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Hindi new book- Novel - Madhurani - CH-13 घर

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Hindi new book- Novel - Madhurani - CH-13 घर

The cure for boredom is curiosity. There is no cure for curiosity.
... Ellen Parr

आज शुक्रवार. गणेशको यहां आकर पांच दिन हूए थे. सुबह नहा धोकर वह जल्दी जल्दी अपना सामान समेटने लगा. उसकी हर हरकतमें एक उत्साह झलक रहा था. क्योंकी वह आज तालूकेकी जगह अपने घर वापस जा रहा था. अपने घर वापस जाकर अपने बिवी बच्चोंको मिलनेके मात्र कल्पना भरसे उसका सारा बदन रोमांचीत हो रहा था. और दुसरी खुशीकी वजह यह थी की पिछले तिन दिनसे मधुराणीके बारेंमे अपने बहक रहे मनपर अंकुश लगानेमें वह पुरी तरह कामयाब हुवा था. पिछले तिन दिनोंमे मधुराणीसे रुबरु होनेके काफी मौके आए थे. लेकिन एकबारभी, गल्तीसेभी उसने मधुराणीके आंखोमें आखें डालकर नही देखा था. अपने इस उपलब्धीके लिए उसे अपने बारेमें बडा गर्व महसुस हो रहा था. उसे इस बातका भी अहसास हुवा था की पिछले कुछ दिनोंसे उसके मचल रहे जीने भी अब मानो सुकुनकी सांस ली थी.

गणेश कपडे पहनकर लगभग तैयार हुवा था. तभी सामनेका दरवाजा बजा. उसने सामने जाकर दरवाजा खोला. सामने सरपर पगडीजैसा कपडा बंधा हुवा देहाती खडा था. उसने निचे धोती और उपर कपडेसे बना हुवा बनियन पहना था. गणेशने उसकी तरफ प्रश्नार्थक मुद्रामें देखा.

" मालिक सामान उठाने के लिए भेज रहत  " गणेशकी मुद्रा देखकर उस देहातीने कहा.

" किसने ?... सरपंचजीने ? "

'' जी.." उसने कहा.

गणेश दरवाजेसे हटतेही वह देहाती अंदर घुस गया. गणेशने कोनेमें रखे अपने बॅगकी  तरफ निर्देश करते हूए कहा -

'' वह उतनी एकही बॅग है .... वह लेकर तुम आगे निकलो... मै बस पिछेसे आया "

" जी "

उसने सरको बंधा हुवा कपडा छोडा. वह कपडा लपेटकर उसका गोलाकर बनाया और अपने सरपर रख दिया. फिर बॅग उठाकर उसने अपने सरके उपर उस गोलाकर बने लपेटे हूए कपडेपर रख दी. वह बॅग लेकर दरवाजेसे बाहर जाने लगा तब गणेश ने कहा, '' अरे... जरा संभालकर भाई ... नही तो उपर लगेगा "

वह नौकर दरवाजेसे जाते हूए थोडा झुका और बॅग लेकर बाहर चला गया. उसके जातेही गणेशने दरवाजा बंद कर दिया.

 गणेशने कमरेसे बाहर आकर दरवाजेको ताला लगाया. उसके चेहरेसे और उसके हर एक हरकतसे उत्साह उमड रहा था.

चलो अब एक बार बस स्टॉपपर  जानेसे पहले एक सिगारेट पिते है...

उसने सोचा. दरवाजेको ताला लगाकर वह मधुराणीके दुकानमें चला गया. अबतो उसे मधुराणीकी नजरोसे बचनेकी मानो आदतसी हो गई थी.

" एक ब्रिस्टॉल  " उसने एक रुपए का सिक्का मधुराणीके सामने रखे गल्लेपर रखते हूए कहा.

आज मधुराणी कुछभी नही बोली . नहीतो हरबार गणेशसे वह कुछ ना कुछ बोलती थी. गणेशको पता नही क्यो अपराधी जैसे लगने लगा.

मैने कुछ गल्ती तो नही कर दी...

या फिर उसका दिल तो दुखाया नही?...

फिर वह आज क्यो नही बोली?...

कही मुझपर गुस्सा तो नही होगई... ?...

या फिर मै घर जा रहा हूं इसकी वजहसे वह दु:खी तो नही महसुस कर रही है? ....

नही ... नही... ऐसे कुछ नही होगा...

मै फालतूही जरा जादाही सोच रहा हूं...

और उसने बोलनाही चाहिए ऐसा थोडी है ?....

आज नही होगा बेचारीका मूड....

यह तो मेरी जबरदस्तीही होगई ...

