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Hindi Novel - Madhurani - Chapter 32 - चोरनी

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आज बृहस्पतिवार था , बृहस्पतिवार को गाँव में  साप्ताहिक हाट - बाजार  लगा करती थी . सुबह सवेरे ही गणेश आफ़िस जा कर आया , आज कुछ  खास काम  भी नहीं  था,  लिहाज़ा उकता कर वह बाजार की तरफ चल दिया .  सब्ज़ी तरकारी वालों की दुकानों के सामने घूमते हुए वह कपड़े वालों की कतार में चला आया.  कपड़े वालों की दुकानों में छोटे बच्चों से ले कर बड़े बूढ़े और महिलाओं के धोती साड़ियाँ कुर्ते करीने से सजाए गये थे .  उन्हीं के बीच उसे बंजारा लोगों की वह खास पोशाक भी नज़र आई , एक तरफ चोगा और टोपी लटके हुए थे , उस अजीब सी रंग बिरंगी पोशाक को देख कर उसे बड़ा मज़ा आ रहा था . दुपहर का वक्त हो चला था , बाजार में आस पास के गाँवों से आने वाले ग्राहकों की भीड़ धीरे धीरे बढ़ने लगी थी , दुकानों के बीचों बीच रास्ते पर भीड़ इतनी बढ़ गयी थी की पाँव रखने की जगह न थी,  फिर भी उन सबके बीच किसी प्रकार गणेश अपने रास्ते चल रहा था , अब वह पूरी तरह उकता चुका था . उसने सोचा एक बार गाँव की तरफ घूम आए ...
 उसके पाँव बरबस ही मधुरानी की दुकान की तरफ बढ़ चले , बाजार की भीड़ भाड़ से बचते बचाते  वह  पानी की टंकी की ओर बढ़ चला जहाँ बड के पेड़ की अच्छी ख़ासी ठंडी छाँव थी. एकपल उसने इस पेड़ तले सुसताने की सोची लेकिन दूसरे ही पल उसने वह विचार त्याग दिया  और उसने मधु रानी की दुकान की ओर अपने कदम  बढ़ाए .

दूर से ही उसकी दुकान के इर्द गिर्द लोगों का जमावड़ा देख उसे हैरत हुई.  वह मन मसोस कर रह गया, अब इस भीड़ के रहते उससे बातचीत मुमकिन न थी.  उसने दो चार मिनट वहीं चहलकदमी कर गुज़ारे,   वह सोच रहा था कि वापिस बाजार जाया जाए  या थोड़ी देर कमरे में सुस्ताया जाए. लेकिन उसे मधु रानी से मिलने की प्रबल  इच्छा हुई, लिहाज़ा उन लोगों की भीड़ में रास्ता निकालते हुए वह गल्ले के करीब  जा पंहुचा .

" ओ  शामू  ज़रा देख तो उ औरत  धोती में गुड का डला  छिपायात रही , जा जा जल्दी जा उ भिखमंगी चोरनी को पकड़ ला "  मधु रानी की तेज नज़रों से वह चोरनी बच न पाई थी.

" ई करम जले गाँव वाले चोरी चकारि से बाज न आवे है" वह गुस्से से  गाँववालों को कोसते हुए बड़बड़ा रही थी.

 " अरे जल्दी जा  नास्पीटे  , तोरा  सत्यानाश जाए कलमुंहे  जा जल्दी जा  उसको पकड़"  वह चीखी.

 उस नौकर ने इधर उधर नज़रे दौड़ाई और वह चोरनी उसकी नज़रों से न बच पाई , नौकर को अपनी तरफ आता देख  वह भीड़ से निकल दूसरी ओर भागने लगी .  गणेश मधुरानी के करीब खड़ा हो तमाशा देख रहा था . उधर मधुरानी थी जो सुध बुध खो बैठी थी, उसका सारा ध्यान उस चोरनी पर लगा था

" अरे जल्दी जा कलमुंहें  पकड़ उ कर्मजली को देख देख  कैसन  भाग रही है उ कुतिया"  मधुरानी उत्तेजित हो कर चिल्लाए जा रही थी .

