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Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-12 : पिछा

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शामका समय था. अपनी शॉपींगसे लदी हूई बॅग संभालती हूई नॅन्सी फुटपाथसे जा रही थी. वैसे अब खरीदनेका कुछ खास नही बचा था. सिर्फ एक-दो चिजे खरीदनेकी बची थी.

वह चिजे खरीद ली की फिर घरही वापस जाना है...

वह बची हूई एक-दो चिजे लेकर जब वापस जानेके लिए निकली तब लगभग अंधेरा होनेको आया था और रास्तेपरभी बहुत कम लोग बचे थे. चलते चलते नॅन्सीके अचानक खयालमें आया की बहुत देरसे कोई उसका पिछा कर रहा है. उसकी पिछे मुडकर देखनेकी हिम्मत नही बन रही थी. वह वैसेही चलती रही. फिरभी उसका पिछा जारी है इसका उसे एहसास हूवा. अब वह घबरा गई. पिछे मुडकर ना देखते हूए वह वैसेही जोरसे आगे चलने लगी.

इतनेमे उसे पिछेसे आवाज आया , '' नॅन्सी ''

वह एक पल रुकी और फिर चलने लगी.

पिछेसे फिरसे आवाज आया, '' नॅन्सी ...''.

आवाजके लहजेसे नही लग रहा था की पिछा करने वाले का कोई गलत इरादा हो. नॅन्सीने चलते चलतेही पिछे मुडकर देखा. पिछे जॉनको देखतेही वह रुक गई. उसके चेहरेपर परेशानीके भाव भाव दिखने लगे.

यह इधरभी ..

अबतो सर पटकनेकी नौबत आई है...

वह एक बडा फुलोंका गुलदस्ता लेकर उसके पास आ रहा था. वह देखकर तो उसे एक क्षण लगाभी की सचमुछ अपना सर पटक ले. वह जॉन उसके नजदिक आनेतक रुक गई.

'' क्यो तुम मेरा लगातार पिछा कर रहे हो ?'' नॅन्सी नाराजगी जताते हूए गुस्सेसे बोली.

'' मुझपर एक एहसान करदो और भगवानके लिए मेरा पिछा करना छोड दो '' वह गुस्सेसे हाथ जोडते हूए, उसका पिछा छूडा लेनेके अविर्भावमें बोली.

गुस्सेसे वह पलट गई और फिरसे आगे पैर पटकती हूई चलने लगी. जॉनभी बिचमें थोडा फासला रखते हूए उसके पिछे पिछे चलने लगा.

जॉन फिरसे पिछा कर रहा है यह पता चलतेही वह गुस्सेसे रुक गई.

जॉनने अपनी हिम्मत बटोरकर वह फुलोंका गुलदस्ता उसके सामने पकडा और कहा, '' आय ऍम सॉरी...''

नॅन्सी गुस्सेसे तिलमिलाई. उसे क्या बोले कुछ सुझ नही रहा था. जॉनकोभी आगे क्या बोले कुछ समझ नही रहा था.

'' आय स्वीअर, आय मीन इट'' वह अपने गलेको हाथ लगाकर बोला.

नॅन्सी गुस्सेमेतो थी ही, उसने झटकेसे अपने चेहरेपर आ रही बालोंकी लटे एक तरफ हटाई. जॉनको लगा की वह फिरसे एक जोरदार तमाचा अपने गालपर जडने वाली है. डरके मारे अपनी आंखे बंद कर उसने झटसे अपना चेहरा पिछे हटाया.

उसकेभी यह खयालमें आया और वह अपनी हंसी रोक नही सकी. उसका वह डरा हूवा सहमा हूवा बच्चोके जैसा मासूम चेहरा देखकर वह खिलखिलाकर हंस पडी. उसका गुस्सा कबका रफ्फु चक्कर हो गया था. जॉनने आंखे खोलकर देखा. तबतक वह फिरसे रास्तेपर आगे चल पडी थी. थोडी देर चलनेके बाद एक मोडपर मुडनेसे पहले नॅन्सी रुक गई, उसने पिछे मुडकर जॉनकी तरफ देखा. एक नटखट मुस्कुराहटसे उसका चेहरा खिल गया था. गडबडाए हूए हालमें, संभ्रममे खडा जॉनभी उसकी तरफ देखकर मंद मंद मुस्कुराया. वह फिरसे आगे चलते हूए उस मोडपर मुडकर उसके नजरोंसे ओझल हो गई. भले ही वह उसके नजरोंसे ओझल हूई थी, फिरभी जॉन खडा होकर उधर मंत्रमुग्ध होकर देख रहा था. उसे रह रहकर उसकी वह नटखट मुस्कुराहट याद आ रही थी.

वह सचमुछ मुस्कुराई थी या मुझे वैसा आभास हूवा ....

नही नही आभास कैसे होगा ...

यह सच है की वहं मुस्कुराई थी ...

वह मुस्कुराई इसका मतलब उसने मुझे माफ किया ऐसा समझना चाहिए क्या? ...

हां वैसा समझनेमें कोई दिक्कत नही...

लेकिन उसका वह मुस्कुराना कोई मामूली मुस्कुराना नही था...

उसके उस मुस्कुराहटमें औरभी कुछ गुढ अर्थ छिपा हूवा था...

क्या था वह अर्थ?...

जॉन वह अर्थ समझनेकी कोशीश करने लगा. और जैसे जैसे वह अर्थ उसके समझमें आ रहा था उसकेभी चेहरेपर वही, वैसीही मुस्कुराहट फैलने लगी.


क्रमश:...

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Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-11 : बदतमिज

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क्लास चल रहा था. क्लासमें जॉन और उसके दो दोस्त पास-पास बैठे थे. जॉनका खयाल बिलकुल क्लासमें नही था. वह बेचैन लग रहा था और अस्वस्थतासे क्लास खतम होने की राह देख रहा था. उसने एकबार पुरे क्लासपर अपनी नजर घुमाई, खासकर नॅन्सीकी तरफ देखा. लेकिन उसका कहा उसकी तरफ ध्यान था? वह तो अपनी नोट्स लेनेमे व्यस्त थी. कल रातका वाक्या याद कर जॉनको फिरसे अपराधी जैसा लगने लगा.

उस बेचारीको क्या लगा होगा ? ...

इतने सारे लोगोंके सामने और मेरीके सामने मैने ...

नही मैने ऐसा नही करना चाहिए था...

लेकिन जोभी हूवा वह गलतीसे हूवा...

मुझे क्या मालूम था की वह चोर ना होकर नॅन्सी थी...

नही मुझे उसकी माफी मांगना चाहिए...

लेकिन कल तो मैने उसकी माफी मांगनेका प्रयास किया था ..

तो उसने धडामसे गुस्सेसे दरवाजा बंद किया था...

नही मुझे वह जबतक माफ नही करती तबतक माफी मांगतेही रहना चाहिए...

उसके दिमागमें विचारोंका तुफान उमड पडा था. इतनेमें पिरियड बेल बजी. शायद ब्रेक हो गया था.

चलो यह अच्छा मौका है ...

उसे माफी मांगनेका ...

वह उठकर उसके पास जानेही वाला था इतनेमें वह लडकियोंकी भिडमें कही गुम होगई थी.

ब्रेककी वजहसे कॉलेजके गलियारेमें स्टूडंट्स की भिड जमा हो गई थी. छोटे छोटे समूह बनाकर गप्पे मारते हूए स्टूडंट्स सब तरफ फैल गए थे. और उस भिडसे रास्ता निकालते हूए जॉन और उसके दो दोस्त उस भिडमें नॅन्सीको ढूंढ रहे थे.

कहा गई?...

अभी तो लडकियोंकी भिडमें क्लाससे बाहर जाते हूए दिखी थी... .

वे तिनो इधर उधर देखते हूए उसे ढूंढनेकी कोशीश करने लगे. आखिर एक जगह कोनेमें उन्हे अपने दोस्तोंके साथ बाते करती हूइ नॅन्सी दिख गई.

''चलो मेरे साथ... '' जॉनने अपने दोस्तो से कहा.

'' हम किसलिए ... हम यही रुकते है ... तुम ही जावो.. '' उसके दोस्तोमेंसे एक बोला.

'' अबे... साथ तो चलो '' जॉन उनको लगभग पकडकर नॅन्सीके पास ले गया.

जब जॉन और उसके दोस्त उसके पास गए तब उसका खयाल इन लोगोंकी तरफ नही था. वह अपनी गप्पे मारनेमें मशगुल थी. नॅन्सीने गप्पे मारते हूए एक नजर उनपर डाली और उनकी तरफ ध्यान ना देते हूए अपनी बातोंमेही व्यस्त रही. जॉनने उसके और पास जाकर उसका ध्यान अपनी तरफ आकर्षीत करनेका प्रयास किया. लेकिन बार बार वह उनकी तरफ ध्यान ना देते हूए उन्हे टालनेका प्रयास कर रही थी. उधर उनसे काफी दूर ऍन्थोनी गलियारेसे जारहा था वह जॉनकी तरफ देखकर मुस्कुराया और उसने अपना अंगूठा दिखाकर उसे बेस्ट लक विश किया.

'' नॅन्सी ... आय ऍम सॉरी'' जॉनको इतने लडको लडकियोंकी भिडमें शर्मभी आ रही थी. फिरभी ढांढस बांधते हूए उसने कहा.

नॅन्सीने एक कॅजूअल नजर उसपर डाली.

जॉनकी गडबडी हूइ दशा देखकर उसके दोस्तोने अब सिच्यूएशन अपने हाथमे ली.

'' ऍक्च्यूअली हम एक चोरको पकडनेकी कोशीश कर रहे थे. '' एक दोस्तने कहा.

'' हां ना ... वह रोज होस्टेलमें चोरी कर रहा था. '' दुसरे दोस्त ने कहा.

जॉन अब अपनी गडबडीभरी दशासे काफी उभर गया था. उसने फिरसे हिम्मत कर अपनी रट जारी रखी, , '' नॅन्सी ... आय ऍम सॉरी ... आय रियली डीडन्ट मीन इट... मै तो उस चोरको पकडनेकी ... .''

जॉन हाथोके अलग अलग इशारोंसे अपने भाव व्यक्त करनेकी कोशीश कर रहा था. वह क्या बोल रहा था और क्या इशारे कर रहा था उसका उसकोही समझ नही आ रहा था. आखिर वह एक हाव-भावके पोजीशनमें रुका. जब वह रुका तब उसके खयालमें आया की, भलेही स्पर्ष ना कर रहे हो, लेकिन उसके दोनो हाथ फिरसे नॅन्सीके उरोजोंके आसपास थे. वह नॅन्सीकेभी खयालमें आया. उसने झटसे अपने हाथ पिछे खिंच लिए. उसने गुस्सेसे भरा एक कटाक्ष उसके उपर डाला और फिरसे एक जोरका चांटा उसके गालपर जडकर चिढकर बोली, '' बद्तमीज''

इसके पहलेकी जॉन फिरसे संभलकर कुछ बोले वह गुस्सेसे पैर पटकाती हूई वहांसे चली गई थी. जब वह होशमें आया वह दूर जा चूकी थी और जॉन अपना गाल सहलाते हूए वहां खडा था.


क्रमश:...

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Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-10 : आय ऍम सॉरी

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रातको होस्टेलके गलियारेमें घना अंधेरा था. गलियारेके लाईट्स या तो किसीने चोरी किये होंगे या लडकोने तोड दिए होंगे. एक काला साया धीरे धीरे उस गलियारेमे चल रहा था. और वहासे थोडीही दुरीपर जॉन, ऍन्थोनी और उसके दो दोस्त एक खंबेके पिछे छुपकर बैठे थे. उन्होने पक्का फैसला किया था की आज किसीभी हालमें इस चोरको पकडकर होस्टेलकी लगभग रोज होनेवाली चोरीयां रोकनी है. काफी समयसे वे वहां छिपकर चोरकी राह देख रहे थे. आखिर वह साया उन्हे दिखतेही उनके चेहरेपर खुशी की लहर दौड गई.

चलो इतने देरसे रुके... आखिर मेहनत रंग लाई...

खुशीके मारे उनमें खुसुर फुसुर होने लगी.

'' ए चूप रहो... यही अच्छा मौका है ... सालेको रंगे हाथ पकडनेका '' जॉनने सबको चूप रहनेकी हिदायत दी.

