अभीभी अँजेनी खानेके टेबलपर बैठी थी. टेबलपर जलाई मोमबत्तीयां आखीर बुझ गई थी. टेबलपर सिर्फ बचा था इधर उधर फैला हूवा मोम. उसके दिलका हालभी कुछ उस मोम जैसाही था. जल जलकर जमे जैसा. टेबलपर खाना वैसाका वैसा रखा हूवा था. राह देख देखकर थकनेके बाद वह कुर्सीसे उठ गई. उतनेमे घडीका गजर बजा. बारा बार. कोई मानो उसके दिलपर घांव कर रहा हो ऐसा उसे लग रहा था. रातके बारा बज चूके थे. .
वह बराबर आठ बजे यहांसे गया था... .
मतलब चार घंटे हो चूके थे. ...
वह शायद कॉटेजके आसपासही पहूंचा होगा...
वह खिडकीके पास जाकर बाहर झांककर देखने लगी. कॉटेजकी तरफ आनेवाला रास्ता एकदम सुनसान था. ना किसीकी आहट ना किसी वाहन के लाईट्स. वह काफी समयतक रास्ते पर आखे लगाए रास्ता ताकती रही. अचानक उसे दो दिए रास्तेसे सामने आते हूए दिखाई दिए. वे उसकी तरफही आ रहे थे. उसका चेहरा खुशीसे खील गया.
वही होगा ...
जरुर जॉन ही होगा ...
वह दूर रास्तेपर आगे सरकते गाडीके लाईटस की तरफ देखने लगी. जैसे जैसे गाडीके दिए नजदीक आने लगे उसका दिल खुशीसे नाचने लगा.
जॉनके बारेमै मैने संदेह नही करना चाहिए था ...
उसे अपराधी लगने लगा था. गाडी अब सामने चौराहे तक आ पहूची थी.
गाडी एक टर्न लेगी और फिर अपने कॉटेजके तरफ आयेगी. ...
लेकिन यह क्या ?...
गाडी चौराहेपर कॉटेजकी तरफ ना मुडते हूए सिधे सामने निकल गई....
फिरसे निराशा उसके चेहरेपर दिखने लगी. अपने मनकी विषण्ण भावना दूर करनेके लिए वह कमरेमे चहलकदमी करने लगी. बिच बिचमें वह खिडकीसे बाहर झांकती थी. सामने रस्ता फिरसे पहले जैसा खाली खाली दिखने लगा था. चहलकदमी करते हूए उसने फिरसे दिवार पर टंगे घडीकी तरफ देखा. साडे बारा बज चूके थे. जॉनका अभीतक कोई अता पता नही था. उसे अब अकेलपन का डर लगने लगा था. उसने फिरसे एकबार खिडकीसे बाहर झांका. उसकी आशा फिरसे अंकुरीत होने लगी. फिरसे गाडीके दो दिए उसे रास्तेपर सरकते हूए दिखाई दिए.
अभी जरुर वही होगा ...
वह फिरसे खिडकीके पास खडी होकर लाईट्सकी तरफ लगातार देखने लगी.
यह गाडी जॉनकी हो सकती है .. और नही भी हो सकती...
लेकिन दिल ऐसा होता है की आदमी को आशा लगाए देता है... ...
अचानक चौराहेपर आनेके बाद गाडीके दिए गायब हो गए.
क्या हूवा ?..
गाडी वहा रुकी तो नही ?...
या फिर गाडी आ रही है ऐसा सिर्फ आभास..?...
वह खिडकीसे हटकर फिरसे कमरेमे चहलकदमी करने लगी. अचानक उसे निचे गाडी के हॉर्नका आवाज आया. वह खिडकीकी तरफ दौडी और उसने बाहर झांककर देखा. जॉन गाडीसे उतर रहा था. उसके जानमे जान आगई. वह दरवाजेके तरफ दौडते हूए चली गई. दरवाजा खोलकर जॉनकी तरफ वह लगभग दौडते हूएही लपकी. सामनेसे जॉनभी दौडते हूए आ रहा था. वह दौडतेही जॉनकी बाहोंमे समा गई.
" कितना वक्त लगाया ? ..." वह जॉनके सिनेपर हलके हलके मुक्के मारते हूए बोली.
" कितनी घबरा गई थी मै .....मुझे तो लगा की तुम मुझे यही छोड जावोगे..." उसकी आंखोमें देखते हूए वह बोली.
