेभी मछलीयां पकाना नही आता"
" क्या? " वह आश्चर्यसे बोला.
" हां, अगर तुम्हे वैसेही बिना पकाये हूए खानेकी हो तो कोई बात नही. " वह मजाकमें बोली.
" तुम्हेभी नही बनाने आती ? कोई बात नही हम पकाकर तो देख सकते है... ट्राय करनेमें क्या दिक्कत है..? " उसने सुझाया.
" और अगर नही पका पाये तो"
" तो जैसे बनती है वैसीही खा एंगे. कमसे कम बिना पकी खानेकीतो नौबत तो नही आयेंगी. " वह हंसते हूए बोला.
इतनेमें अँजेनीको अहसास हूवा की उसका हूक भारी लग रहा है. उसने हूक हिलाकर देखा. शायद उसके हूकमें मछली अटक गई थी. उसने अपना हूक लपेटना शुरु किया. एक भूरे शेडकी सफेद मछली छटपटाते हूए हूकके साथ उसके पास आने लगी. उसने धीरेसे उसे हूकसे निकालकर बगलमें पत्थरपर रखे टोकरीमें डाला और वह फिरसे हूक पाणीमे छोडने लगी. इतनेमें तितलीजैसा कुछतो उसके नाकको लगके पाणीमें गिरे जैसा उसे लगा. उसने नाकको हाथसे पोंछ लिया और फिर उसी हाथसे अपने चेहरेपर लहराती लटोंको संवारते हूए हूक पाणीमे छोडनेमें व्यस्त हूई.
जॉन अचानक उसकी तरफ देखकर जोर जोरसे हंसने लगा.
उसने जॉनके तरफ देखकर पुछा , " क्या हूवा ?"
" तुम्हारी मछली कहा है ? " उसने पुछा.
उसने पिछे रखे टोकरीमें देखा तो मछली वहां नही थी.
" कहा गई ? " वह इधर उधर देखने लगी.
" सचमुछ कहा गई ?" वह मुस्कुराते हूए बोली.
उसे मजा आ रहा था.
" गयी वहां पाणीमें छलांग लगाकर... और साथमें तुम्हारे नाकपर चपटी मारकर" वह फिरसे जोरसे हंसते हूए बोला.
" अच्छा तो वह मछली थी... " उसके खयालमें आया तो वह अपने नाकको हाथ लगाते हूए बोली और वह भी उसके साथ जोरसे हंसने लगी.
क्रमश:...
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Wednesday, February 13, 2008
Ch-34B: फिशींग (शून्य-उपन्यास)
Posted by
Sunil Doiphode
at
10:25 AM
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Labels: उत्तर भारत, उपन्यास, कथा, कहानी, ग्रंथ, दिल्ली, राष्ट्रभाषा, साहित्य, हिंदी
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