उसने एकसाथ अपने मनमें भिड करते विचारोंको झटकनेकी कोशीश की. मधुराणीने चुपचाप अपने पिछे रॅकमें  रखा ब्रिस्टॉलका पाकिट  निकाला और उसे खोलकर उसमेंसे एक सिगारेट निकालते हूए गणेशके हाथमें थमा दी. अचानक गणेशने चौंककर उसकी तरफ देखा. सिगारेटके अलावा औरभी किसी चिजका अहसास गणेशके हाथको हुवा था. जब वह संभला तब उसे अहसास हुवा की मधुराणीने गणेशके हाथपर सिगारेट थमाते हूए जानबुझकर हल्केसे उसका हाथ दबाया था. या फिर गल्तीसे दब गया था. ? यह जाननेके लिएही उसने उसकी तरफ देखा था. उसकी चेहरेपर एक मादक, घायल करनेवाली, रहस्यमय और उतनीही अर्थपूर्ण हंसी फैली हुई थी. गणेश उसकी उत्कट नजरोंमें उलझ गया था. उसका उसकी आखोमें आखें ना डालनेका दृढ संकल्प किसी अत्तर की तरह हवामें उड गया था. उसका दिल जोर जोरसे धडकने लगा. एकही पलमें सारा बदन पसिनेसे लथपथ हो गया. हडबडाकर उसने सिगारेट ली और वह बस स्टॉपकी दिशामें चलने लगा. उसको चलते हुए एक एक कदम आगे डालनाभी बडा भारी महसुस हो रहा था. उसका एक मन कर रहा था की घर जाना रद्द कर दूं.  लेकिन नही ... सरपंचके नौकरने अपना सामान आगे ले जाकर बस स्टॉपपर रखा था. अब अगर मै जाना रद्द करता हूं तो न जाने किसीको कुछ शक होगा... वह वैसेही भारी पैरसे चलते हूए नुक्कड तक चलता रहा. नुक्कडसे मुडते हूए कितनाभी अपने मनको नियंत्रीत करनेके कोशीशके बावजुद उसने मुडकर एक बार मधुराणीकी तरफ देखा. वह भी आमंत्रित करती हुई निगाहोंसे उसे देख रही थी. उसके नजरोंमें जुदाईका गम, और एक अदृष्य आकर्षित करनेवाली शक्ती थी. भारी मनसे वह बस स्टॉपकी तरफ निकल पडा. अब मुडकर देखाभी तो वह दिखने वाली नही थी, फिरभी उसने मुडकर देखा. वह उसको नही दिखाई दे रही थी. लेकिन उसने महसुस किया की वह उसके साथ साथ आ रही थी - दिल के किसी कोनेमें घर बनाती हूई !


क्रमश:


The cure for boredom is curiosity. There is no cure for curiosity.

... Ellen Parr

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Hindi sahitya - Novel - Madhurani CH-12 नजरोंके तिर

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Hindi sahitya - Novel - Madhurani CH-12 नजरोंके तिर

Some people like my advice so much that they frame it upon the wall instead of using it.
-Jordon R. Dickson


सुबह काफी देरसे गणेश निंदसे जागा. आज गणेशको यहां आकर पुरे दो दिन हो गए थे. उसने आंखे मिचकाकर देखा तो सुरज की किरणे खिडकीसे कमरेके अंदर झांक रही थी. बाहरभी लोगोंकी आवाजें आ रही थी. देर राततक गणेश सो नही पाया था. कल रातभी यही हाल था. रातमें रह रहकर मधूराणीकी उसके दिलको आरपार करने वाली नजरें उसे सो नही दे रही थी. वह एकदमसे उठ खडा हुवा और जल्दी जल्दी खिडकीके पास चला गया. खिडकीसे दुकानपर बैठे मधुराणीकी एक झलक दिखनेके बाद कहा उसके दिलने सुकुन महसुस किया. उसका इधर ध्यान नही था. वह अपने काममें मग्न थी .

ये मुझे क्या हो रहा है ?.... गणेश सोचने लगा.

पहले कभी मुझे ऐसा नही हुवा था ....

किसी स्त्री का इतना आकर्षन !...

ये कुछ ठिक नही ...

शायद अपनी बिवीके विरहके कारण यह होता होगा ....

लेकिन क्या इसे विरह कहा जा सकता है ?...

मुझे यहां आकर मुश्कीलसे दो या तिन दिन तो हूए है ....

हो सकता है.... अपनोकी कमी उनसे जुदा होनेपरही महसूस होती है....