" नासमझ हो... ऐसा कभी हो सकता है क्या ?" वह उसके कंधेपर हाथ डालकर उसे कॉटेजमे लाते हूए बोला.
दोनोभी एकदुसरेके कमर मे हाथ डाले सिढीयां चढने लगे.
" अबतो बोलोगे ... कहां गए थे?" उसने पुछा.
" बताता हूं ... बताता हू... थोडा सब्रतो करोगी" वह बोला.
अब दोनो कॉटेजमे आगए. अँजेनीने अंदर आतेही सामनेका दरवाजा बंद किया. और वह क्या बोलता है इसका बेसब्रीसे इंतजार करते हूए उसके आगे पिछे करने लगी. वह सिधा अंदर डायनींग टेबलके पास गया. वह भी उसके पिछे पिछे वहा गई. उसने फिरसे खानेके टेबलपर मोमबतीयां जलाई. घरके सारे लाईट्स बंद किये. अँजेनी कुछ ना समझते हूए सिर्फ उसके पिछे पिछे जा रही थी. उसने उसके कंधे को पकडकर उसे उसके सामने कुर्सीपर बिठाया.
" बैठो, बैठो .. मै तुम्हे बताता हू की मै कहा गया था..." वह उसे बोला.
वहभी उसके सामने बैठ गया. थोडी देर दोनो शांत बैठे रहे. फिर जॉनने उसकी आंखोमें देखते हूए उसके मुलायम हाथ अपने हाथोंमे लिए. मोमबत्तीयोंके रोशनीमें उसका चेहरा और ही निखर आया था. जॉनका आने के बाद यह क्या चल रहा है यह ना समझते हूए वह असमंजससी उसके तरफ देख रही थी.
" अँजेनी तूम मुझसे शादी करोगी ?" उसने उसके आंखोमे आखे डालकर देखते हूए उसे प्रपोज किया.
अँजेनीको तो एकदम भर आए जैसा हुवा.
लेकिन खुदकी भावनाए संभालते हूए वह बोली, " इज धीस सम काईंंड ऑफ जोक?"
" नही नही ... मै सिरीयसली बोल रहा हूं " वह बोला.
" देखो जॉन पहलेही तूम इतनी देर नही थे तो मुझे अकेलापन महसूस हो रहा था... कम से कम ऐसे वक्त ऐसा फालतू मजाक मत करो." वह बोली.
" नही अँजी ... मै मजाक नही कर रहा हूं " वह उसे विश्वास दिलानेका प्रयास करने लगा.
जॉनने उसे पहली बार प्यारसे 'अँजी' कहा था. वह उसकी आखोंमे देखकर उसकी भावनाए टटोलनेकी कोशीश करने लगी.
" तुम्हे सच नही लग रहा है ना ..."
उसने अपने कोटके जेबसे एक छोटा लाल बॉक्स निकालते हूए कहा ,
" यह देखो मैने तुम्हारे लिए क्या लाया है ..."
" क्या है ?" उसने प्रश्नार्थक मुद्रामें पुछा.
उसने बॉक्स खोलकर उसके सामने पकडते हूए कहा,
" एंंगेजमेंट रिंग ... ऑफ कोर्स इफ यू अॅग्री.."
उसने फिरसे एकबार उसे पुछा , " विल यू मॅरी मी प्लीज"
अँजेनीके आंखोमें आंसू तैरने लगे.
" इसके लिए गये थे तूम सिटीमें ?" उसका गला भर आया था.
उसने उसकी आंखोमें देखते हूए 'हां' मे अपनी गर्दन हिलाई.
वह कुर्सीसे उठकर खडी हो गई. वह भी अपने कुर्सीसे खडा हूवा. वह आवेगके साथ उसके बाहोंमे समा गई. .
" यस आय विल" उसके भरे हूए गले से शब्द निकले.
जॉनके चेहरेपर खुशी और समाधान फैल गया. वह अतीव आनंदसे उसे उठाते हूए उसे चूमने लगा. उसने फिर धीरेसे उसे निचे उतारते हूए बॉक्स से अंगूठी निकालकर धीरेसे उसकी तिसरी उंगलीमें सरका दी.
क्रमश:...
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Friday, February 15, 2008
Ch-36: प्रपोज (शून्य-उपन्यास)
Posted by
Sunil Doiphode
at
11:02 AM
Labels: hindi, hindi literature, अंतर्जाल, उपन्यास, राष्ट्रभाषा, साहित्य, हिन्दी
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