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Hindi world of novel books - Madhurani - CH-8 कमरा

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Hindi world of novel books - Madhurani - CH-8 कमरा

When hungry, eat your rice; when tired, close your eyes. Fools may laugh at me, but wise men will know what I mean.
in-Chi
खाना-वाना होनेके बाद दोपहर गणेश और सरपंचजी घरसे बाहर निकले. उनके साथ एक नौकरभी था.

"सबके  पहले आपके रहनेका ,  खानेपीनेका इंतजाम करना जरुरी है... हर बार अपडाऊन करना आपसे ना ही हो पावे गा ... "

" हां मुझेभी ऐसाही लगता है ... कमसे कम यहां हूं तबतक एखाद कमरा रहनेके लिए मिलता है तो बहुत अच्छा होगा "

" मिलेगा ना... जरुर मिलेगा... उधर हमरा और एक घर है .... वहां अभी कोई ना ही रहत... लेकिन वहां हम सारा खेतीका सामान समान  जैसे की हल, दरांती, कुल्हाडी, और खेतीमें लगनेवाली जंजीरे, रखत है ... लेकिन सामनेके कमरेमें आप आरामसे रह पावे  है... . "

" हां ... उतनी ही रखवालदारी हो जावेंगी हमरे सामान सुमानकी ... " सरपंचजीका नौकर बिचमेंही बोला.

सरपंचजीने उसकी तरफ कडी नजरसे देखते हूए उसे चूप रहनेका इशारा किया.

साले बेवकुफ़ नौकर कभी नही सुधरेंगे ... उन्हे कब कहां क्या बोलना चाहिए.. थोडा भी दिमाग नही है....
सरपंचजीने सोचा.
गणेशरावको क्या लगा होगा... की मै उन्हे रखवालीके लिए अपने घरमें पनाह दे रहा हूं ...

" लेकिन सरपंचजी ... मै जादा कुछ किराया नही दे सकुंगा. "

" अरे आप उसकी चिंता मत किजीयो ... हम क्या आपसे किराया लेवेंगे ? " सरपंचजीने गणेशके पिठपर थपकी लगाते हूए कहा.

" नही ... नही ... ऐसे कैसे... जो कुछ भी होगा आप बता दिजीए.. "

'' अरे गणेशराव ये  क्या शहर है ....  आपसे किराया लेवेंगे  तो ... सारे गांव मे हमरी नाक कट जावेंगी ... "

चलते हूए अबतक गणेशके खयालमें आ चुका था की यह वही रस्ता है जिससे वे बसस्टॉपसे सरपंचजीके घरकी तरफ जाते हूए गुजरे थे.

" सुबह हम इधरसेही गुजरे थे... "

" हां ... हमरा घरभी इधरही आवे  है ... हमरे घरके सामनेसेही  गुजरे होंवेंगे . "

वे तिनो फिरसे सुबह जिस दुकानके सामनेसे गुजरे थे उस दुकानके सामने आ गए. दुकानके गल्लेपर अबभी वही सुंदर युवती बैठी हुई थी. उसकी तरफ देखकर ना जाने क्यो गणेशके शरीर से एक अजिबसी सिरहन दौड गई. उसकी दिलकी धडकन तेज होने लगी थी. अभीभी उस युवतीका ध्यान उसकी तरफ नही था. लेकिन उसकी दिल मोह लेनेवाली तेज बिनदास हरकते देखने लायक थी.

" वह हमरी मधुराणीका दुकान " गणेशके देखनेका रुख देखकर सरपंचजीने कहा.

" अच्छा .. अच्छा " गणेश ज्यादा दिलचस्पी ना दिखाते हूए बोला.

" और उसकी दुकानके एकदम सामने है हमरा घर " सरपंच उस दुकानके सामने स्थित एक घरके सामने खडे होते हूए बोले.

सरपंचजीके बोलनेमें शायद कुछ शरारत छिपी हुई थी... कमसे कम गणेशको वैसे लगा था.
और सरपंचजीका दुसरा घर मतलब, इट-पत्थर और मिटी से बने हूए 3-4 कमरे थे. घर उपरसे लोहेके टीन - छप्परसे ढंका हुवा था. और वे टीन नटबोल्टसे फिट किए होनेसे छप्परको बिच बिचमें छोटे छोटे गढ्ढे दिख रहे थे. सरपंचजीने नौकरके हाथमें चाबियां थमाते हूए उसे सामनेका ताला खोलनेका इशारा किया. नौकरने चाबी लेकर जल्दीसे सामनेके दरवाजेपर लगा हुवा ताला खोला. तभी गणेशके बगलमें ऐसी कुछ हरकत हूई की वह की वह चौंक गया. देखता है तो लगभग उसके शरीर को स्पर्ष करती हूई मधुरानी उसकी बगलमें आकर खडी हो गई थी.

" नमस्कार सरपंचजी " मधुराणीका मधुर स्वर गुंजा.

कितना मधूर और आंदोलीत करनेवाला स्वर था वह...

" नमस्कार " सरपंचजीने पलटकर उसके नमस्कार को प्रतिसाद दिया.

" बहुत दिनों बाद दिखाई देवे  है ... . क्या घरको रंग देनेका सोच तो नाही रहियो ...  ऐसी बात होवे तो हमें बताई दियो ... हमरें दुकानमें पडी   है कुछ रंगरोटी  " वह सरपंचजीसे बोली.

