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Hindi novel - Madhurani - Chapter-47 = मुलाकात

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     ..................गणेश बाबू जब अपने खयालोंसे होश मे आए ....
 उन्होने इर्द गिर्द देखा , हॉल लगभग खाली हो गया था. यानी कई लोग सरकार से मिल कर लौट चुके थे . गणेश बाबू का बेटा वीनू भी कहीं दिखाई न पड़ा. गणेश बाबू ने हॉल से बाहर आ कर देखा वीनू वहाँ भी न था

शायद उकता कर घर  चला गया होगा..

 आजकल लड़कों में कोई सब्र नहीं ..

नौकरी पाने के लिए न जाने कैसे- कैसे  पापड़ बेलने पड़ते हैं , द्वारे द्वारे घूमना पड़ता है तब कहीं जा कर नौकरी मिलती है...

उन्होने  सोचा इतने में किसी ने पुकारा

"गणेश बाबू गावंडे"

गणेश बाबू का चेहरा खुशी से चमक उठा. खुशी में अपने सामान की थैली लेने के लिए गणेश बाबू अपनी कुर्सी की ओर जाने लगे.

 "गणेश बाबू गावंडे.. कौन हैं?" उनका नाम दोबारा पुकारा गया.

"मैं.. मैं.... गणेश बाबू गावंडे .." गणेश बाबू ने अपनी थैली संभालते हुए जल्दबाज़ी में दरवाज़े की ओर आते  हुए कहा.

" अरे तो जवाब देने का क्या लेंगे जनाब..यहाँ आपका शुभ नाम चिल्ला चिल्ला कर मेरा हलक सूखा जा रहा है.." वह आदमी गणेश बाबू पर बरस  उठा .

गणेश बाबू उसकी ओर देख कर एक खिसियानी हँसी हँसे.

" जाने कैसे कैसे नमूने  मुँह उठा कर चले आते हैं यहाँ ... अब इन्ही को देखिए .. मुँह में दही जमा हुआ है इनके  .. जवाब देना ज़रूरी नही समझते .. इन्हें लगता है मानों इन्हे सब पहचानते हैं ... खुद को न जाने क्या फिल्मी हीरो  समझते हैं.." वह आदमी भुनभुनाते हुए दूसरे आदमी से कहने लगा.

 गणेश  बाबू ने डरते डरते अंदर जाने के लिए  दरवाज़ा धकेला.  उन्होने भीतर  झाँक कर देखा . सामने ही एक मुलायम सोफे पर बैठी  मधुरानी उन्हें दिखाई दी.  जिसे लोग अदब से सरकार कहते थे वह मधुरानी ही  थी . गाँव की एक मामूली दुकानदार से ... ग्राम पंचायत का चुनाव जीत कर सरपंच बनी ... फिर पंचायत समिति का चुनाव जीतते हुए ....आख़िरकार वह विधायक के पद तक आ पंहुची थी. उसके बगल में ही पाटिल बैठे थे .

उसकी इस उड़ान में यक़ीनन इन पाटिल साहब का ही हाथ होगा ... गणेश बाबू ने सोचा .

गणेश बाबु दरवाजे पर खड़े थे. लेकिन मधुरानी का ध्यान दरवाज़े की ओर न था. वह पाटिल जी से किसी मसले पर बातें कर रही थी . गणेश बाबू ने दरवाज़े को ज़रा और खोला और भीतर आ गये. लेकिन वह अंदर आए इसका ख्याल भी किसी को न था . वह दोनो अभी भी अपनी चर्चा में मग्न थे. गणेश बाबू पास ही एक कुर्सी के सामने जा कर उहापोह की स्थिति में खड़े रहे.

खुद से कैसे बैठूं किसी ने बैठने के लिए कहना चाहिए...

यूँ भी अबतक जो बेइज़्ज़ती हुई है वह कोई कम थोड़े ही  है ?...

अंदर चिट्ठी भिजवाने के बावजूद भी मधुरानी ने इतनी देर इंतेजार करवाया...

गणेश बाबू ने सोचा.

मधुरानी ने हालत के मुताबिक खुद को ढाला था , इसका सबसे बड़ा सुबूत यानी उसकी भाषा जो शहर में रह कर साफ़ हो गयी थी. वहीं उनकी अपनी भाषा सुदूर गाँवों में काम कर गँवई हो गयी थी . उनका रहन सहन भी बदल गया था पॅंट शर्ट पहनना छोड़ अब वह शर्ट और पायजामा पहनने लगे थे.

