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Hindi books - Madhurani - CH-19 तत्परता

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Will you love me in December as you do in May,
Will you love me in the good old fashioned way?
When my hair has all turned gray,
Will you kiss me then and say,
That you love me in December as you do in May?
--- BaylorBound James Walker

बाहर गणेशने देखा की एक 21-22 सालका जवान लडका और 18-19 सालकी जवान लडकी एकदुसरेसे झगड रहे थे. जिस तरह से वे झगड रहे थे, उससे ऎसा लग रहा था की वे दोनोभी गुंगे हो. उनका झगडा देखकर पलभरके लिए गणेशभी मनही मन मुस्कुराया. उसने मधुराणीके दुकानकी तरफ देखा. वह अभीभी वह झगडा देखकर हंस रही थी. वह देखकर गणेश भी अपने आपको उसकी दुकानकी तरफ़ जानेसे नही रोक सका.

" गणेशराव ... देखोयो तो गुंगे कैसे झगडत रहे  ... दुइ  गुंगे झगडते  पहले कभी देखा है जी  ?" गणेशको देखकर वह बोली.

" नही ... ... पहली बार देख रहा हूं " गणेशने उसके हंसीमें अपनी हंसी मिलाते हूए जवाब दिया.

"पता है क्यों झगड रहत  ?"

गणेशने उसकी तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

" वुई  क्या हूई  गवा  की ... ई  गुंगा जा रहा था लोटा लेकर .. उधर आदमीयोंके शौच की खुली जगा  की तरफ़...और गुंगी जा रही  उधर औरतोकी शौच की खुली जगा  की तरफ़ ... अंधेरेमें दोनोकी टक्कर  हुई गवा  ,,, और दोनोके पानीके लोटे उंडेल गए रहत  ... " मधुराणी गणेशकी ताली लेकर फ़िरसे जोरसे हंसने लगी.

गणेशभी जोरसे हंसने लगा.

आज काफ़ी देर तक गणेश और मधुराणी गप्पे मारते हूए बैठे थे. तभी एक आदमी जल्दी जल्दी मधुराणीके पास आगया. उसकी सांस फ़ुली हूई थी. और वह बोलने लगा.

" जरा हौले ... पहले अपना फ़ुली हूई सांस तो ठिक कराइ  लियो और फ़िर बोलीयो... मै यही हूं... मै कही भाग जानेवाली नाही  ? " मधुराणी उस आदमीसे मजाकमें बोली.

उसने रुककर गणेशकी तरफ़ देखकर अपना फ़ुली हूई सांस ठिक की और जेबसे चाबी निकालकर मधुराणीको देते हूए वह बोला, " ई  लो ... पंधरा गोनी होई गवा  .. और तुमरे  गोडाऊनमें रखवा दिए रहत  "

वह चाबी मधुराणीके हाथमें थमाते हूए बोला. मधुराणी ने कुछ काम का बहाना बनाते हूए दुसरी तरफ़ मुडकर कुछ ढुंढने लगी. और उधरही मुंह रखते हूए उसे बोली, " रखियो   ऊंहा  गल्लेपर "

उस आदमीने मुरझे हूए चेहरेसे वह चाबी सामने गल्लेपर रख दी. मधुराणीने उसके पिछेसे बही खाता और पेन ढुंढकर निकाला. फ़िर सामने उस आदमीकी तरफ़ मुडते हूए बोली.

" सिरफ   पंधरा गोनी ... पिछले बखत तो  जादा हुई गवा  "

" क्या बात करती रही  ? ... पिछले बखत तो सिरफ  बारा गोनी हुई गवा ..."

"  पिछले बखत बोयाभी कम था ना "

" हां  उ  सब ठिक है ... लेकिन औसत तो उतनीही आनी चाहिए ना  "

मधुराणी बही और पेन गणेशके पास देते हूए बोली ,
" गणेशराव जरा निकाईलो तो औसत ... हां तुम  जरा बताईयो  तो "

तो आदमी बोला, " पिछले बखत  ...  ढाई एकडमे बारा गोनी हुई गवा ... और इस बखत तिन एकडमें पंधरा गोनी ..."

गणेश बहीपर गिनती और हिसाब करने लगा.

" नही मधुराणी इसबार औसत अच्छा आया है ... इसबार पांचका तो पिछले बार चार दशमलौ आठ का "

" अरे मुझे तो ये मालूम रहा ... संभाजीरावपर पुरा भरोसा है हमरा ...  हम तो ऐसेही उनका मजाक कर रहत  ... ... क्यो संभाजीराव? " मधुराणी संभाजीरावकी तरफ मुस्कुराकर देखते हूए बोली.

संभाजीरावभी शरमाकर हंस दिए.

" ठिक है  जाता  हूं फिर ... " वह बोला.

मधुराणी उसकी तरफ देखकर फिरसे मुस्कुरा दी... मानो हंसनेके बोलीमें कह रही हो... ' ठिक है ...अब तशरफ ले जा सकते है "

वह चला गया.