वे वहांसे छिपते हूए सामने जाकर एक दुसरे खंबेके पिछे छूप गए.

उन्होने चोरको पकडनेकी पुरी प्लॅनींग और तैयारी कर रखी थी. चारोंने आपसमें काम बांट लिया था. उन चारोंमें एक लडका अपने कंधेपर एक काला ब्लॅंकेट संभाल रहा था.

'' देखो... वह रुक गया ... सालेकी घोंगड रपेटही करेंगे'' जॉन धीरेसे बोला.

वह साया गलियारेमे चलते हूए एक रुमके सामने रुक गया.

'' अरे किसकी रुम है वह ?'' किसीने पुछा.

'' मेरीकी ..'' ऍन्थोनीने धीमे स्वरमे जवाब दिया.

वह काला साया मेरीके दरवाजेके सामने रुका और मेरीके दरवाजेके कीहोलमें अपने पासकी चाबी डालकर घुमाने लगा.

'' देखो उसके पास चाबीभी है '' कोई फुसफुसाया.

'' मास्टर की होगी '' किसीने कहा.

'' या डूप्लीकेट बनाकर ली होगी सालेने ''

'' अब तो वह बिलकुल मुकर नही पाएगा ... हम उसे अब रेड हॅंन्डेड पकड सकते है. '' जॉनने कहा.

जॉन और ऍन्थोनीने पिछे मुडकर उनके दो साथीयोंको इशारा किया.

'' चलो ... यह एकदम सही वक्त है '' ऍन्थोनीने कहा.

वह साया अब ताला खोलनेकी कोशीश करने लगा.

सब लोगोंने एकदम उस काले सायेपर हल्ला बोल दिया. ऍन्थोनीने उस सायेके शरीरपर उसके दोस्तके कंधेपर जो था वह ब्लॅंकेट डालकर लपेट दिया और जॉनने उस सायेको ब्लॅकेटके साथ कसकर पकड लिया.

'' पहले साले को मारो... '' कोई चिल्लाया.

सबलोग मिलकर अब उस चोरकी धुलाई करने लगे.

'' कैसा हाथ आया रे साले ... ''

'' ए साले ... दिखा अब कहां छुपाकर रखा है तुने होस्टेलका सारा चोरी किया हूवा माल''

ब्लॅंकेटके अंदरसे 'आं ऊं' ऐसा दबा हूवा स्वर आने लगा.

अचानक सामनेका दरवाजा खुला और मेरी गडबडाई हूई दरवाजेसे बाहर आगई. शायद उसे उसके रुमके सामने चल रहे धांदलीकी आहट हुई होगी. कमरेमें जल रहे लाईटकी रोशनी अब उस ब्लॅंकेटमें लिपटे चोरके शरीर पर पड गई.

'' क्या चल रहा है यहां '' मेरी घाबराये हूए हालमें हिम्मत बटोरती हूई बोली.

'' हमने चोरको पकडा है '' ऍन्थोनीने कहा.

'' ये तुम्हारा कमरा डूप्लीकेट चाबीसे खोल रहा था. '' जॉनने कहा.

उस चोरको ब्लॅंकेटके साथ पकडे हूए हालमें जॉनको उस चोरके शरीरपर कुछ अजीबसा लगा. धांदलीमें उसने क्या है यह टटोलनेके लिए ब्लॅंकेटके अंदरसे अपने हाथ डाले. जॉनने हाथ अंदर डालनेसे उसकी उस सायेपरकी पकड ढीली हो गई और वह साया ब्लॅंकेटसे बाहर आगया.

'' ओ माय गॉड नॅन्सी! '' मेरी चिल्लाई.

नॅन्सी कोलीन उनकेही क्लासमेंकी एक सुंदर स्टूडंट थी. वह ब्लॅकेटसे बाहर आई और अभीभी असंमजसके स्थितीमें जॉन उसके दोनो उरोज अपने हाथमें कसकर पकडा हूवा था. उसने खुदको छुडा लिया और एक जोर का तमाचा जॉनके कानके निचे जड दिया.

जॉनको क्या बोले कुछ समझमें नही रहा था वह बोला, '' आय ऍम सॉरी .. आय ऍम रियली सॉरी ''

'' वुई आर सॉरी ...'' ऍन्थोनीनेभी कहा.

'' लेकिन इतने रात गए तुम यहां क्या कर रही हो?'' मेरी नॅन्सीके पास जाते हूए बोली.

'' इडीयट ... आय वॉज ट्राईंग टू सरप्राईज यू... तूम्हे जनमदिनकी शुभकामनाएं देने आई थी मै..'' नॅन्सी उसपर चिढते हूए बोली.

'' ओह ... थॅंक यू ... आय मीन सॉरी ... आय मीन आर यू ओके?'' मेरीको क्या बोले कुछ समझ नही आ रहा था.

मेरी नॅन्सीको रुममें ले गई. और जॉन फिरसे माफी मांगनेके लिए रुममे जानेलगा तो दरवाजा उसके मुंहपर धडामसे बंद होगया.


क्रमश:...

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Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-9 : कुछ दिन पहले

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पोलिस स्टेशनमें डिटेक्टीव सॅम डिटेक्टीव बेकरके सामने बैठा हूवा था. डिटेक्टीव बेकर इस पुलिस स्टेशनका इंचार्ज था. डिटेक्टीव्ह बेकरका फोन आनेके पश्चात गोल्फका अगला गेम खेलनेकी सॅमकी इच्छाही खत्म हो चूकी थी. अपना सामान इकठ्ठा कर वह ताबडतोड तैयारी कर अपने पुलिस स्टेशनमें जानेके बजाय सिधा इधर निकल आया था. उनका 'हाय हॅलो' - सब फॉर्म्यालिटीज होनेके बाद अब डिटेक्टीव बेकरके पास उसके केसके बारेमें क्या जानकारी है यह सुननेके लिए वह उसके सामने बैठ गया. डिटेक्टीव बेकरने सब जानकारी बतानेके पहले एक बडा पॉज लिया. डिटेक्टीव सॅम भलेही अपने चेहरेपर नही आने दे रहा था फिरभी सब जानकारी सुननेके लिए वह बेताब हो चूका था और उसकी उत्सुकता सातवें आसमानपर पहूंच चूकी थी.

डिटेक्टीव्ह बेकर जानकारी देने लगा -

'' कुछ दिन पहले मेरे पास एक केस आयी थी ........


.... एक सुंदर शांत टाऊन. टाऊनमें हरा भरी घास और हरेभरे पेढ चारो तरफ फैले हूए थे. और उस हरीयालीमें रातमें तारे जैसे आकाशमें समुह-समुहसे चमकते है वैसे छोटे छोटे समुहमें घर इधर उधर फैले हूए थे. उसी हरीयालीमें गावके बिचोबिच एक पुरानी कॉलेजकी बिल्डींग थी.

कॉलजमें गलियारेमें स्टूडंट्स की भिड जमी हूई थी. शायद ब्रेक टाईम होगा. कुछ स्टूडंट्स समुहमें गप्पे मार रहे थे तो कुछ इधर उधर घुम रहे थे. जॉन कार्टर लगभग इक्कीस - बाईस सालका, स्मार्ट हॅंन्डसम कॉलेजका स्टूडंट और उसका दोस्त ऍथोनी क्लार्क - दोनो साथ साथ बाकी स्टूडंट्स के भिडसे रास्ता निकालते हूए चल रहे थे. .

'' ऍंथोनी चलो डॉक्टर अल्बर्टके क्लासमें जाकर बैठते है . बहुत दिन हुए है हमने उसका क्लास अटेंन्ड नही किया है. '' जॉनने कहा.

'' किसके ? डॉक्टर अल्बर्टके क्लासमें ? ... तुम्हारी तबियत तो ठिक है ना ?..'' ऍन्थोनीने आश्चर्यसे पुछा.

'' अरे नही ... मतलब अबतक वह जमा हूवा है या छोडकर गया यह देखकर आते है '' जॉनने कहा.

दोनो एकदूसरेको ताली देते हूए, शायद पहलेका कोई किस्सा याद कर जोरसे हंसने लगे.

चलते हूए अचानक जॉनने ऍन्थोनीको अपनी कोहनी मारते हूए बगलसे जा रहे एक लडके की तरफ उसका ध्यान आकर्षीत करनेका प्रयास किया. ऍन्थोनीने प्रश्नार्थक मुर्दामें जॉनकी तरफ देखा.

जॉन धीमे आवाजमें उसके कानके पास बुदबुदाया '' यही वह लडका... जो आजकल अपने होस्टेलमें चोरीयां कर रहा है ''

तबतक वह लडका उनको क्रॉस होकर आगे निकल गया था. ऍन्थोनीने पिछे मुडकर देखा. होस्टेलमें ऐन्थोनीकीभी कुछ चिजेभी गायब हो चूकी थी.

'' तुम्हे कैसे पता ?'' ऍन्थोनीने पुछा. .

'' उसके तरफ देखतो जरा... कैसा कैसा कसे हूए चोरोंकी खानदानसे लगता है साला.. ' जॉनने कहा.

'' अरे सिर्फ लगनेसे क्या होगा... हमें कुछ सबुतभीतो लगेगा. '' ऍन्थोनीने कहा.

'' मुझे ऍलेक्सभी कह रहा था. ... देर राततक वह भूतोंकी तरह होस्टेलमें सिर्फ घूमता रहता है ''

'' अच्छा ऐसी बात है ... तो फिर चल.. सालेको सिधा करते है.''

'' ऐसा सिधा करेंगे की साला जिंदगी भर याद रखेगा. ''

'' सिर्फ याद ही नही... सालेको बरबादभी करेंगे''

फिरसे दोनोंने कुछ फैसला किये जैसे एकदूसरेकी जोरसे ताली बजाई और फिरसे जोरसे हंसने लगे.


क्रमश:...

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Hindi novel - अद्-भूत : Ch-8 : गोल्फ

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डिटेक्टीव सॅम गोल्फ खेल रहा था. रोजमर्राके तनाव से मुक्तीके लिए यह एक अच्छा खासा उपाय उसने ढूंडा था. उसने एक जोरका शॉट मारनेके बाद बॉल आकाशसे होकर होल की तरफ लपक गया. बॉलने दो तिन बार गिरकर उछला और आखीर होलसे लगभग छे फिटकी दुरीपर लूढकते हूए रुका. सॅम बॉलके पास गया. जमीनके चढाई और ढलानका उसने अंदाजा लिया. बॉलके उपरसे टी घुमाकर उसे कितने जोरसे मारना पडेगा ईसका अनुमान लगाया. और बडी सावधानीसे, सही दिशामें, सही जोर लगाकर उसने हलकेही एक शॉट लगाया और बॉल लूढकते हूए बराबर होलमें जाकर समा गया. डिटेक्टीवके चेहरेपर एक जित की खुशी झलकने लगी. इतनेमें अचानक सॅमका मोबाईल बजा. डिटेक्टीव्हने डिस्प्ले देखा. लेकिन फोन नंबर तो पहचानका नही लग रहा था. उसने एक बटन दबाकर फोन अटेंड किया, ''यस''

'' डिटेक्टीव बेकर हियर'' उधरसे आवाज आया.

'' हा बोलो'' सॅम दुसरे गेमकी तैयारी करते हुए बोला.

'' मेरे जानकारीके हिसाबसे आप हालहीमें चल रहे सिरियल केसके इंचार्च हो ... बराबर?'' उधरसे बेकरने पुछा. .

'' जी हां '' सॅमने सिरीयल किलरका जिक्र होतेही अगला गेम खेलने का विचार त्याग दिया और वह आगे क्या बोलता है यह ध्यानसे सुनने लगा.

'' अगर आपको कोई ऐतराज ना हो ... मतलब अगर आज आप फ्री हो तो... क्या आप इधर मेरे पुलिस स्टेशनमें आ सकते हो?... मेरे पास इस केसके बारेमें कुछ महत्वपुर्ण जानकारी है... शायद आपके काम आयेगी..''

'' ठिक है ... कोई बात नही .. '' कहते हूए बगल से गुजर रहे लडकेको सामान उठानेका इशारा करते हूए सॅमने कहा.

सॅमने बेकरसे फोनपर मिलनेका वक्त वगैरे सब तय किया और वह सामान उठाकर ले जा रहे लडकेके साथ वापस हो लिया.


क्रमश:...

