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Hindi Upanyas - Madurani - Chapter 36 - बंद दरवाज़ा

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      उसके दिल की  धड़कने अब तेज हो चुकीं थी उसने हौले से दरवाज़े की सांकल से दरवाज़ा खटखटाया . अंदर से कोई आवाज़ न आई ..उसे तोड़ा अचंभा हुआ उसने दोबारा दरवाज़ा खटखटाया...

"कौन आया रहा ?" अंदर से मधुर आवाज़ आई  .

गणेश के हलक से आवाज़ न आई. बोलने की उसने लाख  कोशिश की लेकिन चाह कर भी  आवाज़ न निकल सकी.

अभी से यह हाल है तो बाद में न जाने क्या होगा ?....  गणेश ने सोचा

.... ऐसे ही वापस चला चलता हूँ ...

नहीं यूँ इस तरह पीठ दिखा कर भागना उचित न होगा.. थोडा धीरज से काम लेना होगा...  भागना मर्दानगी की निशानी नही... औरत चाहे जितनी भी  बिंदास हो साहस तो मर्द को ही करना चाहिए ....

 " कौन है" अंदर से दोबारा आवाज़ आई . इस बार आवाज़ में ज़रा परेशानी झलक रही थी.

"म..म..म..मैं ग.. गग.. गणेश" गणेश  ने हकलाते हुए किसी तरह जवाब दिया. वह अब हल्का महसूस कर रहा था.  उसे खुद पर ही फख्र महसूस हो रहा था.

 इसी तरह हिम्मत करनी होगी ...

" गनेस बाबू... अरे आप उधर बाहेर  काहे खड़े हो बाबू जी अंदर आइए . हम  इहा कपड़े बदलत  रहे "  अंदर से आवाज़ आई.

गणेश की आँखों के सामने मधुरानी कपड़े बदलती  हुई  तस्वीर  आ गई.

आज तक मैं  सिर्फ़ उसके खूबसूरत जिस्म को निहारना चाहता था.....   शायद अनायास ही वह मौका आज हाथ लगा है …

वह जोरों से सांस लेने लगा  और उसके मन में विचार आ रहे थे.

वह कपड़े बदल रही है भला यह  बतलाने की क्या ज़रूरत थी ?.. या शायद वह यही चाहती थी कि मैं यह बात जान लूँ  ... क्या वह  मुझे करीब आने का  इशारा कर रही है ? .. हाँ , बिल्कुल .. इतने दिन से वह झे इसी का तो इशारा दे रही है ... अब इससे अधिक खुलकर वह भला क्या बताएगी? ....

गणेश हौले से अंदर आया और जाते वक्त उसने दरवाज़े पर काँपते हाथों से सांकल चढ़ाई . सांकल चढ़ा कर वह काँपते कदमों से अंदर आया . एक लंबी सांस ले कर मानों उसने हिम्मत जुटाई .

"उ हाँ चबूतरे पर बिछी  खाट पर बैठ जाइए  बाबू जी" अंदर से दोबारा आवाज़ आई.

उसने सोचा.

वह केवल चबूतरे पर बैठने के लिए कह सकती थी .. भला उसने खाट  पर ही बैठने को क्यों कहा ? आख़िर क्या चाहती है यह .. शायद वह कोई गुप्त संदेश देना चाहती हो ... या वह मुझे अपने करीब बुला रही है ? ... हाँ ज़रूर .. मुझे यूँ ही उसके पास जाना चाहिए .. ऐसा मौका दोबारा हाथ नहीं आएगा ....

  उसके दिमाग़ में नग्न मधुरानी की तस्वीर झलकी.

अब तो जाना ही पड़ेगा....

 वह चबूतरे की खाट तक चल कर आया.  उसने  मधुरानी के कमरे में जाने की लाख कोशिश कि लेकिन उसके मानों पाँव ही उठ नही रहे थे.  पूरा जिस्म पसीने से  तर था .

 अगर मधुरानी मुझे यूँ इस हाल में देख लेगी तो न जाने क्या सोचेगी....

