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Madhurani/Honey - Chapter 31 वह बदमिज़ाज लोग

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"हे भगवान , कैसे  बदमिज़ाज लोग हैं यह , बेकार बखेड़ा खड़ा कर दिया इन  गाँववालों ने "  गणेश मधुरानी से बतियाते हुए बोला  " अच्छी ख़ासी चर्चा चल रही थी सब गुड गोबर कर दिया "

" सादी ब्याह के मामलों में ऐसा ही होवे है बाबू तुम न जानत रहे , कौन मुआ  किस बात को ले  कब आड़े आ जाए कौनो खबर न  रहे " मधु रानी जवाब देते हुए बोली.

कुछ सोच कर गणेश बोला " कुछ भी हो , मुझे तो इसमें उस पाटिल का ही हाथ नज़र आता है "

"उ  कैसे ? " मधुरानी ने पूछा.

" तुम भूल गई ? सरपंच जी ने उनको चर्चा करने पर राज़ी किया था , मुझे लगता है  पाटिल जी को यह नागवार गुजरा "

" ना ना बाबूजी ... पाटिल भला आदमी है  उ बात होती तो  उसने अपनी हवेली में उनको बुलावा   न भेजा होता "  मधुरानी की बात सुन गणेश एक पल सोच में पड़ गया .

इसे पाटिल जी से इतनी हमदर्दी क्यों ? .....
आख़िर  इसी पाटिल की जीप तले आकर इसके मर्द ने अपनी जान गँवाई थी .और फिर भी यह उसी की तरफ़दारी करती है , क्या वजह हो सकती है? अब यूँ तो पाटिल के बुलाने पर भी इसको वहाँ जाना नहीं चाहिए था.... हुम्म! इसी से पूछता हूँ ... लेकिन क्या यह  वाकई मायने रखता है? .....

फिर वह मधुरानी को जवाब देते हुए बोला " अरे इसी बला को तो राजनीति कहते हैं "

तुनक कर वह बोल उठी " ई राजनीति हमें न मालूम है बाबू ....हम तो बस इतना जानत रहे कि उ पाटिल बाबू मक्कार ना है , दिल का सरीफ़ होवे है , हम कहे देते है .... हमको आदमी की परख करना आवे है , आपको न परखा हमने   ? "  शरारत से उसकी आँखो में आँखें डालते हुए  वह बोली.

"तुम औरतों तो पैदाइशी भोली भली होती हो , खैर मैने पाटिल जी को डाक्टर साहब को इशारा करते हुए देखा है"
गणेश उसकी नज़रें टाल कर बोला.

"जाने दो न बाबू जी उ मुए पाटिल को , काहे उसकी बातें करत हो" वह उठकर उसकी ओर खिसक कर बैठ गई .

"जो भी हुआ बहुत बुरा हुआ ... अब उस बेचारी गूंगी लड़की का क्या होगा ? अपनी नासमझी और ज़िद  के चलते उसके अरमानों का बेदर्दी से कत्ल किया इन लोगों ने . उस लड़की के साथ बहुत ग़लत हुआ कम से कम यह देखकर तुम्हें कुछ तो विरोध करना चाहिए था , लेकिन तुम भी चुप रह गयीं , तुमसे मुझे यह उम्मीद न थी " गणेश झुंझला कर बोला.

उसने मधु रानी की तरफ देखा , यह बात सुनकर उसके चेहरे की रंगत एक पल में बदल गयी . गणेश को महसूस हुआ कि बेकार ही उसने उससे गुस्से में इतनी कड़ी बात कर दी .

"साहब जी"  वह  संजीदा आवाज़ में दूर कहीं देखते हुए बोली " ई दुनिया में कई  सही गलत  बातें  होत हैं ...ई सब किस्मत का खेल है जो भाग में लिखा है... सो होवे है उ भाग के आगे हमारा तुम्हारा कोई बस न चले है" फिर वह रुककर बोली "आप भी तो उहाँ बोले थे , कौनो फायदा हुआ उ लोगों के सामने मुँह खोल कर ? उल्टा पूरा गाँव के सामने  बेइज़्ज़ती हो गयी"

यह सुन कर गणेश सकपका गया.

 मधु रानी संभल कर बोली " उ लोगन के सामने मैं भी बोली रही तो मुझे भी डपट देते कि औरतों - लुगाइयो को बीच में बोलना न चाहिए "  वह अपनी रौ में बोली चली जा रही थी .

गणेश बीच में बोल उठा " न न मेरा वह मतलब न था " गणेश उसके सामने सफाई देते हुए बोला .

