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Online Novel Books - Chapter 28 पाटिल जी पधारे हैं

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अचानक गणेश को अहसास हुआ कि लोगों की बातचीत की आवाज़ें थम सी गयी .उस वक्त वह बगल में बैठे मास्टर जी से बतिया रहा था . उसने वजह जानने के लिए पीछे मुड़ कर देखा और यह देख कर हैरत में पड़ गया कि बैठक में मौजूद सारे लोग दरवाज़े की ओर एकटक देखे जा रहे थे . लोगों की देखा देखी उसने भी दरवाज़े पर नज़र डाली और वह यह देख कर सन्न रह गया .... चौखट पर मधुरानी खड़ी थी . वह आज सज धज कर आई थी .

वह यहाँ क्यों आई ? क्या वजह हो सकती है ? .....

वह उसी को निहार रही थी.

गणेश को काटो तो खून नहीं . वह सोचने लगा ....

कहीं यह बला मेरे पीछे तो यहाँ तक नहीं पंहुच गयी?

इधर मधुरानी ने चौखट पर खड़े खड़े ही लोगों पर एक नज़र डाली . सरपंच जी को देखते ही उसने उन्हें राम-राम की. एक बार फिर उसने चारों ओर नज़र धूमाई और इस बार उसकी नज़र गणेश पर आ कर ठहर गयीं . गणेश उसको देख मुस्कुराया . वह गणेश की ओर धीरे धीरे बढ़ने लगी . वह जैसे जैसे पास आती जा रही थी गणेश के दिल की धड़कनें तेज़ होती जा रहीं थी. उसे पसीने छूट रहे थे .

" अरी इहा आओ मधुरानी " सरपंच जी ने उसको पास बैठने के लिए पुकारा .

" ना जी इहा कोने मा ही ठीक है" उसने जवाब दिया.

अब कहीं जा कर गणेश की जान में जान आई.

"यानी की वह इसी बैठक में हिस्सा लेने आई थी. मैं भी न जाने क्या सोच रहा था " गणेश ने मन ही मन कहा.

गणेश की आँखों के सामने वह दृश्य तैर गया जब बीच बाज़ार एक लफंगें के चिकोटी काटने पर मधुरानी ने उसकी चप्पल से जम कर धुनाई करी थी .

मधुरानी गणेश के एकदम करीब आ कर पालथी मार कर बैठ गयी थी . यह देख गणेश सोचने लगा - यहाँ जगह की कमी के चलते वह यूँ इस तरह मेरे पास आ मुझे छूते हुए बैठी है .... नहीं वह अगर चाहती तो लोगों को तोड़ा खिसकने के लिए कह कर अपने बैठने के लिए जगह आराम से बनवा सकती थी ... लेकिन उसे तो मास्टर साहब और मेरे बीच ही बैठना था .. ज़रा देखूं तो क्या उसका पालथी मास्टर जी को भी छू रही है ? लेकिन यह क्या मास्टर जी से तो वह थोड़े फ़ासले पर बैठी है लेकिन मुझ से तो चिपक कर बैठी है...


गणेश को उसके नर्म जिस्म की छुअन बड़ी अच्छी लग रही थी . वह जानबूझ कर वैसे ही बैठा रहा. बीच बीच में वह चोर निगाहों से आस पास नज़र दल कर यह जानने की कोशिश करता कि कहीं कोई उन्हें देख तो नही रहा . लेकिन मधुरानी तो अपने चेहरे पर मुस्कान लिए ऐसे बैठी थी की शायद ही किसी को गणेश पर शक हो .

यह देख कर उसने चैन की सांस लीं उसने गौर किया कि आस पास के लोग चोर निगाहों से मधुरानी को ही निहार रहे थे कुछ तो इतने बेशरम थे कि खुल्लम खुल्ला उसके बदन को ताक रहे थे .


इधर सरपंच जी का पाटिल साहब की राह देखते देखते बुरा हाल हो गया था " पाटिल साहब अभी तक नहीं आए ? " उन्होने बेसब्री छुपाते हुए कहा.

" पाटिल जी पूजा कर रहे हैं " उनका एक चमचा बोल पड़ा.

"इतनी देर पूजा पाठ ? .... भई किसकी पूजा कर रहे हैं ? हम भी तो सुनें ?" सरपंच जी ने ताना मारा.

लोगों में हँसी की लहर दौड़ गयी.

" जा भैया अंदर जा , ज़रा बतला दे , सब गाँव वाले काफ़ी देर से उनकी राह देख रहे हैं उनसे कहना ज़रा जल्दी करें " सरपंच ने उस चमचे को हुक्म सुनाया.

