पाटिलकी हवेली पर हमेशा चहल-पहल का माहौल बना रहता था , दरअसल यह एक पुरानी हवेली थी जो छोटी पहाड़ी पर बनी हुई थी . इसके चारों ओर एक दीवार बनी हुई थी और पहरे के लिए चार पाँच जगह इसी दीवार पर सुरक्षा चौकियाँ बनी हुई थी जिसमें चौकीदार पहरा दिया करते थे . आज कल वह चौकियाँ खाली रहतीं थी क्योंकि अब वैसी सुरक्षा की ज़रूरत नहीं थी . आज हवेली में खास बैठक बुलाई गयी थी . एक एक कर गाँव वाले आने लगे . पाटिलकी हवेली से बुलावा गाँववालों के लिए बड़ी इज़्ज़त की बात होती थी . हालाँकि बैठक में गिने-चुने गाँववालों को ही बुलाया गया था लेकिन बैठक में क्या चर्चा होती है इस बात को जानने कई गाँव वालों ने आस पास ही डेरा जमाया हुआ था , जिसे जहाँ जगह मिली वह वहीं बैठ गया .
बैठक में हिस्सा लेने वाला शख्स बड़ी शान से सीना चौड़ा कर उस जमावड़े को बड़ी हिकारत से देखते हुए हुए हवेली के अंदर जा रहा था , बैठक के दौरान हवेली से बाहर किसी वजह से जो भी आदमी आता था उससे 'ताज़ा हाल' जानने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था और वह बाहर आया हुआ आदमी ना - नुकुर करते भाव खाते हुए लोगों को अंदर की खबर देता था .
गणेश जैसे ही हवेली के करीब पंहुचा उसने घड़ी में देख कर इस बात की तसल्ली करना चाही कि कहीं उसे देर तो नहीं हो गयी , उसने देखा तय समय को ५ मिनट बाकी थे . जैसे ही उसका ध्यान आस पास के जमावड़े की ओर गया उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा . उसने सोचा -
मेरे यहाँ आने से पहले ही यहाँ बैठक तो शुरू नहीं हो गयी ...
लेकिन बैठक को तो वक्त है...
या बैठक शुरू होने के पहले ही कुछ हो गया .....
गणेश ने सरसरी निगाह से लोगों के जमावड़े का जायज़ा लिया सबकी कौतूहल भरी आँखें उसी को देख रहीं थी .
अब भीतर जा कर ही बात पता चलेगी....उसने खुद से मन ही मन कहा .
गणेश ने जल्दबाज़ी में हवेली की ओर कदम बढ़ाए , लेकिन भीतर जाने के लिए दो-तीन रास्ते थे. वह ठिठक गया .
अब इनमें से किस रास्ते से भीतर जाया जाए ? वह इस बात को सोचते हुए उसने आस पास नज़रें दौड़ाई , तभी पाटिल साहब का नौकर उसे दिखाई दिया " यहाँ इस तरफ ..." उस नौकर ने एक जगह इशारा करते हुए कहा , गणेश उसके पीछे पीछे चल दिया , गणेश उसकी ओर देख कर मुस्कुराया . गणेश पहली बार इस हवेली में आया था हालाँकि उसकी और पाटिल साहब की कई दफ़ा मुलाकात हो चुकी थी लेकिन वे सभी या तो आफ़िस में या गाँव के किसी आयोजन में हुई थी .
वह नौकर घुमावदार रास्ते से होता हुआ गणेश को हवेली के उपरी हिस्से में ले गया , उपर आलीशान बैठक थी जहाँ गाँव के २-४ रसूखदार लोग बैठे हुए थे . गणेश को आते देख उनमें दुआ सलाम हुई .पाटिल और सरपंच का आना अभी बाकी था .
