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अध्याय -२२ (तमाशा) - Novel Book Madhurani

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 पेट पूजा होने के उपरांत गणेश ने बाज़ार के मैदान के कोने में स्थित , महादेव के मंदिर में जाने का निश्चय किया. वह महादेवीजी का मंदिर देखने में भले ही प्राचीन था  परन्तु काफी बड़ा था . मंदिर के आस पास का क्षेत्र भी बड़ा और फूलो व फलो के सघन वृक्षों से घिरा था . इसमें एक विशाल नीम का वृक्ष भी था . गर्मियो में शीतल छाया के लिए इस वृक्ष का बहुत उपयोग होता था . और आज तो बाज़ार का दिन और उसमे भी गर्मियों की लू बरसाती कड़ी धुप , इस वृक्ष के नीचे काफी लोगो की भीड़ जमा हो गयी,  कुछ थके हारे लोगों ने तो नींद की झपकी भी ली. मंदिर के प्रवेश द्वार के एकदम सामने एक सार्वजानिक कुआ था. गाँव के अनेक लोग उस कुए से जल भरते थे.  मंदिर के तरफ जाते-जाते गणेश को कोने पर एक पान की टपरी दिखाई दी. वह उस पान की टपरी पर ही रुक गया और उस पानवाले को उसने एक बनारसी पान बनाने का आदेश दिया. पान टपरी के पास काफी लोग जमा थे, कोई व्यक्ति बिडी मांग रहा था , तो कोई सिगरेट तो किसी को तम्बाकू की छोटी पुडिया चाहिए थी. पानवाले ने ग्राहकों को निपटाया, और गणेश का बनारसी पान बनाने के लिए हाथ में लिया, गणेश वहीँ उसके सामने खड़ा रहा.  पान बनने तक क्या किया जाये ये सोचते हुए गणेश ने सामने की ओर देखा तो उसे पान टपरी के बाजु में ही, मंदिर की दिवार से लगकर, कुछ बच्चे कांच के कंचो का खेल जोरशोर से खेलते दिखाई दिये. गणेश उनकी तरफ बढा. जाते-जाते उसने पान वाले को, पान तैयार होने के बाद, आवाज देने को कहा. कंचे खेलने वाले चार- पाँच बच्चे थे. उनमे से एक बच्चा दिवार से लगभग, दस ग्यारह फूट पर रखे पत्थर के पास गया. उसके हाथ में कम से कम १५-२० कंचे थे. उसने उस पत्थर के पास खड़े रहकर कंचो को दिवार की दिशा में धीरे से फेका. दिवार के पास ही, जमीं में, कंचे के आकार का एक गढ्ढा था. वह गोटिया जैसे ही गढ्ढे की दिशा में लुड़कने लगी , बाकि के बच्चो की सांस ऊपर नीचे होने लगी. क्योकि यदि एक भी गोटी उस खड्डे में गिरती है तो वह बच्चा सभी की सभी कंचे जीत जायेगा. काफी सारी गोटिया उस खड्डे के एकदम नजदीक जाकर घूम रही थी, पर एक भी उस गढ्ढे में नहीं गिरी. फिर उन्ही बच्चे में से एक ने किस गोली को मारना है, यह उस गोटिया फेकने वाले बच्चे को बताया. उस बच्चे ने, हाथ में एक गोटी लेकर, थोड़ी सी एक आँख बंद करके , उस गोटी को लक्ष्य किया और उस गोटी को हाथ में रखी गोटी से फेककर मारा. एकदम से सभी बल्लू बल्लू करके चिल्लाने लगे. उसके द्वारा मारी हुई गोटी, किसी दूसरी ही गोटी को लगी थी. गोटी मारने वाले के चेहरे पर निराशा छा गयी, उसने निराश चेहरे से अपनी निकर की जेब में हाथ डालकर कंचे निकाले और उसमे से तीन कंचे गिनकर खेल में डाल दिए. अब अगला बच्चा खेल खेलने के लिए तैयार हो गया. गणेश को यह सब देखकर आनंद आ रहा था. वह अपनी बचपन की यादो में खो गया. बचपन में वह  बच्चो के साथ ऐसे ही कंचे खेलता थाI.अचानक पीछे से आयी आवाज से गणेश होश में आया.

"पान होई  गया साब" पान वाला चिल्लाया था.

उसने उसके पास से पान लिया, पैसे दिए और वह पान मूह में ठूस लिया, फिर उसे एक सिगरेट देने को कहा. सिगरेट जलाकर, पान खाते-खाते गणेश, पेट भरे होने की तृप्त आत्मा के साथ, धीरे धीरे  मंदिर के प्रवेश द्वार की तरफ बढने लगा. मंदिर में दो ही द्वार थे. मुख्य द्वार से अन्दर प्रवेश करने के बाद एक बड़ा हॉल था. हॉल में से अहाते की तरफ जाने पर, अहाते के बाहर एक पत्थर का बड़ा सा नंदी रखा था. जिसके पीठ और कंधे पर चढ़कर, गाँव के छोटे-छोटे बच्चे खेलते रहते थे. मंदिर में दो ही द्वार होने के कारण हॉल में काफी आड़ रहती थी. मंदिर के, हॉल के कोने में, आड़ में हमेशा ही ताश के एक दो खेल चलते रहते, और बाजार के दिन तो रहते ही रहते , साथ में, बंडू के होटल के गरम गरम मिर्ची के भजिये का भी बड़े स्वाद के साथ आनंद लिया जाता.

