पोलिस स्टेशनमें डिटेक्टीव सॅम डिटेक्टीव बेकरके सामने बैठा हूवा था. डिटेक्टीव बेकर इस पुलिस स्टेशनका इंचार्ज था. डिटेक्टीव्ह बेकरका फोन आनेके पश्चात गोल्फका अगला गेम खेलनेकी सॅमकी इच्छाही खत्म हो चूकी थी. अपना सामान इकठ्ठा कर वह ताबडतोड तैयारी कर अपने पुलिस स्टेशनमें जानेके बजाय सिधा इधर निकल आया था. उनका 'हाय हॅलो' - सब फॉर्म्यालिटीज होनेके बाद अब डिटेक्टीव बेकरके पास उसके केसके बारेमें क्या जानकारी है यह सुननेके लिए वह उसके सामने बैठ गया. डिटेक्टीव बेकरने सब जानकारी बतानेके पहले एक बडा पॉज लिया. डिटेक्टीव सॅम भलेही अपने चेहरेपर नही आने दे रहा था फिरभी सब जानकारी सुननेके लिए वह बेताब हो चूका था और उसकी उत्सुकता सातवें आसमानपर पहूंच चूकी थी.
डिटेक्टीव्ह बेकर जानकारी देने लगा -
'' कुछ दिन पहले मेरे पास एक केस आयी थी ........
.... एक सुंदर शांत टाऊन. टाऊनमें हरा भरी घास और हरेभरे पेढ चारो तरफ फैले हूए थे. और उस हरीयालीमें रातमें तारे जैसे आकाशमें समुह-समुहसे चमकते है वैसे छोटे छोटे समुहमें घर इधर उधर फैले हूए थे. उसी हरीयालीमें गावके बिचोबिच एक पुरानी कॉलेजकी बिल्डींग थी.
कॉलजमें गलियारेमें स्टूडंट्स की भिड जमी हूई थी. शायद ब्रेक टाईम होगा. कुछ स्टूडंट्स समुहमें गप्पे मार रहे थे तो कुछ इधर उधर घुम रहे थे. जॉन कार्टर लगभग इक्कीस - बाईस सालका, स्मार्ट हॅंन्डसम कॉलेजका स्टूडंट और उसका दोस्त ऍथोनी क्लार्क - दोनो साथ साथ बाकी स्टूडंट्स के भिडसे रास्ता निकालते हूए चल रहे थे. .
'' ऍंथोनी चलो डॉक्टर अल्बर्टके क्लासमें जाकर बैठते है . बहुत दिन हुए है हमने उसका क्लास अटेंन्ड नही किया है. '' जॉनने कहा.
'' किसके ? डॉक्टर अल्बर्टके क्लासमें ? ... तुम्हारी तबियत तो ठिक है ना ?..'' ऍन्थोनीने आश्चर्यसे पुछा.
'' अरे नही ... मतलब अबतक वह जमा हूवा है या छोडकर गया यह देखकर आते है '' जॉनने कहा.
दोनो एकदूसरेको ताली देते हूए, शायद पहलेका कोई किस्सा याद कर जोरसे हंसने लगे.
चलते हूए अचानक जॉनने ऍन्थोनीको अपनी कोहनी मारते हूए बगलसे जा रहे एक लडके की तरफ उसका ध्यान आकर्षीत करनेका प्रयास किया. ऍन्थोनीने प्रश्नार्थक मुर्दामें जॉनकी तरफ देखा.
जॉन धीमे आवाजमें उसके कानके पास बुदबुदाया '' यही वह लडका... जो आजकल अपने होस्टेलमें चोरीयां कर रहा है ''
तबतक वह लडका उनको क्रॉस होकर आगे निकल गया था. ऍन्थोनीने पिछे मुडकर देखा. होस्टेलमें ऐन्थोनीकीभी कुछ चिजेभी गायब हो चूकी थी.
'' तुम्हे कैसे पता ?'' ऍन्थोनीने पुछा. .
'' उसके तरफ देखतो जरा... कैसा कैसा कसे हूए चोरोंकी खानदानसे लगता है साला.. ' जॉनने कहा.
'' अरे सिर्फ लगनेसे क्या होगा... हमें कुछ सबुतभीतो लगेगा. '' ऍन्थोनीने कहा.
'' मुझे ऍलेक्सभी कह रहा था. ... देर राततक वह भूतोंकी तरह होस्टेलमें सिर्फ घूमता रहता है ''
'' अच्छा ऐसी बात है ... तो फिर चल.. सालेको सिधा करते है.''
'' ऐसा सिधा करेंगे की साला जिंदगी भर याद रखेगा. ''
'' सिर्फ याद ही नही... सालेको बरबादभी करेंगे''
फिरसे दोनोंने कुछ फैसला किये जैसे एकदूसरेकी जोरसे ताली बजाई और फिरसे जोरसे हंसने लगे.
क्रमश:...
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Friday, April 25, 2008
Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-9 : कुछ दिन पहले
Posted by
Sunil Doiphode
at
11:46 AM
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