गणेश बैठक के एक कोने में जा कर बैठ गया . बाकी लोग बाग बीड़ी , पान, चिलम , तंबाखू का मज़ा लेने में मशगूल थे और साथ ही साथ खेती किसानी की बातें हो रहीं थी . गणेश का उन लोगों में जा कर बात करने का जी नहीं हुआ इसलिए एक तरफ वह अकेला ही बैठा रहा . उसके बगल में ही दूसरे कोने में एक बूढ़ा गाँववाला बैठा हुआ था , उस गाँववाले ने कमीज़ के नीचे हाथ डाल कर कुछ टटोला और बनियान के भीतर बनी ख़ुफ़िया जेब से खाकी कपड़े की छोटी से गठरी बाहर निकाली , उसने गठरी की गाँठ हौले से खोली. बड़े आराम से चिलम की सफाई की . चिलम के पिछवाड़े एक छोटी गोली जैसी कोई चीज़ थी , उसने वह चीज़ बाहर निकाली और उसे साफ किया और वापिस चिलम के पिछवाड़े डाल दिया. शायद वह चीज़ चिलम पीते हुए तंबाखू को मुँह के अंदर जाने से रोकने का काम करती थी , इसलिए उसे पिछवाड़े डाला जाता होगा. इसके बाद उसने उस गठरी से कपड़े की एक और छोटी गठरी निकाली . गणेश उस बूढ़े की हरकतों पर बारीकी से नज़रें जमाए हुए था . उसने उस छोटी गठरी की गाँठ खोली उसमें मौजूद तंबाखू को उसने चिलम में दबा कर भर दिया . अब वह दोबारा गठरी में कुछ ढूँढने लगा उसने उसमें से एक सफेद पत्थर का टुकड़ा निकाला उसे गाँव वाले 'चकमक पत्थर' कहते थे और चकमक पत्थर के टुकड़े खेतों में या झरने के किनारे बालू में बहुतायत में मिलते थे . उस पत्थर को वैसे ही हाथ में पकड़े हुए गठरी से उसने कोई की-चेन जैसी चीज़ बाहर निकाली उस चीज़ के एक सिरे पर असल में लोहे की एक छोटी मोटी पट्टी थी और दूसरे सिरे पर उस पट्टी से बँधी हुई रेशमी चीज़ थी. उस रेशमी चीज़ को बीचों बीच काट कर एक छोटी सी डिबिया बनाई गयी थी , उस डिबिया में रूई रखी गयी थी . गणेश ने कभी किसी से इस बारे में पूछा था तो उसे बताया गया वह रूई कपास के बीजों के बजाए किसी जंगली पौधे के बीजों से बनाई गयी थी जिसे वह लोग 'कफ' कह कर पुकारते थे . उस बूढ़े ने उस रेशमी डिबिया से थोड़ा कफ निकाल कर सफेद पत्थर के सिरे पर उसे लगाया और उस छोटी लोहे की पट्टी से उस पत्थर को जोरों से घिस कर , कफ जलाने ले किए वह चिंगारी पैदा करने लगा , दो तीन बार की गयी असफल कोशिशों के बाद चौथी बार उस कफ ने आग पकड़ ली , उसने वह जलता हुआ कफ चिलम के मुंहाने रखा और उसके पिछवाड़े एक छोटे से कपड़े की चिंदी ठूंस कर वह चिलम पीने लगा , जैसे जैसे वह जोरों से कश लेता था चिलम के मुंहाने पर उसे तंबाखू अंगारों की तरह लाल दिखता था . दो तीन लंबे कश ले कर बड़ी शान से वह बूढ़ा मुँह से धुआँ छोड़ रहा था .
उसे अहसास हुआ की गणेश उसे काफ़ी देर से अपलक देखे जा रहा है अगली दफे दो चार लंबे कश ले कर धुआँ छोड़ते हुए उसने चिलम वाला हाथ गणेश की ओर बढ़ा कर बोला " पीवेगा ?"