वह धीरे धीरे कदम बढाते हूए हूए अपने बॅगके  पास जाने लगा. लेकिन उसका मन खिडकीसे हटनेको तैयार नही था. भारी कदमोंसे वह बडी मुष्कीलसे अपने बॅगके पास चला गया. बॅग खोली. बॅगसे उपरका सामान उठाकर बॅगके सबसे निचे हाथ डालकर उसने अपना, बिवीका और उसके लडकेका फॅमीली फोटो  बाहर निकाला. फिर न जाने कितनी देर तक वह उस फोटोको बडी प्यारसे निहारता रहा .

इतनी प्यारीसी बिवी होनेके बाद मेरा मन ऐसे विचलित क्यो होता है ?...

नही. मुझे मेरे मनपर काबू रखना जरुरी है ....

उसने अपना इरादा पक्का किया.

गणेश नहा रहा था. अपने मन का इरादा और निर्धार पक्का करनेके बाद उसे अब अच्छा लगने लगा था. लेकिन यह इरादा टिकना चाहिए. नहाते वक्त उसके दिमागमें एक तरकिब आ गई .

ये सारा जादू मधुराणीके आखोंका और उसकी दिलको भेदनेवाली नजरोंका है ....

अगर मैने उसकी नजरोसे नजर मिलाना टाला तो कैसा रहेगा?...

तो शायद मेरा इरादा टिकना मुमकिन है ...

मुमकिन नही ... मुझे मेरा इरादा टिकानाही पडेगा...

इतनी देर तक हौले हौले नहा रहे गणेशको अब जल्दी हो गई थी. अभी नहाना धोना निपटाकर मै उसकी दुकानमें जाता हूं. यूंभी उसे घरमे लगनेवाली कुछ महत्वपुर्ण चिजे खरीदनी थी. उसने तय किया की अब उसके दुकानमें जाना है. कुछ सामान खरेदी करेंगे. वह अगर बोली तो --- उसे बात भी करुंगा. लेकिन कुछ भी हो उसकी आखोंसे आंखे नही मिलाऊंगा.

तो होगया तय ....

नहाना धोना निपटाकर गणेशने झटसे कपडे पहन लिए. दिवारपर टंगा थैला निकाला और जल्दी जल्दी निकल गया - मधुराणीके दुकानपर. जाते हूए उसके मन में एक विचार आया.

यह कैसी जल्दी ...

यह कैसी तडप !...

उसकी तरफ देखनेकी भी तडप और अब उसके नजरोंको टालनेकीभी तडप ....

सबकुछ कैसे अजिब ही लग रहा था. 

खाली थैला एक हाथमें लेकर गणेश उसकी नजरोंकों प्रयत्नपुर्वक टालते हूए उसके गल्लेके सामने खडा हो गया. उसने उसके हाथमें थमा थैला नौकरके हवाले कर दीया.

" बोलो साबजी  ... क्या मांगता है  " मधुराणी गणेशके आंखोमें आखे डालकर बोली.

गणेश उसकी गहरी नजरोंसे बचते हूए उसकी सरसे उपर पिछे देखते हूए बोला, " यह लीस्ट  है "

उसने चिजोंकी लीस्ट मधुराणीके हाथमें दी.

" साबजी  .. हमरे दुकानमा  लिस्टवा  लेकर आनेवाले आप पहलेही गिराइक  होंगे जी  " उसने लिस्ट हाथमें लेकर उलट पुलटकर देखते हूए कहा.

फिर लिस्ट उसे वापस करते उसने कहा, '' तो फिर आपही पढोनाजी  जोरसे... मैने पढा क्या या  आपने पढा एकही बात हुई  गवा "

वह कागज वापस लेकर पढने लगा .

" लक्स  एक .. रिन  एक... चहापत्ती सव्वाशे ग्रॅमका एक पॅक .. शक्कर एक किलो ...अगरबत्ती एक पॅक ... अच्छा दो जरा ... सुगंधीत ... "

नौकर जल्दी जल्दी सामान निकालने लगा.

"  थोडा  धीमे जी  .... उसे सामान तो निकालवा देइयो .. नाही तो  गडबड हो जावेगी …  उस दिन की तरहा  .."
मधुराणी मधूर सी हंसते हूए बोली. उसके मोतीजैसे सफेद दांतकी तरफ देखकर वहभी हंस दिया. लेकिन वह उसकी नजरोंसे प्रयत्नपुर्वक बचता रहा.

नौकरने सारा सामान थैलेमें भरकर थैला गणेशके हाथमें थमा दीया. तभी वहा सदा आगया. गणेशने सदाकी तरफ देखकर देखा अनदेखा कर दिया. परसोंकी गालीयां वह अबभी भूला नही पाया था. सदा खुद होकर गणेशके पास गया.

