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Hindi Novel Madhurani - Chapter_41 धुलाई

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     गणेश चलते हुए पुल पर पहुँचा .. पुल की दाईं जगह काफ़ी चट्टानी थी और बीच में शायद गहरी खाई थी, इसलिए दाईं तरफ कपड़े धोतीं हुई महिलाएँ दिखाईं नहीं दे रहीं थी .  दाईं ओर ही लड़कों का जत्था पानी में खेल रहा था . लड़के उँची चट्टान पर चढ़  कर पानी में छलाँग लगा रहे थे. लड़के अपने खेल में सुध बुध खो बैठे थे. पुल के बाईं तरफ नाला ज़रा उथला और  सपाट था , उसी जगह  कपड़े धोतीं हुईं महिलाओं का झुंड दिखाई पड़ा . उस उथले पानी में चट्टानों पर  औरतें पटक पटक कर कपड़े धो रहीं थी . फट फटाक की आवाज़ पूरे वातावरण में गूँज रही थी , पास ही उन औरतों के बच्चे पानी में खेल रहे थे . कभी कोई बच्चा पानी में पत्थर फेंकता तो छपाक की  आवाज़ से पास खड़े बाकी बच्चों का मनोरंजन होता और वो ताली  बजा कर खिलखिला कर हंसते .

     गणेश पुल से बाईं तरफ नीचे आ कर  कर नाले के पानी में उतरा . उन औरतों के बीच उसकी नज़रें मधुरानी को खोज रहीं थी . उसे पीली साडी पहनी हुई मधुरानी दूसरे किनारे पर कपड़े धोती हुई दिखाई दी. उथले नाले में रास्ते  बनाते हुई किसी प्रकार दोनों हाथों से अपनी पतलून और लोटा समहालते हुए वह दूसरे किनारे की ओर आगे बढ़ रहा था . पानी ज़रा गहरा होता जा रहा था, इसलिए बीच में एक जगह वह रुका , लोटा वहीं उसने एक सपाट पत्थर पर रखा और अपनी पतलून को उपर खोंस लिया ताकि वह पानी में भीगने से बची रहे . इसके बाद उसने सावधानी से पानी में कदम रखा . एक जगह नाले में यों ही गुज़रते हुए उसे छोटी छोटी मछलियों का झुंड नज़र आया जो उसके पानी में पैर रखते ही इधर उधर बिखर गया . पानी अब घुटनों तक पंहुच चुका था और उसकी लाख कोशिश के बावजूद उसकी पतलून के किनारे गीले हो गये थे . आख़िरकार वह दूसरे किनारे पर पंहुच ही गया . वहाँ पंहूचते ही उसने लोटा एक चट्टान पर रखा और अपनी खोंसी हुई पतलून ढीली छोड़ दी . उसने  किनारे पर नज़रें घुमाई , पास ही  मधुरानी कपड़े धोने में मग्न थी . गणेश लोटा ले कर उसकी ओर बढ़ने लगा .  उसने  वापस मधुरानी को देखा वह सुध बुध खो कर कपड़े  धो रही थी. कपड़े धोते समय साड़ी न भीगे इसलिए उसने अपनी साड़ी घुटनों के उपर खोंस रखी थी जिससे उसकी गोरी गोरी टाँगों के दर्शन गणेश को हो रहे थे . गणेश को उसकी मांसल गोरी  टाँगें  लुभा रहीं थी . कपड़े घुमा कर चट्टान पर पटकते हुए उसके उरोजो की हलचल मानों गणेश को दीवाना बना रहीं थी वह उसको ताके जा रहा था . वह उसके एकदम करीब  पंहुच गया था . उसकी पद्चाप सुनकर उसने पलट कर देखा , गणेश को देख कर वह लजा कर हंस पड़ी फिर   सम्हल कर अपनी खोंसि हुई साड़ी को नीचे किया, फिर पल्लू संभाल कर बगल में रखी बाल्टी से कपड़े निकल कर उन्हें निचोड़ने लगी. बीच बीच में वह चोर आँखों से गणेश की ओर देख रही थी. गला साफ करते गणेश ने उससे कहा

 " अच्छा तो रोजाना कपड़े  धोने तुम इस तरफ आती हो"

" का करे बाबूजी इधर गाँव में आपके सहर के जैसे नल ना है , इसलिए हमका ई हाँ नाले में कपड़े धोने आना पड़ता है" उसने जवाब दिया ,

गणेश अब भी उसे निहार रहा था , अचानक उसे अहसास हुआ यहाँ और भी लोग हैं और वह उसकी ओर देख रहे हैं  , वह किसी को बातें बनाने का मौका देना नहीं चाहता था, इसलिए लोटा उठा कर वह आगे बढ़ा. पीछे मुड़ कर उसने देखा , मधुरानी ने कपड़े वहीं सूखने के चट्टान पर बिछाए थे, फिर भी वह अपनी चोर निगाहों से उसी को देखे जा रही थी. गणेश ने सोचा:

 किस्मत भी न जाने क्या गुल खिलाती है , मधुरानी जैसी बला की खूबसूरत और हिम्मती औरत यहाँ इस पिछड़े  गाँव में पैदा होती है , अगर कहीं यह शहर में होती तो  शायद फर्श से अर्श पर जा बैठती....

 चलते चलते वह दूर आ गया था उसने वापस मुड़ कर देखा , मधुरानी ने अपनी साडी वापस घुटनों के उपर खोंस ली थी और वह चट्टानों पर पटक कर कपड़े धो रही थी , अब माधुरानी उतनी साफ नज़र नहीं आ रही थी , वह भी उसकी नज़रों से दूर आ चुका था.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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