गणेश एकदम उसके करीब खडा उसकी हर अदा, उसके बोलनेका ढंग, उसकी हर हरकत निहार रहा था. बोलते वक्त उसकी रसीले गुलाबी होठोंसे झलक रहे उसके सफेद दांत विषेश मादक लग रहे थे. गणेश अपने होश हवास खोकर उसकी हर अदा निहार रहा था.

" अरे नाही ... हमरे गांव में ये नए ग्रामसेवक आवे  है... गणेशराव ... उनके रहने का इंतजाम करने की सोच रहे है  "

" अरे सच्ची  ... शहरके दिखाई देवत रहे  .... मेरा तो ध्यानही नाही ही था.... सोचा कोई नया मेहमान होवे है  " वह गणेशकी तरफ देखते हूए बोली.

अब वह उससे जरा दूर हटके खडी होगई. गणेशका दिल मायूससा होगया. उसे वह उसका हल्का हल्का स्पर्ष अच्छा लग रहा था. लेकिन उसके चेहरेपर छाई वह मायूसी फिरसे हट गई. उसकी वहं सिधे दिलको छुनेवाली मादक नजर अब उसे घायल कर रही थी. उसकी तरफ देखकर गणेश मंदसा मुस्कुराया.

" अच्छा तो बाबूजी आप ईहां रहनेवाले हो...  फिरतो  आप हमरे पडोसी होवे है ... हमरा बहुत जमेगा.. देखोजी ... " उसने आगे कहा.

तबतक सरपंचजीका नौकर दरवाजा खोलकर अंदर चला गया.

"अच्छा गणेशराव मै क्या सोचरिया... आप आगेका कमरा लीजो  .. " सरपंचजी बोले.

" अच्छा सरपंचजी ... आती हूं " मधुराणी वहांसे निकलकर अपने दुकानकी तरफ जाते हूए बोली.

सरपंचजीने गर्दन हिलाई . जाते हूए उसने गणेशकी तरफ देखते हूए एक मुस्कान दी. गणेशभी उसकी तरफ देखते हूए मुस्कुराया. जैसे वह वहांसे चली गई सरपंचजी और गणेश उस नौकर के पिछे कमरेमें घुस गए. वह नौकर अंदर आकर इधर उधर कुछ ढुंढ रहा था.

" ए येडे पहले लाईट तो जलाई दे ... हमरे नौकर ना एक एक नमुने होवे  है ... " सरपंच चिढकर बोले.

नौकरने वापस आकर दरवाजेके बगलमें स्थित बल्बका स्वीच दबाया. अंधेरे कमरेमें सब तरफ बल्बकी पिली पिली रोशनी फैल गई. कमरेंमें सब तरफ हल, दरांती, कुल्हाडी, और खेतीमें लगनेवाली जंजीरे, जैसे सामान सब तरफ फैलकर रखे हूऐ थे.... और उस सामानपर धुल की एक हलकीसी परत जमी हूई थी. कुछ थैले भी रखे हूए थे जिसके मुंह रस्सीसे बंधे हूए थे.

" तो फिर बोलियो  कैसा रहा ये कमरा.... ' सरपंचजीने गणेशसे कहा.

और आगे नौकरको कुछ आदेश देते हूए बोले, ' ए तूम इस कमरेंमे रखा  सामान सुमान अंदरके कमरेंमे रख  दियो और इन्हे यह कमरा साफ कर दीजो ... बाबूजी आजसे ईहां रहेंगे  ... . "

" जी साबजी  " नौकरने हामी भर दी.

" और हां न्हाणी उधर अंदर है "

"न्हाणी?"

"मतलब बाथरुम जी " सरपंचजी हसते हूए बोले.

गणेशने अंदर जाकर बाथरूम देख ली.

गणेश बाहर आते हूए बोला " संडास.... संडास नही दिख रहा है "

" गणेशराव ....ई देहात है... ईहां सब लोगोंको खुली हवाकी आदत है... एकबार सरकारने संडास बांध दिए थे ईहां... लेकिन उसमें कोई नही जाता रहा ... आखीर लोगोंने तुड़वा दिए ... कमसे कम एक तो रखना था... आपके जैसन  लोगोंके वास्ते ... "

गणेशका चेहरा उदास हो गया. वह अपने चेहरेके भाव छुपाता हुवा बोला, " वैसे कमरा अच्छा है... वैसे मैभी कुछ जादा रुकनेवाला नहीं हूं यहा... हफ्तेमें दो तिन बार बस... "

" और संबा अब एक काम लगाई रहा तुमरे  पिछे... गणेशराव जब जब ईहां रुकेंगे... उनका पाणी वानी भरना तुम्हारी तरफ  ... समझे... " सरपंचजीने अपने नौकर को ताकीद दी.

" पाणी ? " गणेशने आश्चर्यसे पुछा.

" अब नल कहां है ? ये  मत पुछियो  जी .. " सरपंचजी गणेशका मजाक करते हूए बोले.

गणेश फिरसे झेंपसा गया.

" हमारा ये नौकर आपको पाणी कुंएसे भरकर लाकर देवत  रहेगा... " सरपंचजी ने कहा.

" चलो अब उधर ऑफीसमें जावत रहे ... तबतक तुम साफ सफाई करियो ... समझे... " सरपंचजीने अपने नौकरको फिरसे आदेश दिया.

" जी साबजी  " नौकर बोला और उसने अपना काम शुरु कर दिया.

सरपंचजी और गणेश कमरेसे बाहर आगए और आफिसकी तरफ निकल पडे. जाते हूए गणेश लाख कोशीश की बावजुद अपनी नजरको मधूराणीकी दुकानकी तरफ जानेसे रोक नही सका.

क्रमश:...


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