" नमस्कार साबजी  " सदाने उसे अदबके साथ अभिनंदन किया. गणेशने सदाकी तरफ ध्यान नही दिया. सदाका उस रातका रुप और अभिका रुप इसमें जमिन अस्मानका अंतर था. इसलिए सदाके साथ किस तरहसे पेश आया जाए गणेशको कुछ समझ नही रहा था. 

गणेश अपना सामानका थैला लेकर जाने लगा.

" लावोजी  इधर देइयो ... मै लेता हूं थैला '' सदा गणेशके हाथसे थैला लेते हूए बोला.

'' नही ... रहने दो'' लगभग उसके हाथसे थैला छिनकर लेते हूए गणेश बोला.

मधुराणी खिलखिलाकर हंस पडी. गणेश जैसे अपने कमरेकी तरफ जाने लगा वैसे मधुराणी बोली -

" फिर्फीरर्फ कर्फबर्फ आर्फावोर्फोगेर्फ़े "

" क्या ... क्या कहा ?" गणेश पलटकर लेकिन उसके नजरोंको टालते हूए बोला.

" कुछ नाही  .... लगता है हमरी बोली आपकोभी पढवानी पडेगी   ... " मधुराणी मटककर बोली.

गणेशको उसके इस मटकनेसे उसकी आखोंमे देखनेका पलभरके लिए क्यों ना हो प्रलोभन हुवा.

पर नही ...

नजरोंके तिर निष्प्रभ हूए देखकर शत्रूपक्षने यह दुसरा हथियार इस्तमाल करनेकी सोची है ... शायद...

गणेश बडी मुश्कीलसे अपने आपपर काबू पाकर, सदाको टालते हूए अपने कमरेकी तरफ चल दिया.
रसद से भरा हूवा थैला लेकर कमरेमें प्रवेश करनेके बाद प्रथम गणेशने सामनेका दरवाजा बंद कर दिया. खिडकीसे उसने झांककर बाहर देखा. सदा चला गया था. उसने राहत की सांस ली. फिर उसका ध्यान मधुराणीकी तरफ गया. मधुराणी अपने काममें व्यस्त दुकानके गल्लेपर बैठी थी. गणेशने खिडकीसे हटकर थैला एक कोनेमें रख दिया; शर्टके उपरी जेबसे सिगारेटका  पाकिट निकाला. उसमेंसे एक सिगारेट निकालकर उसने वह माचिससे सुलगाई. वह अब सिगारेटके लंबे लंबे कश भरने लगा. वह इस बातसे खुश था की उसने दुकानमें मधुराणीकी आंखोमें आखे डालकर एक बारभी नही देखा था. उसके दिलमें उठी कसकभी अब उसे थमी थमीसी और ठंडी पडी महसुस हो रही थी. उसे उसकी नजरोंके सारे तिर निष्प्रभ करनेका विजयी आनंद हो रहा था.

क्रमश: ...

Some people like my advice so much that they frame it upon the wall instead of using it.
-Jordon R. Dickson

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Hindi books - Novels- Madhurani - CH-11 कनेक्सन ( connection )

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You must be the change you wish to see in the world.
-Gandhi



एक कोनेमें खडे होकर गणेश सिगारेट  के दिर्घ कश मारने लगा. तब कहा उसके जी को सुकुन महसुस हो रहा था. उसके बगलमेंही एक जवान लडकोंका समुह सिगारेट पीनेमें लगा हुवा था. अंधेरेका फायदा उठाकर वे किसी भूखे भेडीएकी तरह मधुराणीके दुकानकी तरफ देख रहे थे. लेकिन गणेश उनके बगलमेंही कोनेमें खडा होनेसे उसे सब दिखाई दे रहा था.

" ए राम्या जरा कनेक्सन  देरे..." उनमेंसे एक अपने मुंहमें सिगारेट पकडकर उसे जलानेके लिए दुसरेसे बोला.

दुसरेने अपने मुंहमेंसे जलती सिगारेट उसके हाथमें थमा दी. उसने वह जलती हुई सिगारेट अपने मुंहमें पकडे सिगारेटके सिरेसे लगाकर दो चार जोरसे कश लगाकर सुलगाई और अपने दोस्त की जलती सिगारेट उसे वापस कर दी.' कनेक्सन' का मतलब समझकर गणेश मन ही मन मुस्कुराया. लंबे लंबे गहरे कश मारनेसे गणेशकी सिगारेट जल्दीही खतम हूई. उसने जेबसे दुसरी सिगारेट निकालकर उसे पहली की सहाय्यतासे सुलगाया -- मतलब उन देहाती लडकोंके अनुसार 'कनेक्शन' दिया. फिरसे वह मुस्कुराया. तभी गणेशको किसीका जोरजोरसे चिल्लानेका या फिर झगडने का आवाज आया.