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Hindi Novel - अद्-भूत : Ch-7 : रोनाल्ड पार्कर

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रोनाल्ड पार्कर, उम्र पच्चीस के आसपास, स्टायलीस्ट, रुबाबदार, अपने बेडरुमें सोया था. वह रह रहकर बेचैनीसे अपनी करवट बदल रहा था. इससे ऐसा लग रहा था की आज उसका दिमाग कुछ जगहपर नही था. थोडी देर करवट बदलकर सोनेकी कोशीश करनेके बादभी उसे निंद नही आ रही थी यह देखकर वह बेडसे उठकर बाहर आ गया, इधर उधर एक नजर दौडाई, और फिरसे बेडपर जाकर बैठ गया. उसने बेडके बगलमें रखा एक मॅगझीन उठाया और उसे खोलकर पढते हूए फिरसे बेडपर लेट गया. वह उस मॅगझीनके पन्ने, जिसपर लडकियोंकी नग्न तस्वीरे छपी थी, पलटने लगा.

सेक्स इज द बेस्ट वे टू डायव्हर्ट यूवर माईंन्ड ...

उसने सोचा. अचानक दुसरे कमरेसे 'धप्प' ऐसा कुछ आवाज उसे सुनाई दिया. वह चौंककर उठ बैठा , मॅगॅझीन बगलमें रख दिया और वैसीही डरे सहमे हालमें वह बेडसे निचे उतर गया.

यह कैसी आवाज .....

पहले तो कभी नही आई थी ऐसी आवाज... .

लेकिन आवाज आनेके बाद मै इतना क्यो चौक गया...

या हो सकता है आज अपनी मनकी स्थीती पहलेसेही अच्छी ना होनेसे ऐसा हूवा होगा...

धीरे धीरे इधर उधर देखते हूए वह बेडरुमके दरवाजेके पास गया. दरवाजेकी कुंडी खोली और धीरेसे थोडासा दरवाजा खोलकर अंदर झांककर देखा.

सब घरमें ढुंढनेके बाद रोनाल्डने हॉलमें प्रवेश किया. हॉलमें घना अंधेरा था. हॉलमेंका लाईट जलाकर उसने डरते हूएही चारो तरफ एक नजर दौडाई.

लेकिन कुछभीतो नही...

सबकुछ वहीका वही रखा हूवा ...

उसने फिरसे लाईट बंद किया और किचनकी तरफ निकल पडा.

किचनमेंभी अंधेरा था. वहांका लाईट जलाकर उसने चारोतरफ एक नजर दौडाई. अब उसका डर काफी कम हो चूका था. .

कहा कुछ तो नही ...

इतना डरनेकी कुछ जरुरत नही थी... .

वह पलटनेके लिए मुडनेही वाला था की किचनमें सिंकमें रखे किसी चिजने उसका ध्यान आकर्षीत किया. उसकी आंखे आश्चर्य और डर की वजहसे बडी हूई थी. एक पलमें इतने ठंडमेंभी उसे पसिना आया था. हाथपैर कांपनए लगे थे. उसके सामने सिंकमें खुनसे सना एक मांसका टूकडा रखा हूवा था. एक पलकाभी समय ना गंवाते हूए वह वहा से भाग खडा हूवा. क्या किया जाए उसे कुछ सुझ नही रहा था. गडबडाये और घबराये हूए हालमें वह सिधा बेडरुममे भाग गया और उसने अंदरसे कुंडी बंद कर ली थी.


क्रमश:...

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hindi sahitya - अद्-भूत Ch-6 : दहशत

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डिटेक्टीव्ह सॅम और उसका एक साथी कॅफेमें बैठे थे. उनमें कुछतो गहन चर्चा चल रही थी. उनके हावभावसे लग रहा था की शायद वे हालहीमें हूए दो खुनके बारेमे चर्चा कर रहे होंगे. बिच बिचमें दोनोभी कॉफीके छोटे छोटे घुंट ले रहे थे. अचानक कॅफेमें रखे टिव्हीपर चल रही खबरोंने उनका ध्यान आकर्षीत किया.
डिटेक्टीवने जितोड कोशीश की थी की प्रेस हालहीमें चल रहे खुनको जादा ना उछाले. लेकिन उनके लाख कोशीशके बादभी मेडीयाने जानकारी हासिल की थी. आखिर डिटेक्टीव्ह सॅमकोभी कुछ मर्यादाए थी. वे एक हद तक ही बातें मिडीयासे छुपा सकते है. और कभी कभी जिस बातको हम छुपाना चाहते है उसीकोही जादा उछाला जाता है.
टीव्ही न्यूज रिडर बोल रहा था - '' कातिलने कत्ल किए और एक शक्स की लाश आज तडके पुलिसको मिली. जिस तरहसे और जिस बर्बरतासे पहला खुन हुवा था उसी बर्बरतासे या यूं कहीए उससेभी जादा बर्बतासे .. इस शक्सकोभी मारा गया. इससे कोईभी इसी नतीजेपर पहूंचेगा की इस शहरमें एक खुला सिरीयल किलर घुम रहा है.... हमारी सुत्रोंने दिए जानकारीके हिसाबसे दोनोभी शव ऐसे कमरेंमे मिले की जो जब पुलिस पहुंची तब अंदरसे बंद थे. पुलिसको जब इस बारेंमे पुछा गया तो उन्होने इस मसलेपर कुछभी टिप्पनी करनेसे इनकार किया है. जिस इलाकेमें खुन हुवा वहा आसपासके लोग अब भी इस भारी सदमेंसे उभर नही पाये है. और शहरमेंतो सब तरफ दहशतका मौहोल बन चूका है. कुछ लोगोंके कहे अनुसार जिन दो शक्स का खुन हूवा है उनके नामपर गंभीर गुनाह दाखिल है. इससे एक ऐसा निष्कर्ष निकाला जा सकता है की जो भी खुनी हो वह गुनाहगारोंकोही सजा देना चाहता है. इसकी वजहसे कुछ आम लोग तो कातिलकी वाहवा कर रहे है...''
'' अगर खुनीको मिडीया अटेंशन चाहिए था तो वह उसमें कामयाब हो चूका है .. हमने लाख कोशीश की लेकिन आखिर कबतक हमभी प्रेससे बाते छुपा पाएंगे'' डिटेक्टीव्ह सॅमने अपने साथीसे कहा. लेकिन सामने बैठा ऑफिसर कुछभी बोला नही. क्योंकी अबभी वह खबरें सुननेंमे व्यस्त था.
जोभी हो यह सब जानकारी अपने डिपार्टमेंटके लोगोंनेही लिक की है...
लेकिन अब कुछभी नही किया जा सकता है...
एक बार धनुष्यसे छूटा तिर वापस नही लाया जा सकता है..
सॅम सोच रहा था. फिर और एक विचार सॅमके दिमागमें चमका -
कही ये अपने सामने बैठेवाला ऑफिसर तो नही... जो सब जानकारीयां लिक कर रहा हो...
सॅम एक अजिब नजरसे उसकी तरफ देख रहा था. लेकिन वह अबभी टिव्हीकी खबरें सुननेमें व्यस्त था.
शहरमें सब तरफ सारी दशहत फैल चूकी थी.
एक सिरीयल किलर शहरमें खुला घुम रहा है....
पुलिस अबभी उसको पकडनेमे नाकामयाब ...
वह और कितने कत्ल करनेवाला है? ...
उसका अगला शिकार कौन होगा?..
और वह लोगोंको क्यो मार रहा है ?...
कुछ कारणवश या युंही ?...
इन सारे सवालोंके जवाब किसीके पासभी नही थे.
क्रमश:...

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Ch-5 : मांस का टूकडा ( hindi sahitya - अद्-भूत ) Hindi

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बाहर एक कॉलनीके प्लेग्राऊंडपर छोटे बच्चे खेल रहे थे. इतनेमें कर्कश आवाजमें सायरन बजाती हूई एक पुलिसकी गाडी वहांसे, बगलके रास्तेसे तेजीसे गुजरने लगी. सायरनका कर्कश आवाज सुनतेही कुछ खेल रहे छोटे बच्चे घबराकर अपने अपने मां बापकी तरफ दौड पडे. पुलिसकी गाडी आयी उसी गतिमें वहांसे गुजर गई और सामने एक मोड पर दाई तरफ मुड गई.
पुलिसकी गाडी सायरन बजाती हूई एक मकानके सामने आकर रुक गई. गाडी रुके बराबर डिटेक्टीव्ह सॅमके नेतृत्वमें एक पुलिसका दल गाडीसे उतरकर मकानकी तरफ दौड पडा.
'' तुम लोग जरा मकानके आसपास देखो...'' सॅमने उनमेंके अपने दो साथीयोंको हिदायत दी. वे दोनो बाकी साथीयोंको वही छोडकर एक दाई तरफसे और दुसरा बाई तरफसे इधर उधर देखते हूए मकानके पिछवाडे दौडने लगे. बाकीके पुलिस और सॅम दौडकर आकर मकानके मुख्य द्वारके सामने इकठ्ठा होगए. उसमेंके एकने , जेफने बेलका बटन दबाया. बेल तो बज रही थी लेकिन अंदर कुछ भी आहट नही सुनाई दे रही थी. थोडी देर राह देखकर जेफने फिरसे बेल दबाई. , इसबार दरवाजा भी खटखटाया.
'' हॅलो ... दरवाजा खोलो.. '' किसीने दरवाजा खटखटाते हूए अंदर आवाज दी.
लेकिन अंदर कोई हलचल या आहट नही थी. आखिर चिढकर सॅमने आदेश दिया , '' दरवाजा तोडो ''
जेफ और और एक दो साथी मिलकर दरवाजा जोर जोरसे ठोक रहे थे.
'' अरे इधर धक्का मारो''
'' नही अंदरकी कुंडी यहा होनी चाहिए... यहां जोरसे धक्का मारो ''
'' और जोरसे ''
'' सब लोग सिर्फ दरवाजा तोडनेमें मत लगे रहो ... कुछ लोग हमें गार्ड भी करो ''
सब गडबडमें आखिर दरवाजा धक्के मार मारकर उन्होने दरवाजा तोड दिया.
दरवाजा तोडकर दलके सब लोग घरमें घुस गए. डिटेक्टीव्ह सॅम हाथमें बंदूक लेकर सावधानीसे अंदर जाने लगा. उसके पिछे पिछे हाथमें बंदूक लेकर बाकी लोग एकदुसरेको गार्ड करते हूए अंदर घुसने लगे. अपनी अपनी बंदूक तानकर वे सब लोग तुरंत घरमें फैलने लगे. लेकिन हॉलमेंही एक विदारक दृष्य उनका इंतजार कर रहा था. जैसेही उन्होने वह दृष्य देखा, उनके चेहरेका रंग उड गया था. उनके सामने सोफेपर पॉल गीरा हूवा था, गर्दन कटी हूई, सब चिजे इधर उधर फैली हूई, उसकी आंखे बाहर आई हूई थी, और सर एक तरफ ढूलका हूवा था. उसकाभी खुन उसी तरहसे हूवा था जिस तरहसे स्टिव्हनका. सारी चिजे इधर उधर फैली हूई थी इससे यह प्रतित हो रहा था की यह भी मरने के पहले बहुत तडपा होगा.
'' घरमें बाकी जगह ढुंढो '' सॅमने आदेश दिया.
टीमके तिनचार मेंबर्स मकानमें कातिलको ढूंढनेके लिए इधर उधर फैल गए.
'' बेडरुममेंभी ढूंढो '' सॅमने ने जाने वालोंको हिदायद दी.
डिटेक्टीव्ह सॅमने कमरेंमे चारो तरफ एक नजर दौडाई. सॅमको टिव्हीके स्क्रिनपर बहकर निचेकी ओर गई खुनकी लकीर और उपर रखा हूवा मांसका टूकडा दिख गया. सॅमने इन्व्हेस्टीगेशन टीमके एक मेंबर को इशारा किया. वह तुरंत टिव्हीके पास जाकर वहा सबूत इकठ्ठा करनेमें जूट गया. बादमें सॅमने हॉलकी खिडकीयोंकी तरफ देखा. इसबार भी सारी खिडकीयां अंदरसे बंद थी. अचानक सोफेपर गीरे किसी चिजने सॅमका ध्यान खिंच लिया. वह वहा चला गया, जो था वह उठाकर देखा. वह एक बालोंका गुच्छा था, सोफेपर बॉडीके बगलमें पडा हूवा. वे सब लोग आश्चर्यसे कभी उस बालोंके गुच्छेकी तरफ देखते तो कभी एक दुसरेकी तरफ देखते. इन्व्हेस्टीगेशन टीमके एक मेंबरने वह बालोंका गुच्छा लेकर प्लास्टीकके बॅगमें आगेकी तफ्तीशके लिए सिलबंद किया. जेफ गडबडाया हूवा कभी उस बालोंके गुच्छेको देखता तो कभी टिव्हीपर रखे उस मांसके टूकडेकी तरफ. उसके दिमागमें... उसकेही क्यों बाकी लोगोंके दिमागमेंभी एक ही समय काफी सारे सवाल मंडरा रहे थे. लेकिन पुछे तो किसको पुछे?
क्रमश:...

