उपन्यास - अद्-भूत The horror, suspense, thriller [Email this] English Version-> [Aghast]
उपन्यास - शून्य The suspense, thriller [Email this] English Version->[Zero]
उपन्यास - ब्लैकहोल The Mystery, horror, suspense Email this English Version->[Black Hole]
उपन्यास - ई लव्ह The suspense, thriller Email this English Version->[eLove]
उपन्यास -मधुराणी Story of a femine power [Email this] English Version-> [Honey]
उपन्यास - मृगजल The psychological suspense, thriller Email this

Hindi literature - Novel - Madhurani - CH-9 खराडे साब

Next Chapter Previous Chapter

This Novel in English

Hindi literature - Novel - Madhurani - CH-9 खराडे साब
 Read Novel - मधुराणी - Hony -  on Google Play Books Store

Read some selected Feedbacks -   प्रतिक्रिया 

Imagination was given to man to compensate him for what he is not, and a sense of humor was provided to console him for what he is.
-oscar Wilde

गणेश ऑफिसमें  बैठकर पुराने ग्रामसेवककी राह देखने लगा. सरकारने ग्रामपंचायतके व्दारा ग्रॅन्ट  देकर जहां हर बृहस्पतीवारको हर हफ्ते बाजार भरता था वहीं मैदानमें एक कोनेमें एक अच्छा खांसा छोटा ऑफीस बनाकर दिया था. पुराने ग्रामसेवकसे चार्ज  लिए बैगर गणेशको वहां काम शुरु करना मुमकीन नही था. तभी उसे दरवाजेमें किसीकी आहट हो गई. गणेशने उधर देखा.

लगता है आगए है पुराने ग्रामसेवक...

वह उनकी अंदर आनेकी राह देखने लगा. काफी समय होगया फिरभी कोई अंदर नही आया यह देखकर गणेशने फिरसे उस तरफ देखा. उसे फिरसे वहां दिवारपर कोई साया हिले जैसा दिखा.

शायद कोई देहाती होगा ... और कामके लिए आया होगा ...

साला अबतक चार्जही नही लिया और ये लोगोंका होगया शुरु...

" कौन है ?" गणेश अपनी जगहसेही चिल्लाया.

एक फटे पुराने कपडे पहना हूवा आदमी अंदर आ गया.

" मै हूं साबजी  ... पांडू"

" देखो मै आजही यहां जॉईन  हुवा हूं ...अभी मैने चार्जभी नही लिया है ... तुम कल आ जावो ..."

" नाही साबजी  ... मै ईहां का चपरासी हूं "

" चपरासी ... लेकिन ऑर्डर लेते वक्त तो मुझे ऐसा कुछ नही बोला गया था की यहां कोई चपरासी भी है "

" मतलब वैसे नाही साबजी  ... "

कुत्ता जैसे अपनी दुम हिलाते हूए अपने मालीक के पास जाता है वैसे वह गणेशके पास गया.

" अच्छा अच्छा ..." अब गणेशके खयालमें आगया.

" अरे ... खराडे साब कैसे नही आए अबतक ..." गणेशने उसे पुछा.

" अभी आवत  ही रहे होंगे... वे उनके गांवसे आवत रहे  ना... इसलिए कभी कभी देर हो जात रही  ..."

" देर ?... सुबह आने चाहिए थे... अब दोपहर हो कर गुजरी है... फिरभी नही आए है अबतक .."

" आ जावेंगे साबजी ... कभी कभी हो जात रही....ऐसन  "

" और तुम कहां रहते हो ..." गणेशने पुछा.

" ई यहीं ... उस तरफ वाली गलीमें... ई हां ऑफीसमा  कुछ आहट होई गयी इसलिए आवत रहा ... मुझे लगा खराडे साब आवे  है... तभी आते हुए रास्तेमें सरपंचजी मिलत  रहे  ... उन्होने कहां की नए साबजी  आवे  है करके... "

यह स्पष्ट था की पुराने ग्रामसेवककी आनेका ऐसा कुछ समय तय नही था. गणेश कुछ नही बोला. उसने फिरसे अस्वस्थतासे अपनी घडीमें देखा.