" उस ग्रामसेवक के माका ---- ... "

" मादर...द साला "

गणेशके नामका कोईतो उध्दार कर रहा था. उसकीतो दिलकी धडकनही तेज हो गई. पहले दिनही उसे कोई गालीयां दे रहा है यह सुनकर वह विचलीत हो गया. शायद पहले वाले ग्रामसेवकको कोई गालीयां दे रहा होगा. उसने सोचा और जिस दिशासें वह आवाजे आ रही थी उस दिशामें देखने लगा.

पहलेके ग्रामसेवककोही जो भी है वह गालीयां दे रहा होगा...

वैसेभी पहलेके ग्रामसेवकाका और गांव के लोगोकां कुछ खास नही जमता था - जो उसे आजही पहलेके ग्रामसेवकसे पता चला था. ...

उधर सामने गहरा अंधेरा था. शायद सामने उस गलीके आगे, सरपंचके घरके पास कोई तो झगड रहा होगा.

" सालेका हुयी गवा शुरु ... रामायण... " बगलमें खडे लडकोंके समुहसे कोई बोला.

मतलब पहलेके ग्रामसेवक के बारेमें अबभी भला बुरा कहा जा रहा था... गणेशने सोचा.

चलो .... वहां जाकरतो देखते है... क्या झमेला है? ....

वह जिधरसे गालीयोंका आवाज आ रहा था उस दिशामें चलने लगा. गणेशने देखा की एक आदमी अंधेरेमें खडे होकर ग्रामसेवकको गालीयां दे रहा है. उसने जरा नजदिक जाकर देखा तो वह तो हक्का बक्का और दंग रह गया. क्यों की. वह सदा था. सुबह उसका सामान उठाकर उसे सरपंचके घर ले जानेवाला सदा! उसे तो अबभी अपने आखोंपर विश्वासही नही हो रहा था. उसके बोलनेके ढंगसे और हावभावसे यह स्पष्ट था की वह पीकर टून्न हो गया था. गणेश उसे दिखते ही उसने अपना रुख गणेशकी तरफ मोड लिया.

" ई  देखो... ई  ग्रामसेवक ... खुदको कोई लाटसहाब समझता है.... ... इसकी तो  मांका --- .... एस्टी स्टँडसे  मुझसे  सामान उठवाया  ... मादर ..द साला. "

सिधे सिधे गणेशपरही गालीयोंकी बरसात होते देखकर पहलेतो वह उलझन में पड गडबडा गया. उसे इस स्थितीसे कैसे निपटा जाए कुछ समझ नही आ रहा था. सदाका उसपर गालीयोंका हमला जारी था.

नही अब बहुत हो चुका....

गणेश का गुस्सा अब सातवे आसमानपर चढने लगा था. सदाके गालीयोंकी तीव्रताही इतनी थी की कोईभी भडक जाए. गुस्सेसे बेकाबु होकर गणेश अब सदाकी तरफ चलने लगा. अब उसे उसके कानके निचे लगानेकी जल्दी हो गई थी. चलते हुए गुस्सेसे उसका पुरा बदन गरम होगया था. उसका चेहरा लाल लाल होगया था. होठ थरथरा रहे थे. हाथ पैर भी कांप रहे थे. अब वह सदाके एकदम सामने जाकर खडा हो गया था. फिरभी सदाके बर्तावमे कुछ तबदीली नही आई. उसका जोर जोरसे गालीयां देना जारी ही था. गणेशने अब अपने मन को कठोर कर ठान लिया की, जो होगा देखा जाएगा, लेकिन इस आदमीको मै अब बहुत धोऊंगा. उसने अपना दाया हाथ उठा लिया और वह अब जोरसे सदाके गालपर तमाचा दे इसके पहलेही पिछेसे उसके कंधेपर किसीने हाथ रख दिया. उसने पलटकर देखा. वह सरपंचजी थे.

" गणेशराव ... थोडा इधर बगल में आइयो  "

सरपंचजी गणेशके कंधेपर हाथ रखकर उसे एक तरफ ले गए.

" अरे गणेशराव... सुबे   इसने आपको मेरे घर लाया ... तभी मुझे वह बात खटक गई रही ... "

" क्यों क्या हुवा ? " गणेशने असमंजसमें पुछा.

" ये  सद्या एकबार इसने पी ली तो इका अपने उपर कोई काबु ना रहे है ... फिर उसे कुछ समझता नाही ... फिर दिनमें जिसे जिसे मिला उन सबको यह रंडवा गालीयां बके  है... "

" बडी अजिब केस  दिखती है ... " गणेश अपने माथेपर आया पसिना पोछते हूए बोला.  " इसका कुछ बंदोबस्त क्यो नही लगाते हो आप लोग ... " वह आगे गुस्सेसे बोला.

