पेट पूजा होने के उपरांत गणेश ने बाज़ार के मैदान के कोने में स्थित , महादेव के मंदिर में जाने का निश्चय किया I वह महादेवीजी का मंदिर देखने में भले ही प्राचीन था I परन्तु काफी बड़ा था I मंदिर के आस पास का क्षेत्र भी बड़ा और फूलो व फलो के सघन वृक्षों से घिरा था I इसमें एक विशाल नीम का वृक्ष भी था I गर्मियो में शीतल छाया के लिए इस वृक्ष का बहुत उपयोग होता था I और आज तो बाज़ार का दिन और उसमे भी गर्मियों की लू बरसाती कड़ी धुप , इस वृक्ष के नीचे काफी लोगो की भीड़ जमा हो गयी I कुछ थके हारे लोगों ने तो नींद की झपकी भी लीI मंदिर के प्रवेश द्वार के एकदम सामने एक सार्वजानिक कुआ थाI गाँव के अनेक लोग उस कुए से जल भरते थेI मंदिर के तरफ जाते-जाते गणेश को कोने पर एक पान की टपरी दिखाई दीI वह उस पान की टपरी पर ही रुक गया I और उस पानवाले को उसने एक बनारसी पान बनाने का आदेश दियाI पान टपरी के पास काफी लोग जमा थेI कोई व्यक्ति बिडी मांग रहा था , तो कोई सिगरेट तो किसी को तम्बाकू की छोटी पुडिया चाहिए थीI पानवाले ने ग्राहकों को निपटाया, और गणेश का बनारसी पानं बनाने के लिए हाथ में लिया, गणेश वहीँ उसके सामने खड़ा रहाI पान बनने तक क्या किया जाये, ये सोचते हुए गणेश ने सामने की ओर देखाI तो उसे पान टपरी के बाजु में ही, मंदिर की दिवार से लगकर, कुछ बच्चे कांच के कंचो का खेल जोरशोर से खेलते दिखाई दियेI गणेश उनकी तरफ बढाI जाते-जाते उसने पान वाले को, पान तैयार होने के बाद, आवाज देने को कहाI कंचे खेलने वाले चार- पाँच बच्चे थेI उनमे से एक बच्चा दिवार से लगभग, दस ग्यारह फूट पर रखे पत्थर के पास गयाI उसके हाथ में कम से कम १५-२० कंचे थेI उसने उस पत्थर के पास खड़े रहकर कंचो को दिवार की दिशा में धीरे से फेकाI दिवार के पास ही, जमीं में, कंचे के आकार का एक गढ्ढा थाI वह गोटिया जैसे ही गढ्ढे की दिशा में लुड़कने लगी , बाकि के बच्चो की सांस ऊपर नीचे होने लगीI क्योकि यदि एक भी गोटी उस खड्डे में गिरती है तो वह बच्चा सभी की सभी कंचे जीत जायेगाI काफी सारी गोटिया उस खड्डे के एकदम नजदीक जाकर घूम रही थीI पर एक भी उस गढ्ढे में नहीं गिरीI फिर उन्ही बच्चे में से एक ने किस गोली को मरना है, यह उस गोटिया फेकने वाले बच्चे को समजायाI उस बच्चे ने, हाथ में एक गोटी लेकर, थोड़ी सी एक आँख बंद करके , उस गोटी को लक्ष्य किया और उस गोटी को हाथ में राखी गोटी से फेककर माराI एकदम से सभी बल्लू बल्लू करके चिल्लाने लगेI उसके द्वारा मरी हुई गोटी, किसी दूसरी ही गोटी को लगी थीI गोटी मारने वाले के चेहरे पर निराशा छा गयीI उसने निराश चेहरे से अपनी निकर की जेब में हाथ डालकर कंचे निकाले और उसमे से तीन कंचे गिनकर खेल में डाल दिएI अब अगला बच्चा खेल खेलने के लिए तैयार हो गयाI गणेश को यह सब देखकर आनंद आ रहा थाI वह अपनी बचपन की यादो में खो गयाI बचपन में वह अपने बाड़े के बच्चो के साथ ऐसे ही कंचे खेलता थाI अचानक पीछे से आयी आवाज से गणेश होश में आयाI
"पान हो गया साहब" पान वाला चिल्लाया थाI
उसने उसके पास से पान लिया, पैसे दिए और वह पान मूह में ठूस लिया, फिर उसे एक सिगरेट देने को कहाI सिगरेट जलाकर, पान खाते-खाते गणेश, पेट भरे होने की तृप्त आत्मा के साथ, घीरे घीरे मंदिर के प्रवेश द्वार की तरफ बढने लगाI मंदिर में दो ही द्वार थेI मुख्य द्वार से अन्दर प्रवेश करने के बाद एक बड़ा हॉल थाI हॉल में से अहाते की तरफ जाने पर, अहाते के बाहर एक पत्थर का बड़ा सा नंदी रखा थाI जिसके पीठ और कंधे पर चड़कर, गाँव के छोटे-छोटे बच्चे खेलते रहते थेI मंदिर में दो ही द्वार होने के कारण हॉल में काफी आड़ रहती थीI मंदिर के, हॉल के कोने में, आड़ में हमेशा ही ताश के एक दो खेल चलते रहतेI और बाजार के दिन तो खेलते-खेलते, साथ में, बंडू के होटल के गरम गरम मिर्ची के भजिये का भी बड़े स्वाद के साथ आनंद लिया जाताI