गणेश ने अजीब सा मुँह बना कर हाथ के इशारे से मना किया
" नाही? .... अरे बबुआ का नसा है इसका ...बहुत बढ़िया .... उ बीड़ी , सिगरेट मा कौनो दम नाही ... एक कस ले के तो देख"
बूढ़े ने दोबारा मिन्नत की.
"मुझे नही चाहिए ... " कहते हुए गणेश ने अपनी नज़रें उस बूढ़ें से हटा कर दूसरी ओर कर लीं .
क्रमशः
Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande
बैठक में हिस्सा लेने वाला शख्स बड़ी शान से सीना चौड़ा कर उस जमावड़े को बड़ी हिकारत से देखते हुए हुए हवेली के अंदर जा रहा था , बैठक के दौरान हवेली से बाहर किसी वजह से जो भी आदमी आता था उससे 'ताज़ा हाल' जानने के लिए लोगों का हुजूम उमड़ पड़ता था और वह बाहर आया हुआ आदमी ना - नुकुर करते भाव खाते हुए लोगों को अंदर की खबर देता था .
गणेश जैसे ही हवेली के करीब पंहुचा उसने घड़ी में देख कर इस बात की तसल्ली करना चाही कि कहीं उसे देर तो नहीं हो गयी , उसने देखा तय समय को ५ मिनट बाकी थे . जैसे ही उसका ध्यान आस पास के जमावड़े की ओर गया उसका दिल ज़ोर ज़ोर से धड़कने लगा . उसने सोचा -
मेरे यहाँ आने से पहले ही यहाँ बैठक तो शुरू नहीं हो गयी ...
लेकिन बैठक को तो वक्त है...
या बैठक शुरू होने के पहले ही कुछ हो गया .....
गणेश ने सरसरी निगाह से लोगों के जमावड़े का जायज़ा लिया सबकी कौतूहल भरी आँखें उसी को देख रहीं थी .
अब भीतर जा कर ही बात पता चलेगी....उसने खुद से मन ही मन कहा .
गणेश ने जल्दबाज़ी में हवेली की ओर कदम बढ़ाए , लेकिन भीतर जाने के लिए दो-तीन रास्ते थे. वह ठिठक गया .
अब इनमें से किस रास्ते से भीतर जाया जाए ? वह इस बात को सोचते हुए उसने आस पास नज़रें दौड़ाई , तभी पाटिल साहब का नौकर उसे दिखाई दिया " यहाँ इस तरफ ..." उस नौकर ने एक जगह इशारा करते हुए कहा , गणेश उसके पीछे पीछे चल दिया , गणेश उसकी ओर देख कर मुस्कुराया . गणेश पहली बार इस हवेली में आया था हालाँकि उसकी और पाटिल साहब की कई दफ़ा मुलाकात हो चुकी थी लेकिन वे सभी या तो आफ़िस में या गाँव के किसी आयोजन में हुई थी .
वह नौकर घुमावदार रास्ते से होता हुआ गणेश को हवेली के उपरी हिस्से में ले गया , उपर आलीशान बैठक थी जहाँ गाँव के २-४ रसूखदार लोग बैठे हुए थे . गणेश को आते देख उनमें दुआ सलाम हुई .पाटिल और सरपंच का आना अभी बाकी था .
