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Rastrabhasha Literature - Madhurani - CH-25 सिग्नल (Signal)

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गणेश जितना हो सके उतना मधुराणीके दूकानपर जाना टालने लगा था. लेकिन आज उसकी मजबुरी थी. क्योंकी उसे कुछ सामान खरीदना था और गावमें दुसरा दुकान जो था वहभी बंद था. दुसरा दुकान हर शुक्रवारको बंद रहता था. हर शुक्रवारको उस दुकानदारके शरीरमें गजानन महाराज प्रवेश करता है ऐसा लोग कहते थे.

लेकिन गजानन महाराजका दिन तो गुरुवार....

फ़िर गुरुवार के बजाय...

शुक्रवारको कैसे गजानन महाराज उसके शरीरमें प्रवेश करते है ....

गणेशने उस बात पर काफ़ी रिसर्च करनेकी कोशीश की. काफ़ी लोगोंसे इस सवालका जवाब ढुंढनेकी कोशीश की. लेकिन किसीके जवाबसे गणेशका समाधान नही हूवा. लेकिन एक दिन ऐसेही सोचते हूए गणेशको उसका जवाब मिल गया. गुरुवार साप्ताहिक बाजार का दिन था. उस दिन खरीदारीके लिए आस पडोसके देहातके लोग उजनीमें आते थे. उनकी पुरे हफ़्तेमें जितनी कमाई नही होती होगी उससे कई जादा कमाई उस एक दिनमें होती थी. मतलब गुरवारका दिन दुकान बंद रखना कतई उसके हितमें नही था. इसलिए शायद एड्जेस्टमेंट के तौरपर गजानन महाराज उसके शरीमें गुरवार के बजाए शुक्रवारके दिन प्रवेश करते होंगे. गणेश मनही मन मुस्कुराने लगा.

सामान लेनेके लिए थैली लेकर गणेश बाहर निकल पडा और उसने अपने दरवाजेको ताला लगाया. मधूराणीसे अपनी नजरे टालते हूए वह उसके दुकानमें गया. वह क्या चाहिए यह बताने वाला था इतनेमें वहा एक 3-4 सालका लडका दौडते हूए आगया.

" मासी एक चॉकलेत देइयो ..." एक सिक्का सामने लकडीके पेटीपर रखते हूए वह अपनी तोतली बोलीमें बोला.
मधुराणीने तुरंत उसे उठाकर अपने पास लिया,

" मासीके बछडे ...किते  दिनसे आए रहत  ... इते दिन कहा था बबुआ   .." मधुराणीने उसे अपने पास लेते हूए तिरछी नजरोंसे गणेशकी तरफ़ देखते हूए कहा.

" जावो ... मै किस्से  बात नाही करत  .... " मधुराणीने इतराते हूए लडकेसे कहा. बिचबिचमें वह तिरछी नजरोंसे गणेशकी तरफ़ देखती.

" मासी चॉकलेत ..." वह बच्चा फ़िरसे बोल उठा.

" देती  रे मेरे... लाल ... " मधुराणीने तिरछी नजरसे गणेशकी तरफ़ देखते हूए उस बच्चेको लगातार दो तिन बार चुमा.

मधुराणीने उस लडके को छोड दिया और चॉकलेट निकालकर उसके हाथमें थमा दिया. चॉकलेट हातमें आतेही वह लडका तुरंत दौड पडा.

" ऐसे आवत रहो मेरे बछ्डे .. " मधुराणी जोरसे बोली.

दौडते हूए उस लडकेने मधुराणीकी तरफ़ देखा और वह मुस्कुरा दिया.

" बडा प्यारा बच्चा है जी  " मधुराणीने गणेशसे कहा.

मधुराणी गणेशसेही बात कर रही थी इसलिए गणेशको एकदमसे क्या बोला जाए कुछ सुझ नही रहा था.

" हां ना... बच्चे मतलब भगवानके यहांके फ़ुल होते है " गणेश किसी तरहसे बोल पडा.

"  भगवानको मानत हो ?" मधुराणीने गणेशसे पुछा.

" वैसे मानताभी हूं ... और नहीभी " गणेशने कहा.