वह अपनी टोपी पहनते हुए और लंबे लंबे ड़ग भरता दरवाज़े के बाहर निकल गया.

बड़ी देर हो गयी वह बंदा पाटिल जी को बुलाने गया लेकिन वापस नहीं लौटा , सरपंच जी की बेसब्री देख कर एक और आदमी पाटिल जी को संदेसा देने बाहर गया वह भी गायब हो गया . अब लोगों में बातचीत बंद हो गयी , कुछ लोग बेसब्री से इधर उधर चहल कदमी करने लगे . कुछ लोग बीड़ी चिलम सुलगा कर कश लेने लगे कुछ तंबाखू हथेलियों में रगड़ने लगे . सरपंच जी का सब्र अब टूटने लगा था वह बाहर दालान में चल कर आए मगर फिर भी कई लोग अब भी दीवान खाने में मौजूद थे , कुछ वहीं पैर फैला कर बैठ गये.

गणेश वहाँ से हिलने को तैयार नहीं था वह अब भी मधुरानी की नर्म मुलायम छुअन के मज़े ले रहा था . उसने देखा इक्का दुक्का लोग उठ कर बाहर टहलने जा रहे हैं , उसने सोचा उसे भी तोड़ा बाहर घूम आना चाहिए वरना यूँ इस हाल में कोई देखेगा तो ग़लतफहमी हो जाएगी , वह उठने लगा.

" ओ रे गनेस जी किधर जात हो ? आपको भी सिग़िरेट की तलब लगी है का ? " मधुरानी ने उससे पूछा .

गणेश हार कर वैसे ही नीचे बैठ गया तभी लोगों का हुजूम बाहर से अंदर आ गया .

"लगता है पाटिल साहब आ गये " गणेश बोला

" हाँ जी कितनी देर इंतेजार करवाया " मधुरानी परेशान होते हुए बोली .

फिर गणेश की ओर देखते हुए बोली " पर ई अच्छा हुआ आप बैठक में मिल गये वरना मैं कभी की चली जाती " गणेश उसकी ओर देख मुस्कुराया .

बाहर से आए सब लोग जब अपनी अपनी जगह बैठ गये तो आख़िर में पाटिल जी अंदर आए . अंदर आते ही सब को देख उन्होने नमस्ते की फिर बैठक के बीचोंबीच आ कर बाहर खड़े सरपंच जी को पुकारा "राम राम सरपंच जी अंदर आइए , अब बैठक शुरू करते हैं "

सरपंच जी मुड़ कर अंदर आए और उनकी नमस्ते का जवाब दिया थोड़े झुंझलाते हुए वह पाटिल साहब की बगल में आ कर बैठ गये.

" बैठक शुरू की जाए..." मानों पाटिल जी सरपंच की आज्ञा ले रहे हों , सरपंच जी ने पाटिल जी की ओर देख कर गर्दन हिलाई.

बैठक में आए लोगों का जायज़ा लेते लेते उनकी दृष्टि कोने में बैठी मधुरानी पर टिक गयीं

"मधुरानी अरी यहाँ सामने आ कर बैठ " पाटिल जी ने उसे सामने आ कर बैठने को कहा.

"मैने तो आते ही साथ उससे सामने बैठने को कहा था ... लेकिन..." अपनी बात अधूरी छोड़ कर सरपंच जी मधुरानी की ओर देखते बोले.

मधुरानी ने वहाँ बैठे बैठे ही हाथ से उनको इशारा किया कि वह ठीक ठाक बैठी है और बैठक शुरू की जाए .

फिर सभा में नज़र डालते अचानक ही पाटिल जी को कुछ याद आया " ओ गाँववालों ई बार इलेक्सन में दूई सीट महिला के लिए हैं , ई सोच कर हमने मधुरानी को बुलवा भेजा , कम से कम एक सीट का तो फ़ैसला होना चाहिए " पाटिल जी बोले

गणेश को पाटिल साहब की बातों पर गौर कर रहा था , पाटिल जी किसी चालाक राजनेता की तरह बातें बनाने में माहिर थे , पिछले बार जब उसकी उनसे मुलाकात हुई तो उसने जाना की वह बड़ी साफ हिन्दी बोलते थे और बड़े पढ़े लिखे जान पड़ते थे , फिर यहाँ गँवई हिन्दी बोलने की क्या तुक ? शायद लोगों से अपनापन जताने की चाल हो.

क्रमशः

Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande

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