" चाय पाणी ... कुछ लावू क्या साबजी  "

" चाय? ... यहां कही हॉटेल  है क्या ?"

" नाही साबजी  ..."

" फिर चाय कहांसे लावोगे... ? "

" लाऊंगाजी  आस पडोससे ... किसीके घरसे... "

" और पैसे..."

" साबजी ने बोलने के बाद ... पैसे लेनेकी किसकी मजालजी ? "

" लेकिन ऐसे कैसे ... कुछ किसीके यहांसे लानेका और वहंभी बेदाम ..."

" साबजी  ... ईहांकी पब्लीक  बहुत येडी है ... जबरदस्ती दिया तो भी पैसे नही लेवेगी... फिर हमराभी क्या जाता है.... बेदाम तो बेदाम " वह ताली लेनेके लिए गणेशके सामने हाथ करते हूए बोला.

गणेशने उसके फटे पुराने और मैले कपडेकी तरफ और उसके पसीनेकी बदबुभरे शरीर की तरफ देखकर अपना ताली लेनेके लिए सामने जाता हूवा हाथ रोक दिया. साफ झलक रहा था की वह गणेशको खुलाना चाहता था.
फिरसे दरवाजेमें कुछ हरकत हुई. गणेशने और पांडूने उधर देखा. उन्होने देखा की आखिर खराडे साहब आ गए थे. खराडे साब मतलब सफेद पैजामा और उपर रेशमी शर्ट , मुंहमें पान, तेल लगा चिकनाई भरा चेहरा, सरपर पतले हूए लेकीन अबभी पुरी तरह काले - तेल लगे हूए बाल.

चलो आगए एक बार खराडे साब...

" नमस्कार साबजी..." पांडूने नमस्कार किया. 

पांडूके नमस्कारकी उपेक्षा करते हूए आए बराबर उन्होने वही एक कोनेमें मुंह मे भरे पान की पिचकारी मारी.

" अरे क्या करे... घरसे सुबह ही निकला लेकिन देखो कैसे आते आते दोपहर हो गई... ." कुर्सीपर बैठते हूए वे गणेशरावकी तरफ देखते हूए बोले.

गणेश सिर्फ उनकी तरफ देखकर मुस्कुराया. उसे मालूम था की उनसे अब देरसे आए बात के लिए बहस करनेसे सिधे चार्ज हॅड ओवर करनेके बारेमें बात की जाए तो सब कुछ उतनाही जल्दी होगा. नहीतो और एक दिन लगेगा.

" कितना समय लगेगा चार्ज लेनेको ..."

" उसका क्या है गणेशराव ... मुझे देनेमे कुछ समय नही लगेगा... पांच मिनिटका  काम है... लेकिन तुम्हे लेनेमे कितना समय लगता है यह तुम देखो... " खराडे साहब मानो अपने खुदकेही जोक पर हंसते हूऎ टेबलके निचे पैर लंबे करते हूए बोले.

पांडू आगे आगया और उन्होने अपनी बॅग पांडूके हाथमें थमा दी. पांडूने वह बॅग बगलमें दिवारमें बने बिनादरवाजेकी अलमारीमें  रख दी. वहां अलमारीमें औरभी बहुत धुलमें पडे कागजाद रखे हूए थे. कोनेमें एक गोदरेजकी अलमारी थी.

उसमें सब महत्वपुर्ण फाइलें रखी होगी... गणेशने सोचा. 

अभीभी खराडे साहब कामके बारेमें कुछ नही कर रहे है यह देखकर गणेश बोला, " तो शुरवात करे...."

" रुको भाई ... ऐसीभी क्या जल्दी है.... पहले आरामसे चाय पिएंगे... और फिर कामके बारेंमे सोचेंगे.... सरकारी काम अगर ऐसेही फटाफट होने लगां तो कैसे होगा... तुम अभी नये हो... बच्चे हो... हो जायेंगी धीरे धीरे आदत... मैभी नया था तब ऐसे ही था... तुम्हारे जैसे... लेकिन सच कहूं ... बहुत गुस्सा आता था पहले... सरकारी लोगोंका ... मैनेतो सारी सिस्टीम बदलनेकी ठान ली थी.... लेकिन अब देखो... निकले थे सिस्टीमको बदलने .... और खुद बदलके रह गए... " खराडे साहबकी बडबड शुरु होगई.

