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Political Novel - Madhurani - Chapter 51 - अभी तो मैं जवान हूँ~

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     गणेश बाबू आज तड़के ही पाँच बजे उठ कर बड़े जोश में सैर पर निकल पड़े. रास्ते से गुज़रते  वक्त उन्हें बगीचे में कसरत करते लोग दिखाई पड़े. वे भी बगीचे में गये और खुद भी  कसरत करने लगे.

अब थोड़ा चुस्त तंदुरुस्त बनना पड़ेगा..

तोंद भी निकल आई है उसे भी कम करना पड़ेगा..

कसरत करते हुए वह जल्दी ही थक गये.

आदत नहीं हो तो ऐसा ही होगा...

कोई बात नहीं धीरे धीरे आदत हो जाएगी... उन्होने सोचा.

कसरत करते हुए उन्हें पसीना आ गया था और इसलिए सुबह की ठंडी हवा उन्हे और भी ठंडी लग रही थी.

कितना अच्छा लग रहा है ... तमाम बंधनों से आज़ाद...

लेकिन मैं कहीं ग़लत राह पर तो नही जा रहा?...

इतने साल जिसने मेरा साथ निभाया आख़िर उस बीवी को मैं कैसे छोड़ दूं?...

चाहे अब मुझे वो ज़रा भी पसंद नहीं लेकिन मैने कभी उससे प्यार किया है.....

लेकिन यह प्यार भी बड़ी अजीब चीज़ है...

जैसे किसी रेशम के कीड़े ने अपने इर्द गिर्द बनाया हुआ कवच ...

जहाँ वह सुरक्षित रहे...

लेकिन एक दिन ....जब वह रेशमी कीड़ा  बाहर आता है... तो उस कवच की दाज्जियाँ उड़ा कर और फिर सारे बंधनों से आज़ाद.... इस फूल की  पंखुड़ी से उस पंखुड़ी पर तितली बन उड़ता है....

     उस सुबह दाढ़ी बना कर  गणेश बाबू ने अपने बेटे वीनू को हुक्म सुनाया -

"जाओ जा कर अंदर से एक कटोरी ले आओ"

वीनू फटी फटी आँखों से अपने बाप को देख रहा था..

यूँ इस प्रकार उसके बाप ने कभी उसको कोई हुक्म न सुनाया था. उसने हैरत भरी निगाहों से उन पर नज़र डाली और उन्हें अनदेखा कर वह अपने काम में लग गया.लड़के ने हुक्म की तामील न की देखकर फिर उन्होने बीवी को हुक्म सुनाया -

"अरी भागवान अंदर से एक कटोरी लाओ"

थोड़ी देर गुज़र जाने पर भी जब कोई आवाज़ न हुई तो गणेश बाबू गुस्से से आग बबूला हो गये

" चीख चीख कर मेरा गला सूख गया के एक कटोरी भेज दो , बहरे हो गये क्या सब के सब?"

इसके साथ ही हुक्म की तामील हुई उनकी बीवी रसोई से भागी भागी स्टील की कटोरी लेकर आई और उनके सामने रखती हुई बड़बड़ा कर वापस जाने लगी.

" घर में कोई पुराना ब्रश है क्या" उन्होने बीवी से मुखातिब हो कर पूछा.

"ब्रश? कैसा ब्रश?"

"दाँतों का ब्रश और किसका"

"क्यों?"

"ज़्यादा सवाल मत पूछो , जो बात पूछी है उसका जवाब दो" गणेश बाबू दोबारा चिल्लाए.

"देखती हूँ मिलेगा तो ला कर दूँगी" रसोई से उनकी बीवी चीखी.

वीनू अपने बाप के सामने आ कर खड़ा हो गया और बरसा

"फिर शुरू हो गयी तुम्हारी चिल्ला चोट?"

"खामोश! बदतमीज़" गणेश बाबू उस  पर बरस पड़े "बड़ों की इज़्ज़त कैसे की जाती है तेरी अम्मा ने न सिखाया तुझको ??? नालयक बड़ों से ज़बान लड़ता है?"

वीनू अपने पिता का यह रूप देख कर भौचक्का रह गया और वहाँ से चला गया

"ब्रश मिला क्या???" गणेश बाबू दुबारा चीखे

"नही मैं घर में पुरानी टूटी फूटी चीज़ें नही रखती" बीवी ने अंदर से चिल्ला कर जवाब दिया.

" फिर मैं जो ब्रश अभी इस्तेमाल करता हूँ वही ले कर आओ" गणेश बाबू ने फरमान सुनाया.

गणेश बाबू की बीवी न कुछ न कहते हुए उनका ब्रश उनके सामने ला पटका और उल्टे पाँव चली गयी.

थोड़ी देर बाद वीनू वापस अपने बाप के सामने आ पंहुचा और अपनी अम्मा को आवाज़ लगाई "अम्मा अरी ओ अम्मा "

"क्या हुआ रे नास्पीटे.. पहले तेरा बाप चिल्ला रहा था अब तू चिल्ला" अंदर से उसकी अम्मा चिल्ला कर बोली.

"अरी अम्मा जल्दी आओ ऐसे ही ... देखो देखो बापू क्या कर रहे हैं"

उसकी अम्मा तेज कदमों से चलती हुई आ कर उसके बगल में खड़ी हो गयी और जो गणेश को बाबू को देखा तो देखती ही रह गयी.

गणेश बाबू कटोरी में खिजाब लिए ब्रश से अपने सफेद  बालों को रंग रहे थे.

 " वाह ....क्या नज़ारा है" वीनू अपने बाप का मज़ाक उड़ाते हुए बोला.

"बुढऊ सठिया गया है....सच कहते हैं लोग , साठ साल का  खूंसठ बुड्ढ़ा खुद को जवान ही समझता है" कहते हुए उनकी बीवी जाने को मुडी और पाँव पटकते हुए रसोई में गयी.

"अरी  भागवान ...अभी तो  सिर्फ  पचास का ही हुआ हूँ ....साठ साल में अभी 10 साल बाकी हैं" गणेश बाबू अपनी मूछों को ताव देते हुए बोले.

क्रमशः

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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