 उसने मन ही मन कहा और वहीं धम्म से  खाट पर बैठ गया . बैठ कर उसके थोड़ी जान में जान आई , जेब से रुमाल निकाल कर वह  चेहरे पर आए पसीने को पोंछने लगा .

"म.. मधुरानी म..मैं प..प्यासा हूँ ... थोड़ा पानी मिलेगा? दर असल आ..आज नौकर  प..प..पानी भ.. भरना भू.. भूल गया" उसके मुँह से यह लफ्ज़ कब निकले खुद उसे अहसास नहीं हुआ.

 उसने सोचा चलो अच्छा ही हुआ यूँ ही चुप रहने में क्या लाभ?....

 इतने में मधुरानी ने जवाब दिया " पानी चाहे हो ... लाती हूँ पर उ पानी के लिए इत्ति तकल्लुफ काहे करे हो बाबूजी ? ई हाँ आने जाने में आप पर कोई पाबंदी तो न है.. बाबूजी"  मधुरानी की यह बातें उसके सिर में  हथौड़े की तरह बजने लगीं

 मतलब यह भी एक इशारा है... और वह भी खुल्लम खुल्ला ..अब तो कुछ करना ही पड़ेगा …

वह तड से उठ कर खड़ा हो गया और खिसीयानी हँसी हंसते हुए बोला "न.. नही मेरा व..वह मत...मतलब नहीं था"

उसने धीरे धीरे मधुरानी के कमरे की तरफ कदम बढ़ाए. इसी दौरान  खुद मधुरानी ही कमरे के बाहर आई.

 "देती हूँ बाबूजी ई ज़रा बाल संवार लूँ "

गणेश फट से पीछे हो गया.

धत्त तेरे की...फिर चूक हो गयी.. इन बातों में टाइमिंग का ख़याल रखना पड़ता है.…  उसने मन ही मन कहा.

 जाने कितनी बार यूँ  ही ग़लती होगी .....कहीं उसने मेरी यह हालत देख ली तो कहेगी कैसे लल्लू से पाला पड़ा है.…

उसने नज़र भर मधुरानी को देखा . हरी साड़ी में लिपटी हुई  वह और भी खूबसूरत नज़र आ रही थी.  उसने माधुरानी की आँखों में देखा . उसे उसकी आँखें शरारत से भरी नज़र आई, मानों वह उसे इशारा कर पास बुला रहीं हो . उसके हौसलें अब और बढ़ गये थे. कुछ पल पहले वह खुद को कोस रहा था.

गणेश जहाँ बैठा था वहाँ उसके पीछे ही दीवार में एक खांचा बना हुआ था . मधुरानी अपने  खुले बालों को उंगलियों से सांवरते हुए, और  दाँतों में  बालों की क्लिप दबाए ,  उसके करीब आई और खाँचे से कोई चीज़ लेने के लिए झुकी ... अचानक ही उसके पैर गणेश के पैरों से छू गये और उसके खुले बाल उसके गालों से थोड़ा छू गये.  गणेश के मानों पूरे बदन में बिजली सी दौड़ गयी, उसका जी किया कि वही  उसकी कमर को पकड़ कर अपनी बाँहों में भींच ले. उसने अपने हाथ आगे बढ़ाए  भी ,  लेकिन इतने में  वह वापस पीछे सरक गयी , उसे दीवार में बने खाने से जो चीज़ चाहिए थी वह मिल गयी थी ..गणेश अपनी नाकामी पर दोबारा मायूस हो गया . गणेश ने अंदर जाती मधुरानी को देखा.  बड़े गले के ब्लाऊज में उसकी सुराहीदार गोरी गर्दन और  बाहें  देख कर वह मचल उठा . अंदर जाते समय अचानक ही वह रुकी और गणेश की ओर नज़रें उठा कर देखा. गणेश उसे निहारते हुए पकड़ा गया था .वह अंदर चली गयी. गणेश खाट से उठ बैठा.

अब तो अंदर जाना ही पड़ेगा .. इससे अच्छा मौका अब हाथ न आएगा...