"  ई क्या कहते हो गणेशराव... सुबे  तो बोल रहे थे बहुत सज्जन आदमी  है " सरपंच उसे छेडते हुए बोले.

" हां कहा तो था... लेकिन इतनाभी सज्जन होगा ऐसा कभी सोचा नही था. " गणेश जबरदस्ती हंसनेकी चेष्टा करते हूए बोला.

क्रमश:...

You must be the change you wish to see in the world.
-Gandhi

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Hindi Kadambari - Novel - Madhurani - CH-10 व्हिल्स

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The trouble with the rat race is that even if you win, you are still a rat.
-Lily Tomlin


गणेशकी पुरी दोपहर खराडे साहब की बकबक सुननेमें और ऑफीसकी सारी फाईले  देखनेंमें गई. अपेक्षानुसार आज पुरा दिन चार्ज हँडओव्हर  नही हुवा था. शायद और एक दिन लगनेकी उम्मीद थी. और खराडे साहबकी बकबक अगर ऐसीही चलती रही तो शायद दो दिनभी लग सकते थे. खराडे साहबके बातोंके सुरसे एक बात साफ थी की उनकी यहां और कुछ दिन रहनेकी इच्छा थी. क्योंकी उनके गावसे यह गांव नजदिक होनेके कारण यहां नौकरी करना उन्हे सुविधाजनक था. उधर गांवमें अपनी खेतीकी तरफ भी वे खयाल दे सकते थे. उनकी बातोसें और एक बात पता चली की उनका तबादला  करनेमें यहांके गांववालोका बहुत बडा हाथ था. इसलिए उनकी बातोंमें गाववालोंके लिए कुछ जादा आदर नही दिखाई दे रहा था.

शामको कामसे काफी थकनेके बाद गणेशने अपने कमरेमें आकर थोडा आराम करनेकी सोची और फिर आरामके बाद रातके खानेके लिए फिरसे सरपंचजीके यहां तो जानाही था. उसने कमरेका ताला खोला. अंदर जाकर दरवाजेके पिछेका इलेक्ट्रीक का बटन  दबाया. लाईट  जल गया लेकिन डीम .

साला देहातमें ये इलेक्ट्रीकका  झमेला है ही ...

भले डीम क्यों ना हो ... इलेक्ट्रीक  तो है ना ...

वही बहुत होगया....

सरपंचके नौकरने गद्दी डालकर उपर चद्दर वैगेरे डालकर पुरी तरह से तैयार की हुई देखकर उसे अच्छा लगा. कमरेमें आते हूए सामने मधुराणीके दुकानकी तरफ देखना उसने जानबुझकर टाला था. अंदर आतेही उसने सामनेका दरवाजा अंदरसे कुंडी  लगाकर बंद कर दिया और खुदको सोनेके लिए बिस्तर  के हवाले कर दिया. वह बिस्तरपर अचलसा पडा रहा. वह बिस्तरपर देखनेकोतो अचल सा पडा था लेकिन उसके विचार रुकनेको तैयार नही थे. तन थक गया था लेकिन दिमाग थकनेके लिए तैयार नही था. वह सोचने लगा....

आज पुरा दिन सरपंचजीके साथ घुमनेमे और आफिसका काम करनेमें और खराडे साहबकी बकबक सुननेमें चला गया था. लेकिन ऐसा एकभी पल नही था की जब मधुराणी उसके मष्तीश्क के पटल से हट गई हो. पुरे वक्त वह उसके साथ उसके दिमागमें थी. उसकी वह उत्कट आंखे, उसकी वह शरारती हंसी, रह रहकर उसकी आंखोके सामने आती रही थी. और अबभी उसका वही हाल था. उसने उसे अपने दिमाग से झंझोरकर निकालनेके प्रयासमें करवट बदली. लेकिन उसके विचार थे की थमनेका नाम नही ले रहे थे. उसने सोचा की एखाद सिगरेट  पी जाए ... तो शायद सुकुन मिले... उसे दिनमें कमसे कम एक या दो सिगरेट पिनेकी आदत थी. और आज उसने एकभी नही पी थी. लेकिन सिगरेट  पिना मतलब साथमें दुकानपर जाना आही गया. लेकिन बादमें उसे क्या लगा क्या जाने, वह झटसे उठ गया.

मै उससे ऐसे कितने दिन बचने वाला हूं.....

किसी समस्यासे बचनेके लिए उससे दुर भागनेसे उसका सामना करना कभीभी उचीत होता है...