" कभीबी किसी एक छोर को पकड़े रहियो ... दुइयो छोर पे   होनेकी कोसीस  करियो  तो बडी मुस्कील  होवे है  ... " मधुराणी गणेशके आखोंमे आखे डालकर बोली.

उसके बोलनेमें हलकीसी तकरार महसुस की जा सकती थी. गणेश उसके बोलको समझनेकी कोशीश करने लगा.

" छोडो जान दो... बहुत दिनवा के बाद दिखाई दिए रहे  ... कुछ लेनेके लिए आए  रहे  या फिर ऐसेही " मधुराणीने एकदमसे अपना मूड बदलकर ताना मारा.

" वैसे नही ... मतलब थोडा सामान लेनेका था.... " गणेश हिचकिचाते हूए बोला.

" तो भी मै बोलू... आज बाबू सुरजवा  पश्चिमसे कैसे निकल पडा " मधुराणीने फ़िरसे ताना मारा.

" नही वैसे नही ... " गणेश अपना पक्ष मजबुत करनेके उद्देश से कहने लगा.

"  आज शुक्रवारको उधरका दुकान बंद होवेगा  इसलिए आए होगे " मधुराणीने अपनी नाराजगी जताते हूए कहा.

गणेशको क्या कहा जाए कुछ समझमें नही आ रहा था.
गणेशका बुझसा गया चेहरा देखकर मधुराणी खिलखिलाते हूए बोली.

" तुम तो एकदम नाराज होये जी  .... मै तो बस मजाक कर रही थी बाबूजी "

मधुराणी इतने जल्दी जल्दी अपने भाव कैसे बदल पाती है इस बातका गणेशको आश्चर्य था. कही वहभी तो नही गडबडा गई की कैसी प्रतिक्रिया दी जाए.

लेकिन एक बात तो पक्की थी की मेरा रुखा बर्ताव उसे कतई पसंद नही आया था...

गणेशका एकदमसे दिल भर आया. मानो उसका उसके प्रति प्रेम उमडने लगा था और किसी प्रेमीने ठूकराए प्रेमीकाके जैसी उसकी अवस्था लगने लगी थी. अपने दिलका दर्द छिपानेके लिएही शायद वह इतने जल्दी जल्दी अपने भाव बदल रही थी. उसे लगा तुरंत आगे जाकर उसे अपने बाहोमें भर लूं. उसे सहलाऊं... और उसके दिलका दर्द कम करनेकी कोशीश करुं.

शायद मेरा बर्ताव उससे कुछ जादाही रुखा था...

मुझे उसे इस तरहसे एकदम तोडकर नही बर्ताव नही करना चाहिए था. ....

उसपर जी जानसे मरनेवाला उसका सखा इस दुनियामें नही रहा... .

इसलिए शायद वह मुझमें उसका सखा ढुंढनेकी कोशीश कर रही होगी...

लेकिन मै कैसे उसके पतीकी जगह ले सकता हूं.?... .

मेरीभी कुछ मर्यादाएं है...

फ़िरभी अपनी मर्यादाओंमे रहके जितना हो सकता है उतना उसके लिए करनेमें क्या हर्ज है ...
तबतक मधुराणीने गणेशका सामान निकालकर उसके सामने रख दिया.

" ई  लो अपना सामान " मधुराणीने कहा.

" लेकिन मैनेतो क्या क्या निकालना है कुछ बोलाही नही ... "

" बाबूजी  ... मै क्या आपको एक दो दिनसे जान रही  ... तुमको  कब क्या चाहिए हो ... मई सब जानत रही  ... "

सचमुछ उसे जो चाहिए बराबर वही सामान उसने निकाला था ...

कितनी बारीकियोंसे वह मुझे जानने लगी है ...

यहांतक की साबुन कौनसी लगती है ...

चाय कौनसी लगती है ...

और कितनी लगती है ...

सचमुछ वह मुझसे प्यार तो नही करने लगी ...

शायद हां ...

नहीतो मेरी इतनी छोटी छोटी चिजोंपर वो भला क्यो ध्यान देती...

उधर दिमागमें विचारोंका सैलाब चल रहा था और बाहरी तौर पर वह अपने थैलीमें अपना सामान भरने लगा था. एक हाथसे थैली पकडकर दुसरे हाथसे सामान भरनेमें उसे दिक्कत हो रही थी.