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Ch-4 : पॉल रॉबर्टस ( hindi sahitya - अद्-भूत ) Hindi

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पॉल रॉबर्टस, काला रंग, उम्र पच्चीसके आसपास , लंबाई पौने छे फुट, घुंगराले बाल, अपने बेडरुममें सोया था. उसकी बेडरुम मतलब एक कबाडखाना था जिसमें इधर उधर फैला हूवा सामान, न्यूज पेपर्स, मॅगेझीन्स, व्हिस्कीकी खाली बोतले वह भी इधर उधर फैली हूई. मॅगेझीनके कव्हरपर जादातर लडकियोंकी नग्न तस्वीरें दिख रही थी. और बेडरुमकी सारी दिवारे उसके चहती हिरोइन्स की नग्न, अर्धनग्न तस्वीरोसे भरी हूई थी. स्टीव्हनके और पॉलके बेडरुममे काफी समानता थी. फर्क सिर्फ इतनाही था की पॉलके बेडरुमको दो खिडकियां थी और वह भी अंदरसे बंद. और बंद रुम एसी थी इसलिए नही तो शायद सावधानीके तौर थी. वह अपने जाडे, मुलायम, रेशमी गद्दीपर वैसाही जाडा, मुलायम, रेशमी तकीया सिनेसे लिपटाकर बारबार करवट बदल रहा था. शायद वह डिस्टर्ब्ड होगा. काफी समयतक उसने सोनेका प्रयास किया लेकिन उसे निंद नही आ रही थी. आखिर करवट बदल बदलकरभी निंद नही आ रही थी इसलिए वह बेडके निचे उतर गया. पैरमें स्लिपर चढाई.

क्या किया जाए ? ...

ऐसा सोचकर पॉल किचनकी तरफ चला गया. किचनमें जाकर किचनचा लाईट जलाया. फ्रीजसे पाणीकी बोतल निकाली. बडे बडे घुंट लेकर उसने एकही झटकेमें पुरी बोतल खाली कर दी. फिर वह बोतल वैसीही हाथमें लेकर वह किचनसे सिधा हॉलमें आया. हॉलमें पुरा अंधेरा छाया हूवा था. पॉल अंधारेमेही एक कुर्सीपर बैठ गया.

चलो थोडी देर टिव्ही देखते है ...

ऐसा सोचकर उसने बगलमें रखा हूवा रिमोट लेकर टिव्ही शुरु किया. जैसेही उसने टीव्ही शुरु किया डरके मारे उसके चेहरेका रंग उड गया, सारे बदनमें पसिने छुटने लगे, और उसके हाथपैर कांपने लगे. उसके सामने अभी अभी शुरु हूए टिव्हीके स्क्रिनपर एक खुनकी लकीर बहते हूए उपरसे निचेतक आयी थी. गडबडाकर वहं एकदम खडाही हूवा, और वैसेही घबराये हूये हालतमें उसने कमरका बल्ब जलाया.

कमरेंमे तो कोई नही है....

उसने टीव्हीकी तरफ देखा. टिव्हीके उपर एक मांस का टूटा हूवा टूकडा था और उसमेंसे अभीभी खुन बह रहा था.

चलते, लडखडाते हूए वह टेलीफोनके पास गया और अपने कपकपाते हाथसे उसने एक फोन नंबर डायल किया.

क्रमश:...

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Ch-3 : पोस्टमार्टम रिपोर्ट ( hindi Novels - अद्-भूत ) Hindi Sahitya

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डिटेक्टीव्ह सॅम अपने पुलिस स्टेशनमें अपने ऑफीसमें बैठा था. उतनेमें एक ऑफीसर वहा आ गया. उसने पोस्टमार्टमके कागजात सॅमके हाथमें थमा दीये. जब सॅम वह कागजात उलट पुलटकर देख रहा था वह ऑफिसर उसके बगलमें बैठकर सॅमको इन्वेस्टीगेशनके बारेमें और पोस्टमार्टमके बारेमें जानकारी देने लगा.

" मौत गला कटनेसे हूई है, और गला जब काटा गया तब स्टीव्हन शायद निंदमें होगा ऐसा इसमें लिखा है लेकिन कातिलने कौनसा हथीयार इस्तेमाल किया गया होगा इसका कोई पता नही चल रहा है. " वह ऑफिसर जानकारी देने लगा. .

" ऍ़मॅझींग ?" डिटेक्टीव सॅम मानो खुदसेही बोला.

'' और वहा मीले बालोंका क्या ?''

'' सर हमने उसकी जांच की ... लेकिन वे बाल आदमीके नही है ''

'' क्या आदमीके नही ? ...''

'' फिर शायद किसी भूतके होंगे... .'' वहां आकर उनके बातचीतमें घुसते हूए एक ऑफिसरने मजाकमें कहा.

भलेही उसने वह बात मजाकमें कही हो लेकिन वे एकदुसरेके मुंहको ताकते हूए दोतीन पल कुछभी नही बोले . कमरेमे एक अजीब अनैसर्गीक सन्नाटा छाया हूवा था.

'' मतलब वह कातिलके कोट के या जर्कीनके हो सकते है...'' सॅमके बगलमें बैठा ऑफिसर बात को संभालते हूए बोला.

'' और उसके मोटीव्हके बारेमें कुछ जानकारी ?''

'' घरकी सारी चिजे तो अपने जगह पर थी... कुछ भी किमती सामान चोरी नही गया है ... और घरमें कहीभी स्टीव्हनके हाथके और उंगलीयोंके निशानके अलावा और किसीकेभी हाथके या उंगलीयोंके निशान नही मिले... '' ऑफिसरने जानकारी दी.

'' अगर कातील भूत हो तो उसे किसी मोटीव्हकी क्या जरुरत?'' फिरसे वहां खडे अफसरने मजाकमें कहा.

फिर दो तीन पल सन्नाटेमें गए.

'' देखो ऑफिसर ... यहा सिरीयस मॅटर चल रहा है... आप कृपा करके ऐसी फालतू बाते मत करो...'' सॅमने उस अफसरको ताकीद दी.

'' मैने स्टीव्हनकी फाईल देखी है ... उसका पहलेका रेकॉर्ड कुछ उतना अच्छा नही... उसके खिलाफ पहलेसेही बहुत सारे गुनाहोके लिए मुकदमें दर्ज है... कुछ गुनाह साबीतभी हूए है और कुछपर अबभी केसेस जारी है... इससे ऐसा लगता है की हम जो केस हॅन्डल कर रहे है वह कोई आपसी दुष्मनी या रंजीशकी हो सकती है....'' सॅम फिरसे असली बात पर आकर बोला.

'' कातिलने अगर किसी गुनाहगारकोही मारा हो तो... '' बगलमें खडे उस ऑफिसरने फिरसे मजाक करनेके लिए अपना मुंह खोला तो सॅमने उसके तरफ एक गुस्सेसे भरा कटाक्ष डाला.

'' नही मतलब अगर वैसा है तो... अच्छाही है ना... एक तरहसे वह अपनाही काम कर रहा है... शायद जो काम हमभी नही कर पाते वह काम वह कर रहा है '' वह मजाक करनेवाला ऑफिसर अपने शब्द तोलमोलकर बोला.

'' देखो ऑफिसर ... हमारा काम लोगोंकी सेवा करना और उनकी हिफाजत करना है...''

'' गुनाहगारोंकीभी ?'' उस ऑफिसरने व्यंगात्मक ढंगसे कडवे शब्दोमें पुछा.

इसपर सॅम कुछ नही बोला. या फिर उसपर बोलनेके लिए उसके पास कुछ लब्ज नही थे. .

क्रमश:...

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Ch-2 : सबूत ( hindi upanyas - अद्-भूत ) Hindi

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सुबह सुबह रास्तेपर लोगोंकी अपने अपने कामपर जानेकी जल्दी चल रही थी. इसलिए रास्तेपर काफी चहलपहल थी. ऐसेमें अचानक एक पुलिसकी गाडी उस भिडसे दौडने लगी. आसपासका माहौल पुलिसके गाडीके सायरनकी वजहसे गंभीर हो गया. रास्तेपर चलरहे लोक तुरंत उस गाडीको रस्ता दे रहे थे. जो पैदल चल रहे थे वे उत्सुकतासे और अपने डरे हूए चेहरेसे उस जाती हूई गाडीकी तरफ मुड मुडकर देख रहे थे. वह गाडी निकल जानेके बाद थोडी देर माहौल तंग रहा और फिर फिरसे पहले जैसा नॉर्मल होगया.


एक पुलिसका फोरेन्सीक टीम मेंबर बेडरुमके खुले दरवाजेके पास कुछ इन्वेस्टीगेशन कर रहा था. वह उसके पास जो बडा जाडा लेन्स था उसमेंसे जमीनपर कुछ मिलता है क्या यह ढुंढ रहा था. उतनेमें एक अनुशासनमे चल रहे जुतोंका 'टाक टाक' ऐसा आवाज आगया. वह इन्व्हेस्टीगेशन करनेवाला पलटकर देखनेके पहलेही उसे कडे स्वरमें पुछा हूवा सवाल सुनाई दिया '' बॉडी किधर है ? ''

'' सर इधर अंदर ..'' वह टीम मेंबर अदबके साथ खडा होता हूवा बोला.

डिटेक्टीव सॅम व्हाईट, उम्र साधारण पैंतिस के आसपास, कडा अनुशासन, लंबा कद, कसा हूवा शरीर , उस टीममेंबरने दिखाए रास्तेसे अंदर गया.

डिटेक्टीव सॅम जब बेडरुममें घुस गया तब उसे स्टीवनका शव बेडपर पडा हूवा मिल गया. उसकी आखें बाहर आयी हूई और गर्दन एक तरफ ढूलक गई हूई थी. बेडपर सबतरफ खुन ही खुन फैला हूवा था. उसका गला काटा हूवा था. बेडकी स्थीतीसे ऐसा लग रहा था की मरनेके पहले स्टीव्हन काफी तडपा होगा. डिटेक्टीव सॅमने बेडरुममें चारो तरफ अपनी नजर दौडाई. फोरेन्सीक टीम बेडरुममेंभी तफ्तीश कर रही थी. उनमेंसे एक कोनेमें ब्रशसे कुछ साफ करने जैसा कुछ कर रहा था तो दुसरा कमरेंमे अपने कॅमेरेसे तस्वीरें लेनेमें व्यस्त था.

एक फोरेन्सीक टीम मेंबरने डीटेक्टीव सॅमको जानकारी दी -

" सर मरनेवालेका नाम स्टीव्हन स्मीथ'

' फिंगरप्रींटस वैगेरे कुछ मिला क्या?"

' नही कमसे कम अबतक तो कुछ नही मिला '

डिटेक्टीव सॅमने फोटोग्राफरकी तरफ देखते हूए कहा, '' कुछ छुटना नही चाहिए इसका खयाल रखो''

'' यस सर '' फोटोग्राफर अदबके साथ बोला.

अचानक सॅमका ध्यान एक अजीब अप्रत्याशीत बात की तरफ आकर्षीत हूवा .

वह बेडरुमके दरवाजेके पास गया. दरवाजेका लॅच और आसपासकी जगह टूटी हूई थी.

'' इसका मतलब खुनी शायद यह दरवाजा तोडकर अंदर आया है '' सॅमने कहा.

जेफ, लगभग पैतीसके आसपास, छोटा कद, मोटा, उसका टीम मेंबर आगे आया, '' नही सर, असलमें यह दरवाजा मैने तोडा... क्योंकी हम जब यहां पहूंचे तब दरवाजा अंदरसे बंद था. ''

'' तुमने तोडा ?'' सॅमने आश्चर्यसे कहा.