वह उठकर खडा हो गया, बाथरुममें  गया. मटकेसे ठंडा-ठंडा पाणी लेकर हथेलीसे मुंह पर छिडका. बगलमें पितलका लोटा रखा था. उससे मटकेमेंसे पाणी लेकर उसने अपने हाथ पैर पर डाला. फिर वैसेही वापस आकर अपने बॅगके  पास चला गया. बॅग खोली. बॅगमध्ये उपरही साफ सुथरे तरीकेसे रखा हुवा तौलीया  था. उसने वह निकाला. मुंह पोंछ लिया. मुंह पौछते हूए टावेसे आ रही वाशींग पावडर  की सौंधी सौंधी खुशबुसे उसके दिलको ठंडकसी महसूस हूई. कुछ क्षण के लिए क्यों ना हो उसे अपने बिवीकी याद आगई. उसने बॅगसे सारे कपडे उठाकर बॅगकी तहमें सबसे निचे देखा. वहां उसका बिवी और लडकेके साथ खिंचा फॅमीली फोटो  रखा हुवा था.

दूर जानेके बादही अपने लोगोंका महत्व महसुस होता है...

उसने सोचा और फिरसे सारा सामान बॅगमें ठिकसे रख दिया. अब वह खडा होकर हाथपैर पोछने लगा. हाथपैर पोछनेके बाद उस गिले तौलीएको कहां सुखनेके लिए टंगाया जाए इसके लिए जगह ढूंढने लगा. दिवार पर उसे एक जगह एक अंकुडा दिखा. उसने वह तौलीया वहां सुखनेके लिए टंगा दिया. तौलीया लटकाते हूए उसका ध्यान खुली खिडकीसे बाहर दुकानकी तरफ गया. दुकानपर अब काफी भिड  इकठ्ठा हो गई थी. शाम का वक्त होनेसे शायद. चबुतरेपरभी लोग समुह बनाकर बाते कर रहे थे. उन समुहमें कोई बिडी फुंक रहा था तो कोई चिलम भर रहा था तो कोई तंबाकू मसल रहा था. दरवाजेके पास जाकर उसने चप्पल पहन ली और दरवाजा खोलकर , दरवाजेको ताला लगाकर, वह बाहर निकल गया. बाहर चबुतरेपर बैठे काफी लोगोंकी चिकित्सक नजरोने उसे घेर लिया. फिरसे लोग अपने अपने कामोंमें मशगुल होनेके बाद वह एक समुहके करीब चबुतरेपर अकेलाही बैठ गया. वह समुह शादीको आए जवान लडकोंका था. लडके छुपछुपकर दुकानके गल्ले की तरफ देखनेमें मशगुल थे. गणेश, उसका उस लडकोंकी तरफ बिलकुल खयाल नही ऐसे जताते हूए वहां बैठा रहा.

" इसेतो  खेतमाँ  ले जाकर  मसलना चाहिए  .. " उस समुहसे एक मधुरानी की तरफ देखते हूए बोला.

" देखियो  जादा मसलेगा तो घुटने फुट जावेंगे  " दुसरेने कहा.

फिर सारा समुह जोरसे हंसने लगा.

' शीशी .... ए लडके तो बहुतही घटीया किस्म के लगते है... ' गणेशने मनही मन सोचा.

और वह वहांसे उठकर मधुराणीके दुकानके सामने जाकर कब खडा हुवा उसेभी पता नही चला. मधुराणी उसकी तरफ देखकर मंद मंद मुस्काई. दिनभर दुकानपर बैठनेके बादभी ना उसकी हरकतोंमें ना उसकी हावभावोंमे कुछ थकावट दिख रही थी. अबभी वह किसी खिले हूए फुलकी तरह तरुण ताजा लग रही थी.

" बोलो साबजी  क्या दूं " उसने कहा.

" थोडी एक वील्स  चाहिए थी... "

" थोडी क्यूं... पुरीही ले लियो जी "  उसने मजाकिया अंदाजमें कहा और खिलखिलाकर हंसने लगी.

गणेशभी उसके साथ हंसने लगा.

" ए एक व्हील देइयो बाबूजी को  " उसने अपने नौकरको फर्माया.

वह नौकर लडका एक एक ग्राहक को सामान देनेमें व्यस्त था.

मतलब उसे और थोडा समय लगने वाला था.....

