... हिमालयमें उस पर्बत के तले बह रहे नदी के किनारे जो गुंफा थी उस गुंफामें अभीभी वह ऋषी ध्यानस्त बैठा हूवा था. अचानक उसने अपनी आंखे खोली. उसकी आंखे लाल लाल मानो आग उगल रही थी. धीरे धीरे उसके आंखोकी लाली कम होगई और उसकी आंखे फिरसे बंद हो गई. और फिरसे जगह और अपने शरीर से अनजान उनकी सुक्ष्म अस्तीत्वका विचर अपनी मर्यादाए लांघकर मुक्त रुप से होने लगा.
एक जंगलमें एक पर्णकुटी थी. पर्णकुटीके सामने आंगनमें तिन लोग बैठे हूए थे. वे आपसमें कुछ बाते और चर्चा कर रहे थे. उन्होने उनके सामने छोटी छोटी लकडीयोंके छोटे छोटे समुह बनाये थे. एक समुहसे लकडीयां निकालकर दुसरे समुहमें डालना या फिर एक समुहसे लकडीया निकालकर उसका दुसरा समुह बनाना ऐसा उनका चल रहा था. ऐसा करते हूवे वे आपसमें चर्चाभी कर रहे थे. उनके हावभावसे ऐसा प्रतित हो रहा था की वे उनकी किसी दूविधाके बारेमें बात कर रहे हो. उतनेमें उनके पिछेसे वह ऋषी आगया. उसकी आहट होतेही वे तिनो मुडकर उसकी तरफ देखने लगे.
ऋषीने तिनोंपर अपना दृष्टीक्षेप डाला.
" मुझे पता है तुम लोग किस दूविधामें हो " ऋषीने गूढ अंदाजमें कहा.
तिनोंके चेहरेपर आश्चर्य झलकने लगा.
हमारे मनमे क्या चल रहा है यह इस ऋषीको कैसे पता. ?...
वे कुछ बोले उससे पहलेही वह ऋषी चलते हूए उनके पाससे सामने निकल गया. वे उस ऋषीकी जाती हूई आकृतीको देखने लगे.
ऋषी एकदम रुक गया और उनकी तरफ मुडकर बोला , " चिंता मत करो मै तुम्हे तुम्हारी दुविधासे जल्दीही तुम्हे मुक्त करुंगा "
वह ऋषी फिरसे मुडकर अपना रास्ता चलने लगा. वे तिनो खुले मुंहसे आश्चर्यसे उस ऋषीकी जाती हूई आकृतीको वह आकृती अदृष्य होनेतक देखते रहे....
क्रमश:...








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