'' यस सर''

'' क्या फिरसे अपने पहलेके धंदे शुरु तो नही किये ?'' सॅमने मजाकमें लेकिन चेहरेपर वैसा कुछ ना दिखाते हूए कहा.

'' हां सर ... मतलब नही सर''

सॅमने पलटकर एकबार फिरसे कमरेमें अपनी पैनी नजर दौडाई, खासकर खिडकीयोंकी तरफ देखा. बेडरुमको एकही खिडकी थी और वहभी अंदरसे बंद थी. वह बंद रहना लाजमी था क्योंकी रुम एसी थी.

'' अगर दरवाजा अंदरसे बंद था ... और खिडकीभी अंदरसे बंद थी ... तो फिर कातिल कमरेमें कैसे आया... ''

सब लोग आश्चर्यसे एकदुसरेकी तरफ देखने लगे.

'' और सबसे महत्वपुर्ण बात की वह अंदर आनेके बाद बाहर कैसे गया?'' जेफने कहा.

डिटेक्टीव्हने उसकी तरफ सिर्फ घुरकर देखा.

अचानक सबका खयाल एक इन्वेस्टीगेटींग ऑफिसरने अपनी तरफ खिंचा. उसको बेडके आसपास कुछ बालोंके टूकडे मिले थे.

'' बाल? ... उनको ठिकसे सिल कर आगेके इन्व्हेस्टीगेशनके लिए लॅबमें भेजो ' सॅमने आदेश दिया.

क्रमश:...

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Ch-1 : चिख ( hindi novel - अद्-भूत ) Hindi

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घना अंधेरा और उपरसे उसमें जोरोसे बरसती बारीश. सारा आसमंत झिंगुरोंकी 'किर्र' आवाजसे गुंज रहा था. एक बंगलेके बगलमें खडे एक विशालकाय वृक्षपर एक बारीशसे भिगा हूवा उल्लू बैठा हूवा था. उसकी इधर उधर दौडती नजर आखीर सामने बंगलेके एक खिडकीपर जाकर रुकी. वह बंगलेकी ऐकलौती ऐसी खिडकी थी की जिससे अंदरसे बाहर रोशनी आ रही थी. घरमें उस खिडकीसे दिख रहा वह जलता हुवा लाईट छोडकर सारे लाईट्स बंद थे. अचानक वहा उस खिडकीके पास आसरेके लिए बैठा कबुतरोंका एक झुंड वहांसे फडफडाता हूवा उड गया. शायद वहां उन कबुतरोंको कोई अदृष्य शक्तीका अस्तीत्व महसुस हूवा होगा. खिडकीके कांच सफेद रंगके होनेसे बाहरसे अंदरका कुछ नही दिख रहा था. सचमुछ वहा कोई अदृष्य शक्ती पहूंच गई थी ? और अगर पहूंची थी तो क्या उसे अंदर जाना था? लेकिन खिडकी तो अंदर से बंद थी.


बेडरुममें बेडपर कोई सोया हूवा था. उस बेडवर सोए सायेने अपनी करवट बदली और उसका चेहरा उस तरफ हो गया. इसलिए वह कौन था यह पहचानना मुश्कील था. बेडके बगलमें एक ऐनक रखी हूई थी. शायद जो भी कोई सोया हूवा था उसने सोनेसे पहले अपनी ऐनक निकालकर बगलमें रख दी थी. बेडरुममे सब तरफ दारुकी बोतलें, दारुके ग्लास, न्यूज पेपर्स, मासिक पत्रिकाएं इत्यादी सामान इधर उधर फैला हूवा था. बेडरुमका दरवाजा अंदरसे बंद था और उसे अंदरसे कुंडी लगाई हूई थी. बेडरुमको सिर्फ एकही खिडकी थी और वहभी अंदरसे बंद थी - क्योंकी वह एक एसी रुम थी. जो साया बेडपर सोया था उसने फिरसे एकबार अपनी करवट बदली और अब उस सोए हुए साएका चेहरा दिखने लगा. स्टीव्हन स्मीथ, उम्र लगभग पच्चीस छब्बीस, पतला शरीर, चेहरेपर कहीं कहीं छोटे छोटे दाढीके बाल उगे हूए, आंखोके आसपास ऐनककी वजहसे बने काले गोल गोल धब्बे. वह कुछतो था जो धीरे धीर स्टीव्हनके पास जाने लगा. अचानक निंदमेंभी स्टीव्हनको आहट हूई और वह हडबडाकर जग गया. उसके सामने जो भी था वह उसपर हमला करनेके लिए तैयार होनेसे उसके चेहरेपर डर झलक रहा था, पुरा बदन पसिना पसिना हुवा था. वह अपना बचाव करनेके लिए उठने लगा. लेकिन वह कुछ करे इसके पहलेही उसने उसपर, अपने शिकारपर हमला बोल दिया था. पुरे आसमंतमें स्टीव्हनकी एक बडी, दर्दनाक, असहाय चिख गुंजी. और फिर सब तरफ फिरसे सन्नाटा छा गया ... एकदम पहले जैसा...


क्रमश:...

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Hindi Songs

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अल्बम - आम्ही पुणेरी
(Officially launched by Padmashree A।R.Rahman (The legendary Music Composer ) on 4th May 2006 @ 8PM;)
संगीत - प्रशांत
गीत - सुनिल डोईफोडे

1. दूर...
(A Hindi Song for todays youth )
स्वर - प्रिती, संजय और कोरस
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2. मंजूळ झुळझुळ
(A Marathi Romantic Number)
स्वर - विनिता

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Hindi Novels - अगला उपन्यास अद-भूत (Horror, Suspense, thiller) अब इस ब्लॉगपर शुरू होगा.

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यह उपन्यास मेरे अंग्रेजी स्क्रिनप्ले 'लॅच्ड' (Horror, Suspense, thiller) पर आधारीत है. यह स्किनप्ले फिल्म रायटर्स असोसिएशन, (FWA) यहां पंजीकृत किया गया है। यह उपन्यास मराठी मे पहलेही शुरू किया जा चुका है ।

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'शून्य' - (Shunya) Hindi Suspense Thriller Complete Novel

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Ch-1:हैप्पी गो अनलकी
Ch-2 आसमान गिर पड़ा
Ch-3 वर्ल्ड अंडर अंडरवर्ल्ड
Ch-4 : वह कहाँ गई?
Ch-5 : दिल विल...
Ch-6 : ब्लैंक मेल
Ch-7 : दिल है कि ...
Ch-8 : और एक ? ...
Ch-9A : पहली गलती ? ...
Ch-9B : पहली गलती ? ...
Ch-10: माय गॉड ...
Ch-11: गद्दार ...
Ch-12A: फर्स्ट डेट ...
Ch-12B: फर्स्ट डेट ...
Ch-13: शुन्यकी तस्वीर... ...
Ch-14: पिछा ...
Ch-15: क्या हूवा? ...
Ch-16: मधूर मिलन ...
Ch-17: बॉसका फोन ...
Ch-18: कमांड2की चाल ...
Ch-19: चाल फंसी? ...
Ch-20: बॉसका मेसेज. ...
Ch-21: जॉनके बॉसकी व्हीजीट.. ...
Ch-22: डिटेक्टीव्ह
Ch-23: हॅपी बर्थ डे
Ch-24: मिस उटीन हॉपर
Ch-25: घात प्रतिघात
Ch-26: ऋषी
Ch-27: तफ्तीश
Ch-28: रेड
Ch-29: बॉसका फोन
Ch-30A: प्रेस कॉंन्फरंन्स
Ch-30B: प्रेस कॉंन्फरंन्स
Ch-31: पॉलीटीक्स
Ch-32: व्हॅकेशन
Ch-33: एक धागा
Ch-34A: फिशींग
Ch-34B: फिशींग
Ch-35: चार घंटे उधार

Ch-36: प्रपोज
Ch-37: चांदनी रात
Ch-38: डीटेक्टीव्ह का फोन
Ch-39: छुट्टीमें व्यवधान
Ch-40: डिटेक्टीव ऍलेक्स
Ch-41: मेडीयाके साथ पाला
Ch-42: शुन्यकी खोज किसने की ?
Ch-43: फिरसे प्रेस कॉन्फरन्स
Ch-44: एक तिर दो निशाने
Ch-45: आय ऍम सॉरी
Ch-46: गुगल सर्च
Ch-47: यस्स !
Ch-48: ओके देन कॉल द मिटींग
Ch-49A: मिटींग
Ch-49B: मिटींग
Ch-49C: मिटींग
Ch-50A: ऑडीओ
Ch-50B: ऑडीओ
Ch-51: आग भडक उठी
Ch-52: ब्रम्ह है परिपूर्ण
Ch-53: वाय स्टार
Ch-54: हिलव्ह्यू अपार्टमेंट
Ch-55: दिवारपर लिखा आखरी मेसेज
Ch-56: आखरी शिकार
Ch-57: आखरी शिकार
Ch-58 : यादें
Ch-59A : आर्यभट्ट
Ch-59B : आर्यभट्ट
Ch-60 : देर रात गए
Ch-61 : कंपाऊंड के अंदर
Ch-62 : लता
Ch-63 : रेकॉर्ड डिटेल्स
Ch-64 : डॉ. कयूम खान
Ch-65 : पेपर रोल
Ch-66A : झीरो मिस्ट्री
Ch-66B : झीरो मिस्ट्री
Ch-67A : शुन्यसे शुन्यकी ओर
Ch-67B : शुन्यसे शुन्यकी ओर
- समाप्त -
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Ch-67B : शुन्यसे शुन्यकी ओर ( upanyas - शून्य) Hindi

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शहर पोलीस ब्रांचप्रमुख बाहर बाल्कनीमें बैठे हूए चायका आनंद ले रहा था. वह अब रिटायर हो चूका था. सच कहा जाए तो वह रिटायर होनेसेही जॉन केसपर ठिक ढंगसे काम कर पाया था. और तहकिकात का पुरा जिम्मा और क्रेडीट उसे मिल पाया था. शहर पोलीस शाखाप्रमुख एक आतंकवादी ऑरगनायझेशनका मेंबर था. उसी आतंकवादी ऑरगनायझेशनके उपरके पदाधिकारीयोंसे जॉन जिस केस पर काम कर रहा था उसमें रुकावट डालनेके उसको आदेश थे. डॉ. कयूम खान और शहर पोलीस शाखाप्रमुख उनका वैसे आमनेसामने कोई संबंध नही था. जिस ऑरगनायझेशनका डॉ. कयूम खान मेंबर था उसी आतंकवादी ऑरगनायझेशनका शहर पोलीस शाखाप्रमुखभी मेंबर था. जब डॉ. कयूम खानको अपने भविष्यमें आनेवाले खतरेका अहसास हूवा तभी उसने उसका काम किसी औरके पास सौपानेकी बिनती उपरके अधिकारीयोंके पास की थी. और उसके वरिष्ठोने उसे रिटायर्ड शहर पोलीस शाखाप्रमुखका नाम सुझाया था.

आरामसे चायका एक एक घूंट लेकर रिटायर्ड शहर पोलीस शाखाप्रमुख एक एक बात याद कर रहा था. मरनेके एक दिन पहले डॉ. कयूम खान उसे मिलनेके लिए आया था. वह जब आया था तब उसने सिर्फ इतनीही अपनी पहचान बताई थी की उसे ऑरगनायझेशनके वरिष्ठोंने उसके पास भेजा है. वैसे वह जादा कुछ बोला नही था. सिर्फ प्लास्टीकमें लपेटी हूई कुछ चिज उसके हवाले कर वह उसे कामयाबीकी दुहाई देकर वहांसे चल दिया था. जब डॉ. कयूम खान मारा गया और उसके फोटो न्यूज पेपरमें आगए तभी रिटायर्ड शहर पोलीस शाखाप्रमुखको पता चला था की वह डॉ. कयूम खान था.