गणेशने अपने आसपास - इर्दगीर्द एक नजर दौडाई. वहां औरभी कुछ ग्राहक खडे थे. उनमेंसे एक 7-8 सालकी सुती मटमैला, जगह जगह फटा और मरम्मत किया हुवा फ्रॉक  पहने हूए एक प्यारीसी लडकी खडी थी. उसने सरको काफी मात्रामें तेल लगाया हुवा था और उसकी छोटी छोटी दो चोटीयां मैले रिबनसे बंधी हुई थी. उसके हाथके उंगलीमें रस्सीसे बंधी हूई एक कांच की शीशी लटकी हूई थी.

" ताई... एक छताक गोडतेल " वह लडकी मधुराणीकी तरफ देखकर बोली.

मधुराणीभी उसकी तरफ बडे लाड प्यारसे देखते हूए बोली.

" देती हूं ... गुडीया थोडा रुकियो तो  ... " मधुराणी उसका गाल पकडते हूए बोली.

" बर्फहुर्फुतर्फ दिर्फीनोर्फो बार्फादर्फ दिर्फीखीर्फी " मधुराणी इतने जल्दीमें उसे कुछ बोली.

" मार्फामार्फाकेर्फे गार्फावर्फ गर्फईर्फी थीर्फी ' उस लडकीनेभी कुछ जवाब दिया.

गणेश मंद मंद मुसकाते हूए सब देख सुन रहा था. लेकिन उन्होने क्या कहा गणेश के कुछभी समझमें नही आया था.

" क्या?... क्या बोले आप लोग ...? " गणेशने उत्सुकतावश पुछा.

" कुछ नाही ... वह हमरी खास बोली  है जी ... " मधुराणी नटखटसी हसती हुई उस लडकीका फिरसे गाल पकडती हुई बोली.

शायद वह उनकी कोई सांकेतीक बोली थी. गणेशको याद आया... उसके बचपनमेंभी उसकी बहने ऐसीही कुछ अजीब भाषामें उसके सामने बोलती थी. और उसने पुछा तो उसे कुछ एक नही बताती थी. उसने बहुत कोशीश की थी, लेकिन उसकी बहनोंने आखरी तक उसे उस भाषा का राज नही बताया था.

उस छोटे लडकीके बगलमें एक धोती पहनी हूई बुढी महिला खडी थी. और उसे लगकर एक साडीसी धोती पहनी हुई और एक, शायद मुलाजीम  महिला खडी थी. आसपास देखते हुए अनायासही गणेश का खयाल उपर आसमानकी तरफ गया. काफी अंधेरा छा गया था. तभी रास्तेपर सिमेंटके पोलपर टंगे इलेक्ट्रीक  दिए जल गए. गणेशने गौर किया की चबुतरेपर बैठे काफी लोगोंने एक हाथसे क्यो ना हो उन दियोंका अभिवादन किया था.
गणेश फिरसे अंतर्मुख अपनी सोच शृंखलामें लिन हो गया. उसने महसुस किया की अब जब वह मधुराणीके सामने खडा था और उसकी तरफ देख नही रहा था तब उसके दिलकी बेचैनी थोडी कम सी हुई थी.

" ये लो साबजी  "

उसकी मधूर स्वरसे वह फिरसे अपनी सोच से बाहर आ गया.

मधुराणीने उसके सामने लकडीके बक्सेपर रखे व्हील  साबुनकी तरफ देखकर गणेश जोर से हंस पडा.

" क्या हुवाजी  ? " उसनेभी हंसकर पुछा.

" व्हील साबन नही... वील्स सिगारेट मांगी थी मैने. "

" अच्छा अच्छा ... साबजी  ... ई हां ब्रिस्टॉल  और चारमीनारही मिलती है ... व्हील ... या क्या कहते है उसको ... व्हील्स ई हां कोई नाही  इस्तेमाल करत " उसने कहा.

" अच्छा तो एक ब्रिस्टॉल दो ... और एक माचीसभी देना "

" ए साबजी  को ब्रिस्टाल और एक माचिस देइयो  " उसने अपने नौकरसे कहा.

वह एक एक सामान के बारेमें बोलती और वह नौकर सिर्फ सुन लेता था. ना 'हा' कहता ना 'ना'. लेकिन उसका बराबर ध्यान रहता था. नौकरने ब्रिस्टॉल और माचिसके बारेमें सुना लेकिन अब उसने उस छोटे बच्चीसे वह कांच की शीशी ली - तेल देने के लिए.

" अरे इनको पहले देइयो ... कितनी देर से खडे है बेचारे... " उसने उसे टोका.

उस नौकरने सिर्फ उसकी तरफ देखा और वह शीशी वैसेही अपने हाथ मे रखकर एक ब्रिस्टॉलका पाकीट और एक माचिस लेकर गणेशके हाथमें थमा दी.

क्रमश:...

The trouble with the rat race is that even if you win, youe still a rat.
-Lily Tomlin

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