लेकिन उसकी बात को बीच में काटते हुए मधुरानी बोल पड़ी "आप सोचत रहे कि उनका ब्याह हो जाता तो अच्छा रहता  , आप लोगन के लगने से कौनो फ़र्क पड़े है ? मुझे भी लागे है कि आपके संग मेरा  ब्याह हो जावे तो कितना अच्छा हो "

गणेश का मुँह खुला का खुला रह गया वह ऐसे चौंक उठा मानों उसे बिजली का झटका लगा हो.  वह फटी फटी आँखों से मधु रानी को अपलक देखता ही रह गया .

बात को आगे बढ़ाते  हुए उसने कहा "लेकिन मेरा ऐसन सोचने से का होवे है बाबू जी ? .... ई तो किस्मत की बात होवे है"

हे भगवान  ! यह मुझ पर डोरे  डाल  रही है ? क्या यह मेरे गले पड़ने की सोच रही है?.....  गणेश सोच में पड़  गया  ....  बडी चालू चीज़ है यह , मुझे  फाँसने  की कोशिश कर रही है.…   गणेश के पसीने  छूट गये .

"बाबूजी"  मधुरानी की आवाज़ से उसकी तंद्रा टूटी.

 " अ.... हाँ ???"  रुमाल से अपनी गर्दन और और चेहरे पर पसीने की बूँदें  पोछते हुए उसने मधुरानी से कहा "कुछ ? कहा मुझसे?"

उसकी सकपकाहट देख कर मधुरानी की हँसी छूट गयी "बाबू जी"  वह मुस्कुराते हुए बोली  "तोहार तो पसीने छूटे है"  मुस्कुराना जारी रखते हुए  उसने आगे कहा " घबडाओं ना बाबूजी , हमार कोई ऐसा वैसा इरादा ना है , एक औरत का घर बार  उजाड़ कर हम अपना घर ना बसाना चाहे . आपने का सोचा ??  "

"न..न.. नहीं" खिसियानी  हँसी हंसते हुए गणेश बोला , अब भी रुमाल से उसका पसीना पोंछना जारी था.

गणेश की इस हालत के मज़े लेती हुई मधुरानी  ठहाका मार कर हँसने लगी " आईने में खुद की सकल  देखों बाबूजी , का चेहरा होई गवा है "

आख़िर क्या चाहती है यह औरत ? ....इस पिछड़े हुए गाँव में रहने के बावजूद कितने आज़ाद ख्यालात क़ी  है यह .... गणेश मन ही मन विचार करने लगा

"बाबू जी" मधुरानी आगे बोली " आप एही सोचत रहोगे कि कैसी कलमुंही औरत होवे है , इसके ख़सम को उ पाटिल ने अपनी  गाड़ी से कुचला , ई की माँग उजाड़ दि फिर भी उ पाटिल की तरफ़दारी करती है"

हद हो गयी यह तो....  गणेश चौंक गया ....इसे कैसे पता मैं क्या सोच रहा हूँ ?.... कहीं यह कोई टोना टोटका तो नहीं करती?.... शायद नहीं , हो- न- हो यह  मेरे मन की बात ताड़ गयी , या शायद यह महज एक इत्तेफ़ाक हो....

"मेरा ख़सम बेवड़ा था ,  दिन-रात सराब के नसे में धुत्त रहता था उ ही हालत में उ ससुरा उ पाटिल जी की गाड़ी के नीचे आया रहा , ई बात में उ पाटिल जी का क्या कसूर ? और ई बात को लेकर हम काहे पाटिल जी से दुस्मनि मोल ले? अब ई तो एही हुआ के पानी में रहकर मगरमच्छ से पंगा लेना"  मधुरानी ने कहा .

गणेश टकटकी लगाए उसकी ओर देख रहा था ....इसकी सोच सही है... अगर इसने पाटिल साहब से पंगा लिया होता तो वह इसका इस गाँव में जीना हराम कर देता....  गणेश वापिस सोच में डूब गया .

"बाबूजी" अबकी बार उसकी बाँहों को पकड़ कर ज़ोर ज़ोर से उसे हिलाते हुए मधुरानी बोल उठी "आपको ई बीच बीच में खोने की न जाने कैसी अजीब बीमारी होवे है"

उसके नर्म , मुलायम हाथों  की छुअन से उसके  सारे  बदन में रोंगटे  खड़े हो गये वह फिर अपनी सोच में डूब गया.
अब इसकी बातें  कुछ कुछ समझ में आने लगी है , शायद  यह भी मेरे जसबातों को समझती है....

वह उसकी खूबसूरती को अपनी आँखों से निहार रहा था  , उसे  ताक  रहा था   मानों  उसके चेहरे का नूर  अपनी आँखों से पी जाना चाहता हो.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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