चाय खतम कर रिटायर्ड शहर पोलीस शाखाप्रमुखने अपनी गोदमें रखी प्लास्टीकमें लपेटी हूई वह चिज खोली. उसमें सूचनावजा जानकारी देनेवाले कुछ कागजाद थे. उसने वह कागजाद पढकर देखे. जैसे जैसे वह आगे पढने लगा उसके सासोंकी गती बढने लगी. उसमें एक नवचैतन्य दिखने लगा था. वह भलेही शहर पोलीस शाखाप्रमुखके पदसे रिटायर हो गया था, ऑरगनायझेशनने उसे डॉ. कयूम खानकी तरफसे झीरो मिस्ट्रीकी अगली जिम्मेवारी सौंपी थी. उसने वह कागजाद बाजूमें रखकर उस प्लास्टीकके अंदर झांककर देखा. उसमें एक पुराना जिर्ण हूई किताब रखी थी. उसने वह किताब अपने हाथमें लिया और वह उसके पन्ने बडी सावधानीके साथ पलटने लगा. उस किताबके बारेंमे अंग्रेजी नोट्सभी उस किताबके पन्नोके बिच रखे थे. वह वह नोट्स पढने लगा. डॉ. कयूम खानने आपनेपास था वह ज्ञान रिटायर्ड शहर पोलीस शाखाप्रमुखाकके पास हस्तांतरीत किया था. रिटायर्ड शहर पोलीस शाखाप्रमुख खुशीसे फुला नही समा पा रहा था. वह सोचने लगा ...

की यह उसका ऑरगनायझेशनके प्रति जो निष्ठा उसने रखीथी उसका नतिजा था या फिर विधीलिखीत...

उस किताबमें लिखी नोट्स पढते पढते उसका विश्वास दृढ होने लगा था की यह सब शायद विधीलिखीतही होना चाहिए...


स्वच्छ और शुभ्र नदीका बहता हूवा पाणी मधूर संगीत बिखेर रहा था. उस बहते पाणीकी साथ नदीके किनारेसे वह ऋषी चलने लगा. थोडी देरमें चलते हूए वह अपनी गुंफाके पास पहूंच गया. गुंफाके पास पहूचतेही वह रुका और उसने चारो ओर अपनी नजर दौडाई. मानो प्रकृतीका सौंदर्य उसने अपने तेजस्वी आंखोसे पी लीया हो. फिर धीरे धीरे मंद गतीसे वह अपने गुंफाकी तरफ जाने लगा. गुंफाके द्वारमें रुककर उसने फिरसे एक बार मुडकर नदीकी तरफ देखा. फिर उसने अपनी गुंफामें प्रवेश किया. गुंफामें मंद मंद रोशनी थी. धुंधली रोशनीमें वह अपने आसनके पास चला गया. अपना आसन ठिक कर वह फिरसे ध्यान धारणाके लिए उसपर बैठ गया. धुंधली रोशनीमेंभी उसके चेहरेपर एक तेज झलक रहा था. उसके सरके आसपास एक गोल आभा फैली हूई दिख रही थी.

गोल... किसी बडे शून्यक तरह ...

फिर उसकी दृष्टी धीरे धीरे स्थिर हो गई ... शून्यमें...

आंखे धीरे धीरे बंद होगई. और वह ध्यानस्थ हो गया. काल स्थल और अपने नश्वर शरीर के परे उसका सुक्ष्म अहसास मानो आजाद होकर विचर करने लगा.

फिर कुछभी नही ...

शून्य विचार, शून्य अस्तित्व...

बिलकूल शून्य!

सब कुछ शून्यही शून्य!


- समाप्त -


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Ch-67A : शुन्यसे शुन्यकी ओर (शून्य-उपन्यास) Hindi

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जॉनकी कार तेज गतिसे रास्तेपर दौड रही थी. कार जैसे जैसे शहरके बाहर जा रही थी वैसे वैसे रास्तेपर यातायात कम होती नजर आ रही थी. जॉनको अकेलापण कुछ जादाही महसूस होने लगा. जॉन रास्तेके किनारे देखने लगा. रास्तेके किनारेभी अब मकानोकी भिड कम होती नजर आ रही थी. थोडा आगे जाकर जॉनकी कार रास्तेके बायी तरफ मुडकर एक कच्चे रास्तेपर दौडने लगी. गाडी चलाते वक्त रास्तेपर मानो धुलके बादल उठ रहे थे. उस वजहसे और रास्ताभी कच्चा होनेसे जॉनके गाडीकी गती कम हो गई थी. आखीर जॉनकी गाडी एक बडे खाली फेन्सके पास रुक गई. गाडी रास्तेके किनारे पार्क कर जॉन गाडीसे उतर गया. गाडीके पिछले सिटपर रखा एक बडा फुलोंका हार उसने अपने हाथोंमें लिया. उसने सामने देखा. फेन्सके दरवाजेपर एक बडा सिमेटरीका पुराना हूवा बोर्ड लगा हूवा था. जॉन वह फुलोंका बडा गोल हार (रीथ) लेकर सिमेटरीमें दाखील हूवा. अंदर जानेके बाद उसका दिल और ही भारी भारी हो गया था. उसके चलनेकी गती धीमी हो गई थी. वह वैसेही भारी मनसे अंदर जाकर एक समाधीके सामने खडा हो गया. उसने समाधीपर खुदे अक्षरोंपर एक नजर घुमाई. वह अँजेनीकी समाधी थी. थोडी देर वैसेही स्तब्ध खडे रहकर उसने झुककर वह गोल हार उसके समाधीपर रखा और घूटने टेककर वह शांतीसे आंखे मुंदकर उसको आत्मशांती मिलनेके लिए प्रार्थना करने लगा. उसे उसकी वह गंभीर, अल्लड, भोली, लोभस, अदाए याद आने लगी. उसका दिल भर आने लगा था.

उसने अँजेनीके साथ पूरी जिंदगी व्यतित करनेका निश्चय किया था. लेकिन नियतीके सामने उसके निश्चयको क्या किमत थी?..

शून्य...

उसखी आंखे भर आयी और उससे आंसू बहने लगे. एक वडासा आंसू बहते हूए उसके गालपरसे होकर अँजेनीके समाधीपर रखे गोल हारके एकदम बिचोबिच जाकर गिरा. थोडी देर बाद उसने किनारेंको आंसू लगी हूई अपनी पलके खोली. उसकी नजर सामने रखे गोल हारकी तरफ गई.

' सचमुछ कितना अनोखा है आदमीका जिवन..' वह सोचने लगा. '... शून्यसे आना और आखिर शून्यमेंही विलीन हो जाना'

क्रमश:...

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Ch-66B : झीरो मिस्ट्री (शून्य-उपन्यास) Hindi

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रिपोर्टरोंके सवालोंका तांता शुरु हो गया.

" यह डॉ. कयूम कौन है? "

" विनय जोशी और उसका आपसमें क्या संबंध है?"

" वे किस ऑरगनायझेशनके तालूकात रखते थे?"

" दोनोभी एकसाथ कैसे मारे गये? कमसे कम एक तो जिवित रहना चाहिए था"

" पुलिस कुछ छिपानेका प्रयास तो नही कर रही है?"

" दोनोंको मारकर यह केस खत्म हूवा ऐसा कैसे मान ले?"

" यह आतंकवाद अब किस हद तक जायेगा?"

" हिंदू आतंकवाद! यह और एक नया आतंकवाद? "

" वन अॅट अ टाईम प्लीज " जॉनका आत्मविश्वाससे भरा स्वर गुंजा.

उसके आवाजसे सब लोग थोडे शांत होगए.

" आज मेरे पास इस केससे सबंधीत सारे सवालोंके जवाब तैयार है. इसलिए थोडा धीरज रखो और वैसेभी अब केस खतम होनेसे मै एकदम खाली हूं ... मुझेभी कोई जल्दी नही है.. " आज पहली बार जॉन पत्रकारोंके सामने खुलकर बोल रहा था.

पत्रकारोंमे थोडी हंसी की लहर दौड गई. मौहोल थोडा हंसी मजाकका बन गया.

एक रिपोर्टर सवाल पुछनेके लिए सामने आया.

" मुझे लगता है हिंदू आतंकवादसे अमरिकाका पहली बार सामना हो रहा होगा. इसे कितने गंभीरतासे लेना चाहिए.? "

जॉन बोलने लगा -

" यह 'झीरो मिस्ट्री' कोई मामूली घटना ना होकर अमरिकाके इतिहासमें पहली बार दुष्मनने सोच समझकर और चालाकीसे रची हूई एक चाल है. इस घटनाके तहतक जाकर हमें जो तथ्योंका पता चला है वह सारे तथ्य आपके सामने रखनेसे आपको यह बात पता चल जायेगी.

तथ्य क्रमांक 1 - इस 'झीरो मिस्ट्री' का हिंदू आतंकवाद या हिंदू धर्मसे कोई दुरकाभी वास्ता या संबध ना होकर जानबुझकर वैसा आभास तैयार किया गया है.

तथ्य क्रमांक 2 - 'झीरो मिस्ट्री' का जनक 'डॉ. कयूम खान' किसीभी हिंदू ऑर्गनायझेशनसे संबंधित ना होकर उसका सिधा सिधा संबंध 'लष्करे कायदा' इस आतंकवादी ऑर्गनायझेशनसे आता है. यह ऑर्गनायझेशन 'लष्करे तोयबा' या 'अल कायदा' इन आतंकवादी और प्रतिबंधीत ऑर्गनायझेशनका आयसोटोप हो सकती है और ये लोग उनके हस्तक हो सकते है. उनका काम करनेका तरीका और उनके ऑर्गनायझेशनका उगम देखते हूए यह बाते ध्यानमें आती है.

तथ्य क्रमांक 3 - 'झीरो मिस्ट्री' मसलेको हम प्रॉक्सी आतंकवाद कह सकते है. उनका उद्देश भारत और अमेरिकाके सुधरते संबंध, उनका अण्वस्त्र करार, उनकी एक दुसरे पर निर्भर आर्थिक परिस्थिती देखते हूए इन दो देशोमें दरार बनाकर दोनो देशोंको आर्थिक हानी पहूचाना था.."

जॉनने एक दीर्घ सांस लेकर फिर आगे बोलने लगा -

" इसलिए मै सारी दुनियाको तुम पत्रकारोंके जरीये फिरसे बताना चाहता हू की 'झीरो मिस्ट्री' यह हिंदू आतंकवाद ना होकर वैसा आभास तैयार किया गया था... आप लोग अमेरिकन हो या हिन्दोस्तानी हो ... इस आभास के झासें मे नही आना चाहिए... इसमे नुकसान दोनोंका है ... जितना अमेरिकाका उतनाही हिन्दोस्तानकाभी.'

" लेकिन इंटरनेटपर एक ऑडीओ रिलीज की गई थी उसका क्या? ... उससे तो अलग ही मतलब निकलता है...'' एक रिपोर्टरने बिचमेंही पुछा.

फिरसे जॉन बोलने लगा.