गणेश बैठक के एक कोने में जा कर बैठ गया . बाकी लोग बाग बीड़ी , पान, चिलम , तंबाखू का मज़ा लेने में मशगूल थे और साथ ही साथ खेती किसानी की बातें हो रहीं थी . गणेश का उन लोगों में जा कर बात करने का जी नहीं हुआ इसलिए एक तरफ वह अकेला ही बैठा रहा . उसके बगल में ही दूसरे कोने में एक बूढ़ा गाँववाला बैठा हुआ था , उस गाँववाले ने कमीज़ के नीचे हाथ डाल कर कुछ टटोला और बनियान के भीतर बनी ख़ुफ़िया जेब से खाकी कपड़े की छोटी से गठरी बाहर निकाली , उसने गठरी की गाँठ हौले से खोली. बड़े आराम से चिलम की सफाई की . चिलम के पिछवाड़े एक छोटी गोली जैसी कोई चीज़ थी , उसने वह चीज़ बाहर निकाली और उसे साफ किया और वापिस चिलम के पिछवाड़े डाल दिया. शायद वह चीज़ चिलम पीते हुए तंबाखू को मुँह के अंदर जाने से रोकने का काम करती थी , इसलिए उसे पिछवाड़े डाला जाता होगा. इसके बाद उसने उस गठरी से कपड़े की एक और छोटी गठरी निकाली . गणेश उस बूढ़े की हरकतों पर बारीकी से नज़रें जमाए हुए था . उसने उस छोटी गठरी की गाँठ खोली उसमें मौजूद तंबाखू को उसने चिलम में दबा कर भर दिया . अब वह दोबारा गठरी में कुछ ढूँढने लगा उसने उसमें से एक सफेद पत्थर का टुकड़ा निकाला उसे गाँव वाले 'चकमक पत्थर' कहते थे और चकमक पत्थर के टुकड़े खेतों में या झरने के किनारे बालू में बहुतायत में मिलते थे . उस पत्थर को वैसे ही हाथ में पकड़े हुए गठरी से उसने कोई की-चेन जैसी चीज़ बाहर निकाली उस चीज़ के एक सिरे पर असल में लोहे की एक छोटी मोटी पट्टी थी और दूसरे सिरे पर उस पट्टी से बँधी हुई रेशमी चीज़ थी. उस रेशमी चीज़ को बीचों बीच काट कर एक छोटी सी डिबिया बनाई गयी थी , उस डिबिया में रूई रखी गयी थी . गणेश ने कभी किसी से इस बारे में पूछा था तो उसे बताया गया वह रूई कपास के बीजों के बजाए किसी जंगली पौधे के बीजों से बनाई गयी थी जिसे वह लोग 'कफ' कह कर पुकारते थे . उस बूढ़े ने उस रेशमी डिबिया से थोड़ा कफ निकाल कर सफेद पत्थर के सिरे पर उसे लगाया और उस छोटी लोहे की पट्टी से उस पत्थर को जोरों से घिस कर , कफ जलाने ले किए वह चिंगारी पैदा करने लगा , दो तीन बार की गयी असफल कोशिशों के बाद चौथी बार उस कफ ने आग पकड़ ली , उसने वह जलता हुआ कफ चिलम के मुंहाने रखा और उसके पिछवाड़े एक छोटे से कपड़े की चिंदी ठूंस कर वह चिलम पीने लगा , जैसे जैसे वह जोरों से कश लेता था चिलम के मुंहाने पर उसे तंबाखू अंगारों की तरह लाल दिखता था . दो तीन लंबे कश ले कर बड़ी शान से वह बूढ़ा मुँह से धुआँ छोड़ रहा था .
उसे अहसास हुआ की गणेश उसे काफ़ी देर से अपलक देखे जा रहा है अगली दफे दो चार लंबे कश ले कर धुआँ छोड़ते हुए उसने चिलम वाला हाथ गणेश की ओर बढ़ा कर बोला " पीवेगा ?"
गणेश ने अजीब सा मुँह बना कर हाथ के इशारे से मना किया
" नाही? .... अरे बबुआ का नसा है इसका ...बहुत बढ़िया .... उ बीड़ी , सिगरेट मा कौनो दम नाही ... एक कस ले के तो देख"
बूढ़े ने दोबारा मिन्नत की.
"मुझे नही चाहिए ... " कहते हुए गणेश ने अपनी नज़रें उस बूढ़ें से हटा कर दूसरी ओर कर लीं .
क्रमशः
Original Novel by Sunil Doiphode
Hindi Version by Chinmay Deshpande








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