वह नजरोंसे ओझल होतेही मधुराणी बोली " बदतमीज कलमुहा  ... काम तो अच्छा करत है ... कडी मेहनत भी करत है ... लेकिन .नजदीकी बढानेकी कोशीश करत है... अभी देखाना  कैसन चाबी मेरे हाथमे थमानेकी कोशीश कर रहा था...  हाथको छुनेकी कोशीश करेगा ....  अपने घरमें मां बहन  नाही ... "

यह बोला हुवा गणेशकोभी लागू होता था इसलिए गणेशकोभी शर्मींदगी महसुस हो रही थी.

छटसे मधुराणी गणेशके जांघपर थपथपाते हूए बोली , " मतलब उकी औकातभी तो उतनी होनी चाहिए जी जी  "

गणेशका चेहरा फिरसे खिल गया. उसने सोचा -
अच्छा तो कमसे कम मुझे तो नही बोला मधुराणीने ...
मै उसके लिए अपवाद जो हूं ...
लेकिन यह किसी मजबुर बेवा औरतकी मजबुरीका लाभ उठाना बराबर नही लोगोंका...

" गणेशराव आपका हिसाब तो एकदम भारी दिखता है जी ... बहुत जल्दी किया ...  नाही मालूम था की गणितमेभी आप इतने निपूण रहत  ... "

" मधुराणी आप तो तारिफोंके पुल बांध कर अब तो मुझे शर्मींदा कर रही हो .." गणेश शर्माकर बोला.

वहां दूकानमें या आसपास कोई नही था. उसका फायदा उठाते हूए मधूराणी इतराते हूए बोली,
" गणेशराव  मुझे ... ऐस आप वैगेरे मत कहियो  ... "

गणेशने चमककर उसकी आंखोमें देखा. उसकी आंखोमें उसे मदभरे भांव उभरते हूए नजर आ रहे थे. गणेशको उसके कान गरम होनेजैसा अहसास होने लगा था.

"  सिरफ  मधू कहा तो चलेगाजी  ... या फिर राणी चलेगा ... हां राणीही ठिक रहेगा "

गणेशका गला सुखने लगा था. उसके हाथपैरमें कंपन महसूस होने लगी थी. उसने झेंपकर अपनी नजर मधूराणीके चेहरेसे हटाकर निचे झुकाई . फिरभी उसे अहसास हो रहा थाकी अबभी मधूराणी लगातार एकटक उसके चेहरेकी तरफ ही देख रही है. मानो आज वह उसे अपनी आंखोसे पी लेना चाहती हो.

" आपके दुकानका हिसाब किताब कौन रखता है " वह कुछ तो बात बनानेकी कोशीश करते हूए बोला.

" मै ही रखती हूं जी  ... क्यो ? ...  मुझे  अनपढ तो  नाही समझ रही  ... ?" मधुराणी जोरसे हंसते हूए बोली.

" नही वैसे नही ... " वह हडबडाकर संभलते हूए बोला.

" उ  पडोसका विलास करता है हमरी सहायता कभी कभी ..."

" नही .. मैने सोचा कभी कभी मैभी सहायता करता जाऊंगा आपकी ."

" आपकी ..." उसने टोका.

" नही मतलब ... तुम्हारी ' ऐसा कहते हूए गणेशका चेहरा शरमके मारे लाल लाल हुवा था.

"वैसे सहायता की कोनी  जरुरत तो नाही... पर सहायता करनेका कोई दुसरा कोई मक्सद रहा तो चलेगा ' फिरसे मधूराणी उसकी आंखोमें आखें डालकर बोली.

उसने फिरसे शर्माकर अपनी नजर झुकाई. वह अब उसके सामने रखे लकडीके संदूक की तरफ देखने लगा. संदूकपर रखा मधूराणीका हाथ ऐसेही संदूकसे खेल रहा था. उसकी हाथके हर हरकतसे उसके मनकी चंचलता स्पष्ट झलक रही थी. गणेश अब अपना ढाढस बांधनेकी कोशीश करने लगा. उसकी आंखोमें देखनेकीतो हिम्मत नही बन रही थी उसकी.

लेकिन नही वह मुझे सिग्नलपर सिग्नल दे रही है ...
उसके सिग्नलका जवाब देना अब जरुरी है ...
नही तो मुझे वह क्या समझेगी ... नंपूसक ...
नही ... कुछ तो जवाब देनाही चाहिए ....

उसके दिमागमें सोच का चक्र जोर जोरसे घुम रहा था. वह अब अपने हर हरकतके परिणामके बारेमें सोचने लगा.

साली अपने गले पडी तो ? ...
बडी मुश्कील हो जाएगी ...
सिर्फ मजा मारने तक तो बात ठिक है ...
जाने दो ... बाद का बादमें देखा जाएगा ...
पहले ... उसके सिग्नकलका जवाब तो देते है ...

उसने उसकी चेहरेकी तरफ देखा. उसकी नशिली नजर अभीभी उसे पी रही थी. फिरसे झेंपकर उसकी नजर झुक गई. अब तो उसे अपने आपपर गुस्सा आने लगा था.

