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Hindi Novel books - Madhurani - CH-20 साप्ताहीक बाजार

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It is better to light a candle than to curse the darkness
-- Anonymous
आज गुरुवार होनेसे साप्ताहीक बाजार था . सुबहसे रास्तेपर भिड और वातावरणमें एक उत्साह भरा हुवा दिख रहा था. उजनीको साप्ताहीक बाजारके बहाने आसपासके गांवके लोग आते थे. गणेश सुबह सुबह नहा धोकर अपने ऑफीसकी तरफ चल पडा. आज साप्ताहीक बाजार होनेसे आसपासके गांवके लोगभी उसकेपास आनेवाले थे. मतलब रोजके मुकाबले आज कामका बोझ जरा जादा ही होनेवाला था. इसलिए वह अपने कमरेसे थोडा जल्दीही बाहर निकल गया. जाते हूए उसने एकबार मधुराणीकी दुकानकी तरफ नजर दौडाई. और मधूराणीनेभी जवाब दिया - एक मिठीसी मुस्कान देकर. ऑफीसकी तरफ जानेवाले उसके कदम अपने आपही उसकी दुकानकी तरफ मुडे. अभी अभी उसने दुकान खोला था. दूकानमें दुसरा कोई ग्राहक नही दिख रहा था. और उसका नौकरभी नही आया था. या फिर उसे कही और भेजा गया होगा.

" आवोजी  गणेश " 'गणेश' पर कुछ जादाही जोर देते हूए वह बोली.

उसने 'गणेश' थोडा धीरेसे और हिचकिचाते हूए संबोधीत किया था.

उसने पहली बार गणेशको 'गणेश' ऐसा संबोधीत किया था. यूतो वह उसे 'गणेशराव' करके संबोधीत करती थी.
गणेशके दील की धडकन तेज हो गई.

" क्या दूं जी ? ... बोलोयो तो "

' क्या दूं? ' पर जोर देकर एक खास अदासे बोलते हूए मानो वह कुछ और ही जताना चाहती थी.

गणेश गडबडा गया. उसका दिल जोर जोरसे धडकने लगा. चेहरा लाल लाल होने लगा था. उसने इधर उधर देखा. उसे क्या किया जाए कुछ सुझ नही रहा था. भलेही दुकानमें उसके और मधुराणीके अलावा कोई नही था, लेकिन रास्तेपर बाजार जानेवाले लोग दिख रहे थे.

" सिगारेट दिजिए " किसी तरह वह बोला.

" दिजिए ?" उसने प्रश्नार्थक मुद्रामें गणेशकी तरफ देखकर टोका.

उसकी तिरछी नजर उसे उकसा रही थी.

" मतलब दो .." उसने हिम्मत कर उसे संबोधीत किया.

उसने एक सिगारेट निकालकर उसके हाथपर रख दी. गणेशने सिगारेट लेनेके बहाने उसका हाथ अपने हाथमें लिया. मधुराणीने शर्माकर गर्दन झुकाकर अपना हाथ अदबसे उसके हाथसे छुडा लिया. तभी एक ग्राहक वहां आ टपका. अब गणेशके पास उसके जानेकी राह देखनेके अलावा कोई रास्ता नही था. उस ग्राहकने कुछ खरीदा और जाने लगा तो गणेशको सुकुन महसूस होने लगा. लेकिन तुरंत वहा दुसरा एक ग्राहक आगया. और उसके पिछे तिसरा, चौथा ... ऐसे ग्राहकोका तांताही लग गया.

'' अच्छा निकलता हूं'' उसके मुंह मे आया '' राणी'' संबोधन को मुश्कीलसे निगलकर उसने कहा.

मधूराणी सिर्फ उसकी तरफ देखकर मुस्कुरा दी. वह भारी कदमोसे अपनी ऑफीसकी तरफ चल दिया.

गणेश जब ऑफीसमें पहुंचा तब उसके टेबलके सामने काफी लोगोंकी भिड जमा हो गई थी. किसीको प्रमाणपत्र किसीकी सनद तो किसीके लोनके लिए लगनेवाले कागजाद. और किसीको सरकार ने एलान किए अनुदानके लिए कागजाद चाहिए थे. गणेशने आएबराबर तुरंत काम शुरु कर दिया. शायद कामके साथ मिलनेवाले उपरके कमाईके कारण उसे काममें कुछ थकावट महसुस नही होती थी. बाहर चबुतरेपर पांडू पैसे इकठ्ठा करनेके लिए बैठा था. पहलेभी जब खराडे साहब थे तबभी वह वही काम करता था. वह लोगोंको अंदर भेजनेके पहलेही उनसे पैसे ऐठता था और उनके पास एक परची देता था. पांडू जादा कुछ पढा लिखा नही था. भलेही वह सिर्फ दुसरी कक्षा तक ही पढा था, फिरभी परची लिखनेका काम वह बखुबी निभाता था. पांडूको बाहर बिठानेसे गणेश के दो काम आसान होते थे. एक तो पैसे खुद नही लेने पडते थे, जिसके कारण ऍन्टी करप्शनवालोंका कोई डर नही रहता. वैसे ऍन्टी करप्शनवाले इतने बेमालूम तरीकेसे और वह भी इतने दूर देहातमें आनेवाले नही थे , इसका गणेशको अंदाजा था. लेकिन नही कभीभी किसीभी मुसिबतके लिये तैयार रहना सबसे बेहतर होता है. गणेशको पांडूका दुसरा फायदा यह था की लोगोंको क्या चाहिए यह जाननेके लिए गणेशको फालतूकी मगजमारी करनेकी जरुरत नही पडती थी. दिनके आखिरमें गणेशभी पांडूको कुछ इनाम देकर खुश करता था. उस इनाम के लालचमेहीतो वह दिनभर गणेशका काम करता था.