" वह एक भारतीय लोगोंको अमेरिकन लोगोंके खिलाफ और अमेरिकन लोगोंको भारतीय लोगोंके खिलाफ भडकानेकी एक साजिश थी और दुर्भाग्यसे वे लोगे उसमें कामयाब भी हूए थे'

" लेकिन इस 'झीरो मिस्ट्री' से अमरिकाको क्यो नुकसान होगा?...मुझे नही लगता की इससे जानमालका जो थोडाबहुत नुकसान हूवा वह छोडकर अमेरीकाको दुसरा कोई नुकसान हो सकता है... "

" उन लोगोंने जैसे इस शहरमें 'झीरो मिस्ट्री' खुनी शृंखला पुरी कर सारी अराजकता मचा दी थी. .. वैसीही अमेरिकाके अन्य बडे शहरोमें 'झीरो मिस्ट्री' खुनी शृंखला चलानेका उनका मनसुबा था. .... सौभाग्यसे हमने उनको उसमें कामयाब नही होने दिया है ... इस सब घटनाक्रममें उपर उपर से ऐसा लगता है की अमेरीकाका उसमें कोई नुकसान नही ...लेकिन सोचसमझकर देखनेके बाद पता चलता है की ... आजके स्थितीमें भारत यह एकमेव ऐसा देश है की जिनके लोग यहां बडे पैमानेपर जॉबके लिए आए हूए है... उनमेंके कुछ लोगोंको अमेरिकन नाकरीकत्वभी मिल चूका है... इन लोगोंको अगर एक साथ भडकाकर उनको नुकसान पहूचाया या फिर उनको सिर्फ निष्क्रीयभी किया तो अमेरिकेमें बडे पैमानेपर काम बंद होगा और परिणामत: अमेरिकाके इकॉनॉमीपर उसका जरुर गलत असर पडेगा. .... उसी तरह आज अमेरिकाकी काफी कंपनीयां भारतमें निवेश कर चूकी है... वहा भारतमेंभी अगर उनके खिलाफ प्रतिकूल परिस्थिती निर्माण हो गई तो उसका सिधा असर उन कंपनीयोंको ... और परीणामत: अमेरिकाकी इकॉनॉमीपर होने वाला है. "

" और इस 'झीरो मिस्ट्री'से भारतका किस तरहका नुकसान होगा?" एक भारतीय मूलके पत्रकारने पुछा. "काफी लोगोंको पता होगा या उन्होने सुना होगा ... की 90 के दशकमें एक वक्त ऐसा आया था की भारतीय अर्थव्यवस्था पुरीतरह ढहनेके कगार पर थी... तब परकीय चलन पानेके लिए रिजर्व बॅकको आखरी उपायके तौर पर बडे पैमानेपर आरक्षित किया हूवा सोना बेचना पडा था. .... लेकिन उस वक्त भारतीय अर्थव्यवस्थाको जो गती मिली थी वह एनआरआय लोगोंके भारतमें किये निवेशकी वजहसे. ... और इस तरह परकीय चलनकी जो कमी थी वह पूरी हो गई थी... उस वक्त एक अच्छी बात भी हूई की ... धीरे धीरे उनकी सॉफ्टवेअर इंडस्ट्रीभी समृध्दीकी ओर बढने लगी थी ... आगे चलकर भारत अमेरिका और वहांके सॉफ्टवेअर कंपनीके लिए आऊट सोर्सीग करने लगा.. .. आजभी ऐसे हालात है की भारतीय अर्थव्यवस्था बडे पैमानेपर आऊट सोर्सीगपर निर्भर है... यह 'झीरो मिस्ट्री' मसला अगर और बिगड गया तो भारतका आऊटसोर्सीग और विदेशी कंपनीयोंका भारतमें निवेश रुक जाएगा... और परीणाम स्वरुप भारतीय अर्थव्यवस्था बुरी तरह गडबडा जाएगी... कोई माने या ना माने ....आज के स्थितीमें भारत और अमेरिकाका रिश्ता एकदूसरेका हाथ पकडकर आगे चलनेका है... इस रिश्तेमें अगर दरार आ जाये तो हानी दोनोंकोभी भूगतनी पडेगी ... "

जॉनने किसी अर्थतज्ञकी तरह भारतीय और अमेरिकन अर्थव्यवस्थाका तर्कसंगत विश्लेषण किया.

" लेकिन सिर्फ डॉ. कयूम या विनय जोशी सरीके लोगोंको मारकर या पकडकर क्या इस समस्याका समाधान होनेवाला है ?"

एक रिपोर्टरने सवाल पुछा.

"नही ... दुर्भाग्यसे इसका जवाब 'नही' ऐसा है ...क्योकी भारत और अमेरिकामें दरार बनाना उस ऑर्गनायझेशनकी एक कोशीश थी... और डॉ. कयूम क्या या फिर विनय जोशी क्या ये तो उनके हाथके सिर्फ खिलौने थे.... भविष्यमें ऐसे औरभी प्रयास हो सकते है... फर्क सिर्फ इतनाही रहेगा की उस वक्त डॉ. कयूम या विनय जोशीकी जगह दुसरा कोई होगा.. ."

" फिर अब इस सबका हल क्या है ?" एक रिपोर्टरने अगला सवाल पुछा.

" इसका हल एकही है ... की अमेरिकन , भारतीय अमेरिकन और भारतीय लोगोंने अपनी सद्विवेक बुध्दी सही सलामत रखकर इस सबमें छिपी हूई चाल और तीव्रता समझ लेना जरुरी है.. और उन्हे तुरंत सारे दंगाफसाद रोकने चाहिए... अगर वैसा नही हुवा तो दुष्मन अपने इरादोंमें पुरी तरह कामयाब हुये जैसा होगा... अगर हमनें आपसमेंही दंगाफसाद किये तो वह अपनेही पैर पर कुलाडी मारने जैसा होगा... और फिर हमें अपने पतनसे कोई नही बचा पाएगा... अब वक्त आ गया है की लोगोंने होशीयार और सतर्क होना चाहिए... किसीकेभी भडकाने या बहलावेमें ना आकर खुदकी आखे खुली रखकर खुदके सद्विवेक बुध्दीसे खुदके निर्णय लेनेका अब वक्त आया है..."

अब रिपर्टरोंके सवाल उस एक घटनासे संबंधित ना रहकर आतंकवाद इस जागतिक मुद्देपर होने लगे थे. इसलिए जॉनने अब प्रेस कॉन्फरंन्स समेटकर वहांसे निकलना ही बेहतर समझा. क्योकी आतंकवादपर बोलना यह कोई प्रेस कॉन्फरन्स का हेतू नही था. और उस विषयपर भाष्य करना जॉनको उचीत नही लग रहा था. जिस केसपर जानकारी देनेके लिए यह प्रेस कॉन्फरंन्स बुलाई गई थी वह पुरी जानकारी जॉनने दी थी.

"इस तरह सब लोगोंपर सौंपकर पुलिस कैसे क्या अपने कर्तव्यसे मुंह मोड ले सकते है.?... उनकीभी लोगोंके प्रती कुछ जिम्मेदारीयां बनती है.." एक रिपोर्टरने व्यंग और कटूतासे कहा.

वहांसे निकलनेके लिये जॉन मुडनेही वाला था, रुककर बोला,

" मैने ऐसा कभीभी नही कहा... पुलिसको उनका कर्तव्य तो है ही... और वे उसको तत्परतासे निभाएंगे... लेकिन आतंकवाद यह सिर्फ एक घटना ना होकर वह एक फेनॉमेनॉ है ... उसमें आम लोगोंपर जादा जिम्मेदारीयां होती है... वह जिम्मेदारीयां वे निभाएंगे इतनीही हमारी उनसे अपेक्षा है..."

जॉन थोडी देर रुका और बोला,

"अब मुझे लगता है .... की इस घटनासे संबंधित सारी जानकारी मैने आपके सामने जैसी थी वैसी पुरी तरहसे रखी है... थँक यू"

जॉन पलटकर प्रेस कॉन्फरंन्ससे बाहर जानेके लिए निकला. जाते वक्तभी रिपोर्टरोंकी भीड उसे सवाल पुछनेके लिए बिचबिचमें आ रही थी. जो उसके साथ थे उन पुलिसने उसे उस भिडसे रास्ता बनाते हूए बाहर उसके गाडीतक पहुचनेमें उसकी मदत की.

क्रमश:...

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Ch-66A : झीरो मिस्ट्री (शून्य-उपन्यास) Hindi

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दुसरे दिन अलग अलग हेडींगसे कातिल मिलनेकी खबरे न्यूजपेपरमें आगई.

'झीरो मिस्ट्री' सॉल्व्ड अॅट लास्ट'

'झीरो मिस्ट्री' यह दुष्मनोंकी एक अलग चाल.'

'झीरो मिस्ट्री' यह दुष्मनोंने ललकारा हूवा एक युध्द. सिर्फ ढंग जुदा'

'झीरो मिस्ट्री' के तहत पुलिसका अंदरुनी बेबनाव जाहिर '

'झीरो मिस्ट्री' यह घटना या फेनॉमेनॉ'

'झीरो मिस्ट्री' की गुत्थी सुलझानेमें आखिर डिसमिस पुलिस अफसरही कामयाब'

'झीरो मिस्ट्री' का जनक डॉ. कयूम खान'

'विनय जोशी और डॉ. कयूम खान इनका आपसी संबंध क्या?'

टीव्ही चॅनल्सपरभी आज दिनभर 'झीरो मिस्ट्री'के अलावा दुसरी कोई खबरें नही थी. एक तरफ 'झीरो मिस्ट्री'की गुत्थी सुलझानेसे लोगोंमें संतोष था तो दुसरी तरफ उस केस का गांभीर्य और आगे होनेवाले परिणाम लोगोंके चेहरेपर अलग अलग रुपसे झलक रहे थे. इस सब झुट सच के चक्करमें अलग अलग अफवाहें फैल रही थी. ऐसे वक्तमें लोगोंको एक ठोस मार्गदर्शन और 'झीरो मिस्ट्री' का सच जैसे के तैसा उनके सामने रखनेकी जरुरत थी. .

शहरमे दंगे फसाद अब कम होते नजर आ रहे थे. लेकिन बिच बिचमें अंदर जल रही आग घात प्रतिघातके स्वरुपमें बाहर आ रही थी. ऐसे वक्तमें एक स्पेशल प्रेस कॉन्फरंस लेकर लोगोंको 'झीरो मिस्ट्री' और उसके पिछे रहे उन लोगोंके असली उद्देशके बारेमें बताना बहुत जरुरी था. 'झीरो मिस्ट्री' की गुथ्थी सुलझाकर सच बाहर लाने का पुरा श्रेय जॉनको जाता था, इसमें कोई दोराय नही थी. पुलिस डिपार्टमेंटनेभी उसे जिस जोरशोरसे डिसमिस किया था उसी जोरशोरसे सरपर बिठाकर विजयमाला उसके गलेमें पहनाई गई थी. प्रेस कॉन्फरंसमे शहरकेही नही तो सारे देशके टीव्ही चॅनल्स और न्यूजपेपरके रिपोर्टरोंने भिड की थी. प्रेस कॉन्फरंन्समें जॉनका प्रवेश होतेही सबतरफ एक जल्लोष दिखने लगा. जॉनके चेहरेपर कॅमेरेके फ्लॅश गिरानेकी मानो होड लग गई हो. इतने भिडमेंभी सामने चमक रहे फ्लशकी तरह एक विचार जॉन के जहनमें आया.

अँजेनीको खोनेके बाद उसने खुदको इस केसमे पुरी तरह डूबो लिया था और केस सुलझाई थी ...

लेकिन अब बादमें क्या ?...

यह केस ठंडी पडनेके बाद यह जो भिड उसके इर्द गिर्द दिख रही थी वह छटने वाली थी... .

और फिर वह बिलकुल अकेला होनेवाला था... .

और अकेला होनेके बाद फिरसे वह निराशा... फिरसे वह अँजेनीको खोनेका दर्द...

सोच में डूबा जॉन जहां मायक्रोफोन्स किसी गुलदस्तेकी तरह एक जगह इकठ्ठा रखे हूए थे वहा पहूंच गया. वह केस सुलझानेका सम्मान और अँजनीको खोनेका दर्द एकसाथ लेकर वह आज सब रिपोर्टरोंका सामना कर रहा था. आज पहली बार पूर आत्मविश्वासके साथ वह रिपोर्टरोंके सामने खडा था.

क्रमश:...

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Ch-65 : पेपर रोल (शून्य-उपन्यास) Hindi

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विनय पुरी तैयारीके साथ रात एक बजेके बाद डॉ. कयूम खानके बंगलेके पास आया. बंगला बाकीके मकानोंसे अलग थलग बंसा हूवा था. इसलिए बंगलेमे पिछेसे प्रवेश करना शायद मुमकीन था. विनयने अंदाजा लगाया. एक बार फिर इधर उधर देखते हूए वह बंगलेके पिछवाडेकी तरफ जाने लगा.

विनयकी नजर पहुचेगी नही ऐसी एक जगह काली कार पार्क की हूई थी. अंदर जॉन और सॅम दुर्बिणसे विनयके हर हरकतको बारकाईसे देख रहे थे. .

" मुझे लगता है अब उसे जाकर पकडनेमें कुछ हर्ज नही होना चाहिए... नहीतो देर हो जाएगी." सॅम ने कहा.

" नही अभी नही ... मुझे पुरा यकिन है की वह अंदर खुनी श्रृंखला आगे बढानेके लिए नही जा रहा है. ' जॉनने कहा.

" फिर किसलिए जा रहा होगा ?" सॅमने पुछा.

"वहीतो हमे पता करना है " जॉनने कहा.

विनय जब बंगलेके पिछेकी तरफ जाने लगा तब अंदर बैठे हूए जॉन और सॅम एकदम अलर्ट हो गए. विनय नजरोंसे ओझल होतेही वे कारसे बाहर निकल आये.