इंसान को हमेशा तरक्की की राह चलना चाहिए .. जैसे मधुरानी चली ...मेरी तरह उल्टी दिशा में नहीं... उन्होने सोचा

उसके हाव भाव में यूँ तो कोई ख़ास फ़र्क नज़र नहीं आया. यूँ भी उसकी अदाएँ किसी रानी से कम न थी.
धीरे - धीरे पाटिल साहब और मधुरानी की चर्चा गर्म होते- होते फिर बहस में बदल गयी. मधुरानी अपनी बात ज़ोर दे कर मनवाना चाहती थी. लेकिन पाटिल जी थे की समझने को तैयार ही न थे , बहस गर्म होती जा रही थी. गणेश बाबू को महसूस हुआ की कहीं वे  ग़लत समय पर तो न आ गये ? शायद थोड़ी देर और राह देख सकते थे. गणेश बाबू बाहर जाने को जैसे ही मुड़े तभी मधुरानी का ध्यान उनकी ओर गया.

"आइए गणेश बाबू विराजिये" मधुरानी ने थोड़ी देर अपनी चर्चासे बहार आते हुए कहा.

गणेश बाबू को  मानो उसके साथ बिताए हुए पुराने दिन याद आने लगे  - उसकी वही चंचल शोख आँखें , वही शरारती मुस्कुराहट. उन्होने उसकी ओर देखा. यही चीज़ें आज भी कायम थी केवल समय के साथ चेहरे पर थोड़ी गंभीरता आ गयी थी. उसने  एक पल भी एहसास होने न दिया की कुछ देर पहले वह ताव ताव में बहस कर रही थी, यूँ तो अपने चेहरे के हाव भाव एक पल में बदलने  की उसे महारत हासिल थी और गणेश बाबू इस बात से खूब वाकिफ़ थे.

गणेश बाबू सकुचाते हुए मधुरानी के सामने सोफे पर बैठ गये.

"बड़े दिनों बाद मिलना हुआ.." मधुरानी ने उलाहना देते हुए कहा.

गणेश बाबू हौले से मुस्कुराए.

"कहिए कैसे आना हुआ..?" मधुरानी ने पूछा

पाटिल जी ने पहचान दिखाना भी ज़रूरी न समझा. पाटिल जी  गुस्से में तड़ से उठ बैठे और पैर पटकते हुए वहाँ से चले गये. मधुरानी  चोर निगाहों से उनको जाते हुए देख रही थी.

" मधुरानी... मॅडम"  सिर्फ़ मधुरानी कहना उचित न होगा ऐसा जानकार गणेश बाबू ने उनके नाम के आगे मॅडम जोड़ा. 'मॅडम' कहते हुए गणेश बाबू थोडा  रुके .

मधुरानी ने कोई ऐतराज़ न जताया "हाँ… हाँ  .. कहिए रुक क्यों गये?"

"मॅडम वह मेरे तबादले के बारे में कुछ कहना था.."

"याने तबादला कराना है या रुकवाना है..?"

"रुकवाना है.."

"ठीक है ... ठीक है...एक काग़ज़ पर आप अपना पद , वरिष्ठ का नाम और इलाक़ा इत्यादि बातें ज़रा विस्तार में लिखिए...बाकी हम देखते हैं.."

गणेश बाबू  ने तुरंत अपनी जेब से एक काग़ज़ निकाला और मधुरानी के सामने रखते हुए बोला  " यह रही अर्ज़ी मैने इसमे सब कुछ लिखा है"

"नहीं मेरे पास नहीं .. बाहर दरवाज़े के करीब हमारे सेक्रेटरी साहब बैठे हैं उन्हीं को दीजिए.."

"आपका बहुत बहुत धन्यवाद मॅडम.."

"अरे गणेश बाबू आप तो हमें शर्मिंदा कर रहे हैं" मधुरानी ने कहा.

"लेकिन काम तो हो जाएगा न  मॅडम.."

"होगा होगा यक़ीनन होगा...फ़िक्र न करें.." मधुरानी ने जवाब दिया.

मधुरानी का इशारा समझ कर गणेशबाबू  वहाँ से चलने को हुए.

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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