 उसने उस कमरे की तरफ कदम बढ़ाए. उसकी साँसे  तेज चलने लगी थी . अब उसमें आत्मविश्वास झलक रहा था . वह उस कमरे के दरवाज़े की चौखट पर खड़ा हो गया और उसने  मधुरानी को आईने में अपने बाल संवारते हुए देखा. वह उसकी ओर पीठ कर खड़ी थी .   वह अपने बाल बनाने में मग्न थी उसने सोचा.

वह शायद यूँ ही बेख़बर रहने का नाटक कर रही है....

 उसने उसकी तरफ कदम बढ़ाए. उसकी धड़कने तेज हो गयीं, कनपटी भी गर्म हो गयी. वह दबे पाँव उसके पीछे पंहुचा ओर एक झटके से उसने  उसका हाथ पकड़ लिया।  उसके मन में लड्डू फुट रहे थे, आख़िर वह जो करना चाह रहा था वह हो ही गया. अब उसे मधुरानी क्या करती है यह देखना था .

 मधुरानी अपना हाथ  छुड़ाते हुए दस कदम पीछे हट गयी.   उसे ऐसी उम्मीद न थी . वह मधुरानी की आँखों में झाँक कर उसके मन की बात जानना चाहता था लेकिन नाकामी हाथ लगी .

कहीं वह नाराज़ तो नहीं हो गयी?.... उसने सोचा.

 उसने हिम्मत जुटा कर दुबारा उसका हाथ पकड़ने की चेष्टा की.

  "बा..बाबूजी .. क्या  हुई गवा है आपको?" मधुरानी  कमरे के बाहर तेज कदमों से चलते हुए निकल गयी.

एक पल तो उसे समझ ही नही आया कि हुआ क्या? लेकिन उसे अहसास हो गया.

मतलब... उसने मुझे ठुकरा दिया....

 उसका सारा शरीर ढीला पड़ गया था . जाते जाते मधुरानी ने  मुड़ कर उस पर एक नज़र डाली उसमें उसकी जलती निगाहों का सामना कर सकने का साहस न था. आख़िर औरत के मन की बात तो  स्वयं शिव जी भी  न  समझ सके. वह मायूस हो उठा और उसका मन खुद के प्रति गुस्से से भर गया . कमरे से निकलते हुए उसने दरवाज़ा ज़ोर से खोला और तेज कदमों से चलते हुए बाहर आ गया. उसने पीछे मुड़ कर मधुरानी को देखना तक मुनासिब न समझा .

वह बाहर खुले में आ गया . गर्मी और उमस के दिन होने के बावजूद उसके  शरीर को छू कर एक ठंडी हवा का झोंका निकल गया . उसको थोड़ा  चैन आया.

चलो अच्छा ही हुआ कम से कम फ़ैसला तो हो गया, नहीं तो जाने कितने दिन में इस बात को लेकर बेचैन रहता...

चलते चलते वह अपने कमरे के बाहर ठिठक कर रुक गया.

अब कहाँ जाऊं .. कमरे में वही अकेलापन .. शादी की भीड़ भाड़  में जाने को उसका जी न किया. फिर न जाने कितनी देर, इन सबसे दूर वह न जाने कितनी देर वह सिर्फ चलता रहा . पूरा गाँव गुँगे की शादी में शामिल होने गया था इसलिए रास्तों पर कोई चहल पहल न थी. फिर अचानक ही एक घर के सामने किसी आवाज़ को सुन कर वह ठिठक गया. अंदर से कोई चीख रहा था . उसे अहसास हुआ यह गूंगी का घर था . घर पर बाहर से ताला लगा था .

इस घर के लोग जाने कहाँ चले गये .. गुँगे की शादी में तो यक़ीनन नहीं गये होंगे फिर कहाँ गये  हैं .. शायद खेतों में गये होंगें ....  

घर के अंदर से किसी के रोने चिल्लाने की आवाज़ अब भी आ रही थी. ऐसी आवाज़ सुन कर पत्थर दिल आदमी भी पसीज जाए . उस गूंगी का दिल टूट गया था और वह कलेजा फाड़ कर रो रही थी. उसका दिल भी इसी तरह रो रहा था फ़र्क सिर्फ़ इतना था कि उसकी आवाज़ किसी को सुनाई नहीं दे रही थी .


क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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