मुरख वह इतनी तुझे सिग्नल पर सिग्नल दे रही है ..
और तुम किसी निर्जीव वस्तूकी तरह उसके सामने सिर्फ बैठे हो ...
अपने हाथपैर फुलाकर ...
नही ... कुछतो करनाही चाहिए ...
अब लोहा गरम होकर लाल लाल हो चुका है ...
यही सही वक्त है ... घाव करनेके लिए ...
आखिर उसने तय किया... .
उसकी तरफ देखना तो मुमकिन नही है... .
उसकी आंखोमें देखनेपर ... न जाने क्यो सौ तपते सुरज की तरफ देखे जैसा होकर आखे चौध जाती है...
कमसे कम ... निची गर्दन रखकर भी मै बहुत कुछ कर सकता हुं...
मै उसका हाथ तो अपने हाथमें ले सकता हूं...

वह धीरे धीरे अपनी हिम्मत बटोरकर अपना हाथ उसके संदूकपर रखे हाथकी तरफ खिसकाने लगा. उसके हाथमें कंपन होने लगी थी. पैरभी अब कांपने लगे थे. वह अपने कांपते हाथको किसी तरह काबुमें करनेकी कोशीश करते हूए उसकी तरफ खिसकाने लगा. बाहर इतनी ठंडी  हवा बह रही थी फिरभी वह पसिना पसिना हो गया था. आखिर उसने बडी हिम्मत कर अपने कंपकपाते हाथका हमला उसके हाथपर बोल दिया. लेकिन ये क्या?... उसके पहलेही उसने अपना हाथ वहांसे झटसे उठा लिया था. वह एकदम मुरझा सा गया. उसे अपमानीत महसूस होने लगा था. तभी मधुराणीका आवाज आया,

" बापू ... तनिक  संभालके... थोडी कम लियो  ... नाही तो कल जैसे गटरसे उठाकर लाना पडेगा... "

गणेशने अपनी शर्मींदगीसे निची झुकी गर्दन उपर उठाकर देखा. मधुराणीके सामने दो - तिन दिनकी दाढी बढा हुवा एक वयस्क देहाती खडा था. उसने मधुराणीके सामने अपना हाथ फैलाया था. और मधुराणीने एक एकके दो सिक्के उसके हाथपर रख दिए थे. उस आदमीने वे सिक्के ले लिए और कुछ ना बोलते हूए वहांसे चल दिया.

अच्छा मतलब मधुराणीने वह आदमी आया था इसलिए झटसे अपना हाथ पिछे खिंच लिया था...
नहीतो उसे बडे कठिण समयसे गुजरना पड सकता था ...
मधुराणीने सतर्कतासे वह समय टाला था...

गणेशने सोचा. उसे सचमुछ उसकी तत्परताका बडा आश्चर्य लग रहा था.

सचमुछ अपनी आंखोमे खो जानेके बावजुद उसका सब तरफ खयाल था. ...
और मै ...
सचमुछ उसकी सतर्कताकी जितनी तारिफ की जाए उतनी कम थी...

अब उसके चेहरेसे अपमानके भाव मिटने लगे थे. उसने मधुराणीकी तरफ देखा. वह उसकी तरफ नटखटसी देखते हूए उठ गई.

" कौन था वह ?" वह अपने चेहरेके भाव छिपानेकी चेष्टा करते हूए बोला.

" ससूरा " वह बोली. " चलियो बहुत देरी हुई  गवा   ...  दूकान बंद करना पड़ेगा ... नहीतो लोग ..." वाक्य आधाही छोडते हूए वह दुकान बंद करने की तैयारी करने लगी.

" ठिक है मैभी निकलता हूं ..." वह खडा होते हूए बोला.

वह फिरसे उसकी तरफ देखते हूए नटखटसी हंस दी और अपने काममें फिरसे व्यस्त हो गई. मानो कुछ हुवाही ना हो. सचमुछ उसका एक  अवसर से दुसरे अवसरमें चपलतासे प्रवेश करनेका हुनर प्रशंशा करनेलायक था.
वह उसकी बिजलीसी तेज हरकतोंकी तरफ देखते हूए अपने कमरेकी तरफ मुडा. वह भारी कदमोंसे अपने कमरेकी तरफ जा रहा था. दरवाजेकेपास खडे होकर उसने एक बार मुडकर मधुराणीकी तरफ देखा. उसनेभी उसकी तरफ देखा. अबभी वह नटखट मुस्कान उसके चेहरेपर फैली हुई थी.

क्रमश:...

Will you love me in December as you do in May,
Will you love me in the good old fashioned way?
When my hair has all turned gray,
Will you kiss me then and say,
That you love me in December as you do in May?
--- BaylorBound James Walker 

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2 comments:

  1. mai aapka naya paathk hoon.maine aapka novel adbhut pada acha laga.madhurani ke newr post ka intzaar hai.....

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  2. shandar hai bhy bahut din baad aisa padh rha hu nice!!

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