गणेश सिर्फ सुन रहा था. उसे मालूम था की बोलकर कुछ नही होनेवाला. उलटी औरभी देरी हो जाती.

" ए पांड्या ... जरा शांताबाईके यहांसे चाय लेकर आ" खराडे साहबने आदेश दिया.

पांडू तुरंत दौडते हूए बाहर चला गया. खराडे साबने अब बैठे बैठे ही अपनी कुर्सी पिछे खिसकाई और आरामसे बैठते हूए पुछा,

" तो... यही रहोगे या अपडाऊन  करोगे ?"

" यही एक कमरा दिया है सरपंचजीने "

" अच्छा... सरपंच बहुत अच्छा आदमी है यहां का"

खराडे साहबने इधर उधर कोई है तो नही यह देखा और जितना हो सके उतना गणेशके पास उपना मुंह लेकर कहा, " तुम हो इसलिए एक पर्सनल  मशवरा देता हूं ..."

गणेश खराडे साहब क्या बोलते है इसकी राह देखने लगा.

" यहां के लोग... बहुत बुरे है .. यहां किसीके झमलेमें मत पडो... यहां हम भले और हमारा काम भला ऐसे रहना पडता है.... एक को सलाह दो तो दुसरेको बुरा लगता है... और दुसरेको दो तो तिसरेको गुस्सा आता है... अब क्या बोलू तुम्हे ... बहुत बुरा गांव है ये... मतलब ... मेरे पुरे नौकरीके अबतक के कार्यकालमें मैने इतना बुरा गांव कही देखा नही " खराडे साहब बोल रहे थे.

गणेशको खराडे साहबकी फालतु बकवास सुननेमें बिलकुल दिलचस्पी नही थी. उसे कब एकबार चार्ज लेकर कामपर लग जाता हूं ऐसे हो गया था.

" सब फाईल इस अलमारीमें रखी होगी ... नही ? ..." गणेश फिरसे असली बातपर आते हूए बोला.

खराडे साहब कुछभी बोले नही. फिरसे एकबार कोनेमें जाकर पानकी पिचकारी मारकर आगए.

" आलमारीकी चाबी आपके पासही होगी ... नही? ... " गणेश फिरसे बोला ताकी खराडे साहब कुछ जल्दी करे.

" क्या भाईसाब... आप तो बहुत ही व्याकुल हो रहे हो... मेरी बात मानो ऐसी सिन्सीयारीटी गव्हर्मेंटमें  कुछ कामकी नही ... कभी कभी तो ऐसी सिन्सीयारीटी हमारे लिए ही खतरा बन जाती है... मतलब ये मेरे अनुभवके बोल है... मै तो बोलता हूं ये बोल लिख लो... "

गणेशको अब इस आदमीको कैसे हॅन्डल  करे कुछ सुझ नही रहा था. उसे चिढभी आ रही थी और हंसीभी आ रही थी. लेकिन चिढकर काम नही बननेवाला था और हंसनेसे तो और भी खतरा था. उलटा काम बिगड सकता था. आखिर गणेशने अपने पल्ले बांध लिया की भले दो दिन क्यों ना  लगे  ... लेकिन खराडेसाहब के अनुसारही आगे चलना चाहिए. वैसेभी उनके पास कौनसा दुसरा रास्ता था. ?. उधर खराडे साहब की फालतु बकबक चल रही थी और इधर गणेश एक अपने अलगही दुनियामें रममान हुवा था की जिसमे उसे खराडे साहबकी बकबक तो सुनाई दे रही थी लेकिन चिढभी नही आ रही थी और हंसीभी नही आ रही थी.


Imagination was given to man to compensate him for what he is not, and a sense of humor was provided to console him for what he is.
-oscar Wilde


continued ... 



This Novel in English

Next Chapter Previous Chapter

No comments:

Post a Comment