एक एक को निबटने के बाद गणेशके टेबलके सामने अब एकमात्र देहाती बच गया था. उस अकेलेको देखकर गणेशने चैनकी सांस ली. और फिर घडीमें देखा. लगभग एक बजनेको था. सुबहसे उसने पाणी तक पिनेका वक्त नही मिला था. अब उसका पेट भूखसे बेहाल होगया था. प्याससे गला भी सुख गया था. उसने सोचा की बस इस एक देहातीको निबट लूं तो बाहर बाजारमें एक चक्कर मारते है और खानेको कुछ मिलता है क्या यह देखते है. तभी एक लडका अंदर आगया. उसके हाथमे पितलका एक ग्लास था. उसने कुछ ना बोलते हूए वह भरा हुवा ग्लास गणेशके सामने रख दिया और बिना कुछ बोले चल दिया.

'' अरे ... ये क्या है?'' गणेशने उस लडकेको छेडा.

'' मालूम नाही'' उसने कंधे उचकाकर जवाब दिया, '' पांडूदा भेज रहत '' उसने आगे कहा और वह चल दिया.

गणेशने पहले ग्लासके अंदर झांककर देखा और फिर एक घुंट लिया. उसे अच्छा लगा. बाहर बैठे पांडूने कहीसे जुगाड जमाकर इस ठंडे शरबतका इंतजाम किया था. शरबत सौफसे बनाया हुवा था. मटकेके ठंडे पाणी मे शक्कर डालो और फिर उसमें सौफकी पाउडर बनाकर डालो और कपडेमेंसे उसे खंगालो - बस होगया शरबत - सौफका शरबत. गणेशने इस तरीकेका सौफका शरबत पहली बार इस उजनीमेंही पिया था. उसे वह खुब भाता था. बचा हुवा शरबत उसने झटसे चंद घुंटोमेंही गटक लिया. उसे प्यासही वैसी लगी थी. अब गणेशने उस बचे हूए एकमात्र देहातीको बुलाया. वह देहाती एक कदसे काफी उंचा 20-22 सालका लडका होगा.

'' क्या चाहिए ?'' गणेशने पुछा.

'' हमरे  बाने भेज रहत '' उसने जवाब दिया.

'' अरे हां ठिक है तेरे बापने भेजा है... लेकिन क्या काम है यहतो बताएगा?'' गणेशने पुछा.

फिर वह दिमागपर जोर देकर याद करनेकी कोशीश करने लगा.

'' बाहर पांडूसे मिला?'' गणेशने पुछा.

'' जी '' उसने जवाब दिया.

'' फिर उसने कुछ परची तो दी होगी'' गणेश.

'' जी  दि रहत ...'' उसने उपरके जेबसे एक मसलकर मुरझी हुई एक पर्ची निकाली और गणेशके हाथमें थमा दी.

'' अबे पागल हो क्या ...'' गणेशने चिढकर कहा.

गणेशने एकबार उस मसले हुए पर्चीकी तरफ देखा और फिर आश्चर्यसे उस लडकेकी तरफ देखा. गणेशने वह मसली हूई पर्ची खोलकर देखी और उसपर क्या लिखा है यह पढनेकी कोशीश की. लेकीन वह कागज इतनी बुरी तरह मसला हुवा था की उसपर लिखा हुवा पढना मुश्कील लग रहा था.

'' तुम्हे पढना लिखना आता है?'' गणेशने उस देहाती लडकेसे पुछा.

'' जी  ... आता  हैजी  '' उसने गर्वके साथ कहा.

'' अच्छा तो फिर इधर आकर इस पर्चीपर क्या लिखा है जरा पढके तो बता ... '' गणेश अबभी उस पर्चीको पढनेकी कोशीश करते हूए बोला.

उस देहाती लडकेने पहले गणेशके पास जानेके लिए कहांसे रास्ता है यह देखा. गणेशके सामने एकसे सटकर एक ऐसे तिन टेबल रखे हूए थे और गणेश बाए कोनेमें एकदम दिवारसे सटकर बैठा था. गणेशकी तरफ जानेका रस्ता वे तिन टेबल छोडकर एकदम  दाए कोनमे था. फिर उस देहातीने गणेशके सामने रखा एक टेबल हटाकर उधर जानेकी कोशीश की. और फिर उसे क्या लगा पता नही एकदमसे अपनी उंची टांग टेबलके उस तरफ रखकर टेबलपरसे उधर चला गया. गणेश ने वह उसका तरीका देखा और हक्का बक्कासा होकर आश्चर्यसे उस लडके की तरफ देखने लगा.

'' अबे पगले हो क्या?'' गणेश गुस्सेसे चिल्लाया. लेकिन दुसरेही पल उस लडकेके चेहरेके भाव देखकर और उसका टेबल लांघनेका तरीका याद कर उसे उस लडकेकी हंसी आ रही थी.

'' अबे क्या येडे आदमी हो... वह उधरका रास्ता छोडकर... सिधे टेबल लांघकर इधर आगया तू...'' गणेश हसते हूए बोला.

उसे क्या बोला जाए? ... हंसे की उसे गुस्सा करे?... गणेशको कुछ सुझ नही रहा था.

तबतक वह लडका वह टेबल लांघकर गणेशके बगलमें खडे होकर उस परचीपर क्या लिखा है यह पढने लगा, '' खेत बोनेका परमान पत्र ''

क्रमश:...
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