... दुनियाके इतिहासमें शून्यकी खोजको बडा महत्व है. शून्यकी खोजने गणितको एक नई दिशा और पुर्णत्व दिया. शून्यको एक नंबरके हैसीयतसेही नही तो एक कॉन्सेप्टके हैसीयतसे बडा महत्व है. अभीभी विज्ञानमें ऐसी बहुतसारी समस्याए है की जो शुन्यके बिना और परिणामत: 'अगणित' (infinity) इस कॉन्सेप्ट के बिना सुलझाना लगभग नामुमकिन है. शून्यकी खोज किसने की इस बातपर बहुत संभ्रम और अलग अलग धारणाए अस्तीत्वमें है. लेकिन यह भी एक सच है की अमेरिका और युरोप जैसे दुनियाके हिस्सेमें जिसकोकी अब बहुत जादा प्रगत समझा जाता है वहां शुन्यकी खोज नही हूई थी. वहां बाकी खोजोंकी तरह शून्यको चतूराई और कपटसे 'इंम्पोर्ट' किया गया था. इतनाही नही तो युरोप और अमेरिकामें जो रोमन अंकपध्दती शुरुमें इस्तेमाल की जाती थी वह बहुत ही अनपुयुक्त और अपरिपूर्ण थी. क्योंकी उस पध्दतीमें आंकडेंको उसके जगहके अनुसार महत्व या व्हॅल्यू ना होनेसे उस अंक पध्दतीममें गणितके बेसीक प्रक्रियायें जैसे जोडना, घटाना, विभाजन, गुणन भी ठिक ढंगसे और जलद नही किये जा सकते है.
अब शुन्यके बारेमेंही बोलना हो तो एक धारणा ऐसी है की शून्यकी खोज सबसे पहले भारतमें लगी. 1 यह प्राकृतिक पहली संख्या है. 1 के बाद आनेवाली प्राकृतिक संख्या .. 2,3,4,5,6 ... इत्यादि है. इन संख्यांयोंका कोई अंत नही. 1 में 1 का योग करनेसे 2 आता है. 2 में 1 का योग करनेसे 3 आता है. . 3 में 1 का और 4 में 1 का योग करनेसे क्रमश: 4 और 5 आता है. इसी प्रकार 6,7,8... इत्यादि संख्यायें आयेगी. योग इस क्रियाके विरुध्द क्रियाको व्यवकलन यानेकी घटाना कहते है. . 5 मेंसे 1 का व्यवकलन करनेसे 4 प्राप्त होता है , 4 से 1, 3 से 1 और 2 से 1 का व्यवकलन करनेसे क्रमश 3,2,1 ऐसे : प्राप्त होते है. लेकिन अब सवाल आता है की 1 से 1 का व्यवलोकन करनेसे क्या प्राप्त होगा? यह सवाल सबसे पहले भारतीय ऋषींयोंके दिमागमें आया . 1 से 1 का व्यवलोकन करनेसे रिक्तता उत्पन्न होती है , और उसे 0 के स्वरुपमें लिखा जाता है.. शून्यको संख्याके स्वरुपमें किसने उपयोगमें लाया यह कहना थोडा कठिन है. लेकिन इतनी जानकारी मिलती है की ई.पू. दुसरे शताब्दीमें यूनानके जोतिषी शून्यकेलिए 0 का इस्तेमाल करते थे. लेकिन वह लोगभी उसी अर्थसे उसका उपयोग करते थे जिस अर्थसे बॅबीलॉनीयन लोग उपयोग करते थे. 200 ई.पू. आचार्य पिंगलके छन्द: सूत्रमें शून्यका इस्तेमाल मिलता है. भक्षाली पाण्डूलिपिमें (300 ई.) शून्य चिन्हका (0) प्रयोग कर संख्याए लिखी हूई मिलती है. इस ग्रंथके 22वे पन्नेपर शून्य चिन्ह (0) मिलता है. शून्याका सबसे प्राचीन चिन्ह है (.).
शून्यका खोजही नही तो बीजगणित, भूमिती इन सबपर आर्यभट्ट् गणिततज्ञके कालमें बहुत कार्य किया गया. लेकिन वह सब कार्य संस्कृतमें सूत्रोंके स्वरूपमें होनेसे जिनको संस्कृत नही आता वे उसे समझ नही पाए. कालके साथ भारतमें वह पिढी दर पिढीतक मुखोद्गद करके संजोया गया. शून्यके खोजका मूल भारतीय इतिहासके वैदिक कालमें अलग अलग स्वरूपमें मिलता है. सबसे पहला जिसे कोईभी ठूकरा नही सकता ऐसा प्रमाण ग्वालेर को मिला. ग्वाल्हेरमें एक जगह संवत 933 में खुदाये गये कुछ आंकडे मिले. वहा एक जगह 50 हार का उल्लेख मिलता है और 270 यह संख्या हिंदी अंकका उपयोग कर लिखी हूई है. यहा शून्यका संख्याही नही तो प्लेस होल्डर के हैसीयतसेभी उपयोग किया गया है.
दुनियाके इतिहासमें बह्मगुप्त यह पहले गणिततज्ञ थे की जिन्होने नॅचरल नंबर्स और झीरोपर अलग अलग गणिती प्रक्रिया करनेका प्रयास किया था. औरभी कुछ सभ्यताओंने जैसे बॅबीलॉनीयन लोगोंनेभी एक चिन्ह शून्यके लिए प्लेसहोल्डर और एक संख्या की हैसीयतसे इस्तेमाल कीया था. लेकिन एक धारणाके अनुसार दुनियाके इतिहासमें भारतीय सभ्यतामेंही सबसे पहले झीरोका एक संख्या, एक प्लेस होल्डर और एक संकल्पना के हैसीयतसे इस्तेमाल हूवा था. इस चिन्हको , उस प्लेस होल्डरको और संकल्पनाको भारतीय वेदीक साहित्यमें 'शून्य' ऐसा नाम दिया हूवा मिलता है . ...
क्रमश:...








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