वैसे ताश के खेल रोज ही खेले जातेI गणेश को ताश खेलने में कभी भी रूचि नहीं थी, पर यदि समय न कट रहा हो तो गणेश हमेशा ही अपने आफिस में से उठकर इस मंदिर में आ जाता थाI वहा खड़े रहकर उन ताश के पत्तो को खेलते देखना गणेश को सुहाता थाI
कभी-कभी तो गणेश को आश्चर्य होता था की गाओं में रहने वाले बच्चे इतना उबाऊ रमी का खेल इतनी आसानी से कैसे खेल लेते हैI मतलब इन ग्रामीण बच्चो में भी सर्वसामान्य लोगो की तरह दिमाग होता है लेकिन वे शायद इसका उपयोग काफी बार गलत या निरर्थक रस्ते के लिए करते हैI गणेश मंदिर में ताश के खेल को देखने में तल्लीन थाI
तभी कोई दोड़ता हुआ आया-
"ए चलो रे....... उधर बाजार में कोई तमाशा (गोची) हो गया हैI "
ताश का खेल आधे में ही रूक गयाI सभी ने खेल में लगाये अपने अपने पैसे बाँट कर वापस ले लिएI एक ने ताश का बण्डल जेब में ठूस लियाI
"क्या हुआ किसी ने तो भी चिंतित स्वर में पुछाI
"अबे जल्दी चल......... वहा जाकर ही देख......... यहाँ क्या चिल्ला रहा है ....... और यहाँ समय किसको हैI " वो बोला और जैसे हवा की तरह आया था वैसे ही हवा की तरह दरवाजे से बाहर निकल गयाI सभी उसके पीछे दोड़ने लगेI गणेश की भी उत्सुकता बढने लगीI
क्या हुआ होगा.........
वह उनके पीछे दोड़कर तो नहीं........... पर जितनी जल्दी हो सके उतने तेज कदमो से चलने लगाI
बाजार में एक स्थान पर बहुत सारी संख्या में लोग जमा थेI मंदिर में ताश खेलने वाले सभी लोग वहा आक़र रूक गएI गणेश भी भीड़ में घुसकर, एड़ी के बल पर, अपने पैर्रो को उचा करके, क्या हुआ ये देखने लगाI भीड़ के बीच में चल रहे द्रश्य को देखकर, गणेश को अपना दिल बैठता हुआ सा महसूस हुआI उसके हाथ पैर ठन्डे पड़ गएI
चेहरा एकदम सफ़ेद हो गयाI वहा पर मधुरानी एक गवार से दिखने वाले व्यक्ति को अपनी अस्सल कोल्हापुरी चप्पल से बुरी तरह पीट रही थीI वह व्यक्ति अपने दोनों हाथो से उसके मार से बचने का प्रयत्न कर रहा था और उसे जो शर्मिंदगी महसूस हो रही थी वह भी छिपाने का प्रयत्न कर रहा थाI जो व्यक्ति मार खा रहा था, वह शायद इन ताश खेलने वालो में से किसी एक का मित्र थाI क्योकि इनमे से इक बीच में आया-
"क्या हुआ" उसने पुछाI
मधुरानी अत्यंत आवेश और गुस्से में थीI उसी आवेश में उसने, जो बीच में आया उसे भी दो तीन चप्पले जड़ दीI
"पति-पत्नी के झगड़े और रास्ते में हो रहे झगड़े के बीच नहीं पड़ना चाहिए............. ऐसा कहने वाले जूठ नहीं कहते" बाजु में खड़े एक वृद्ध ने सुझाव दियाI
"मधुबाई..........." वह कहने का प्रयत्न करने लगाI
"मधुबाई......... क्या हुआ.... वह तो बताओI बीच में पड़े व्यक्ति ने मार खाकर बड़े ही कातर स्वर में पुछाI
"मरे, मुर्दे............ क्या समझता है....... भीड़ में से जाते जाते चिमटी ली मरे ने.............. उस चंडाल से कहो घर जाकर उसकी माँ बहन की चिमटी ले........."
बीच में पड़ने वाला क्या कहे, उसे समज नहीं आया, फिर भी वह बोला.........
" कहा चिमटी ली मधुबाई"
"मरे, अब क्या तुझे खोलकर दिखाऊ......... और ये मधुबाई , मधुबाई क्या लगा रखा है.......
में क्या तुझे तमाशे में नाचने वाली बाई नजर आती हूँI "
"वैसे नहीं मधुबा..... मधु ..... बहन " उसने कहा
" बहन " उसके मुह से बहुत मुश्किल से निकला थाI
गणेश ने मधुरानी का ऐसा चंडी का अवतार पहले कभी नहीं देखा थाI
उसने मन ही मन में मधुरानी की जो कल्पना की थी उसकी छबी मलिन पड़ गयीI
वह एकदम निराश, हताश दिखाई देने लगाI
क्रमश:
Original Novel by - Sunil Doiphode
Hindi Version by - Pratiksha Kawishwar








0 comments:
Post a Comment