विनय बंगलेके हॉलमें खडा था. हॉलमें अंधेरा था. सामने एक कमरा खुला दिख रहा था और उस कमरेसे धुंधली रोशनी बाहर आ रही थी. बंदूक तानकर धीरे धीरे विनय उस कमरेके दरवाजेके दिशामें चलने लगा. उसको सामने एक कुर्सीपर बैठा हूवा एक आदमीका साया दिखाई दिया. उस सायेका मुंह उस तरफ था. वह साया अंधेरेमें बैठा होनेसे वह कौन है यह पहचानना मुमकीन नही था. वह साया पैर फैलाकर कुर्सीपर आरामसे बैठा हूवा था. विनय उस सायेकी दिशामें चलने लगा. उतनेमें अचानक -

" हॅन्ड्स अप... थ्रो द गन" एक कडा आवाज हॉलमें गुंजा.

जॉन और सॅम विनयके पिछे बंदूक ताने हूए खडे थे. उन्हे वह कुर्सीपर बैठा हूवा साया भी दिख रहा था. इस अचानक हूए अप्रत्याशीत घटनासे विनय घबरा गया और गडबडा गया. उसने अपनी बंदूक जमीनपर फेंक दी और अपने दोनो हाथ उपर हवामें उठाए. सामने धुंधले रोशनीमें बैठे आदमीने अपनी पहियेवाली कुर्सी आवाजकी तरफ घुमाई. विनय अब संभलकर धीरे धीरे मुडने लगा था. सामने धुंधले रोशनीमें बैठा सायाभी उठकर खडा होनेका प्रयास करने लगा.

" डोन्ट मूव्ह" जॉनका कडा स्वर गुंजा.

विनय किसी बूत की तरह अपने जगह बिना हिले खडा हो गया. वह कुर्सीपर बैठा सायाभी अपने जगहपर बैठा रहा.

लेकिन यह क्या ?...

उस सायेके हाथमें शायद बंदूक थी.....

उसके हाथमें बंदूक दिखतेही सॅमने अपने बंदूकसे उस सायेपर गोलीयां की बरसात शुरु कर दी.

" नो...." जॉनने सॅमके हाथसे बंदूक दुसरे तरफ करनेकी कोशीश की.

उनके सामने 'धप' 'धप' ऐसे दो आवाज आये. एक वह साया गिरनेका और दुसरा विनय निचे गिरनेका. सॅमकी बंदूक बाजु हटानेके चक्करमें विनयके मस्तकमें एक गोली घुस गई थी.

" व्हॉट हॅपन्ड टू यू" जॉनने चिढकर सॅमसे कहा.

" अगर मैने बंदूक नही चलायी होती तो उसने चलाई होती " सॅमने कहा.

सॅम उस काले सायेके निचे पडे शरीरकी तरफ दौडा. और जॉन विनयके निचे पडे शरीरकी तरफ दौडा. सॅमने स्टडी रूमका बडा बल्ब जलाया. निचे एक वयस्कर सफेद दाढी रखा हूवा और पुरी मुंछ मुंडाया हूवा एक शख्स पडा हूवा था. वही डॉ. कयूम था. डॉ. कयूमका शरीर एक राखके ढेरपर गिरकर राख इधर उधर बिखर गई थी. वह राख शायद कुछ कागजाद या कोई पुस्तक जलानेसे बनी हूई थी. डॉ. कयूमके हाथमें एक कागजका रोल था. उस रोलकोही अंधेरेमे बंदूक समझकर सॅमने बंदूक चलाई थी.

" उसके हाथमें कागजका रोल देखकर अपने आपपर चिढकर सॅमके मुंहसे निकल गया, " शिट ... व्हाट अ फूल आय अॅम ... यह तो सिर्फ रोल किया हूवा पेपर है.."

सॅमने निचे घुटनेपर बैठकर उस निचे गिरे आदमीकी नब्ज टटोली. उसकी नब्ज पुरी तरहसे बंद हो चूकी थी. " हि इज डेड" सॅमके मुंहसे निकल गया.

जॉनने निचे पडे हूए विनयके शरीरकी तरफ देखा. वह अबभी दर्दसे कराह रहा था. उसने निचे झुककर उसे कहां गोली लगी यह देखा और वह उसके बचनेकी कितनी संभावना है यह देखने लगा.

" इसे किसीभी हालातमें हमें बचाना पडेगा" जॉनने कहा.

उसने वैसेही वहा घुटनेपर बैठकर जेबसे मोबाईल निकाला और एक नंबर डायल करने लगा.

उधर सॅमने निचे गिरे डॉ. कयूम खानके शवके हाथसे कागजका रोल खिंच लिया. वह कागजका रोल उसने खोलकर देखा. उस कागजपर अलग अलग तारख और समय लिखा हूवा था. कही 'लाभदायक समय' तो कही 'अति लाभदायक समय' ऐसा लिखा हूवा था. कही कही 'धोकादायक समय' ऐसाभी लिखा हूवा था. उसमें डॉ. कयूमकी लगभग सब कुंडलीही लिखी हूई थी. पढते पढते सॅमका ध्यान कागजके एकदम आखिरमें गया. .

" माय गॉड !" सॅमके मुंहसे निकल गया.

" जॉन " सॅम आवाज देते हूए जॉनके पास गया.

जॉनने अभी अभी हॉस्पिटलको फोन लगाकर तुरंत यहा आनेके लिए कहा था.

"जॉन यह तो देखो " सॅमने वह कागज जॉनके सामने पकडा.

जॉनने उस कागजको हाथमें लेकर एक नजर दौडाई और वह कागज निचे फेंकते हूए कहा -

" अरे आजकल ज्योतिष्य यह एक फॅशनही हो गया है."

सॅमने वह कागज उठाया और उस कागजके आखिरमें लिखा हूवा जॉनको दिखाकर कहा-

" यह इधर देखो... यहां ... तारीख 17 रातके बारा से आगे 3 दिन 'धोकादायक समय' और यह देखो यहां रातके 12 से 2 तक 'अति धोकादायक समय' "

जॉनने वह कागद अपने हाथमें लेकर ठिकसे देखा. उसने घडीमें देखा 1 बजकर 5 मिनट हो चूके थे. और आज तारीख बराबर 17 थी. जॉन स्तब्ध होकर उस कागजकी तरफ देखने लगा. उसके चेहरेपर एक गूढतापुर्ण आश्चर्य फैल गया था. जॉन जहा खडा था वही निचे जमिनपर विनय कराह रहा था. उसने सॅमने जॉनको पढाकर सुनाया सुना था. उसे बॉसके पास रहे ज्ञानकी पुरी तरह तसल्ली हूई थी. आखिर एक दीर्घ सांस लेते हूए विनयकी गर्दन एक तरफ ढूलक गई. लेकिन उसकी वह ज्ञान हथीयानेकी इच्छा पुरी नही हो सकी थी...

क्रमश:...

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Ch-64 : डॉ. कयूम खान (शून्य-उपन्यास) Hindi

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कमांड2की यानीकी विनयकी बॉसको ढुंढनेके लिए इस एरियामें यह हमेशाकी चक्कर थी. वह लगभग रोजही इस एरियामें आकर बॉसको ढुंढनेके लिए घुमता रहता था. उसे खुदको बॉस ना पहचाने इसकी वही पुरी एतीयात बरतता था. न जाने कितनी बार, कमसे कम सौके उपर, वह इस एरीयामें बॉसको ढुंढनेके लिए आया होगा. लेकिन उसने कोशीश जारी रखी थी. निरंतर प्रयास करते रहना यह एक उसका गुण ही था. आज दिनभर घुम घुमकर वह थका हूवा था. शाम हो चुकी थी. शहरका मौहोल अब काफी ठंडा पडा हूवा था. हालहीमें उसे बॉसका इंटरनेटपर एक मेसेज आया था. अब यह खुनी श्रुंखला दुसरे एक शहरमेंभी शुरु करनी थी. बॉस नही चाहता था की मौहोल ठंडा पडे. वैसे दुसरे शहरमें खुनी श्रुंखला शुरु करनेके लिए और वक्त था. लेकिन विनयको दुसरे खुनी श्रुंखलामें बिलकुल रुची नही थी. उसके पहलेही उसे उसने शुरु किए खेल का अंत करना था. लेकिन अभीतक एकभी धागा हातमें नही आ रहा था. वह सोचते सोचते एक बडी बिल्डींगका काम चल रहा था वहा खाली जगहमें जाकर खडा हो गया. उसे थकनेकी वजहसे कही बैठनेकी जरुरत महसुस हूई. बैठनेके लिए कुछ है क्या यह देखनेके लिए उसने आजु बाजु देखा. एक जगह रेत का एक बडासा ढेर पडा हूवा था. कोई हमें देखेगा या कोई हमें पहचानेगा इसकी पर्वा ना करते हूए वह उस ढेरपर बैठ गया.

जहा विनय बैठा हूवा था वहांसे लगभग 200 मीटरपर एक काली कार रस्तेके किनारे रुकी हूई थी. गाडीका काला शिशा चढाया हूवा था. इसलिए अंदरका कुछ दिखाई नही दे रहा था. लेकिन अंदरसे जॉन और सॅम दुर्बिणसे विनयकी सारी हरकते निहार रहे थे.

'आज लगभग 5 दिन होगए है हम इसके पिछे है. लेकिन साला इस एरियामें क्या ढूंढ रहा है कुछ पता नही चल रहा है. " सॅमने जॉनसे कहा.

" मुझे लगता है ईसीमें सारे कत्ल का रहस्य छिपा होगा. " जॉनने कहा.

" लेकिन हम कितने दिन ऐसे इसके पिछे पिछे घुमेंगे ? " सॅमने पुछा.

" जबतक उसे जो चाहिए वह मिलता नही तब तक " जॉनने कहा.

" वह अपना अगला शिकार तो नही ढूंढ रहा है? "

" वही तो हमें ढूंढना है... लेकिन मुझे ऐसा नही लगता " जॉनने अपनी राय बताई.

बैठे बैठे विनयका सामने एक बंगलेकी तरफ ध्यान गया. सामने दरवाजे के खंबेपर पत्थरमें मालिकका नाम खुदा हूवा था. और वहा पत्थरके चारों तरफसे रोशनी आनेके लिए बल्बका इंतजाम किया था. विनयने ऐसेही वह नाम पढा.

'डॉ. कयूम खान'

विनयने वह नाम फिरसे पढा.

'डॉ. कयूम खान'

नाम पहचानका लग रहा था. यह नाम कहीतो पढा या सुना लग रहा है. विनय अपने दिमागपर जोर देकर याद करनेकी कोशीश करने लगा. वैसे उसको सब मुस्लीम नाम सरीके लगते थे. शायद इसलिए वह उसे पहचानका लग रहा हो. वह सोचने लगा. अचानक वह जहा बैठा था उसके पिछे 'घरऽऽ घरऽऽ' ऐसा जोरसे आवाज आने लगा. विनय अप्रत्यक्षित तरहसे आये आवाजसे एकदमसे चौककर लगभग खडाही होगया. उसने पिछे पलटकर देखा. पिछे बिल्डींगका कंस्ट्रक्शन चल रहा था और रेडीमीक्स काँक्रीट मशीन अभी अभी शुरु हूई थी. वह खुदको संभालते हूए बाजू हटने लगा. अचानक उसके दिमागमे मानो रोशनीसी कौंध गई.

" माय गॉड" उसके मुंहसे निकल गया.

उसने एकबार फिरसे सामने खंबेपर लिखा नाम पढा. और फिर उस रेडीमीक्स काँक्रीट मशीनकी तरफ देखा. उसके दिमागमें अब सब पहेलिया सुलझ रही थी. .

'डॉ. कयूम खान' यह तो मैने पढे आर्यभट्टके उपर लिखे रिसर्च पेपरका कोऑथर है...

और यह रेडीमीक्स काँक्रीट मशीनकी घरघर उसे एकबार बॉसके फोनपर सुनाई दी थी. ....

"मतलब डॉ. कयूम खानही अपना बॉस है !"

उसके शरीरमे अब फुर्ती दौडने लगी. वह डॉ. कयूम खानके घरकी तरफ जानेके लिए लपका. फिर ब्रेक लगे जैसा एकदम रुका.

नही अब नही...

मुझे सही समय देखकर सब बराबर प्लॅनींग करते हूए अंदर प्रवेश करना पडेगा...

उसने कैसेतो खुदको रोका.

क्रमश:...

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