" लाओ जी  मै पकडाए देती हू थैली " कहते हूए मधुराणीने अपने दोनो हाथोसे थैली पकड ली.

थैलीका एक तरफ़का हिस्सा गणेशने पहलेसेही पकडा हूवा था. उस हिस्सेको मधुराणीने इस तरहसे पकडा की गणेशका हाथभी उसके हाथमे आ जाएं. अचानक मधुराणीने उसका हाथ अपने हाथमें लेनेसे गणेश हडबडा गया. उसने हडबडाहटमें अपना हाथ झटसे पिछे खिंच लिया. लेकिन अगलेही क्षण उसे अपने गल्तीका अहसास होगया.

मै भी कितना पागल ... अपना हाथ पिछे खिंच लिया ...

कितना अच्छा मौका था. ...

दैव देता है और कर्म ले जाता है ... लोग झुट नही कहते ...

मुझे थैलीका दुसरा हिस्सा फिरसे पकडना चाहिए ...

वह थैलीका मधुराणीका हाथ रखा हुवा हिस्सा पकडनेके लिए मन मन निश्चय करने लगा था. लेकिन उसकी हिम्मत नही बन रही थी.

गणेशकी वह हडबडाहट देखकर मुस्कुराते हूए मधुराणी बोली , " बाबूजी आपतो एकदम वो ही हो ... आपके बिवी का न जाने कैसा होवे रहे "

अरे क्या कर रहा है ? ...

वह तो सिधा तुम्हारे मर्दानगीपर घांव कर रही है ...

गणेशने पक्का निश्चय कर मधुराणीका हाथ रखा हुवा हिस्सा पकडनेकी चेष्टा की. लेकिन तबतक थैलीमें पुरा सामान डालना हो गया था.

" अब और कुछ डालना है ... थैलीमें " गणेशने उसका थैलीके साथ पकडा हुवा हाथ देखकर मजाकमें कहा.

" नही .. बस इतनाही " कहकर गणेशने फिरसे अपना हाथ पिछे खिंच लिया.

मधुराणी नटखटसी फिरसे मुस्कुराने लगी. गणेश शर्माकर लाल लाल हो गया था. उसे अपना खुदकाही गुस्सा आ रहा था. की वह ठिकसे इतने बडे मौके का फायदा नही ले पा रहा था. इसलिए उसका चेहरा औरही लाल हो गया था. उस अवस्थामें उसने झटसे थैली उठाई और तेजीसे अपने कमरेकी तरफ़ निकल पडा.

कमरेका ताला खोलकर अंदर जानेसे पहले उसने एकबार पलटकर मधुराणीकी तरफ़ देखा. वह अबभी उसकी तरफ़ देखकर मुस्कुरा रही थी. न जाने क्यो उसे क्या लग रहा था - कही वह यह तो नही सोच रही की , '' कितना बेवकुफ़ है ... कैसा होगा इसका.'
वह झटसे कमरेंमें घुस गया. दरवाजा बंद करनेके लिए पलटनेकीभी उसकी हिम्मत नही बनी. कमरेमें आतेही सिधा वह बाथरुममें चला गया. लोटेसे मटकेका ठंडा पाणी निकालकर चेहरेपर छिडका.

क्या कर रहा है तू ...

वेवकुफ़ के जैसा ...

वह सिग्नलपे सिग्नल दे रही है ....

और तूम हो की बस ढक्कनके जैसे कुछ नही कर रहे हो ....

नही कुछतो करना चाहिए ...

गणेशने अपना जबडा कस लिया.

मैने अपने आपपर बहुत संयम रखनेका प्रयत्न किया. ...

लेकिन मधुराणी तुम ही हो की जो मेरे प्रयत्नको यश मिलने देना नही चाहती ...

अब मै हार गया हूं ...

पुरी तरह हार गया हूं ...

अब इसके आगे जो भी होगा उसके लिए मै जिम्मेदार नही होऊंगा ...

उसके लिए मधुराणी तुम ही पुरी तरहसे जिम्मेदार होगी ...

ऐसा विचार मनमें आते ही गणेशको हल्का हल्का महसूस होने लगा था. उसके अंदरके अपराधके भाव पुरी तरहसे नष्ट हो गए थे.

क्रमश:....

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