वैसे ताश के खेल रोज ही खेले जाते. गणेश को ताश खेलने में कभी भी रूचि नहीं थी, पर यदि समय न कट रहा हो तो गणेश हमेशा ही अपने आफिस में से उठकर इस मंदिर में आ जाता था. वहा खड़े रहकर उन ताश के पत्तो को खेलते देखना गणेश को सुहाता था.

कभी-कभी तो गणेश को आश्चर्य होता था की गावों में रहने वाले बच्चे इतना कठिन  रमी का खेल इतनी आसानी से कैसे खेल लेते है.  मतलब इन ग्रामीण बच्चो में भी सर्वसामान्य लोगो की तरह दिमाग होता है , लेकिन वे शायद इसका उपयोग काफी बार गलत या निरर्थक रस्ते के लिए करते है. गणेश मंदिर में ताश के खेल को देखने में तल्लीन था.

तभी कोई दौड़ता  हुआ आया-

"ए चलो रे....... उधर बाजार में तमाशा (गोची) होई गवा. "

ताश का खेल आधे में ही रूक गया. सभी ने खेल में लगाये अपने अपने पैसे बाँट कर वापस ले लिए. एक ने ताश का बण्डल जेब में ठूस लिया.

"क्या हुई गवा "  किसी ने तो भी चिंतित स्वर में पुछा.

"अबे जल्दी चलियो ......... उहा जाकर ही देख लियो ......... ईहाँ क्या चिल्लावे  है ....... और ईहाँ टेम  कोनो  है. " वो बोला और जैसे हवा की तरह आया था वैसे ही हवा की तरह दरवाजे से बाहर निकल गया. सभी उसके पीछे दोड़ने लगे. गणेश की भी उत्सुकता बढने लगी.

क्या हुआ होगा.........

वह उनके पीछे दोड़कर तो नहीं........... पर जितनी जल्दी हो सके उतने तेज कदमो से चलने लगा.

बाजार में एक स्थान पर बहुत सारी संख्या में लोग जमा थे. मंदिर में ताश खेलने वाले सभी लोग वहा आक़र रूक गए. गणेश भी भीड़ में घुसकर, एड़ी के बल पर, अपने पैर्रो को उचा करके, क्या हुआ ये देखने लगा. भीड़ के बीच में चल रहे द्रश्य को देखकर, गणेश को अपना दिल बैठता हुआ सा महसूस हुआ, उसके हाथ पैर ठन्डे पड़ गए, चेहरा एकदम सफ़ेद हो गया. वहाँ  पर मधुरानी एक गवार से दिखने वाले व्यक्ति को अपनी अस्सल कोल्हापुरी चप्पल से बुरी तरह पीट रही थी. वह व्यक्ति अपने दोनों हाथो से उसके मार से बचने का प्रयत्न कर रहा था और उसे जो शर्मिंदगी महसूस हो रही थी वह भी छिपाने का प्रयत्न कर रहा था. जो व्यक्ति मार खा रहा था, वह शायद इन ताश खेलने वालो में से किसी एक का मित्र था. क्योकि इनमे से एक बीच में आया-

"क्या हुई गवा " उसने पुछा.

मधुरानी अत्यंत आवेश और गुस्से में थी. उसी आवेश में उसने, जो बीच में आया उसे भी दो तीन चप्पले जड़ दी.

"मरद - औरत के झगड़े और रास्ते में हो रहे झगड़े के बीच नाहीं पड़ना चाहिए............. ई  कहने वाले जूठ नाहीं कहते" बाजु में खड़े एक वृद्ध ने सुझाव दिया।

"मधुबाई..........." वह कहने का प्रयत्न करने लगा.

"मधुबाई......... क्या हुई  गवा .... तनिक बताओ तो "  बीच में पड़े व्यक्ति ने मार खाकर बड़े ही कातर स्वर में पुछा.

"मरे, ............  की  समझता है.…  मुर्दे....... भीड़ में से जाते जाते चिमटी ली मरे ने.............. उस चंडाल से कहियो  घर जाकर उसकी माँ बहन की चिमटी लेइयो ........."

बीच में पड़ने वाला क्या कहे, उसे समज नहीं आया, फिर भी वह बोला.........

" किहा  चिमटी लीयो  मधुबाई"

"मरे, अब  तुझे की खोलके बताऊ ......... और ई  मधुबाई , मधुबाई क्या लगा रखा रहे .......  में क्या तुझे तमाशे में नाचने वाली बाई नजर  आवे है  "

"वैसा  नाहीं मधुबा..... मधु ..... बहन " उसने कहा.

" बहन " उसके मुँह से बहुत मुश्किल से निकला था.

गणेश ने मधुरानी का ऐसा चंडी  अवतार पहले कभी नहीं देखा था. उसने मन ही मन में मधुरानी की जो कल्पना की थी उसकी छबी मलिन पड़ गयी. वह एकदम निराश, हताश दिखाई देने लगा.

क्रमश:

Original Novel by - Sunil Doiphode
Hindi Version by - Pratiksha Kawishwar

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1 comment:

  1. NOVEL IS REALLY INTERESTING BUT THE TIME LAG BETWEEN THE POSTINGS MAKING ITS INTEREST FAINT.

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