" ए री ज़रा ई  बोतल में तेल तो  डाल " उस भीड़ में किसी ने बोतल उठा कर उसका ध्यान अपनी ओर खींचा.

 " ए री मधुरानी ज़रा नोन की थैली निकाल तो "  एक औरत उससे बोली.

 गणेश ने १० रु. का नोट निकाल कर कहा "मुझे एक गोल्ड फ्लेक "

 "अरे  तनिक ठहरो , इधर ई चोर लोग पूरा दुकान पे हाथ साफ करत रहे और आप लोगन को थोडा वक्त रुकने की फ़ुर्सत नाही"  मधुरानी गणेश पर झुंझला कर  जैसे फट पड़ी .

 उसको जब अहसास हुआ कि वह गणेश है तो आवाज़ में नर्मी लाते हुए बोली " बाबूजी ए आप हैं हम समझे कोई और आवे है"  

" न.. न.. कोई बात नहीं पहले तुम अपना काम देख लो , कोई जल्दी नहीं है " गणेश ने जवाब दिया.

 " अरे  बाबू तोके जल्दी ना है पर हमको तो है ना " एक औरत भीड़ में बोल उठी .

उस औरत की ओर गुस्से से देखती हुई मधुरानी तेज आवाज़ में बोल उठी " ए री बड़ी जल्दी है ना तुझे  ? जा किसी और दुकान पर चली जा , हमर दुकान का नौकर उ चोरनी के पीछे  गया है , हम जो  गल्ले से उठ कर तुझे जो समान दिए  रहे तो उ चोर लोग पूरा दुकान पर हाथ साफ कर लिए"

वह औरत चुप हो गयी . मधुरानी की बात अपनी जगह सही थी.

 " बाबू जी  तनिक ठहरिए  उ शाम  के आते ही आपको सिगरेट दिए  रहे "  मधुरानी गणेश की ओर मुखातिब हुई.

 इतने में शाम उस चोरनी को पकड़ कर मधुरानी के सामने ले आया.

"हरामजादे" वह औरत  शाम से अपना हाथ छुड़ाते  हुए बोली "हमरा हाथ जोड़ बेसरम , कीड़े पड़े तोहार हाथ में , तेरा सत्यानास जाए"

"मैं न छोड़ूं  तोहार  हाथ , म्हारी दीदी ने तुमको गुड चुराते देखा होवे है"  लड़का बोला.

 "ए कलमुंही , हम ई गुड के पैसे  दिए हैं" चोरनी उल्टा मधुरानी  पर बरसी .

"पैसे दिए रहे तूने ? हैं ? बड़ी आई पैसे देने वाली कुतिया  "  अपनी  साडी कमर में खोंस कर मधुरानी आगे बढ़ी .

 " ए शामू ज़रा ग्राहकों को देख तो , हम अभी इसको ठीक किए देते हैं"

" जी दीदी जी" कह कर शामू ग्राहकों को समान  तौलने लगा .

इतने में चोरनी कह उठी "हराम की जनी ग़ाली मत दे कहे देती हूँ"

 "चटाक!!!" मधुरानी एक झन्नाटेदार तमाचा उस चोरनी के  मुँह पर रसीद  दिया "गुड चोरनी , रंडी! " मधुरानी उसके बालों का झोंटा पकड़ कर उसे तमाचे पर तमाचे मारे जा रही थी "पैसे दिए तूने कमिनि ? हाँ?  हमर से ज़बान लड़ाती है ? हैं?   कितने का गुड तूने मोल लिया, बता कमिनि ... बोल हरामजादि हम तोहार चमडी निकाल लूँगी "  इतना कह कर उसने और एक तमाचा उसको जड़ा .

"आ " मार से वह औरत कराह उठी फिर आवाज़ में नर्मी लाते हुए बोली "ए री मार मत"

 "अच्छा ? तो बताए दे कितने का गुड खरीदा तूने ? "  इतना कह कर उसके झोंटे को उसने ज़ोरदर झटका दिया .

वह औरत अपने बॉल छुड़ाते हुए नीचे गिर पड़ी फिर सम्हल कर उठती हुई बोली " बताती हूँ"  "चार आने का आधा किलो"

 " चार आने  का आधा किलो? हैं?" उसकी बात को दोहराते हुए मधु रानी बोली " चार आने का आधा किलो गुड कब से मिलत रहा ? हैं? कलमुंही  झूठ बोलती है , कीड़े पड़ें तेरे मुँह में रंडी , हराम जादि चोरनी " उसे गलियाते हुए उसने उसके मुँह पर एक घूँसा जड़ दिया , फिर उसकी साडी से गुड की दल्ली निकल कर शामू को बोली " ओ सामू बेटा ज़रा ई गुड की दल्ली को तोलना तो और बता ई रंडी को कितना होवे है? "

 उससे गुड की दल्ली ले कर तौलने के बाद कहा " डेढ़ किलो बनता है दीदी जी"

" ए देखो गाँववालों ई औरत कहे है इसने हमार से आधा किलो गुड लिया रहा चार आने में , और फिर तौलने पर इसका वजन डेढ़ किलो कैसे हुआ रहा ?  और ई रंडी हमसे कहत रही इसने गुड हमसे मोल लिया है , क्योंरी कुतिया ? " इतना कह कर उसने नीचे बैठी  औरत की कमर में एक जोरदार लात जमाई . वह औरत ज़मीन पर  धराशायी हो गयी

" ठहर  रंडी  की जनि छीनाल औरत , तुझे छठी का दूध याद न दिलाया रहा तो हमरा नाम भी मधुरानी नहीं , कहे देती हूँ  , ए रे सामू ज़रा रस्सी तो ला रे इसको बाँध कर थाने लिए चलते हैं" मधु रानी कड़क कर बोल उठी.

वह औरत दर्द से कराहते हुए अपने कान पकड़ कर  गिडगिडाई  " ना दीदी , रहम करो  हमार छोटे छोटे बच्चे हैं , हमका पुलिस में ना दो" वह मधुरानी के पाँवों को छू कर बोली .

 " नौटंकी ना कर , धन्दे का  टाइम खराब करती  है रंडी , चल उठ  और दफ़ा हो यहाँ से और कहे देते हैं आइन्दा इहा अपनी मनहूस सकल न दिखाना वरना ओ हाल करूँगी तेरा तोरे बच्चे भी तुझे न पहचानेंगे चल भाग बुरचोदि रंडी हरामजादि " पलट कर गल्ले पर वापिस जाते हुए मधुरानी गुस्से से बड़बड़ा रही थी.

गणेश सांस रोक कर यह हाई वोल्टेज  ड्रामा देखे जा रहा था  उसके मुँह से एक लफ्ज़ नहीं निकल रहा था , दूसरी दफे वह मधुरानी का यह रूप देख रहा था. लेकिन जो भी हो ऐसे मुश्किल हालात से दो चार हाथ  करना इसे खूब आता है , कोई और होती तो घबरा जाती.  उसे याद आया एक बार वह अपनी पत्नी को पीछे  स्कूटर पर बिठा कर कहीं जा रहा था एक गुंडा दिन दहाड़े उसकी बीवी के हाथों से पर्स  छीन कर भाग खड़ा हुआ , यह देख कर उसकी बीवी को वो सदमा लगा की उसको समझ ही नहीं आया कि आख़िर क्या हुआ , वह मानों काठ की हो गयी , कितनी देर बाद वह होश में आई तब तक गुंडा दूर भाग चुका था.  उसकी जगह यह मधु रानी होती तो गाड़ी से कूद कर  उस गुंडे का पीछा करती और न सिर्फ़ अपना पर्स उससे लेती बल्कि  उसकी  गर्दन पकड़ कर २-४ लातें उसको लगाए बिना वापस न आती.

आज उसके दिल में मधुरानी के प्रति इज़्ज़त कई गुना बढ़ गयी थी. उसने सोचा,

भारतीय नारी को इसी तरह हिम्मती बनना पड़ेगा , अगर इसी तरह महिलाएँ खुद को मजबूत बनाएँ और हिम्मत से काम लें तो कोई भी इन महिलाओं का शोषण न कर पाएगा , वाकई  औरत अबला नहीं होती....

क्रमशः ..

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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